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प्रतिक्रिया

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19 May 2010
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चलो अब नक्सली बन जाते हैं.

(नीचे दी गई रचना मेरी नहीं है. यह रचना मेरे एक दोस्त  हिमाशुं कुमार की है. हिमांशु कोई पेशेवर लेखक या पत्रकार नहीं हैं सो लिखने से  ज्यादा लगाव नहीं है. लेकिन रोज–ब-रोज की हर छोटी-बड़ी समस्या पर खूब सोचते हैं और हर कोण से सोचते हैं. )होली के
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मीडिल क्लास को सब कुछ चाहिए.....!

निरुपमा पाठक, एक ऐसा नाम जिसे समाज की दकियानूसी सोच ने, पढ़ेलिखे परिवार ने एक ही झटके में इतिहास बना दिया. ऐसा नहीं है कि अपनी मर्जी से, अपनी पंसद से शादी करने और अपना जीवन साथी चुनने की वजह से किसी लड़की के मारे जाने की यह  अकेली घटना है. हर कुछ दिन
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" देशद्रोही है, आतंकवादी है….."

आज क़साब है. इससे पहले अफजल था और उससे पहले भी कोई रहा होगा. ये ऐसे कुछ चेहरे हैं जो समय-समय पर बदलते रहते हैं. लेकिन क्या यही कुछ चेहरे हैं जिसके किये धरे से हम एक समुदाय विशेष की छवि मन-माफ़िक तरीके से गढ़ने लगें? ये चेहरे तो सामने आते हैं और फिर इतिहास
May 07 2010 01:52 PM
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इनसे लड़ना होगा नहीं तो.....!!

झरखंड में जन्मी और दिल्ली में पत्रकारिता करने वाली निरुपमा आज इतिहास बन चुकी है. निरुपमा को किसी खाप पंचायत के सरपंच ने नहीं मारा. उसका गला घोटने वाले उसके अपने थे. शायद, उसके मां-बाप. वैसे हमारे देश के लिए यह कोई नई और अचरज में डालने वाली घटना नहीं है.
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क्या रैलियों में आम आदमी होता है?

कभी-कभी सोचता हूं कि अगर हमारे देश से गरीबी, भुखमरी, महंगाई और बेरोजगारी खत्म हो जाए तो इन नेताओं की गाड़ी कैसे चलेगी? ये कैसे विधायक, मंत्री और न जाने क्या-क्या बन कर लालबत्ति की गाड़ी से सायरन बजाते हुए जाएंगे और आएंगे? कैसे इनके चेहरे की लाली और बैंक
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स्टोरी, जो रोक दी गई...!

 (मेरी इस स्टोरी को मेरे संपादक ने भाजपा के खिलाफ बता कर रोक दिया. चलिए कोई नहीं. अपना ब्लॉग तो है ही. अभी मैं भाजपा के पक्ष में स्टोरी लिख रहा हूं तब तक आप मेरी इस स्टोरी को पढिए जिसे  संपादक महोदय ने रोक दिया.)भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की
टैग: भाजपा
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आखिर, पानी को बोलना ही पड़ा !!

प्यारे दोस्तों,जम के पीजिये. मस्त रहिये. इस गरमी को मात देने में बस मैं ही आपकी मदद कर सकता हूं. लेकिन इसके लिये आपको मेरी बात सुननी पड़ेगी. इसे गुहार कहिये, फ़रियाद कहिये, गिला कहिये... या फिर सलाह कहिये. अगर आपलोगों ने अपने इस दोस्त को अब तक नहीं
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तेरा बसेरा यहां नहीं....!!

तू कहीं और जा,तेरा बसेरा यहां नहीं,खुद की हरकतों से, आज बर्बाद है, कपटी है बना, एक वहसी भी तूझ में तैयार है, चल जा, तू कहीं और जा…….!!
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मेरे प्यारे प्रधानमंत्री जी.......

प्यारे प्रधानमंत्री जी, मेरा नाम रौनक है और हम आपकी दिल्ली से बहुत दूर  एक गांव में रहते हैं.  मेरे साथ मेरी मां है जो पिछले कुछ दिनों से बीमार है. बाबा खेती करते हैं. बड़ा भाई जिसकी उम्र 20 साल है,  बाबा के साथ खेत पर काम करता हैं लेकिन
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चुप हो जाओ नहीं तो चलती ट्रेन से फेंक दूंगा

 धर्म हमारे यहां एक बेहद संवेदनशील विषय हैं.  धर्म या भगवान के बारे में कुछ भी बोलने से लाखों लोगों की भावनाएं ऐसे भड़कती हैं जैसे अपनी परछाईं को देखकर भेड़ या लाल कपड़े को देखकर सांड़ भड़कता है. मुझे तो लगता है कि इन्सान इस विषय पर ऐसा भड़कता है कि
टैग: धर्म
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आम आदमी, आम आदमी और केवल आम आदमी!!

