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15 Jun 2010
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जेठ की दुपहरी

जेठ की तपती दुपहरीआग जो बरसा रहीबर्फ़ की चादर लपेटेठंढ भी शरमा रही ।स्याह लावा हर सड़क परबस पिघलता जा रहाचीख प्यासे पाखियों कीदिल को अब दहला रही ।दूर तक दरकी है धरतीघाव बस सहला रहीसोत पानी का दिखा करआंख को भरमा रही।हर नदी अब भाप बन करधुंध में मिल जा
 
हेमंत कुमार ♠ Hemant Kumar
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ओ मां

      परिस्थितियां हमें कभी कभी इतना विवश कर देती हैं कि हम चाह कर भी कुछ कर नहीं सकते----बस उन हालातों को मूक दर्शक बने देखते रहते हैं और खुद को हवाले कर देते हैं उन हालातों के जिनसे हम जूझ रहे होते हैं। हम मान लेते हैं कि जो
 
हेमंत कुमार ♠ Hemant Kumar
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हमारे विकास के तीन दशकों का जीवंत दस्तावेज----“मुन्नी मोबाइल”

पुस्तक:मुन्नी मोबाइललेखक:प्रदीप सौरभ  प्रकाशक:वाणी प्रकाशन 4695,21-ए,दरियागंज,नई दिल्ली-110002                                       
 
हेमंत कुमार ♠ Hemant Kumar
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सारी रात

रात रात भरखदबदाते हैं विचारअदहन की तरहमेरा दिमाग बन जाता हैचूल्हे पर चढ़ी पतीली।कितने कितने विचारकैसे कैसे विचारढेर सारे विचारअच्छे बुरे सुखद दुखद।आसमान में उड़ती चिड़ियाबियाबान जंगलों की हरियालीपेड़ों के बीच भागते हिरनों का झुण्डफ़ूल पत्तियां झरनेतपते
 
हेमंत कुमार ♠ Hemant Kumar
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हंस रे निर्मोही हंस

हंसो शेखरूहंसो सिद्धूहंसो राजूहंस रे जानीहंस,हंस रे निर्मोही हंस।हंसो कि बचपन भूलता जा रहा है हंसनाहंसो कि लड़कियां भूल रही हैं खिलखिलानाहंसो कि दम तोड़ रहे हैं यौवन के अरमानहंसो कि बोझ बन गया है बुढ़ापाहंसो कि बढ़ रही है पागलों की तादादहत्यारों की
 
हेमंत कुमार ♠ Hemant Kumar
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गौरैया से----

प्यारी गौरैयाक्यों रूठ गई हो तुमहमसेपिछले कुछ सालों से।मेरा आंगन घरऔर खपरैले पर फ़ैलीलौकी की बेलसब बाट जोह रहेतुम्हारी वापसी का।तुम्हारीचीं चीं चूं चुं से हीहमारी सुबह होती थीआंगन में तुम्हारे फ़ुदकनेके साथ ही तोहम भीशुरू करते थे धमाचौकड़ी।प्यारी
 
हेमंत कुमार ♠ Hemant Kumar
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होलीनामा

 (कुछ व्यक्तिगत और कुछ आफ़ीशियल व्यस्तताओं के कारण मैं पिछले दो माह से ब्लाग पर अनुपस्थित था। मैनें सोचा कि होली के पावन पर्व पर ब्लाग पर फ़िर वापस हो लिया जाय। आज मैं अपने पिता श्री प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव जी का एक व्यन्ग्य प्रकाशित कर रहा हूं। यह
 
हेमंत कुमार ♠ Hemant Kumar
Feb 28 2010 08:55 AM
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गजल

धूप के छौने भी अब तो ठंढ से शर्मा रहे आग से दहके थे उपवन राख बनते जा रहे। स्याह चादर में लिपटते शब्द ढलते जा रहे गीत के मुखड़े निकल कर धुंध बनते जा रहे। बंद मुट्ठी से फ़िसल कर छंद निकले जा रहे शीत के पहरे में बैठे हम तो बस बल खा रहे। मौन पसरा गांव में
 
creativekona
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शिक्षक दिवस पर ----मेरे मन में ---------

