यादों का इन्द्रजाल... Hindi Poetry by Sulabh's Image

यादों का इन्द्रजाल... Hindi Poetry by Sulabh

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15 Jun 2010
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बेचारा बहुरंगी

अरे बेटी सुनैना ज़रा दो मिनट पास बैठना | पापा आज आप बहुत खुश दिख रहे हैं क्या कोई खुशखबरी है या मुझे देख हंस रहे हैं | तुम तो जानती हो बेटी तुम्हारे लिए वर की तलाश है और आज बात बहुत ख़ास है मैं मिलकर आया हूँ एक शख्स से नाम है उसका बेचारा बहुरंगी चेहरे से
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शुरू करो उपवास रे जोगी

जब तक चले श्वास रे जोगी रहना नज़र के पास रे जोगी बंधाकर सबको आस रे जोगी कौन चला बनवास रे जोगी हर सूँ फ़र्ज़ से सुरभित रहे घर दफ्तर न्यास रे जोगी सदियों तक ना प्यास जगे यूँ बुझाओ प्यास रे जोगी टूटे हिम्मत फिर से जुड़ेंगे खोना मत विश्वास रे जोगी जो भी पहना
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नौकरी (लघुकथा - सुलभ)

"अंकल आ गए... अंकल आ गए... " घर पहुँचते ही पांच वर्षीय भतीजा सोनू ख़ुशी से चहक उठा. सोनू के प्यारे अंकल रमन ने भी सोनू को गोद में उठाकर अपने कमरे में ले आए और पुचकारते हुए कहा "हाँ ! तुम्हारे अंकल आ गए और तुम्हारे लिए एक खिलौना लाये हैं... ये देखो
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दौरे-तरक्की नहीं कुछ बेसुरों का राग है

दौरे-तरक्की नहीं कुछ बेसुरों का राग है कागजों पर महकता हिन्दुस्तानी बाग़ है सबको मिलेगी रौशनी बड़े बड़े वादे कर गुपचुप तेल पी रहा खुदगर्ज़ चिराग़ है मायूस हुआ किसान सोना हरा उगा कर जम्हूर के आसमान से बरसता आग है दाल दिखता नहीं है खाने की थाली मे तरकारी
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दो चार दिनों के लिए मर नही सकते...!

आज से तीन साल पहले का मंजर याद आता है... खुद पर तरस आता है... ये स्वयं पर विश्वास का ही असर है की बहुत से झंझावातों को झेलते हुए एक अकेला युवक महानगर में अपनी राह बनाता हुआ स्वयं को भीड़ में खड़ा होने लायक बनाता है.... साहित्य प्रेम ऐसा की तंग हालात में
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तोहरा से नज़र मिलाईं कईसे (भोजपुरी ग़ज़ल)

देखाईं कईसे जताईं कईसे हमरो अकिल बा बताईं कईसे नासमझ के समझाईं कईसे आँख खुलल बा जगाईं कईसे अकेले सफ़र में गाईं कईसे उदास मन बा खाईं कईसे घाव करेजा के छुपाईं कईसे पुरनका याद भुलाईं कईसे तोहरा से नज़र मिलाईं कईसे 'सुलभ' झूट शान देखाईं कईसे
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हसबैंड वाईफ चैटिंग

बहुत दिनों से हास्य की रसोई में कुछ नया खिचड़ी नहीं पका. सो एक पुराना अनुभव दे रहा हूँ, जब Windows की समस्याओं से परेशान होकर एक हास्य रचना इस प्रकार अवतरित हुई थी..... उन दिनों चैटिंग का मजा बेचलर्स ज्यादा उठाते थे.... लेकिन अब तो हसबैंड मशीनी हो गए...
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एक ब्लोगर जिनके अंदाज निराले हैं.