आम जनता के द्वारा निर्वाचित और देश की आम सी दिखने वाली रेल मंत्री ने साल 2010 का रेल बजट पेश कर दिया. जैसे हर नेता या कहें तो जनसेवक चुनाव के वक्त आम जनता के नाम की माला जपता है. वैसे ही रेल मंत्री और वित्त मंत्री बजट पेश करते वक्त आम जनता के नाम का माला
Feb 24 2010 05:29 PM
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हनुमान हो लिए राम विरोधी

राजनीति खेल का एक ऐसा मैदान है जहां हर कोई हमेशा अपना-अपना दाव चलता रहता है. यहां कुछ भी पहले से तय नहीं होता. इस मैदान का कोई  भी  रेफरी या अंपायर दावे से कुछ भी नहीं कह सकता. इधर हमेशा कोई न कोई खेल चलता रहता है. मजे की बात तो यह है कि
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कल एक और गणतंत्र दिवस

हर बार की तरह कल एक और गणतंत्र दिवस का समारोह होगा और आज शाम गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर देश की आम जनता के नाम राष्ट्रपति का संदेश राष्ट्रीय चैनल पर प्रसारित किया जाएगा. इस अवसर पर सब कुछ राष्ट्रिय होगा, सरकारी होगा.क्या मकसद है इस दिन को मनाने का?
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कुछ ऐसा हो जो दिखे

आजकल टीवी की दुनिया में एक भूचाल आया हुआ है. कुछ समाचार चैनल के बड़े पत्रकार त्राहिमाम, त्राहिमाम कर रहे हैं. कोई अपनी खीज फेसबुक पर छोटे-छोटे टॉपिक डाल कर मिटा रहा है तो कुछ बड़े पत्रकार ब्लॉग पर पोस्ट लिखकर अपना दुख जाहिर कर रहे हैं.लेकिन ये भूचाल, ये
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मीडिया का क्या करें?

पश्चिम बंगाल के एक वयोबृद्ध नेता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बिमार हैं. बंगाल के एक अस्पताल में उनका इलाज चल रहा है.इस तरह के खबरों के बीच एक खबर आती है कि बिमार नेता नहीं रहे. वो स्वर्ग के लिए निकल गए हैं. लेकिन अगले दिन खबर मिलती है कि नेता के मरने
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दिल्ली का ये कैसा गांव है?

“मुनिरका गांव” साउथ दिल्ली के बीचों-बीच का एक ऐसा इलाका जो अब केवल नाम के लिए ही गांव है. यहां कुछ भी गांव जैसा नहीं है.  न लोग और न जगह.फिर भी इसे गांव ही कहा और लिखा जाता है. सवाला उठता है कि अगर इस इलाके में गांव जैसा कुछ भी नहीं है तो इसे गांव
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नए साल में एक नई शुरुआत करें!

माननीय, टीवी के समाचार संपादकों कुछ ही दिनों में नया साल शुरू होने वाला है. मैं इस मौके पर आपसब के कुशल और खुशहाल जीवन की कामना करता हूं. मैं और मेरे जैसे आपके हजारों दर्शक यही कामना करते हैं. अपके दर्शक आपसब से बेहद प्यार करते हैं और एक लगाव भी महसू
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बनाने वाले…………

बर्तन बिखरे हुए, सड़क किनारे चुल्हे पे है रोटी पकती, सड़क किनारे बच्चे रोते, लडते और सो जाते, सडक किनारे दिन का सूरज, सड़क किनारे रात मे चान्द, सड़क किनारे आना-जाना, खाना-पीना, लडाई-झगड़े, प्यार-मोहबत, सब कुछ इनका सडक किनारे वास्तव मे, ये महानगरों की
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सच का सामना क्यों नही?

अभी हाल ही मे एक टीवी शो शुरू हुआ है ( सच का सामना ) और साथ ही शुरू हुआ है इसका विरोध। इस शो के बारे में जो विरोध लिखकर या बोलकर हो रहा है , नाहक है , बेकार है , कहूं तो बेमतलब है क्योंकि इसका फायदा तो शो को ही मिल रहा है। मुझे नही लगता कि यह मसला इत
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इकबाल की नज्म “मजहब नही सिखाता….” की जरुरत न हो.

