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फ़लसफा : ज़िंदगी का

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24 May 2010
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पाँच कविताएँ

१:कविताएँ हैं विस्मयकारी दवाएं ,जो हमें जिंदा रखती हैंजब हम जीने के ख्वाहिशमंद हैं ;और जब हम मरना चाहते हैंतब भी जिंदा रखेगी ,सुनाकर मृत्यु के कुतूहलपूर्ण विवरण |२:चौबीस घंटे ,सातों दिन ,बारहों मास ,और सम्पूर्ण ज़िन्दगी |ज़िन्दगी के किसी एक पल को जीने
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आत्मकथ्य

यह प्रारंभनहीं है निमेश भर, मायापाश काऔर न ही अंतिम मुक्ति का प्रश्वास;यह तिमिर हैचिरसंचित,चिरकालीनउस दिन सेजब वे मुझे कैद कर गए थेरहस्य-गर्भ स्पंदित कारागारों में ;तब रुद्ध-सिंहा मेरी आत्माबच निकली थी,वातायन वेदना के दौरानउन सघनित लोहे की सलाखों
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त्रिवेणीनुमा कुछ

कैमरे छिपे हुए हैं हर शहर हर गली,और जंगलों में आजकल रहते हैं नक्सली |बसंती परेशान है, मिले तो कहाँ मिले ||
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उद्विग्न-व्याकुलता

मेघ पुनः संदेशा लाए,मग में कोई नयन बिछाए |कैसे आऊँ द्वार तुम्हारे ,तेरे-मेरे नेह के पथ में घिर आते हैं जग के साए |निशा गयी और प्रात हुआ अब,स्वप्न-आकृति छूटी मन की |एक-दूसरे से मिल न सके , यह विडम्बना है जीवन की ||धूसर दिवस आज प्रिय तुम बिन, विप्लव की
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पाँच क्षणिकाएं

१ : रिश्ते प्रतीकों को रूपकों,उपमाओं में बदलकर मैंने अपनी बात क्या कही वह सबकी हो गयी . सबके सब रिश्ते टंगे हैं कच्ची डोर की अरगनी पर सबको भय लगा है यहाँ ग्रहण लग जाने का २ : जीवन हम जिन्दा लाशें बने किसी अप्रत्याशित कल्पना में डूबे रहे इस ज़िन्दगी म
Dec 29 2009 11:50 AM
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वे अल्हड़ दिन....

वे बादलों पर बैठकर आसमान घूमने के दिन थे महकते फूलों पे बैठी तितलियाँ पकड़ने के दिन थे वे पोसमपा खेलने झूला झूलने के दिन थे नंगे पाँव गाँव की सरहदे पार करने के दिन थे वे शीशम की छाँव तले चिड़ियाँ निहारने के दिन थे रहट की बाल्टियाँ चढाने,उतारने के दिन
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दोस्त किसको माने हम

लुटने का अंदेशा है यहाँ घर के ही पहरेदारों से खुद को बेगानी दुनिया में महफूज़ कैसे माने हम . दिल कहता है तेरे फैसले,हैं सच्चाई पे ज़माने के पर्दे अक्स-ए-हकीक़त क्या है दोस्त,बतलाओ कभी तो जाने हम . मुद्दतों से सुनते आये हैं तारीफ़ कूचे-कूचे में कभी बद
Dec 29 2009 11:50 AM
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ये जख्मों का किस्सा पुराना है...

ये कैसी हलचल है,कैसा आना-जाना है जाओ,मयकशी है यहाँ,ये मेरा आशियाना है . वक़्त ने भुला दिए हैं,अब न कुरेदो इनको गोया जल उठूँगा,ये जख्मों का किस्सा पुराना है . कौन जाने अबकी बिछ्ड़े तो कल को कब मिलें आजमा ले आज,जितना आजमाना है . आवारा-मिज़ाजी हमारी सीख
Dec 29 2009 11:50 AM
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Abhivyakti ki khaatir

कभी-कभी सोचता हूँ बंद कर दूँ ये कविता लिखना कविताएँ पढ़कर कभी लुटाये होंगे सैनिकों ने प्राण और बदली गयी होगी दुनिया किसी ज़माने में पर मैं आश्वस्त हूँ मेरी कविता से कुछ नहीं हो सकता न तो मैं मुर्दों में जान फूंक सकता हूँ न मैं बदहालों को कुछ दिला सकत
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पाजी नज्में

फासला दोनों के दरम्यान बस दो क़दमों का फासला था बढ़ाएगा पहला कदम वो सोचकर दूसरा नहीं बढ़ा बीमारी वह रहने आई थी मुहल्ले में दवाखाने भर गए हकीम समझ ही न सके मुहल्ले में कौन सी बीमारी आई है बातें ज़माने में दोनों की बहुत बातें होती थी पर रहते थे दोनों ख
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चैन,सुकून,शान्ति

