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RELIGION, A SILENT CONSPIRACY

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05 Jun 2010
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अधर्म के ढांचे में बसा हुआ धर्म

आज यहां सब विराजमान हैं. राधा, कृष्ण, राम, जानकी, लक्ष्मण, हनुमान (एक छोटा हनुमान राम के चरणों में, एक बड़ा हनुमान पहाड़ और गदा लिये अकेला), और कैलाशपति भोलेनाथ. अकेले भोलेनाथ को सबसे ज़्यादा ज़मीन दी गयी है, हड़प कर. शिव जी, बजरंगबली और श्रीराम अपने परिवार
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इंसान कैसे रंग में... लिपा-पुता सा है

रोड़ा-पत्थर सा यहां बिखरा पड़ा सा है,हाथ कुछ और पैर... कुचला दबा सा है,ख़ून का छींटा कहीं और अश्क की दरिया,परिजन किसी का लाश से लिपटा हुआ सा है,है कौन हिन्दू, और मुस्लिम, ढूंढ के बतला,अल्लाह तेरा और राम भी... दुबका-छुपा सा है,जिहाद या फ़साद है, है राम या
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शांत, शिथिल और अमिट चेहरे

बेगुसराय में किराये के मकान में रहते थे हम. न्यू दिनकर नगर प्रोफेसर्स कॉलोनी में. लाल पगड़ी बांधे आता था वो. चमकती हुई सफ़ेद मूछ और दाढ़ी में लिपटा था उसका चेहरा. एक हाथ में पीतल की कमंडल होती थी. दूसरे में लाठी. साल दर साल बीते. सिवाय चंद झुर्रियों के उसके
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सज़ा नहीं सुविधा

जो मरने के लिये ही आया है उसे मौत की सज़ा सुनाकर हम कौन सा तीर मार लेंगे. वो तो ग़नीमत है कि कसाब २६/११ को बच गया वरना वो कौन सा वापस पाकिस्तान लौट के हनीमून मनाने वाला था ! फ़ांसी की सज़ा सही मायनों में न तो कसाब जैसे अपराधियों में दहशत ही बना पायेगी, न
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मैं मर्द हूं .... तुम औरत..!!

मैं भेड़िया, गीदड़, कुत्ता जो भी कह लो, हूं. मुझे नोचना अच्छा लगता है. खसोटना अच्छा लगता है. मुझसे तुम्हारा मांसल शरीर बर्दाश्त नहीं होता. तुम्हारे उभरे हुए वक्ष.. देखकर मेरा खून रफ़्तार पकड़ लेता हूं. मैं कुत्ता हूं. तो क्या, अगर तुमने मुझे जनम दिया है. तो
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तेरी संसद में अबकी आग लगाऊंगा…

तुम्हारे उधार मैं सूद समेत चुकाऊंगा,सूंघा सरकारी कुछ भी तो खून बहाऊंगा…लूट-खसोट किया बहुत अब बारी मेरी,तेरी गोली से तेरा ही भेजा उड़ाऊंगा…तु दिखा मुझे इक जंगल और जला के अब,तेरी संसद में अबकी आग लगाऊंगा…रख बिजली अपनी और ये सड़कें अपने पास,दौड़ा-दौड़ा कर वरना
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हरिद्वार की सैर

हरिद्वार जाना पडा!! वर्ना ना तो अपनी दिलचस्पी हर की पौड़ी पर होने वाली महा-आरती में थी, ना ही ऊँचे पहाड़ो पर सोने में लिपटी मनसा देवी में. ना ही चंडी देवी से कोई राफ्ता रखता हूँ, ना ही ऋषिकेश में बने राम और लक्ष्मण झूले से. पर जाना बुरा था ऐसा नहीं
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बीयर की बोतल और बच्चों की मार-मार

