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06 Jun 2010
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अमेरिका का राष्ट्रपति… और उसके मज़े

पिछले दिनों, करीब दो-ढाई माह पहले एक फ़ीचर पढ़ा था, “ अफ़गानिस्तान में फँसा अभिमन्यु – अमेरिका “ !  हालाँकि इसमें सामयिक वस्तुस्थितियाँ पूरी ईमानदारी से बयान की गयीं थी, पर मुझे इस फ़ीचर के शीर्षक में अभिमन्यु का होना नागवार गुज़रा था । हठात मुझे बरसों
 
डा. अमर कुमार
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तेरी आवाज़, को काग़ज़ पे रखके, मैंने चाहा था कि पिन कर लूँ........

गुलज़ार पर कुछ लिखना जैसे मन के कितने कोनो से गुजरना है .....कितनी जिंदगियो को रिवाइंड करना है .....वो मेरे लिए उस कोर्स की किताब की  माफिक है जिसे जितनी बार पढ़ा जाये.भीतर सेहर बार नया कुछ निकाल देती है ........इक नज़्म की चोरी इक नज़्म मेरी चोरी कर
 
डॉ .अनुराग
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अज़ीब आदमी

उन दिनों सरकार  ने  बाहर  जाने  पर  कड़ी  पाबंदी  लगा  रखी  थी   और  क्योंकि  बुलावा  केवल  धर्म  और  रणधीर  का था, इसलिए मंगला और दिल्लू नहीं जा सकती थी। बड़ी
 
डा. अमर कुमार
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किसी का मुंह जो यह बात हमारे मुंह पर लावे

.... ... के हमने यह नायाब अफ़साना जो रानी केतकी के नाम से चलता है, पूरा न किया ? वापस आकर देखता हूँ, तो डेढ़ महीने पूरा होना चाहते हैं.. और रानी का किस्सा कोने पड़ा मेरी राह तक रहा है । ज़माने की रुसवाईंयों ने मुझे खुद से रुबरू होने का इतना मौका भी न दिया कि
 
डा. अमर कुमार
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हमारे दरमिया ऐसा कोइ रिश्ता नहीं था .....

परवीन शाकिर...गर आज़ाद नज़्म को बेबाकी से कहना भी एक हुनर है ... तो यकीन मानिये इस हुनर में इनका जवाब नहीं.....हमारे दरमिया ऐसा कोइ रिश्ता नहीं था तेरे शानो पे कोई चाहत नहीं थी मेरे जिम्मे कोई आँगन नहीं था कोई वादा तेरी ज़ंजीर -ए -पा बनने नहीं पाया किसी
 
डॉ .अनुराग
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एक आंतकी का पति ओर बुद्ध की मुस्कान -उदय प्रकाश.

उदय प्रकाश...... नाम लिखना जैसे शब्दों के कई रेखा चित्रों के बण्डल को एक साथ संभालना है...उन्ही का ..एक रेखा चित्र यहाँ भी है....सत्ताओं ने एक ऐसा समय रचा है हमारे इर्द-गिर्द कि सारे दुस्वप्न और आशंकाएं एक-एक कर सच होने लगती हैं। उस रोज़ जब पोखरण में
 
डॉ .अनुराग
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चूल्हे भाड में जाय यह चाहत - चाह के हाथों किसी को सुख नहीं

मेरी सकत गुरू की भगत फूरे मंत्र ईश्वरोवाच .. उधर  हमको नींद सताती थी, और की सुनिये । अब तक जो पढ़ा सो यह था कि मेरी सकत गुरू की भगत फूरे मंत्र ईश्वरोवाच पढ के एक छींटा पानी का मिलना था कि छीटों के साथ ही कुँवर उदैभान और उसके माँ बाप तीनों जनें हिरनों
 
डा. अमर कुमार
Feb 25 2010 10:51 PM
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गोरख जागा, मुंछदर जागा और मुंछदर भागा

यह किस्सा गोरख जागा, मुंछदर जागा  और  मुंछदर भागा तक पहुँचाया, और  धीरे धीरे ऎसे अड़चन आन पड़ी और ऎसी बान बनी  कि हिरदय में एक छिन को लगता रानी केतकी की पूरी कहानी मेरे पन्नों पर कभी  उतर कर न आ पावेगी । जिस घडी इसे पूरी करने की
 
