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जेठ की दुपहरी
जेठ की तपती दुपहरीआग जो बरसा रहीबर्फ़ की चादर लपेटेठंढ भी शरमा रही ।स्याह लावा हर सड़क परबस पिघलता जा रहाचीख प्यासे पाखियों कीदिल को अब दहला रही ।दूर तक दरकी है धरतीघाव बस सहला रहीसोत पानी का दिखा करआंख को भरमा रही।हर नदी अब भाप बन करधुंध में मिल जा
Jun 15 2010 09:39 PM


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