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प्रेम धुन

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12 Jun 2010
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के प्याला जिंदगी का......

मत तौल के ये जिंदगी  बोझ नहीं है.मत सोच के ये जिंदगी सोच नहीं है.जी गया है ,जिसने खुद को पा लिया है       के  प्याला जिंदगी का मजे से पिया है......बैसे तो दुनिया का कोई छोर नहीं है.चला जा कहीं भी, तू कोई और नहीं
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शायद कहीं ऐसी भी दुनिया होगी

शायद कहीं ऐसी भी दुनिया रही  हो की मीरा बेरोक नृत्य करती रही हो .ह्रदय  में उमड़ा हुआ अंतहीन सावन होता हो कलियाँ खिलती रहें फूलों पर ताउम्र योवन हो. पर्वत का पत्थर व्रक्षों का वोझ सहता हो वेखोफ़ जहाँ जीवन एक साथ रहता हो
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क्षितिज ने पहली बार चादर हटाई है

दिल में अजीब सी उलझन है पर लगता यूँ है ,कुछ उम्मीद नजर आई है.सब कुछ भुला देने को मन करता है,तो ऐसी कौन सी बात याद आई है.नजरों के सामने भीड़ दिखाई पड़ती है,पर अन्दर तो दिखती तन्हाई है.अँधेरा भी है और सन्नाटा भी,पर देखा तो लगा, कोयल गयी है.मौसम थमा सा और
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जीवन...... या जानी-समझी बेहोशी .

   हृदय में अजीब सी  खिन्नता नजर आती है,ऐसा नहीं है कि आसपास व्यस्तता का अभाव हो ,बात तो यही है ये व्यस्तता आखिर चाह क्या रही है. शांत भाव से यदि अवलोकन किया जाये तो हम पते है , कि कोई कथनी में मगन है तो कई करनी में ......... लक्ष्यों कि
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अच्छा लगे बड़ा ही ,कुदरत का ये वर्ताव

अच्छा लगे बड़ा ही , कुदरत का ये  वर्ताव.चढ़ने को है सूरज ,बढ चली है नाव.वृक्षों की पत्तियों पर ,ओस का ये छिडकाव.अकड़ी सी टहनियों में , यूँ बला का घुमाव.नटखट सी नदी का , अलबेला सा ठहराव.महकी सी हवा का , शर्मीला सा बहाव .चहकते से पंछियों का ,तट पर ये
टैग: कुदरत
Feb 19 2010 08:14 PM
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मेरी कौन सुनता है

मरने से पहले एक रपट मे: नाम :- जो पसंद हो उम्र :- नब्बे साल मानवीय गड़ना के अनुसार कार्य :- जीवन को पालना-पोसना अनुभव :- लगभग जीवन भर शिकायत का संपूर्ण विवरण (अपनी जुवानी ) :- साहब वैसे तो मैं आपसे कहीं ज्यादा बुजुर्ग हूँ ,मगर चूँकि आप सरकारी अफसर है
Dec 29 2009 11:59 AM
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श्याम से कहो - पैसा कमाए

श्याम से कहो - पैसा कमाए मुरली तो बाद मे भी बजायी जा सकती है प्रातः काल का समय, नीला आकाश और कही दूर नदी किनारे के पास से आती हुई सुरीली बांसुरी की लय ,इस बासुरी की लय पर तो मानो सब की सब प्रकृति नाच उठी हो ,फिर इस मानब हृरदय मे तो झंकार बज ही उठेगी
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रूपए ४००/- का पुरस्कार ,क्या यह ज्यादा नहीं .

हमारे भारत देश में जो चल पड़े सो चल पड़े, जैसे की क्रिकेट को ही ले लीजिये. आज हर बड़े बूढ़े , बच्चे की जुबान पर यही बात है - क्यों स्कोर क्या हुआ है. और फिर हो क्यों न सरकार  पैसा जो खर्च कर रही है.       &nb
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माँ बाप के आशीर्वाद ने अपराधी बना दिया

बेटा दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करो - "मगर तरक्की का आशय ?" बेटा दूधो नहाओ पूतो फलो - "शायद जिंदगी का आखिरी लक्ष्य।" ऐसे कुछ आशीर्वाद जो बड़े-बूढे और माँ-बाप प्रायः देते रहते है, दरअसल असमंजस्य से भरे हुए कथन से जयादा कुछ नहीं। एक तरफ बड़े-बूढे छोटों
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बस हम इंसान ही तो हैं ............