अपने ब्लॉगजगत में यूँ तो भाँती भाँती के आकर्षक अनोखे ब्लॉग हैं और विशिष्ट अंदाज वाले ब्लॉग स्वामी अपने अपने ब्लॉग पर शब्द क्रीडा करते देखे जाते हैं. साहित्य के विभिन्न रस में हाल के दिनों में व्यंग्य-ग़ज़ल रस खूब लोकप्रिय हुआ है. आइये आज मैं आपको मिलवाता
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खिलौने अकेले में रोते हैं

गुजरा वक़्त कब लौटा है आंसू बह जाने के बाद मोहब्बत बढती जाती है मोहाबत खो जाने के बाद दीवानों के घर नहीं बसते साकी औ' मयखाने के बाद खिलौने अकेले में रोते हैं बच्चों को हंसाने के बाद पास कोई नज़र नहीं आता आँखें बूढी हो जाने के बाद यादों की उमर बढ़ती है बचपन
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दर्द अपना मिल कर बाँट लेंगे

चारो तरफ हल्ला मचा है, तो मैं क्या करूँ... सब को समझाना जरुरी है क्या... सभी तकनीक से समृद्ध है... ज्ञान से लबरेज़ है... कोई दूरियां बढाता है तो बढाए... हम मिटाते रहेंगे अपनों के बीच की दूरियाँ... कुछ लोग तो खासे अपने हैं उनकी संख्या उँगलियों से बाहर हो
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डोमेन/वेबसाईट से जुड़े कुछ सवाल जवाब:

हिन्दी ब्लोगर्स के लिए सूचना... हालंकि मैंने स्पेशल डिस्काउंट सिर्फ हिंदी ब्लोगर्स के लिए रखा है…जो ब्लोगर नहीं है मगर उनके परिचित हैं वे भी इस छुट का लाभ ले सकते हैं... वेब स्पेस न्यूनतम 750/- रु. सालाना देय होगा(with MySql database)… साथ ही 1000 MB
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एक डिसकाउंट ऑफर हिन्दी ब्लोगर्स के लिए...Get domain at Low Cost

हिन्दी ब्लोगर्स के लिए सूचना... स्वयं का वेब स्पेस लेने के लिए कम से कम सालाना 750/- अतिरिक्त लगेगा...
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(क्यों सिर्फ) बहादुर जवानों पर आस है

बाढ़ का पानी तो हर साल एक महीने के लिए आता है, और कुछ ले दे कर चला जाता है... मगर उत्तर बिहार के वासियों के आंसूं कब थमेंगे पता नहीं... ऊपर से महंगाई भी घटने का नाम नहीं ले रही... मेरे कुछ वरिष्ठ साथी भी किन्ही कारणों से नाराज चल रहे हैं... जाहिर सी बात
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होली में ठिठोली > एक से बढ़कर एक बुढऊ > रंग बरसे

आदरणीय महाबीर शर्मा, प्राण शर्मा, मंसूर अली हाशमी, डा. श्याम सखा, तिलक राज कपूर, नीरज गोस्वामी, आचार्य संजीव 'सलिल', सर्वत जमाल, राज भाटिया,राजेश चेतन, राज सिंह, समीर लाल, राकेश खंडेलवाल और स्नेही गुरु पंकज सुबीर जी के चरणों में यह पोस्ट समर्पित करता
Mar 03 2010 03:54 PM
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कॉपी पेस्ट करना सरल काम है

आज के लिए अपनी कोई मौलिक रचना नहीं सो एक पुरानी कथा सुनाता हूँ... एक लोकप्रिय प्रेरक वक्ता अपने श्रोताओं का मनोरंजन कर रहा था, उसने कहा: "मेरे जीवन का सबसे अच्छा साल वो था जो मैंने एक औरत की बाहों में खर्च किया जो मेरी पत्नी नहीं थी!" सभी श्रोता मौन रहे
Feb 20 2010 03:27 PM
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विल यु बी माय वेलेंटाइन

पश्चिम से आयातित यह पर्व शुरुआत में वहां उम्र दराज लोग मनाते थे. बाजारवाद ने सब कुछ पलट कर रख दिया है. भारत में कदम रखने के साथ ही सैंट वेलेंटाइन डे, १४ फरवरी प्रेम दिवस बनकर छा गया. वेलेंटाइन एक रोमन परिवार का नाम Valentinus, जो लैटिन शब्द(पुल्लिंग
Feb 13 2010 04:30 PM
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उठो सुबह हो चुकी चमक रहा आफताब देखो

