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चलो अब नक्सली बन जाते हैं.
(नीचे दी गई रचना मेरी नहीं है. यह रचना मेरे एक दोस्त हिमाशुं कुमार की है. हिमांशु कोई पेशेवर लेखक या पत्रकार नहीं हैं सो लिखने से ज्यादा लगाव नहीं है. लेकिन रोज–ब-रोज की हर छोटी-बड़ी समस्या पर खूब सोचते हैं और हर कोण से सोचते हैं. )होली के
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May 19 2010 04:18 PM


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