कैपिटल कोर्ट, मुनिरका. ऑफ़िस से आने के बाद एक बिगड़े दोस्त को समझाना था. दो-चार फिलोसॉफी पिलानी थी. और यह तब तक मुमकिन नहीं था जब तक उसे बीयर ना पिलाऊं. ठेके से दो बीयर की बोतल ली. बगल के पनवाड़ी से एक डिब्बी सिगरेट ली. और वहीं बने दो-चार चबूतरॊं में से एक
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चुप हो जाओ नहीं तो चलती ट्रेन से फेंक दूंगा

साभार - विकास कुमर www.qalamse.blogspot.comधर्म हमारे यहां एक बेहद संवेदनशील विषय हैं. धर्म या भगवान के बारे में कुछ भी बोलने से लाखों लोगों की भावनाएं ऐसे भड़कती हैं जैसे अपनी परछाईं को देखकर भेड़ या लाल कपड़े को देखकर सांड़ भड़कता है. मुझे तो लगता है कि
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जहन्नुम की जय हो!!

बहुत लोगों ने डराया. समझाया. बतलाया . सलाह दिये. भगवान के घर देर है अंधेर नहीं. अभी भी पूजा-पाठ शुरु कर दो. वो बहुत दयालू है. मुआफ़ कर देगा. सुबह दो अगरबत्ती उनके नाम से जला दिया करो. मैनें सोचा – अगरबत्ती तो अभी भी जलाता हूं. वो बात और है कि मेरे घर इस
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धर्म के ना रंग होते, अधर्म फिर होता नहीं…

जीत के आगे छुपा,है लोभ का कोहरा घना…हार कर देखा है मैंनें,शर्म से जो मुंह बना..परिणाम गर होते नहीं तो,कितना सुन्दर दृश्य होता..फिर विफल होता ना कोई,और ना कोई दिव्य होता…न कर्ण ही तब छला जाता,और न लंका जला जाता…दूर उस एक गांव में फिर,नक्सली ना पला
Mar 11 2010 09:54 PM
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मैं तुम्हे आदाब भी नहीं कहूंगा क्योंकि इतनी अदब नहीं है मुझमें

लोगों के चहेते चेहरों और नक़ाब-पोशों,मैं तुम्हे आदाब भी नहीं कहूंगा क्योंकि इतनी अदब नहीं है मुझमें…लोग कहते हैं कि तुम बहुत ताक़तवर हो, तुमने जहां बनाया, आसमान बनाया, पेड़-पौधे बनाये, जीव-जन्तु बनाये, चांद-सितारे बनाये, इंसान बनाया!! कुल मिलाकर सब कुछ
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किसके लिए?

कॉपी, कट, और पेस्ट वाले संविधान को अबकी साठ साल पूरे हो गए. ताई जी सुबह सुबह तिरंगा लहरायेंगी और ताऊ शाम होते ही उसे उतार लेंगे. इन साठ सालों में 25 झंडे चढ़ते-उतरते तो जरूर देखा है आज के दिन. हरेक साल बस यही सोचता रहा की ये जश्न किसके लिए? ये शक्ति
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मुल्क की मय्यत में आना होगा...

अफवाहों के बाज़ार में, आजकल, समाचार में, महसूद है सुर्खियों में, टीवी और अखबार में, बेतुल्लाह भी, हकीमुल्लाह भी... पीठ थपथपाने का दौर है, औपचारिकताएं अभी और है, जो खबर अभी अपुष्ट है, उससे जनता संतुष्ट है, और उस खबर की कहाँ फिकर है, जहां अध-नंगों, भूखो
 
राहुल कुमार
Dec 29 2009 11:59 AM
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ऊपर वाले का कुछ ऐसा "राहुल", दोष लिखो...

लिखा बहुत है प्रेम, ज़रा आक्रोश लिखो, मार-काट मच जाए, ऐसा रोष लिखो, दुनियादारी बहुत लिखी और लिखा अमन, भड़क उठे भावनाएं, ऐसा जोश लिखो, सहानुभूति है लिखी बहुत, पीड़ितों हेतु, खड़े हो सकें वो, ऐसा उदघोष लिखो, अल्लाह-ओ-अकबर, राम-नाम, सब ख़त्म करो, इंसान बन
 
राहुल कुमार
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तेरी बंदगी देखकर, मैं झुक गया मेरे भाई..