इससे पहले कि गीली आँखों में तेज़ाब देखो होश में आओ रहनुमाओं वर्ना इंकलाब देखो हक़ मार जाते हो तुम अपने ही खिदमतगार के रगों में इसके खून नहीं सुलगता अलाव देखो जंगल पहाड़ उजाड़ कर ये कैसी तरक्की पाई है चार दिन कि जिंदगी में कुदरत के सौ अज़ाब देखो जमीन मकान
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गणतंत्र दिवस 2010 पर विशेष - दिल्ली को समर्पित

मैं दिल्ली हूँ ख्वाब सभी के सजाता हूँ हाँ ये सच है पहले खूब आजमाता हूँ तुम भी समझो जिम्मेदारियां अपनी बोझ करोड़ो का कैसे रोज़ उठाता हूँ जनहित में जारी सन्देश..."मेरी दिल्ली - मैं ही संवारूं " मैं दिल्ली हूँ जान-ए-हिंद हिन्दुस्तान का दिल हूँ... अपने सीने
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इजहारे जज़्बात की ज़हमत कीजिये (Ghazal)

इजहारे जज़्बात की ज़हमत कीजिये मोहब्बत की है तो हिम्मत कीजिये खुदा के रहमत से कायम मोहब्बत सजदे में सर रख इबादत कीजिये मोहब्बत की मंजिल है इम्तहान लेगी ना उफ़ ना कोई शिकायत कीजिये माना की मोहब्बत में खामोश है जुबाँ चाहें तो निगाहों से शरारत कीजिये रंजिश
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मकर संक्रांति की पावन सुबह है ये सभी को बधाई!

प्रातः स्नान सूर्य नमस्कार दान चावल स्पर्श सबके नाम से सीधा (दान) तिल गुड का भोग नाना प्रकार के लाइ मकर संक्रांति की पावन सुबह है ये सभी को बधाई! दही चुडा भोजन पतंगे गुल्ली डंडा संध्या स्वादिष्ट खिचड़ी तरकारी, पापड़, चोखा...
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"बिक न जाना वो पहरुवे हाथ में तुम्हारे कलम है" - EK REPORT

दो दिन सात सत्र ३२ घंटे, डूबा रहा मैं कवि संगम में.... वन्दे मातरम् का नारा है तिरंगा हमको प्यारा है जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमे रसधार नहीं वो ह्रदय नहीं है पत्थर है जिसमे स्वदेश का प्यार नहीं और...... जो वक़्त की आंधी से खबरदार नहीं है वो कुछ और
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दो दिन सात सत्र ३२ घंटे, डूबा रहा मैं कवि संगम में. (एक Report)

वन्दे मातरम् का नारा है तिरंगा हमको प्यारा है जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमे रसधार नहीं वो ह्रदय नहीं है पत्थर है जिसमे स्वदेश का प्यार नहीं और...... जो वक़्त की आंधी से खबरदार नहीं है वो कुछ और ही है वो कलमकार नहीं है राष्ट्र जारण धर्म हमारा... जी
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छोटी सी ठंडी एक कविता

आज ठण्ड और कोहरा इतना ज्यादा है की पोस्ट लिखना तो दूर पोस्ट पढना भी मुश्किल हो रहा है. शुक्र है एक छोटी सी कविता पढने को मिली, तो मैंने भी आज एक छोटी कविता कह दी. सुबह देर तक बंद रहे किवाड़ ठण्ड में सूरज जो नहीं निकला -सुलभ
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नया वर्ष नयी उम्मीदों नयी तैयारियों के नाम

समस्त पाठकों को नववर्ष की शुभभकामनाये !! नया वर्ष नयी उम्मीदों नयी तैयारियों के नाम नूतन उत्साह और नवीन चेतना के नाम पराजय की घड़ी में भी विजय के सपनों के नाम लगातार चलते रहने की जीवटता के नाम सतत प्रयासों और संघर्षों के नाम आत्म-अन्वेषण और स्व-अनुशासन
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इस जमाने के अन्दर तो जमाने बहुत हैं