आज शिक्षक दिवस है। इस शुभ अवसर पर सभी शिक्षक बन्धुओं को हार्दिक बधाई । इस अवसर पर मैं अपने शिक्षक बन्धुओं खासकर प्राथमिक स्कूलों के शिक्षकों से कुछ अनुरोध करना चाहूंगा। कि ------ 0बच्चों का मन बहुत कोमल होता है। 0इस उम्र में बच्चों के मन पर जो छाप पड़
 
creativekona
Dec 29 2009 11:50 AM
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कहानी …कहना ---- सुनाना ( भाग – 3)

मेरे अब तक के पिछले दोनों लेखों से पाठक, अभिभावक, शिक्षक बन्धु यह बात समझ ही चुके ह ोंगे कि क हा नी सुनाने में स्व रों के उतार चढाव की क्या भूमिका है? स्वर,गति और लय का क्या महत्व है? अब मैं आपके सामने कथा वाचन या कहानी कहने का एक तरीका और रख रहा हूं
 
creativekona
Dec 29 2009 11:50 AM
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रीतापन

हर बारिश में तुम्हारे पास होने का एहसास बुन देता है एक गुंजलक मेरे चारों ओर। बंध जाते हैं मेरे हाथ पांव कैद हो जाती हैं सांसें और गुंजलक खुलने पर मैं पाता हूं कि बारिश खतम हो चुकी है और मैं रीता रह गया हूं। ********** हेमन्त कुमार
 
creativekona
Dec 29 2009 11:50 AM
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अस्तित्व

अस्तित्व -1 नेस्तनाबूद करने की करो हजार कोशिशें कर दो जमीन्दोज मुझे पाताल की गहराइयों में । पर मैं ऊपर आऊंगा जरूर एक दिन धरती का सीना फ़ाड़ कर तुम्हारी खैरियत पूछने क्योंकि मैं एक बीज हूं । 000000 अस्तित्व -2 माचिस उठाने से पहले देख तो लेते मैं फ़ूस का
 
creativekona
Dec 29 2009 11:50 AM
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एहसास

कब तक खेलते रहोगे तुम लुका छिपी का यह खेल मुझसे कब तक भटकते रहोगे इस सूखे रेगिस्तान में बरसने को आतुर बादलों की प्रतीक्षा में। क्या नहीं उठती कोई हलचल तुम्हारे अन्तः में बारिश की रेशमी फ़ुहारों के स्पर्श को अपने होठों पर महसूस करने की। विश्वास करो मुझ
 
creativekona
Dec 29 2009 11:50 AM
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( कहानी कहना -----कहानी सुनाना एक कला (भाग-2)

स्वर +गति+लय+अभिनय =अच्छी कहानी मेरे लेखन की शुरुआत आकाशवाणी के इलाहाबाद केन्द्र से हुई थी ।वह भी बच्चों के लिये प्रसारित होने वाले कार्यक्रम ‘बालसंघ’ से ।1974 के आसपास ‘बालसंघ’ कार्यक्रम का संचालन आदरणीय श्री विजय बोस जी किया करते थे ।श्री विजय बोस
 
creativekona
Dec 29 2009 11:50 AM
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चिड़िया

चिड़िया तो आखिर चिड़िया है उसको बेचारी को कहां पता कि हम सभ्य हो रहे हैं और हमारा विकास पूरी प्रगति पर है । चिड़िया तो खोज रही है सूनी आंखों से अपना नन्हां सा घोसला और नन्हें बच्चों को जिन्हें वह अकेला छोड़ सुबह उड़ गई थी दानों की खोज में पर अब तो वहां कु
 
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पेड़ बनाम आदमी

पेड़ जितना झेलता है सूरज को सूरज कभी नहीं झेलता पेड़ जितना झेलता है मौसम को मौसम कभी नहीं झेलता। ---और पेड़ जितना झेलता है आदमी को आदमी कभी नहीं झेलता सच तो यह है पेड़ अंधेरे में भी रोशनी फ़ेंकते हैं और अपने तैनात रहने को देते हैं आकार। ------और आदमी उजाल
 
creativekona
Dec 29 2009 11:50 AM
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व्यंग्य--हंगामाये वर्कशाप -- बोले तो -- चाकलेटी बच्चे / खुरदुरे बच्चे

इस समय गर्मी की छुट्टियां चल रही हैं।गर्मी की छुट्टियों में शहरी बच्चों की तो मौज ही मौज रहती है।सुबह से शाम तक मौज। हर शहर में गर्मियों की छुट्टियों में बच्चों के लिये एक बहार सी आ जाती है। आप कहेंगे ये कौन सी बहार है भैया जो गर्मियों में ही आती है?
 