वो कहता है, वाह! क्या माल है? कुड़ी ग़ज़ब है, बेमिसाल है, उसकी फीगर! ओह! काश! एक रात के लिए! आ जाती, जवानी की उठी प्यास के लिए.. अपनी मर्दानगी का अहसास है उसे, पर खुदा का भी आभास है उसे, कहता है, राहुल भाई मैं अल्लाह के खिलाफ कुछ नहीं सुन सकता, उनके ख
 
राहुल कुमार
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सब हवसी, कपटी, पाखंडी है....

विप्र, मुल्ला, पादरी सब, हैं चोर की बिरादरी सब, मूढ़ तुलसी कहता है कि नारी, होती है त्रिया चरित्र वाली, और कुरान में कहीं इस बात का उल्लेख है, नारियां नर की ख़रीदी हुई एक खेत है. हर कहानी ग्रन्थ की सिर्फ एक षडयंत्र है, झूठ हर इक तंत्र, और ढोंग हर इक
 
राहुल कुमार
Dec 29 2009 11:59 AM
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क्यूँ करूं पूजा मैं तेरे भगवान् की....

क्यूँ करूं पूजा, मैं तेरे भगवान् की, अस्तित्वविहीन, एक सत्यहीन अनजान की.. लंगड़ा-लूल्हा, मूक-बधिर, आँखों से पैदल है वो, शक्ति सिर्फ कथाओं में है उस बानर हनुमान की, जानकी को वन भोग हुआ, जब पाँव उसके भारी थे, कैसी धृष्टता थी यह, उस पापी कपटी राम की, प्र
 
राहुल कुमार
Dec 29 2009 11:59 AM
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उपर वाले की लैंग्वेज

इन दिनों माथा-पच्ची में लगा हूं कि क्या होगी उपर वाले की लैंग्वेज. हिन्दू भाई के भगवान ने सृष्टि रची, मुस्लिम भाई के अल्लाह ने जहाँ बनाया, और इसाई दोस्तों के जीसस ने अर्थ को क्रिएट किया. घूम-फिर कर मैं यहाँ तक पहुंचा कि भैया धरती तो पूरे ब्रह्मांड मे
 
राहुल कुमार
Dec 29 2009 11:59 AM
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प्यारे भाई पाकिस्तान

प्यारे भाई पाकिस्तान, जन्मदिन की बासठवीं साल गिरह मुबारक हो.. मै तुमसे कभी अलग नहीं होना चाहता था, आखिर तुम और मैं तो एक ही थे ना, लेकिन इन लोगों का क्या करें जिन्होंने मजहब के नाम पर हमें एक से दो कर दिया. खैर, बताओ तुम कैसे हो? मुझे मालूम है इनदिनो
 
राहुल कुमार
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YOU BE ALERT & BE SCARED!!

You call us poor.You call us labour.You call us rustic.You call us fool.You call us servants.You not only abuse us,At the same time you use us.You beat us,You defeat us,Sometimes by hook,Sometimes by crook!!You exploit us,You demoralize us,By showing
 
राहुल कुमार
Nov 24 2009 04:43 PM
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सूरज को साहिल तेरे आगे ही ढ़लना होगा…

हर मुश्किल से तुमको निकलना होगा, ख़ुद ही, अपना ख़ुदा बनना होगा… चिलचिलाती धूप और कँपकँपाती सर्द, बेहद क़रीब से इनके गुज़रना होगा… वक़्त दिखायेगा कभी, कुछ ग़लत राहें, आँखों को हरदम ही खुला रखना होगा.. डँस लेगा, आस्तीन में छुपा साँप कभी, उनपे भी तुमको, हौले
 
राहुल कुमार
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मै अजीबो-गरीब तरीके से मरना चाहता हूँ

इतवार की सुबह वाकई ख़ास रही जब चाय की चुस्कियां और यशवंत भाई के वसीयतनामे पर चर्चा चल रही थी. बहुत दिन से बेरोजगार घूम रहा था.. सोचने के लिए कई दिन पहले एक मुद्दा सूझा था.."क्या है ऊपर वाले की लैंग्वेज".. तब से आज तक माथा-पच्ची करने की ज़ुरूरत नहीं हु
 
राहुल कुमार
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नफ़रत कहाँ-कहाँ से मिटायें!!