आप सभी को याद होगा, इकबाल का वो गाना, “मजहब नही सिखाता आपस मे बैर रखना……”. हम सब गहे-बगाहे इस गीत को गुनगुना लेते हैं और अपने अपने धर्म की पीठ थपथपा लेते हैं। लेकिन क्या वास्तव मे ऐसा है? मुझे तो नही लगता. मैने जब से होश संभाला है यही देखा है कि लोग
Dec 29 2009 11:28 AM
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मजदूरों की मजदूरी और पुलिस की लाठी

मुझे यह जानकारी संदीप जी के मेल से मिली. इस खबर को कोई अखबार या टीवी वाला तो दिखाएगा नहीं क्योंकि यहां उनके मालिकों का हित खतरे में है. लेकिन ब्लौग पर तो हम इसे पढ ही सकते है. यहां किसी का कुछ नहीं चलता है.) करावल नगर के बादाम मज़दूर पिछ्ले कुछ दिनों
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हम तो आम हैं!!!

सुबह-सुबह छत पर आराम से बैठकर अखबार पड़ने का मौका नहीं मिलता, सो चलते वक्त बैग में रख लेता हूं और बस में अपनी सीट पर जमने के बाद पढ़ना शुरु करता हूं. आज भी ऐसा ही हुआ. खबरें और लेख देखते वक्त मेरी आखों के सामने दो ऐसी खबरें आईं, जिसे पढने के बाद लगा कि
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ज़िन्दा कर दो…….

दुधिया रौशनी मे नहाता कमरा जो तुम्हारे आने पर रौशन होता है,   वो दीवारे, जहाँ केवल प्रेमवाणी लीखी हुई है,   तुम्हारे आने पर ही वो उसे समझते हैं,   फर्स पर बीछा बिछावन ,जिसे तुमने और मुलायाम बनाया है,   पुराना तकिया जो तुम्हारे आसप
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सुनो तो मेरी भी

हे मर्द, तुमने क्या कहा? ज़रा दुहराना तो तुमने कहा- हम औरतें, कोमल हैं, कमज़ोर हैं! लाचार हैं साथ तुम्हारे चलने को, हमारा कोई अस्तित्व नहीं है बगैर तुम्हारे! तुम्हारी इन बातों पर, बचकानी सोच पर, जी करता है खूब हँसू…….! सोचती हूँ, कैसे बोलते हो तुम ये स
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ठण्ड की काली रात में......

ठण्ड की काली रात में...... कांपती हुई, सिकुड़ी हुई है. तंग कपड़ों में लिपटी, सड़क किनारे लुढ़्की हुई है. गोद में समेटे बच्चे को, शीतलहर से लड़ रही है. लड़ते-लड़्ते हांफ रही है, और सांसों की खुलती गठरी को बांध रही है. ठण्ड की काली रात में...... अपनी जिन्दगी
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“खबर हर किमत पर" ये क्या है?

अगर आप पहली फोटो में देखें तो पता चलता है कि खबर क्या है वहीं दुसरी फोटो से यह मालुम होता है कि खबर  “ अगर आप नौकरानी रखने जा रहे हैं तो ये जानिए... ”  के बीच में एक हिरोइन की फोटो लगी है. उपर की दोनों तस्वीरें उस टीवी चैनल के वेब साइट की ह
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गंभीर विषय और NDTV

दिसंबर की रात के करीब 10 बज रहे होंगे जब मैं अपने एक दोस्त के रूम पर टीवी देख रहा था. उस वक्त हर न्युज चैनल अपने-अपने अंदाज में एक साल पहले की उस घटना को याद कर रहा था जिसने समूचे देश को स्तब्ध कर दिया था, मुम्बई की तेज रफ्तार जिन्दगी को रेंगने पर मज
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ऐसा होगा शिव सैनिकों का राज.....!!!!

कल, बाल ठाकरे के गुंडों ने मुम्बई के एक टीवी चैनल के दफ्तर में मार-पीट और तोड़-फोड़ की. इस घटना के बाद सेना के एक प्रवक्ता ने गर्व के साथ स्वीकार किया कि हमला “शिव सैनिको” ने किया है.  मुझे लगता है कि, इस घटना के बाद मुम्बई वासियों को चेत जाना चाह
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चैनल के साथ जनता का समर्थन है.

इन दिनों हर कोई इन्डिया टीवी के पीछे पड़ा है, कोई खराब कंटेंट का नाम लेकर इस चैनल को गाली दे रहा है तो कोई खबर की प्रस्तुति को लेकर सवाल उठा रहा है. किसी को परेशानी है कि चैनल प्राइम टाइम पर भूतों की कहानी दिखा रहा है तो कुछ लोग कहते फिर रहें हैं कि य
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अपना गांव अच्छा नहीं लगा.