डा. अमर कुमार
Feb 22 2010 02:19 AM
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जोशिम ओर फुग्गो की बिरादरी

सोचता   हूँ  कविता को परिभाषा  कितनी कठिन होगी ...  ...नियम हिज्जे के कानून ख्याल   को  कैसे   बाँध सकते  है  .....अक्सर जब ख्यालो  की रवानगी रुक  जाती है तो कंप्यूटर के दरवाजे खटखटाता हूँ
 
डॉ .अनुराग
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प्यार के संबंध में एक छोटी सी बात

सबद एक ऐसी लाइब्रेरी है जहाँ मनपसंद किताबो के कुछ बेहतरीन पन्ने मिल सकते है ...आज उसी लाइब्रेरी का एक पन्ना खोला है  ...( नीरज पाण्डेय की ख्याति वेंसडे फिल्म से है. वे अपनी फिल्मों के लिए खुद लिखते हैं. यह फिल्म से बहार उनकी पहली कहानी है. इसे नीरज
 
डॉ .अनुराग
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बच्चे.. जो बच्चे न रह पायेंगे

कुछ दिनों पहले डा० महेश परिमल की एक पोस्ट पढ़ी थी.. उन्होंनें एक विचारोत्तेजक और ज़ायज़ मुद्दा उठाया था । सरकार व जनसाधारण की बात तो दूर.. ब्लागर पर ही उनकी बात दब कर रह गयी । कई दिनों के प्रयास के बाद लिंक मिल पाया है । देखिये तो.. बच्चों को समय से पहल
 
डा. अमर कुमार
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भारतीय कुत्ते

आज नीरज जी की एक पुरानी पोस्ट पढ़ने को मिला । यूँ देखें तो कुछ ख़ास नहीं, पर सैटायर या हासपरिहास लेखन में सटीकता की दृष्टि से यह साझा करने का मन हुआ । प्रस्तुत है, एक अँश ; “ और अगर आपको हमारे देश के आवारा कुत्तों की काबिलियत पे शक है, तो दोबारा सोचिये
 
डा. अमर कुमार
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हिन्दू धर्म क्या है ?

इस उद्धरण में विन्सेंट स्मिथ ने हिन्दू-धर्म और हिन्दूपन शब्दों का प्रयोग किया है । मेरी समझ में इन शब्दों का इस तरह इस्तेमाल करना ठीक नही । अगर इनका इस्तेमाल हिंदुस्तानी तह़जीब के विस्तृत मानी में किया जाय, तो दूसरी बात है । आज इन शब्दों का इस्तेमाल,
 
डा. अमर कुमार
Dec 17 2009 10:36 PM
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श्री गणेश

ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ
 
डा० अमर कुमार
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क्राँति की तलवार - इन्क़लाब ज़िन्दाबाद

शहीद भगत सिंह जन्मदिन पर विशेष अलीपुर बमकाँड के आरोपी श्री यतीन्द्रनाथ दास 63 दिन के  आमरण  अनशन  के  पश्चात   ब्रह्मलीन हो गये  । सँभवतः ब्रिटिश सरकार उनको मिसगाइडेड हूलीगन से अधिक कुछ और न मानती थी । यह इसलिये भी
 
डा. अमर कुमार
Dec 17 2009 10:36 PM
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कवि हृदय वैज्ञानिक का चकित आध्यात्म्य

समँदर की लहरें, सुनहरी रेत, श्रद्धानत तीर्थयात्री रामेश्वरम द्वीप कि वह छोटी-पूरी दुनिया सबमें तू निहित सबमें तू समाहित अधिकाँश पाठक इस वैज्ञानिक के परिचय  को  लेकर  उत्सुक  हो  उठे  होंगे ।  शायद  इनकी  इ
 
डा. अमर कुमार
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मज़बूत होता जाता रिश्ता