नफ़रत कहाँ-कहाँ से मिटायें!! एक घर की कहानी है. वहाँ एक लड़के का जन्म हुआ. खुशी की बात थी. पहला बच्चा था. वैसे बेटी भी होती तो भी खुशियाँ ही मनायी जाती. घर एक पढ़े-लिखे और सभ्य आदमी का माना जाता था. बच्चे का नाम क्या रखा जाये, सोचा जा रहा था. मुझसे भी ए
 
राहुल कुमार
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आओ!! दरिद्दर भगायें...

हुक्का पाती लोय-लाय, लक्ष्मी घर, दरिद्दर बाहर” पता नहीं दिल्ली में ऐसी कोई रस्म निभायी जाती है कि नहीं. मेरे गाँव में तो हमेशा से ही दिवाली में संठी जलाकर दरिद्दर को बाहर भगाया जाता है. माना जाता है कि लक्ष्मी घर तभी आयेगी जब दरिद्दर बाहर जायेगा. इसक
 
राहुल कुमार
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दारू की खुमारी और देवता की याद

सबसे पहले माफ़ी एक लम्बे विराम के लिए.. एक दोस्त के यहाँ दारू की दावत थी. पांच लोग थे हम. पीने का कारबार शुरू हुआ. थोडी बहुत झुनकी सवार होने लगी थी. एक ने गुनगुनाना शुरू किया, "गुलाबी आँखे, जो मैंने देखी...". मैंने बीच में टांग अड़ाई. भाई! आँखे झील सी
 
राहुल कुमार
Oct 14 2009 07:58 PM
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मुल्क से पहचान अपनी, है वतन ये जान अपनी,

मुल्क से पहचान अपनी,है वतन ये जान अपनी,मजहबों को भूल जाएँ,बस ज़मीं हो प्राण अपनी..आओ ये निश्चय करें हम,साथ ही मिलकर रहें हम,हो अमन ही धर्म अपना,प्रेम से बंधकर चलें हम,हिन्दू ना कोई, सिख कोई ना,और ना कोई जात अपनी,मुल्क से पहचान अपनी..है वतन ये जान
 
राहुल कुमार
टैग: गीत
Oct 10 2009 02:01 PM
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तुम्हारे धर्म की क्षय (भाग दो)

आपने “तुम्हारे धर्म की क्षय (भाग एक)” पढ़ा.. इससे आगे का अंश पेश कर रहा हूँ, आपके तवक्को की ख़ास ज़रूरत है.. उम्मीद है राहुल सांस्कृत्यायन जी का यह आलेख आपको सोचने पर विवश करेगा.. मजहब की दकियानूसी औक़ात खत्म करने की मेरी इस कोशिश में आपका साथ अपेक्षित
 
राहुल कुमार
Oct 10 2009 01:59 PM
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तुम्हारे धर्म की क्षय (भाग एक)

सन्दीप भाई की मदद से ये बेह्तरीन आलेख मिला, ये आलेख थोड़ा बड़ा है सो दो भागों में पेश कर रहा हूँ, गौर फ़रमायिएगा..• राहुल सांकृत्यायनवैसे तो धर्मों में आपस में मतभेद है। एक पूरब मुँह करके पूजा करने का विधान करता है, तो दूसरा पश्चिम की ओर। एक सिर पर कुछ बाल
 
राहुल कुमार
Oct 10 2009 01:58 PM