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मेरी रचनाऍ

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31 Dec 2009
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एक दिन

एक दिन सुबह सूरज नहीं उगा हम बिस्तरों में कसमसाते हुए उसके उगने का इन्तजार करने लगे पर वह नहीं उगा । घीरे -घीरे हमारी बैचेनी बढ़ने लगी अँधेरे आँखों को चुभने लगे हम भाग कर सड़कों पर आ गये हजारों की तादाद में लोग भाग रहे थे चीख रहे थे सूरज के उगने की प
 
विपिन बिहारी गोयल
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तुम मेरी क्या हो

मैं आज बेसाख्ता मैं अपने से पूँछ बैठा कि तुम मेरी क्या हो मेरा दिल का सकून मेरी आखों की नींद मेरी जुबाँ पर हर वक्त तेरा जिक्र कानों में गूँजती तेरी हँसी तेरे कदमों की आहट तेरी किसी बात को याद करके मुस्करा जाना और फिर निगाहों का दूर कहीं खो जाना कभी त
 
विपिन बिहारी गोयल
Dec 29 2009 11:53 AM
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भीत कपोत

मौन क्लान्त विश्रान्त तरू ये भीगे - भीगे लम्बी सड़कों का दूर कहीं पर खो जाना तूफानों का दो हाथों के मध्य गुजरना कदमों का बरबस ही थमना , चलना फिर थमना अंगारों को मुठ्ठी में लेना और झुलसना पीड़ा को स्वर न देना पर बिलखना ताका करता है आखों में बैठा एक भी
 
विपिन बिहारी गोयल
Dec 29 2009 11:53 AM
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यात्रा

अनंत से अनंत की ओर,पूर्णता से पूर्णता की ओर , सत से सत की ओर ,प्रकाश से प्रकाश की ओर , यात्रा -वैकल्पिक नहीं अनिवार्य पुदगल कर्मबंधन अज्ञानजनित अनिवार्यता कछुए की तरह मंजिल की तरफ़ या हिरन की तरह माया के जल की तरफ़ दुर्गम -सुगम ,छांव -तपन ,मित्र -दुश
 
विपिन बिहारी गोयल
Dec 29 2009 11:53 AM
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जिंदगी जब ठहराव होती है

जिंदगी जब ठहराव होती है हर सुबह शाम की बात होती है बहुत खामोश हो जाता है जब सारा आलम तब खुद से खुद की बात होती है युहीं खो जाती हो तुम जब पास हो कर भी मुझे भी एक गुमशुदा की तलाश होती है जब भी हो जाता हूँ उदास हँसते हँसते यारों में तेरी बेवफाई की बात
 
विपिन बिहारी गोयल
Dec 29 2009 11:53 AM
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उफ़, ये क्या हो गया

उफ़ ये क्या हो गया बातों बातों में इजहार हो गया अब कैसे मिलाऊंगा मैं निगाहें तेरा साया तक शर्मसार हो गया आँख खुली तो तुम्हें आगोश में पाया मेरा जीवन फूलों की कतार हो गया तेरी चाहत बस युहीं बरकरार रहे मुझे खुदा पे एतबार हो गया
 
विपिन बिहारी गोयल
Dec 29 2009 11:53 AM
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थके हुए पाँव

बालू रेत पर थके हुए पाँव का अक्स भी ऐसा ही उभरता है थका हुआ ,बोझिल सा एक समग्र और लक्ष्य भेदी जीवन का यही तो परिणाम है एक थकान वरना बालू की रेत पर हवा के झोंके से गुजर जाते और लहरों से अठखेलिया करते
 
विपिन बिहारी गोयल
Dec 29 2009 11:53 AM
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जो जैसा चल रहा था चलने देते

जो जैसा चल रहा था चलने देते गलतफहमियों का दाय्ररा बढ्ने देते तो ही अच्छा था । दिल को बहलाने का बहाना तो था सतरंगे सपनों का खजाना तो था । कुछ कह कर हमने कुछ खो दिया कितनी सादगी से तुमने दिल तोड दिया उम्र भर भटकने को तन्हां छॉड दिया । -विपिन बिहारी गोय
 
विपिन बिहारी गोयल
Dec 29 2009 11:53 AM
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बन्द दरवाजों का नहीं अफसोस