अनजान शहर में मिले खजाने बहुत हैं खेल किस्मत को अभी दिखाने बहुत हैं हर कदम टूटते हैं सैकडो दिल यहाँ टूटे बिखरे दिलों के अफ़साने बहुत हैं कुर्सी के पिछे दौड़कर सभी बावले हुए इक नाजनीन के देखो दीवाने बहुत हैं नक़ाब बदल बदल कर जो करते हैं घात उनको ढुढें
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करोड़पति कन्या - मेरी पहली हास्य कविता

ये साल भी अब जाने जाने को है. वर्ष २००९ बहुत से रोचक, अद्भूत, जोखिम भरे दिन मुझे दिखा गए. इन सबसे ऊपर कुछ कठोर अनुभवों से साक्षात्कार हुआ. नौकरी, स्वरोजगार और महानगर की आपाधापी में कुछ खोया और बहुत कुछ पाया भी. आज कल बहुत राहत महसूस कर रहा हूँ. पिछले
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शिखा वार्ष्ने जी, अब नर विमर्श का इंतज़ार है

अभी अभी शिखा जी को जन्मदिन की बधाई दे कर आया हूँ. विचारोत्तेजक पोस्ट के लिए और हाल फिलहाल की अशांति, वादविवाद पर निष्कर्ष के रूप में नारी विषयक पोस्ट लिखने के लिए शिखा जी बधाई के पात्र है. थोड़ी सी असहमति है इसलिए प्रतिक्रया मात्र में यह पोस्ट लिख रहा
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एक कचोटती ग़ज़ल

हैरत में हैं लोग सचबयानी देखकर दो गवाह और झूटी कहानी देखकर लिख सजा बेगुनाह को कलम है शर्मशार फैसले हुए हैं कागज़ कानूनी देखकर ख्वाहिशों कि उड़ान अभी बाकी है बहुत मियाँ घबरा गए ढलती जवानी देखकर जाने क्या देखकर जाने क्या सोचकर फूल मुरझा गए सख्त निगरानी द
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चित्र कविता - 2 (एक ग़ज़ल)

पिछले दिनों नीरज जी की पोस्ट में यह चित्र देखा था. बहुत कुछ कह रहें है ये सजीव चित्र. इसे देखकर स्वतः ही लेखनी चल पड़ी. हँसते बोलते कहीं खो जाओ ये अच्छा तो नहीं है अपने मन को बस दुखाओ ये अच्छा तो नहीं है मैं जानता हूँ मेरी जाँ मैं तुमसे दूर हूँ बहुत स
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टिप्पणी कीजिये खूब कोई शरारत ना कीजिये - ग़ज़ल

जैसा की आप सभी जानते हैं पिछले एक महीने से अपने प्यारे ब्लॉगजगत में कुछ उलजलूल हरकतें और अनावश्यक बहसे हुई हैं. दुखी होकर मैंने एक Post जारी किया था "शान्ति के लिए यह सन्देश आत्मसात करें " बहुतों ने इसकी सराहना की तो कुछ ने असहमति जताते हुए अपना पक्ष
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राह चलते एक छोटी सी ग़ज़ल

आंधियां जब तेज रही थी टहनियों में खलबली थी दरख़्त वही जगह पर रहे जड़े जिनकी खूब गहरी थी खुद को घायल पाया हमने हुस्न से जब नज़र मिली थी एक मुलाक़ात में दिल दे बैठे नाजनीन वो बड़ी हसीं थी सुबह तक डूबा रहा सूरज जाड़े की एक रात बड़ी थी सब ने अपने होश गंवाये
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मेरी याद में देखना परेशाँ तुम होगे - ग़ज़ल

अभी हाल ही में मेरे किसी शुभचिंतक ने मुझे मुफ्त की सलाह बांटने पर अपनी नाराजगी जाहिर की है. मैं परेशान, आख़िर मान लिया की गलती मेरी ही है. जाने अनजाने कुछ शे'र लिखे चले गए. आज की यह ग़ज़ल उसी शुभचिंतक के नाम पेश है - अपनी जमीं के वास्ते आसमां तुम होग
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भारत और आतंकवाद - क्षमादान अब त्यागो