इस तरह मुँह फुलाए क्यूँ बैठे हो गुस्सा न हो अब मुझे क्या मालूम था तुम सचमुच ही जान निकालकर देखोगे . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . "तुम्हारे लिए मैं जान दे सकता हूँ" मेरा ऐसा कहना तुम्हें नाटकीय लगता है क्या कहा तुमने? "हर कोई यही कहता ह
Dec 29 2009 11:50 AM
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फ़लसफा : ज़िंदगी का

समय का ये कौन सा दौर है लगता है मौसम ने घोंट के सारी संवेदनाएं घोल दी है तन्हाई न स्मृति के फाटक पर यादों की दस्तक होती है न चित्रों चलचित्रों से हास्य रुदन की भावनाएं आती हैं बस विचारों की खींचातानी मची रहती है . . सूरज लगता है कोई बंधुआ मजदूर मद्धम
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अवधारणाएं

हम अक्सर बहुत सारी अवधारणाएं सच मान लेते हैं गाहे-बगाहे,जाने -अनजाने . हमें दिखाई देता है सूरज का हर शाम पर्वत पार सो जाना और अल सुबह मेहनती किसान की तरह जाग जाना हमें चाँद का आकार लगता है अनामिका के नाखून से छोटा धरती लगती है तश्तरी की तरह चपटी और ह
Dec 29 2009 11:50 AM
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फ़लसफा : ज़िंदगी का

सुबह-सुबह खिलती हुई धूप और फुदकते हुए पंछी हाँ ये समय है इमली वाली गली में दर्जी की दुकान खुलने का और चूड़ी वाले का महिलाओं को रोककर चूड़ी पहनने का आग्रह करने का . . तुम मसरूफ हों हो सकता है गूँथ रही हो आटा और हवा बिखरा देती है मुँह पर गेसू तुम झुँझलाक
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आग्रह/तीन क्षणिकाएं

आग्रह-१ मुझे याद है, तुम घायल शावकों को बचाने ले जातीं थी चिकित्सालय; और बिलखते बच्चों को देख लुटा दिया करती थीं दो टिकिट और पॉपकोर्न तुल्य सारे पैसे | यदि पहले की दया-भावना का अंशभर भी मौजूद है आज, तो ये लो खंज़र और घोंप दो मेरे ह्रदय में; हत्याओं क
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आग्रह

गुजर चुकी हैं कौशाम्बी और नालंदा की सभ्यताएं , बीत गया है मौर्य और गुप्त वंशों का स्वर्ण-काल , और मिट गया है आदिमयुगीन ताम्र-युग | फिर घोर उद्योगवाद के दौर में अयोध्या को पाषाण-युग में कैद कर आपकी पथराई सोच चाहती क्या है ? कृपा करो अयोध्या पर !! वह आ
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अब मैं नहीं याद करता तुम्हें

अब मैं नहीं याद करता तुम्हें बरस बीते मिले थे हम दूर देश में | एक और देश में दूसरे आज मैं नहीं याद करता तुम्हें | जाने कहाँ हो तुम बरस बीते | पीता हूँ सिगरेट ढूँढता हडबडाकर माचिस जाकर खड़ा हो जाता खिड़की के पास | सूर्यास्त | अब मैं नहीं याद करता तुम्ह
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नींद को

जब स्वप्नदृष्टा दुनिया मसरूफ होती है स्वप्नों की और स्वप्नों सी रंगीनियों में , तब देखकर मैं पल-पल गुजरता वक़्त , इंतज़ार किया करता हूँ तुम्हारे आगमन का | जानता हूँ,तुम नहीं आओगी और न ही बुलाओगी , इसीलिये सुनने लगता हूँ तुम्हारे लिए सुरक्षित रखा मोजार
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स्वाभिमान--(निजता का बोध)

नयनाभिराम बन जाते हो, प्रभु शीशों को तुम भाते हो ; शत-शत जन को पुनरपि-पुनरपि मोहित करते जाते हो | तुम पुष्प बनो और महको तुम ,ये गौरव तुम्हें मुबारक हो; मैं कंटक हूँ,मर्यादित हूँ,है कंटक बन अभिमान मुझे || १- म्रदु हाथों से पाला जाये, और गहनों में ढाला
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आवागमन

वे गहन वेदना के क्षणों में, और गूंजते सन्नाटों में , अक्सर ढूँढा करती हैं हमारी खुशियाँ | जब वे जिया करती हैं मिलने की तीव्र उत्कंठा लिए. तब हम होते हैं जल्दबाजी में ; बघारते हैं एक से बढ़कर एक थ्योरी , और भर देते हैं कूडेदान बीमारी लिए अनेकानेक लिफा
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खामोशी