अभी एक-दो दिन पहले ही अपने गांव से लौटा हूं, इस बार मेरा गांव प्रवास करीब-करीब बीस दिनों का था सो मेरे पास कुछ ज्यादा टाइम था, अपने उस गांव को देखने-समझने का जहां मैं पैदा हुआ, जवान हुआ. पहले अपना गांव अच्छा लगता था, वहां के लोग और उनकी बातें सुहाती
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छठ पूजा की हार्दिक शुभकामनाएं.......!!!

आज ही अखबार में पढ़ा रहा था कि पूरब की तरफ जाने वाली ट्रेनों में रेलमपेल की स्थिति है, क्योंकि छठ पूजा में सब बिहारी अपने घर जाना चाहते हैं. तो साथियों, आपका ये बिहारी भी आज अपने गांव जा रहा है. छठ पूजा के बाद आपसब से मुलाक़ात होगी. चलते-चलते, आप सब ब्
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पेशाब पिशूब करना मना है

सामान्य देशों में लोग सुबह दफ़्तर जाने से पहले नाश्ता करते हुए इसलिए टीवी ऑन करते हैं कि कोई सुंदर चहरा देखें. किसी हल्की फुल्की बात पर हंसें. किसी राग का मज़ा लें और दिन की शुरुआत ख़ुशगवार अंदाज़ में करें. लेकिन पाकिस्तान में अब लोग सुबह, दोपहर या श
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इनकी दिवाली कैसे मनेगी……!!

वो अकेले नहीं रह्ती, साथ रह्ते हैं बच्चे भी , एक सुबह से शा म तक उसकी मदद करता है, दूसरा छाती से चिपकी, या फिर चिपका रहता है. मलीन चेहरा, गन्दे कपडे, उजरे बाल, खाली पैर, उचाट माथा, पीली आखें, पेट और पीठ एक-सा, वो एक नहीं है, इनकी संख्या बड़ी है, हर ला
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घर की लड़ाई की वजह से…..

जंगल के रास्ते एक कुत्ता तेजी से दौड़ रहा था . रास्ते में खड़े एक किसान ने उससे पूछा- भाई, तुम कहां जा रहे हो? कुत्ते ने जवाब दिया- मैं जिन्दगी भर के पापों को धोने के लिए गंगा स्नान के लिए जा रहा हूं। तुम्हें गंगा तक पहुंचने में कितना समय लगेगा?- किसान
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मुंबई या बंबई

यह पोस्ट भी बीबीसी हिन्दी के ब्लॉग खरी-खरी से उधार लेकर यहाँ चस्पा रहा हूँ. इस लेख में एक ख़ास तेवर है जिसे आप पसंद करेंगे. इसके लेखक है बीबीसी के पत्रकार " राजेश प्रियदर्शी" । ) पहले राज ठाकरे नाराज़ हुए और उसके बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चह
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“इसरो करेगा चाँद पर खुदाई….” वाह भाई..वाह !!

कुछ दिन पहले हमने चाँद पर छ्लांग लगाई थी तो दुनियाभर के लोगों ने तरह-तरह की बातें बनाई. किसी ने मुंह चमकाते हुए कहा “ कोई बड़ी बात नही है चाँद पर जाना! ” तो किसी ने नसीहत वाले लहजे में कहा “ अच्छा है … .पर चाँद के बदले मंगल पर जाना चाहिये था. ” कुछ लो
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लघु कहानी: ये तो सड़े हुए थे....!

(लेखक दोस्त कबीर कृष्ण की कलम से दुसरी कहानी आप सब के लिए।)पिछली गर्मी की छुटियों में मैं घर जा रहा था।अगले दिन की सुबह जब नींद खुली तो मेरी ट्रेन इलाहाबाद स्टेशन पर रुकी हुई थी।मैं उत्सुकतावश खिड़की से बाहर देखने लगा।तभी प्लेटफार्म की भीड़ से कोई दस
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अब आपको भी शादी कर लेनी चाहिए......

एक लंबे समय बाद फिर आ गया हूँ आपके साथ, अपने ब्लॉग पर । मैं छुट्टी पर था, करीब एक साल बाद अपने गॉंव, दूर तक फैले खेतों और अपनी माँ जो कुछ समय से जब भी फोन करती तो एक सवाल हमेशा पूछती कब आओगे? और मैं हमेशा किसी न किसी वजह से उसे आगे की तारीख देता रहता था।
टैग: बिहार
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वेब को वेब ही रहने दीजिये टीवी मत बनाइए……

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Sep 17 2009 10:19 PM