कभी तो सोच मानव ,क्यों लिया धरती पे तूने ये जनम , कभी तो याद करले ,प्रेम करना है तेरा पहला कदम । कभी तो देख चलके बेधड़क सच्चाई के उस रस्ते , कभी तो देख बनके तू बना इंसान जिसके बास्तें । क्यों भर रहा है दम, जो तू चल पढ़ा गँवांने को , होता रहा है दूर जि
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दिवाली या सिर्फ सजी हुई इमारतें .....

अध्यात्मिकता का सम्बन्ध स्वतंत्रता से है और जब व्यक्ति पूर्ण रूप से स्वतंत्र होता है तो उसे खुश होने के लिए त्यौहार की जरुररत नहीं होती,हमारे देश में व्यक्तिगत जीवन को सामाजिक दायरे में इस तरह से बाँधा गया है ,की वह परतंत्रता को ही अपना जीवन लक्ष्य स
टैग: खुशी
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मानवता का बलात्कार या संस्कृति की रक्षा ..

भाई बात कुछ इस तरह है की बहुत दिन हो गए जमाना अपनी रफ्तार में आगे बढा जा रहा है और हम हैं की लाइफ में कोई ट्विस्ट ही नहीं। ॥ कोई काम भी नहीं है और अन्दर दिल में बैठी कुंठित उर्जा जवानी में कुछ कर गुजरने के लिए कह रही है,कोई मुद्दा भी नहीं मिला की तोड़
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प्रेम हो जाये, तो इन्सान तर जाये

इंसानियत फकत है क्या, इस जिंदगी का मकसद हस्ती अपनी ही मिटाकर ,इंसा एक बनाना है । रुक गया था वेबजह ही , चलते तुझे जाना है । अकेला है दिले-इंसा,अकेला ही खुदा है अकेला ही आया था ,अकेला तुझे जाना है. रुक गया था बेबजह ........................ ऊँची इन लहरो
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क्या कहा .... प्रेम हो गया?

बनने लगा था इन्सां,पर अब रहा नहींगर यूंही था मिटाना ,तो फिर बनाया क्यों था खोता चला गया हूँ ,ज़माने की भीड़ में तोगर छोडनी थी ऊँगली तो अपना बनाया क्यों था बढ़ने की मैं अकेले ,कर ही रहा था कोशिशसहारा यूंही था छुडाना,तो साथ आया क्यों था भरोषा किया था इतना,
टैग: इश्क
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जीवन जीना है तो शराब-ऐ-हँसी पीना है

आज जब हम बहुत व्यस्त है ,तो रोजाना की दौड़-धूप में जीवन को जीना ही भूल जाते है. चेहरों की हंसी अजनबी हो जाती है तो इसी रोज की दौड़-धूप से ही कुछ हंसी के पलों को चुराने की कोशिश है,कुछ इस तरह -- एक बस पकड़ रहा है,और एक सर क्योकि स्कूटर पंचर हो गया है और अब
टैग: हंशी
Sep 16 2009 11:41 PM
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वो बोलता था सच

अब तक बुद्ध के बारे मे जो कुछ भी जाना है, यों समझिये राइ से ज्यादा कुछ भी नहीं पर जितना जाना है,उससे अनुमान तो लगाया ही जा सकता है की वह क्या ब्यक्तित्व होगा जिसने एक समय के बहाव को पूरी तरह से उलट के रख दिया हो; क्या जादू होगा उसकी वाणी मे जिसने उस समय,
टैग: क्षमा
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अस्तित्व का अंत कोंन होगा जिम्मेदार !

जीवन ........बड़ा रहस्यमयी ,बड़ा रोचक सबाल हैजीवन का विकाश किस-किस तरह से होता आया , प्रकिरिती अपने अंदर क्या क्या समेटे हुआ है ,ये सब जान पाना तो एक अंत हीन यात्रा होगी यह सच है की मानव जिस तरह से विकसित हुआ है वह जिस तरह से अपना संरक्षण करता आया है