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बाजे वाली गली

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17 May 2010
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ज़माना गुज़रा है अपना ख़याल आए हुए

मैं अपनी हज़ार चीज़ों से ख़फा हूं - अपनी सूरत से. अपनी आदतों से. अपने अलालपन से. अपने सपनों से.लोग कहते हैं इंसान के भेजे में भेजा होता है। मुझे लगता है मेरे भेजे में सिर्फ कबाड़खाना है. किसी भगोड़े फिल्मकार का कबाड़खाना. एक ऐसा फिल्मकार जिसने ज़िन्दगी के न
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Allen Ginsberg - America

एलेन गिंसबर्ग अपनी प्रसिद्ध कविता 'अमेरीका' (अमरीका) का जिस तरह पाठ करते थे, उसे सुनकर कविता की ताकत का अंदाजा होने लगता है। एक कवि किस तरह अपने देश, अपने समाज की अवांछित स्थितियों, प्रवृतियों के विरुद्ध अपनी कविता को एक असरदार हथियार की तरह इस्तेमाल कर
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टी.एस.इलियट - अ गेम आफ चेस

लीजिये पेश है टी.एस.इलियट की ‘वेस्टलैंड’ का दूसरा भाग – ‘अ गेम आफ चेस’.
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टी.एस.इलियट - कविता पाठ

इस ख़ूबसूरत चीज़ को अकेले सुनते-सुनते जी चाहा की आप सबके साथ इसे शेयर करूँ । सो हाज़िर हैटी.एस. इलियट की आवाज़ में ही उनकी 'वेस्ट लैंड' कविता का पहला भाग।
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बाजे वाली गली

नव वर्ष की शुभकामनाएं२०१० सभी के लिए मंगलमय होराजकुमार केसवानी
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तस्वीर-ए-लापता : दिलीप चित्रे

कोई तीन साल पहले दिलीप भाई का एक मेल आया जिसमें उन्होने उन्होने अपनी एक सीधे उर्दू में लिखी गई छोटी सी नज़्म भेजी थी. आज उस तस्वीर-ए-लापता को पढ़ता हूं तो तब न समझ में आने वाली बातें समझ में आ रही हैं. मैं यहां सभी दोस्तों के लिए उस मेल के कुछ ज़रूरी हि
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दिलीप चित्रे नहीं रहे !

आख़िर कोई ख़बर इतनी बुरी कैसे हो सकती है ? इतनी बुरी कि वह कहने लगे कि दिलीप चित्रे नहीं रहे ! इतनी बुरी ख़बरों का गला क्यों नहीं घोंट दिया जाता ? ऐसी तमाम बुरी ख़बरों को पैदा होने की इजाज़त नहीं मिलनी चाहिए जो दुनिया की हर अच्छी चीज़ को मौत देती हों. कुछ
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अजब दास्ताँ है मेरी ज़िंदगी की...

एक सदी – यानी सौ बरस. कितने सारे होते हैं ये सौ बरस ? इतने कि हम जिनसे मोहब्बत करते हैं तो उनकी लम्बी उम्र की दुआएं माँगते हुए कहते हैं – ‘आप सौ साल जिएं’. इस दौर में भी कभी-कभार ऐसी दुआएं सच हो ही जाती हैं. इसी ख़्याल से सोचता हूं तो सोचता हूं आखिर क
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‘ये लड़का पूछता है, अख्तरुल-ईमान तुम ही हो?

एक भूला बिसरा नाम- अख्तरुल-ईमान (1915-1996). ज़्यादातर लोग उन्हें एक फिल्मी लेखक के तौर पर जानते हैं. थे भी. मगर फिल्मों से बहुत पहले ही वो एक नामवर शायर और कहानीकार थे. इसी ताक़त के दम पर उन्होने फिल्मी दुनिया में मर्तबा हासिल किया. फिल्मों में रहते ह
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जिनके घर में छह लठा, सो अंच गिने न पंच

सागर में एक मित्र बसते हैं – रमेश दत्त दुबे. हिन्दी के जाने-माने कवि-कथाकार. नवीन सागर की बदौलत उनसे मुलाक़ात हुई. मुहब्बत हुई. उनसे जितनी बार मिलो, उतनी बार अहसास होता है कि हम लोग अपने समय के अच्छे लोगों की क़द्र करना नहीं जानते. उनकी योज्ञता,क्षमता
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सफ़ेद खेत है- काग़ज़, काले बीज - स्याही