बन्द दरवाजों का नहीं अफसोस मुझे   खोल दो खिड़कियाँ की दम धुटता है   आह तुमने न सुनी तो न सही   चीखँ पर तो अजनबी भी पलटता है   राह उनको दिखाता है फिसलन कि   और हँसता है जब कोई फिसलता है   वो कह रहा था मुझसे कि बन दरियादिल
 
विपिन बिहारी गोयल
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अपने हिस्से का सूरज

मैंने तुमसे मुठ्ठी भर प्रकाश माँगा था और बदले तुम मेरे अन्धेरों पे   सुहानुभुती मैं दो शब्द बोलने लगे   अच्छा तो नहीं लगा   पर फिर भी मैंने कृतज्ञता प्रगट की   और मैं कर भी क्या सकता था   तुम्हें अपना समझ के कुछ मागाँ था
 
विपिन बिहारी गोयल
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यत्रांणा से मुक्त कर दो

यत्रांणा से मुक्त कर दो   रिक्तता मुझको निगल ले   इससे पहले उस दिशा में  प्रस्थान कर दो   व्योम सा व्यापक नहीं हूँ मैं   ना समुद्र सी गहराई मुझ में   मैं तो दीर्ध निश्वासों की कड़ी हूँ  मुझ में अविकल प्राण भर दो &nb
 
विपिन बिहारी गोयल
Oct 14 2009 07:50 PM
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में ऐसा एक गीत लिखूगां

मेरे जीवन की सांझ ढले   इससे पहले तुम आ जाना   मैं एक पूरा गीत लिखुंगा   जिसमें मेरे कुछ स्वपन अधूरों का   जिसमें मेरे कुछ गीत अधूरों का  जिक्र न होगा  मैं ऐसा एक गीत लिखूगां  मेरे जीवन की .........  जिसमें तुम
 
विपिन बिहारी गोयल
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जिंदगी का उलाहना

जिंदगी मुझको उलाहना दे रही है   कुछ घाँव जो पाले थे मैंने अपनों की तरह  दर्द वो अब देते नहीं बेगानों की तरह   किस तरह होगी बसर कुछ समझ आता नहीं   पर जिंदगी का उलाहना भी तो भाता नहीं   राह के हर पत्ते पर तेरा नाम लिख कर 
 
विपिन बिहारी गोयल
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मैं इसी शहर में हूँ

मुझ से ग्लानि का बोझ सहा ना जाएगा  तुम मुझे कभी `मसीहा´ मत कहना  मैं भीड़ में खड़ा होकर चिल्ला लुँगा मुझे मंच पर आने को मत कहना  इस यंत्राणा में भी मैं मुस्करा लेता हूँ मुझे कहकहा लगाने को मत कहना  उनके जज्बातों को ठेस बहुत
 
विपिन बिहारी गोयल
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Sep 23 2009 11:23 PM
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क्यों भूल जाऊँ मैं

स्मृति के दंश, पीड़ा ,छटपटाहट और तुम्हारा खिलखिलाना काश भूल जाऊँ मैं अनभिज्ञता, उपहास , ग्लानि बोध और तुम्हारा मुझसे नज़रें चुराना काश भूल जाऊँ मैं दु:स्साहस , आलोचनाएं , आत्म प्रवंचना और तुम्हारा शर्म से झुका सिर काश भूल जाऊँ मैं बस याद रहे वो शाम का
 
विपिन बिहारी गोयल
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Sep 21 2009 09:24 PM
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छोटी सी बात

छोटी सी बात का अफसाना बना दिया  अपना था तुम्हारा, बेगाना बना दिया  अधेंरे में पल रहा था सपनों का भ्रम  रोशनी ने उनको पागल बना दिया  उम्र बहुत लम्बी है पर समय बहुत कम  आकाश को आंकाक्षाओं की सीमा बना दिया  रूक तो मैं जाता पर
 
विपिन बिहारी गोयल
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Sep 19 2009 10:44 PM
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तेज धूप का सफ़र

छाँव का सकून मृग-मरीचिका बन छलता रहा तेज धूप का सफ़र यूँ ही चलता रहा राहबर भी सभी किनारा कर गए कद अपने ही साये का भी घटता रहा इस तपिश में कौन सी वो कशिश  है क्या सोच कर ये फूल इस बंजर में खिलता रहा कदम दो कदम
 