शारीरिक जीवन के इस कैदखाने में आने से पहले हम कहाँ थे और क्या थे ? " " ये समझदार, सँज्ञाशील और शरीर में  बेचैन रहने वाली आत्मायें हमारे शरीर में आने से पहले कहाँ थीं और क्या थीं ? इससे पहले कि ज़माना हमें निरर्थक आवाज़ बना कर दुनिया में
 
डा. अमर कुमार
Dec 17 2009 10:36 PM
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इनकी डायरी में कैद उनकी वर्दियाँ

बहुचर्चित शशि हत्याकाण्ड की गूँज कुछ थम सी गयी है ।  पर  मक़तूल  के  रिश्तेदार, कातिल   और पैरोकार तो इसे अपने अपने ढँग से जी ही रहे हैं !  इस  हत्याकाण्ड  के  मुख्य  आरोपी  आनन्द सेन  
 
डा. अमर कुमार
Dec 17 2009 10:36 PM
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फुल्ली फालतू चैनल का कवर स्टोरी: घासी राम की भैँस

सबसे पहले -   श्री राजशेखर रेड्डी हमारे बीच न रहे । यहाँ कोई भी शरीर स्थायी परमिट लेकर नहीं आता है, तो उसके न रहने का शोक क्यों ? जिस तरह से उनको विदा होना पड़ा, वह वाकई दुःखद है । किसी भी राजनैतिक पार्टी के पर्ति कोई विशेष प्रतिबद्धता न रखते हुय
 
डा. अमर कुमार
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भिखारी और लिपस्टिक

कल डा० अनुराग की पोस्ट ने कुछ समय तक अशाँत रखा। मेरे ख़्याल से यह कथ्य कोलाज़ समाज के विस्तृत कैनवास के चित्रण का एक फ़ैशनेबुल रिपीटेशन था, जो एक कोने पर ही टिक कर रह गया है । कुश के स्वर में निहित प्रतिवाद और अनूप शुक्ल की प्रशँसात्मक उलाहना से जैसे मु
 
डा. अमर कुमार
Dec 17 2009 10:36 PM
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कुंठित कनेक्शन

इस आलेख पर मैं अपनी तरफ़ से कोई टिप्पणी न दूँगा । बेहतर होगा कि यदि आपके पास सोचने के लिये पल दो पल हों, तो आप इसे स्वयँ ही पढ कर कोई निष्कर्ष निकालें, । सँकलक– डा० अमर  कुमार कुंठित कनेक्शन स्त्री-पुरुष संबंध, सृष्टि की बेहद भरोसेमंद बुनियाद ।&#
 
डा. अमर कुमार
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हमारी अपनी ज़बान की साठवीं बरसी

हमारी हिंदी, जिसे हम इतना प्यार करते हैं अपंग है, वह जन्म से विकलांग नहीं थी लेकिन उसका अंग-भंग कर दिया गया. वह बहुत बड़ी सियासत का शिकार हुई, अभी वह बड़ी हो ही रही थी कि 1947 में उसके हाथ-पैर काटके उसे भीख माँगने के लिए बिठा दिया गया. करोड़ों लोगों
 
डा. अमर कुमार
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क्यों नाराज़ है, यह शायर ?

आइये फ़र्ज़ करें कि, अडवानी  प्रधानमन्त्री  बन  ही  जाते । तो, इस दौर के एक विवादित राजनीतिज्ञ निश्चय ही कबिनेट को सुशोभित कर रहे होते । अल्ला अल्ला ख़ैर सल्ला तीन साल तो निकाल ही लेते । फिर उनकी किताब आती या न आती, कौन जानता है ? यह
 
डा. अमर कुमार
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पुनर्जन्म चक्र पर एक चिंतन : गांधीजी के परिप्रेक्ष्य में

अतिथि पोस्ट             विज्ञान का कोई भी छात्र अमूमन पुनर्जन्म जैसे विषय को एक गप्प मान नकार देगा। लेकिन मैं कहीं -न कहीं पुनर्जन्म को पूर्णतः नकारने को तैयार नहीं हो पाता। इसका कारण भी विज्ञान
 
Abhishek Mishra
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जो कभी हुआ करता, अपना इन्डिया