उन दिनों मैं समझा करता था तुम्हें सर्वस्व , और भटकता था तुम्हारे साहचर्य में बना हुआ 'अहम् ब्रह्मास्मि' | उस भोले से मस्तिष्क के सबसे सुदूर कोने को भी कहाँ ज्ञात था , कि जब हम गुजार रहे होंगे निश्चिंत रातें सोफे पर लम्बी टांगें पसारकर, तुम आओगी एक दि
Oct 14 2009 07:49 PM
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साक्षात्कार

उसे जगाया गया था कच्ची नींद से इस एकाकी यात्रा के लिए आखिर उसके निर्निमेष पलकों में यही तो समाया था अनेकानेक वर्षों से अपना समस्त चेतन,शौर्य और निश्चय उस क्षण में उँडेलकर वह बढ़ने लगा कान नहीं थे उसके पास सवाल सुनने को और कदम अनुमति नहीं देते थे थम ज
Oct 14 2009 07:49 PM
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अभिलाषा

वे भुलाती हुईहमारी सारी वेदनाएँ और सुखसमय और उम्रजन्म ले लेती हैंजटिल से जटिल परिस्थितियों मेंउनके आश्रय में हमलहरों की अंगडाई सुला देते हैंआकाश की ऊँचाई मिटा देते हैंआँधियों में दीप जलाने लगते हैंपत्थर की छाती पर नव-अंकुर उगाने लगते हैंवे उडाकर हमारी
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वो प्रेम का त्यौहार हूँ

मधुऋतु की कोमल बयार हूँ गले का आशातीत हार हूँ आया हूँ तुमसे मिलने मैं जीवन की मधुता का सार हूँ खुशबू बिखेरूँ चमन में कर दूँ समर्पित आगमन में मुरझा न सके जिसको अनल मैं सुमन वो नव आकार हूँ मलय जिसे उड़ा न सके जलाधार जिसे डिगा न सके निकलेंगी लहरी हर ऋतु
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प्यार और लड़कियाँ

वे हाथ में हाथ डालकर घूमा करती हैं सिनेमा और पार्क मानो मिल रहे हों चुम्बकों के दो विपरीत ध्रुव मिलते ही एकांत घंटों बतियाती हैं मोबाइल पर गज़लें,गुलाब कॉलेज,किताब मौसम,हवा बादल,घटावफाई,बेवफाई और गढे मुर्दों की खुदाई उन्हें आती हैं सैकडों दलीलें शैम्पू
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हिंदी दिवस की शुभकामनाएं

समस्त हिंदी ब्लोगिंग जगत को हिंदी दिवस के मौके पर मेरी हार्दिक शुभकामनाएं . मुझे कुछ महापुरुषों के उद्गार याद आ रहे हैं जिन्हें इस मौके पर आपके साथ बांटना चाहूँगा "निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा ज्ञान के मिटत न हिय को शूल" -भारतेंदु
Sep 14 2009 08:07 PM
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एक पाती

कलमों की नोंकें टेढ़ी हो जाती हैंआपके व्यवहार की शिष्टता लिखते हुएऔर जुबान तालू से चिपक जाती हैआपके सिद्धांतों की परिपुष्टता के आगेइसलिए कभी साहस नहीं जुटा पाताआपका गुणगान करने कापर आज मेरे हाथ फड़फड़ा रहे हैंऔर मस्तिष्क उद्वेलित हो उठा हैअब आपका महिमा
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हमारी दुनिया बहुत भिन्न है

सृजन का सौंदर्य होया धर्म की पराकाष्ठा न्याय,संस्कृति,साधन बल,बुद्धि और धन साथ में भक्ति,ढोंग,पाखण्ड क्रोध,शोक,रोग वासना और निर्लज्जता सब कुछ तुम्हारे साए में रहते हैं हमारे पास है केवल पसीने और कीचड़ की दुर्गन्ध हमारे शब्द सीमित हैं और शब्दों के मायने
Sep 10 2009 04:35 PM
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रात्रि बेला की ख्वाहिशें

गली-गली बने शिवालयों मेंनीरव खामोशीघुप्प अंधकारऔर धुंधले चित्रों की क्रमहीन श्रंखलामेरे प्यारे बनारस की धरती परमैं भरा हूँतुम्हारी दुनिया मेंतुम्हारे आभामंडल की दुनियाअंतहीन जैसे समयचमकीली जैसे तारेतुम्हारे बारे में सोचनाजैसे निहारनादुग्ध-धवल झीनी चादर
Sep 10 2009 04:25 PM