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ग़ज़ल

ईमान की इक लाश की कर रहे थे तुम फ़िकर देखो, यहां लाशों का बस रहा है इक शहर देखो। लगी थी आग जो शोलों का अब असर देखो, किसी ने ढा दिया है हम पे ये कहर देखो। जुबां पे बन्दिश का जमाना गया गुजर देखो, मीठी बातों का मिल रहा है अब जहर देखो। कहा था तुमने मुहैय्
 
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कहानी कहना ----कहानी सुनाना ---एक कला (भाग -५)

नाच री कठपुतली) (अपने इस लेख के पिछले चार भागों में मैनें कहानी सुनाने की कला और कहानी सुनाने या प्रस्तुत करने के विभिन्न तरीकों,माध्यमों के विषय में लिखा था। आज मैं कहानी सुनाने के एक और माध्यम कठपुतली के बारे में लिख रहा हूं।) कहानी को आप श्रोताओं
 
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टिप्पणियों में भी गीत रचते-----डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

आदरणीय डा0 रूप चन्द्र शास्त्री जी से हिन्दी का कोई भी ब्लागर,रचनाकार अपरिचित नहीं होगा। शास्त्री जी अपने ब्लागों के अलावा भी कई ब्लाग पर लिखते रहते हैं।इनके लेखन की,कथ्य को प्रस्तुत करने की शैली अपने आप में अनूठी है। आपकी इस शैली भाषा से तो सभी पाठक
 
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गजल

हर सतह पर इस जमीं के खून के छींटे पड़े हैं, पांव रखें किस जगह पर पशोपेश में हम खड़े हैं। कल चले थे शेर बनने आज मांदों में घुसे हैं, हर किसी के हाथ अब तो सिर्फ़ नारों से रंगे हैं। भूख आंतों से निकल कर आज संसद में खड़ी है, पेट की भाषा भी शायद राजनेता बन चु
 
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नारी के अन्तर्मन में झांकती तस्वीरें

किसी भी कला के अंकुर व्यक्ति में दो तरह से विकसित होते हैं।एक तो जन्मजात ईश्वरीय वरदान के रूप में।दूसरे पारंपरिक रूप से सीख कर या प्रशिक्षण लेकर।सुनीता कोमल के अन्दर कला के अंकुर जन्मजात ईश्वरीय वरदान के रूप में ही प्रस्फ़ुटित हुये हैं।सुनीता कोमल खुद
 
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पतवार

हर पतवार में छिपा रहता है एक नाव का स्वप्न एक नदी की नींद एक नाविक का स्वप्न—सहवास। यह बात समझ नहीं पाते नाव में बैठे लोग समझ नहीं पाती हवा किस पतवार में होती कितनी सांस। तूफ़ान का सामना करने के एहसास में आगे बढ़ चलती है पतवार न पहचानती है प्रकाश न अंध
 
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घोसले की ओर

आसमान आज साफ़ है धूप भी अच्छी निकली है कुर्सियां भी कुछ खाली पड़ी हैं दफ़्तर के लान में। आओ हम बैठें खाली कुर्सियों पर चाय की चुस्कियों और मूंगफ़ली की सोंधी महक के बीच आसमान में उड़ती हुई चीलों को गिनें। या फ़िर चर्चायें करें करें कुछ लफ़्फ़ाजी किस अफ़सर ने क
 