लीजिए हो गया एक हफ्ता पूरा और आ गया समय पहेलियों के उत्तर बताने का. आज गुरुवार है न. सबसे पहले तो वंदना जी दूसरी पहेली का सही जवाब मनोज जी ने दिया है(बधाई) – हुक्का. बाकी के जवाब हाज़िर हैं. १ सफ़ेद खेत में काले बीज --- काग़ज़ और स्याही २ ऊपर आग नीचे पान
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दीपावली की शुभकामनाएं

सभी मित्रों को दीपावली की शुभकामनाएं राजकुमार केसवानी
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सफ़ेद खेत में काले बीज

हर भाषा की अपनी एक सुन्दरता है। देस और परदेस की अलग-अलग भाषाओ को जानने-पहचानने की ललक में इधर-उधर को तांक-झाँक करता रहता हूँ । कई मर्तबा बड़ी मज़े की चीज़ें जानने मिल जाती हैं। ऐसे ही एक बार एक चीज़ पढ़ी थी उरांव भाषा के गीतों,मुहावरों के साथ पहेलियाँ।
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जो मोतियों की तलब ने कभी उदास किया

एक शायर है शकेब जलाली. सारे बड़े लोगों की तरह इस दुनिया को कुल जमा 32 साल तक नवाज़ा. इन सालों में ही जो कुछ शकेब कर गए, दुनिया में सौ-सौ बरस तक जीकर भी बहुत लोग नहीं कर पाए. यूं तो शायर की पहचान उसकी शायरी है, मगर कुछ अता-पता मालूम रहे तो अपनापा ज़रा ज़्
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तैमूर लंग और एक गवैया

आगरा घराने के उस्ताद गायक विलायत हुस्सैन खान ने अपने संस्मरण में एक बहुत मज़ेदार किस्सा बयान किया है. बात सुनने में मज़े की लगती है लेकिन है असल में बड़ी कमाल की . खैर, वह बात बाद को, पहले किस्सा. किस्सा यूं है बादशाह अमीर तैमूर लंग ने दिल्ली फतेह कर जश
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जुगनू मियां की दुम जो चमकती है रात को

एक शायर हुए हैं – अशरफ अली खां ‘ फुग़ां ’ . बहुत ही मस्त-मौला किस्म के इंसान थे. चुटकुलेबाज़ी और फिकरेबाज़ी का ऐसा शौक़ था कि उनकी शायरी में भी यही रंग नज़र आते हैं. पैदाइश का तो ठीक पता नहीं लेकिन 1186 में उनकी मृत्यु हुई. मौका मिला तो इन हज़रत के बारे मे
Oct 14 2009 07:56 PM
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शशिन : जो सपना नहीं बनना चाहता था

पिछले महीने एक कार्यक्रम के सिलसिले में जबलपुर जाना हुआ. प्रसिद्ध रंगकर्मी मित्र अरुण पाण्डेय का भी साथ रहा. उन्होने एक बहुत ही बहुमूल्य चीज़ दी – शशिन की स्मृति में बरसों पहले प्रकाशित एक पुस्तिका. इस पुस्तक में शशिन के कुछ छाया चित्र, कविताएं हैं, स
Oct 14 2009 07:56 PM
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एक सुबह कोहरे की

भोपाल में बुधवार की सुबह अदभुत कोहरा छाया था। कोई ५.३० बजे जब वाक पर निकला तो दूर-दूर तक सिवा कोहरे के कुछ दिखाई न देता था। अबा ऐसे में सिवाय रूमानी होने के और किया भी क्या जा सकता था। सो बस निकल पड़ा अपना कैमरा लेकर और अगले डेढ़ घंटे तक जो कुछ करता र
Oct 14 2009 07:56 PM
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घर जला भाई का भाई से बुझाया न गया

इंसानी फितरत का भी कोई जवाब नहीं. जब, जिस हाल में रहे, उस समय,काल और हाल की शिकायत किए बिना रहा नहीं जाता. अब आप आज की हालत देखें. मुझ जैसे उम्र-रसीदा लोग नए ज़माने के नए माहौल,नए दौर की ऐसे धज्जियां उड़ाने को तुले रहते हैं कि बस अल्लाह रहम करे. सच तो
Oct 14 2009 07:56 PM
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इश्क करे ऊ जिसकी जेब में माल बारे बलमूं