कभी घुसपैठ कभी जेहाद और आतंकवादलगे हैं सबके सब करने भारत को बरबादभारत को बरबाद रोज हो रहा ख़ूनी खेलढुलमुल विदेश नीति की देखो रेलमपेल हमे बचाया मेजर संदीप ने देकर अपनी जान करकरे, काम्टे, शर्मा और कितने वीर जवान कितने वीर जवान अभी और शहीद कहलायेंगे क्या
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सतरंगी परिभाषा - 'सपने', 'वक़्त' और 'मौत'

आज कल मन बड़ा दार्शनिक हो चला है। कहीं जल्दी ही बुढापा न आ जाए। वैसे भी आदरणीय श्री राज भाटिया जी मुझे बुजुर्ग सोच वाला नौजवान मानते हैं। तीन क्षणिकाएं हैं। तीनो को एक साथ यहाँ रखकर आज सतरंगी परिभाषा की श्रिंखला को यहीं समाप्त करता हूँ...(9) विकल्पों
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मानवता के दुश्मन ब्लोगिंग से दूर रहें.

हम मानवता के रक्षक हैं."मैंने यह पोस्ट सिर्फ इसलिए लगाई है की ब्लॉग जगत में (नित्य बढ़ते इन्टरनेट ज्ञान कोष में) ज्यादा समय हम अपना ज्ञानवर्धक आलेख(ऐतिहासिक, भोगोलिक, वैज्ञानिक, धार्मिक कुछ भी हो सकता है) पढने लिखने पर व्यतीत करें। साथ ही भाषा सुधार,
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ब्लॉग जगत में शान्ति के लिए यह विजेट लगाएं

हम मानवता के रक्षक हैं...मैं उन साइट्स और ब्लॉग को पढने और उनपर टिप्पणी करने से बचुंगा जहाँ सस्ती लोकप्रियता के लिए धर्म-जाति संगत/ धर्म-जाति विरोधी, निरर्थक बहस,व्यक्तिगत आक्षेप, अभद्र अश्लील रोषपूर्ण भाषायुक्त विचार या वक्तव्य प्रस्तुत किये जाते है
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महफूज़ के नाम एक पत्र.

प्रिय महफूज़, अब तबियत कैसी है?जिंदगी एक रेस ही तो है. अलग अलग उम्र में रेस के मैदान अलग अलग होते हैं. पिताजी (पिताजी जैसे लोग), अपना बेस्ट अनुभव बेटे को देना चाहते हैं.आप ब्लोगिंग में बहूत मशरूफ रहते हैं. सिर्फ आप ही नहीं और बहुत से लोग इसमें अस्त-व
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कभी नाम था इज्ज़तदार में (शायद एक ग़ज़ल)

यह भी अपने आप में एक ग़ज़ल है जिसे मैंने मोहल्ले में रहने वाले एक बुजुर्ग के लिए लिखा है. और लिखा है देश के उन तमाम बुजुर्गों के लिए जो अकेलेपन का दंश झेल रहे हैं.कभी नाम था इज्ज़तदार मेंअब अकेला बचा हूँ घरबार मेंआप दरवाजे पर आये होंगे बेहोशी में था मै
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यह चिट्ठी तो अनमोल है

मेरे विद्यार्थी जीवन में और आज नौकरी में भी पत्र और पत्रलेखन की महत्ता क्या मायने रखती है यह सिर्फ मैं ही समझ सकता हूँ. मेरे व्यक्तित्व विकास और लेखकीय सुधार में डाकखाने (विशेषरूप से डाकघर अररिया) का बड़ा योगदान है. अभी कुछ दिनों पहले (27-अक्तूबर-200
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सतरंगी परिभाषा - 7 "सफलता" 8 "असफलता"

सफलता -"बहुत कुछ देने के बादबदले मेंबहुत कुछ पाने के बादएक खुशी मात्र है "असफलता - "एक खुशी का पीछा करने के दौरानरास्ते में मिली कुछ ठोकरें " - सुलभ 'सतरंगी'