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लौटना

आसमान पर दौड़ रहे हैं हाथी घोड़े हिरण बादलों के साथ चल रही है सूरज की लुकाछिपी। दौड़ रहे हैं बच्चे स्कूल की ओर मचाते शोर देखो देखो हो रही है सियार की शादी। उसी वक्त ठीक उसी वक्त सफ़ेद बालों वाला एक पथिक लौट जाता है छुटपन के दिनों में वह मन्द मन्द मुस्करा
 
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इन्तजार

इस जंगल के दरख्तों से क्यों पूछते हो इनकी खैरियत । इनके दहशतजर्द चेहरों पर तो खुद ही चस्पा है रोज तिल तिल कर मरते हुये अपने जिबह होने के इन्तजार की तस्वीरें । 000000 हेमन्त कुमार
 
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महुअरिया की गंध(भाग-2)

अभी तक आपने पढ़ा ---- मानिक क्षण भर उनकी आंखों में झांक कर बोला —‘ आप का कह रहे हैं मालिक ? घर में एक भी जन रहता है तब भी तुलसी के बिरवा तर संझौती की दिया बाती होती है। मंदिर का कपाट नाहीं खुला होता तब भी लोगों का हाथ जुड़ता है ।सच है कि नाहीं ? उठिय
 
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महुअरिया की गंध

कमलेश्वर के हाथ में पेग देख मानिक चुप न रह सका—‘हम गंवई गांव का मानुस है मालिक। यह लाल रंग देखकर हमें अपने गांव का कमल ताल याद होइ आय रहा है।ऊ लाल लाल कमल ला फ़ूल,पुरवा के हिलोर पर उनका नाचना। जैसे ऊ ललाई ई बोतल में आय के बंद होय गई है।मालिक,अब गांव न
 
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Oct 14 2009 07:49 PM
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नियति

इस जंगल मेंहर शामएक कहर बरपा होता हैसन्नाटा टूटता है जंगल काबन्दूकों की आवाजों से।बूट रौंदते हैंजंगल के सीने कोटूटती हैंकुछ व्हिस्की और रम कीखाली बोतलेंऔर एक मासूम पेंडुकीदम तोड़ देती हैतड़फ़ड़ा करचन्द खुरदुरे हाथों के बीच।00000हेमन्त कुमार
 
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रामकली

बहुत सालों के बादआज इस चेहरे को देखा हैदिमाग पर काफ़ी दबाव देने के बाद याद आयाइसका नाम रामकली है।रामकली उन दिनोंलहलहाता खेत थीएक भरा पूरा गुलदस्ताऔर जिन्दगी को जीने कीएक अदम्य लालसा थी उसकी आंखों में।खनखनाती हंसी बिखेरतीमहफ़िलों की रौनक रामकलीआज बाजार में
 
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तलाश एक द्रोण की

मैं जानता हूं कि आजद्रोण मर चुका हैफ़िर भी मुझेरहती है तलाश/हर चेहरे में एक द्रोण की।मैं तलाशता हूं उसेसुबह से शाम तकशाम से रात तकदोपहर की चिलचिलाती धूप मेंबरसात के थपेड़ों के बीचकि शायद कहीं वह----।मैं उसे तलाश करता हूंविद्या मन्दिरों के विध्वंसित
 
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कहानी कहना…… सुनाना………(भाग-4)

कहानी से चित्र/चित्र से कहानी कहानी सुनाने, कहानी पढाने या कहने का एक और तरीका है। वह है कहानी को बच्चों से चित्रित करवाना या कुछ चित्रों के आधार पर उनसे कहानी लिखवाना। इस प्रक्रिया में भी सभी श्रोता बच्चे कहानी के साथ तुरंत ही इन्वाल्व हो जाते हैं।
 
creativekona
Sep 01 2009 09:55 PM
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चिल्ड्रेन्स वर्कशाप आन वीडियो प्रोडक्शन……एक अभिनव प्रयोग

दुनिया का हर बच्चा अपने आप में अलग और अनोखा होता है। हर बच्चे के भीतर कुछ नया करने ,बनाने की ललक के साथ ही कल्पनाओं का एक विशाल भण्डार छुपा रहता है।यदि इन बच्चों को सही दिशा निर्देश मिले तो ये ऐसे काम भी कर सकते हैं ,जिन्हें हम उनकी पहुंच के बाहर मान
 
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