के दशक की भोजपुरी फिल्मों में बहुत ही खूबसूरत गीत-संगीत रचा गया है. संगीतकार चित्रगुप्त की इसमें बड़ी महती भूमिका है. ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो’ (1962), ‘लागी नाहीं छूटे राम’ (1963), ‘बिदेसिया’ (1963), ‘कब होइहैं गवनवा हमार’(1964), ‘भौजी’ (1965) जैस
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आलों में लुप्त ज़िन्दगियों का भान : नवीन सागर

मैं अक्सर सोचता हूं – एक कहानी लिखूं, जिसका नाम हो - नवीन सागर. एक कविता लिखूं, जिसका शीर्षक हो – नवीन सागर. एक आवाज़ दूं – नवीन ! अब तक यह कहानी नहीं लिखी. न ही यह कविता लिखी है और न ही पिछले नौ साल से यह आवाज़ दी है – नवीन ! . डर लगता है - वह कहानी न
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एक गुंडा, जो कवि भी था

बात शुरू करने से पहले एक बात बताना ज़रूरी समझता हूं. बात ऐसी है कि आज मैं एक गुंडे की बात करने वाला हूं. मतलब वो कोई ऐसा-वैसा गुंडा नहीं था जो सिर्फ सड़कों पर गुंडई करता रहा हो, वह बाकायदा कवि भी था. इस गुंडे कवि का एक कविता संग्रह भी प्रकाशित है. नाम
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कोई मरने से मर नहीं जाता

सोचते हो कि ये नहीं होगा ? आसमां एक दिन ज़मीं होगा ! कोई मरने से मर नहीं जाता देखना वो यहीं कहीं होगा न जाने कबसे इस अनूठी शायरी का दीवाना बना बैठा हूं. यह इजलाल मजीद की शायरी है. एक ऐसा शायर जो अपने बारे में चाहे जितना कम बोले मगर उसकी शायरी इस शख्स
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‘मतवाला’ कैसे निकला

अब से कोई 77 बरस पहले मुंशी प्रेमचन्द के ‘हंस’ का आत्मकथा अंक प्रकाशित हुआ था. हिन्दी साहित्य में इस अंक का अपना एक मह्त्वपूर्ण स्थान है. इस अंक में जयशंकर प्रसाद, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, प्रेमचन्द,शिवरानी देवी,मुंशी अजमेरी, शिवपूजन सहाय सहित उस दौर
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रोशनी किस जगह से काली है

फज़ल ताबिश नाम के इस ज़िन्दादिल इंसान को कभी कोई ‘उर्दू ज़ुबान का बांका शायर’ कहता है तो कोई ‘ख़ूबरू पठान और ख़ूबतर इंसान’. मुझे तो अब तक नहीं मालूम मैं उन्हें क्या कहूं. उनकी और मेरी उम्र में कोई 17 साल का फासला था मगर हमेशा बराबरी से दोस्तों का सा सुलूक
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रांगेय राघव की कविता

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Sep 25 2009 06:04 PM
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‘पीछे बंधे हैं हाथ मगर शर्त है सफर...’

न जाने कब से ताने सुन रहा हूं कि अपने भोपाली होने पर इतना ग़ुरूर रखते हुए भी अब तक भोपाल के लोगों की बात ही नहीं कर रहा. सचमुच. अपने लोग दिल के इतने क़रीब होते हैं कि उनके बारे में लिखने का ख्याल ही नहीं आता. खैर! जो कल तक नहीं किया वो आज किए लेते हैं.
Sep 24 2009 05:10 PM
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तंग करती है यह तस्वीर

यह तस्वीर मुझे बहुत तंग करती है. यह तस्वीर मुझे कुछ कहती है. मैं इस तस्वीर का कहा सबको सुना देना चाहता हूं. उनको भी जो दुनिया में किसी की भी नहीं सुनते.कितनी बार कोशिश कर नाकाम हो चुका हूं. कमाल है! जो बात एक तस्वीर कर जाती है मैं, एक इंसान, अपने लफ्ज़ो
Sep 23 2009 08:09 PM
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अलेक्ज़ेंडर ब्लाक

कोई सवा सौ साल पहले रूस में एक ऐसा कवि पैदा हुआ जो मेरे लिए कविताएं लिख गया है. मुझे इस बात से कोई ऐतराज़ नहीं होगा अगर कोई यह कह दे कि मेरा दावा ग़लत है और यह कविताएं दरअसल उसके लिए लिखी गई हैं. नो प्राब्लम. मैं हर इंसान का इस दुनिया की हर उस चीज़ में जो
Sep 23 2009 06:45 AM