यद्यपि इन सँकलित चित्रों का ब्लागपोस्ट से कोई सरोकार नहीं है, फिर भी इन्हें एक स्थान पर सँजो रखने की गरज़ से बटोरा है । यदि हमारी अपनी पीढ़ी को यह चित्र विचित्र किन्तु सत्य लग सकते हैं, तो आने वाले कई दशकों के बाद इन्हें देखना रोमाचँक कम लोमहर्षक अधिक
 
डा. अमर कुमार
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एक और रात - गुलजार

सदाबहार ग़ुलज़ार का 75 वाँ जन्मदिन 18 अगस्त को चुपचाप आकर निकल भी गया । कोई शोर नहीं, कोई हलचल नहीं !  मैं उनके लिये कुछ लिखना चाहता था, लेकिन हज़ार चेहरों वाले ग़ुलज़ार के लिये लिखने का मेरा क़द नहीं, बल्कि ईमानदारी से कहूँ कि ड्राफ़्ट को लगभग पाँच दफ़
 
डा. अमर कुमार
Dec 17 2009 10:36 PM
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ब्लागपोस्ट की पहेली ?

पिछले हफ़्ते, मैंने ( अपनी समझ के अनुसार ) एक  अच्छी पोस्ट सहेजी ,  और लिंक व लेखक का नाम न देकर इसे पहेली का रूप दे दिया । यह एक तरह से ख़ुराफ़ात ही कहा जायेगा । लोगों ने सोचा होगा, एक  निट्ठल्ला  बैठे  ठाले  ब्लागजगत 
 
डा. अमर कुमार
Dec 17 2009 10:36 PM
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भारतीय सँस्कृति और इससे जुड़ी एक पहेली

जबसे इस ब्लाग की परिकल्पना बनी, तभी से एक पोस्ट मन में बार बार घुमड़ रहा था ।  शायद        अक्टूबर 2007 के आस पास पढ़े  गये  इस पोस्ट का कन्टेन्ट तो मोटा मोटी  याद था, शीर्षक याद आये तो  लिंक&
 
डा. अमर कुमार
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तूफ़ान को पहचानने में इतने असमर्थ

श्री प्रियरँजन जी राँची से हैं, और पेशे से पत्रकार हैं । वह उदयकेशरी जी के ब्लाग सीधी बात ( Dare to say truth ) पर यदा कदा पोस्ट भी देते रहते हैं । जून 2008 में उनकी एक पोस्ट रिंगटोन का बाज़ार और संस्कृति एक साथ कई प्रश्न उठाती है । किंवा किसी पाठक क
 
डा. अमर कुमार
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राष्ट्रकवि और ठेठ हिन्दी के ठाठ

हिंदुस्तान 7 मार्च, 1956 पहला पेज दो कालम की खबर है, जिसमें प्रख्यात कवि मैथिलीशरण गुप्त ने कवितामय अंदाज में बजट से जुड़े सवाल पूछे हैं- –आह कराह न उठने दे जो शल्य वैद्य है वही समर्थ—राष्ट्रकवि की दृष्टि में बजट- हमारे संवाददाता द्वारा नई दिल्ली 6 म
 
डा. अमर कुमार
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तीन अलग कवि ..तीन अलग कविताएं ....तीन अलग सोच .......

कुछ कविताएं ऐसी होती है जब लिखी जाती है तो जाने क्या सोचकर .पर जब सामने आती है तो कई लोगो की बन जाती है ..कभी कभी सोचता हूं ...के पियूष मिश्रा क्या .."तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनिया "के बाद क्या उससे बेहतर लिख पायेगे ..क्या प्रसून जोशी ....तारे
 
डॉ .अनुराग
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दीपावली की शुभकामनाओं पर सवार माई लक्ष्मी

दीपावली की शुभकामनाओं का आना आरम्भ हो चुका है  । मेरे मन के किसी कोने में ठँसे हुये उलट  चरित  को  यह  क्यों  लगता  करता  है  कि  ऎसे  रस्मी बधाई  सँदेश  दाल-रोटी के ज़द्दोजहद में जुटे आ
 
डा. अमर कुमार
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जारी है.. रानी केतकी की कहानी