विपिन बिहारी गोयल
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Sep 17 2009 10:14 PM
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उसकी क्या खता है

खुद ही से पूछ कर हँसता है रोता है क्या कोई शख्स इतना भी तन्हॉ होता है पेड़ की डाली को समझ कर बाजू हौले से छूता है कस के पकड़ता है रोक कर राह चलते से पूछता है साथ दोगे मायूस चेहरा लिये खाली आखों से तकता है बिछे है कालीन और
 
विपिन बिहारी गोयल
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ऐसा सिर्फ मेरे साथ क्यों होता है

ऐसा सिर्फ वृक्षों के साथ क्यों होता है  कि वो अचानक पर्णविहिन हो फूलों से लद लाते है  अपनी सार्थकता का अहसास कितना भला लगता होगा उन्हें जब हमारी आँखें बरबस ही उन पर ठहर जाती हैं ऐसा सिर्फ बहुत ऊँचें पर्वतों के साथ क्यों
 
विपिन बिहारी गोयल
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अब तो रूक के देख लो

अब तो रूक के देख लो फांसला जो तय किया  किससे तुमने क्या लिया , किसको तुमने क्या दिया चले कुछ दूर फिर भी , आज तक जो साथ है और साथ चल कर भी आज तक जो दूर हैं उस प्यार पर अधिकार था , और वह अहसान था फिर भी उसका बदला हमने एक सा ही
 
विपिन बिहारी गोयल
टैग: कविता
Sep 09 2009 11:41 PM
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लौट के ना आ जाना

बहुत भीड़ है कहीं भी खो जाना तुम कहीं लौट के ना आ जाना मुसाफिर हूँ मुश्किल है कहीं पर रूक जाना ढूंढोगे जहॉ छोड़ा था तो मुश्किल है पा जाना तुम कहीं ...................... भूला के कल को मैने आज इतना से है जाना मैं न याद रख पाऊगा तुम्हारा मुस्कराना,
 
विपिन बिहारी गोयल
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Aug 29 2009 10:47 PM
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जाने कैसे लोग

जाने कैसे लोग यहाँ बसते हैं जलता है जब घर किसीका ,हँसते हैं समझाते हैं ज़माने की ऊँच नीच हमकोख़ुद अपनी नियत पर जो नकाब रखतें हैं खुश हैं अगर आप तो क्यों खुश हैं रचते हैं कोई साजिश दिल आपका दुखाते हैं छिपके करते हैं वार,भाग जाते हैंजुबाँ शेर की जिगर
 
विपिन बिहारी गोयल
Aug 25 2009 12:27 AM
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ज़िन्दगी गाँव है

धूप है छांव है ज़िन्दगी गाँव है तेज धूप का सफ़र और थके पाँव है केवट सी जिंदगी रोजगार नावं है कोयल की कुहू है कौवे की कांव है हार जीत का फेंसला खेल है दांव है जिन्दगी गाँव है विपिन बिहारी गोयल --Peace and Love
 
विपिन बिहारी गोयल
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मन बंजारा

अपनों की बस्ती थी फिर भी मन बंजारा हो गया जिस भी गाँव रुके हमवो ही प्यारा हो गया अपनों से दो मीठे बोल सुनने को मन तरस गया अपनी आँखों का हर सावन गेरों के कंधो पर बरस गया जब कभी दिखलाया है मुझसे बेगानों ने अपनापन अनायास चुभ गया है मुझको अपनों का बेगानापन
 
विपिन बिहारी गोयल
Aug 13 2009 01:32 PM
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प्रणय का मूक निवेदन

मुझे तुम्हारे घर के सामने लगेबैगनी रंग के फूलों वाले पेड सेप्यार हो गया हैएक दिन मैं उधर सेगुजर रहा थाअचानक हवा कातेज झोंका आयाऔर ढेर सारे बैंगनी फूलमेरे कदमों मैं बिछ गयेकह कर तो सभी करते हैंपर प्रणय का ऐसा मूक निवेदनकहीं देखा है तुमने ।-विपिन बिहारी
 
विपिन बिहारी गोयल