अब तक की कहानी ( यहाँ देखें ) कहानी के जीवन का उभार और बोलचाल की दुलहिन का सिंगार किसी देश में किसी राजा के घर एक बेटा था । उसे उसके माँ-बाप और सब घर के लोग कुंवर उदैभान करके पुकारते थे । सचमुच उसके जीवन की जोत में सूरज की एक स्त्रोत आ मिली थी । उसका
 
डा. अमर कुमार
Dec 17 2009 10:36 PM
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सुकुल पाकड़ के बहाने ईँशा अल्लाह - रानी केतकी की कहानी

प्रसँगतः यह सूत्रपात : मेरे  सह-कर्मचारी  अवधेश द्विवेदी  का  रविवार  को  सुबह सुबह  फोन   आया कि, " सर  मैं  अभी  नहीं  आ  पाऊँगा,  बाबू  ने  मेले  में
 
डा. अमर कुमार
Dec 17 2009 10:36 PM
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भिखारी और लिपस्टिक

कल डा० अनुराग की पोस्ट ने कुछ समय तक अशाँत रखा। मेरे ख़्याल से यह कथ्य कोलाज़ समाज के विस्तृत कैनवास के चित्रण का एक फ़ैशनेबुल रिपीटेशन था, जो एक कोने पर ही टिक कर रह गया है । कुश के स्वर में निहित प्रतिवाद और अनूप शुक्ल की प्रशँसात्मक उलाहना से जैसे मु
 
डा. अमर कुमार
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कुंठित कनेक्शन

इस आलेख पर मैं अपनी तरफ़ से कोई टिप्पणी न दूँगा । बेहतर होगा कि यदि आपके पास सोचने के लिये पल दो पल हों, तो आप इसे स्वयँ ही पढ कर कोई निष्कर्ष निकालें, । सँकलक– डा० अमर  कुमार कुंठित कनेक्शन स्त्री-पुरुष संबंध, सृष्टि की बेहद भरोसेमंद बुनियाद ।&#
 
डा. अमर कुमार
Nov 21 2009 03:19 AM
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हमारी अपनी ज़बान की साठवीं बरसी

हमारी हिंदी, जिसे हम इतना प्यार करते हैं अपंग है, वह जन्म से विकलांग नहीं थी लेकिन उसका अंग-भंग कर दिया गया. वह बहुत बड़ी सियासत का शिकार हुई, अभी वह बड़ी हो ही रही थी कि 1947 में उसके हाथ-पैर काटके उसे भीख माँगने के लिए बिठा दिया गया. करोड़ों लोगों
 
डा. अमर कुमार
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क्यों नाराज़ है, यह शायर ?

आइये फ़र्ज़ करें कि, अडवानी  प्रधानमन्त्री  बन  ही  जाते । तो, इस दौर के एक विवादित राजनीतिज्ञ निश्चय ही कबिनेट को सुशोभित कर रहे होते । अल्ला अल्ला ख़ैर सल्ला तीन साल तो निकाल ही लेते । फिर उनकी किताब आती या न आती, कौन जानता है ? यह
 
डा. अमर कुमार
Nov 21 2009 03:19 AM
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पुनर्जन्म चक्र पर एक चिंतन : गांधीजी के परिप्रेक्ष्य में

अतिथि पोस्ट             विज्ञान का कोई भी छात्र अमूमन पुनर्जन्म जैसे विषय को एक गप्प मान नकार देगा। लेकिन मैं कहीं -न कहीं पुनर्जन्म को पूर्णतः नकारने को तैयार नहीं हो पाता। इसका कारण भी विज्ञान
 
Abhishek Mishra
Nov 21 2009 03:19 AM
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जो कभी हुआ करता, अपना इन्डिया

यद्यपि इन सँकलित चित्रों का ब्लागपोस्ट से कोई सरोकार नहीं है, फिर भी इन्हें एक स्थान पर सँजो रखने की गरज़ से बटोरा है । यदि हमारी अपनी पीढ़ी को यह चित्र विचित्र किन्तु सत्य लग सकते हैं, तो आने वाले कई दशकों के बाद इन्हें देखना रोमाचँक कम लोमहर्षक अधिक
 
डा. अमर कुमार