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09 Apr 2010
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कहीं यह पलायन तो नहीं...!

प्रत्याशित सफलता का न होनानीयति पर ठीकरा कसना क्यों हो...? कहीं यह पलायन तो नहीं...!इसकी समीक्षाठंडे बस्ते में डाल देती हैगर्म लोहे के ताप कोअसफलता से प्राप्तआग की ज्वालायदि सच्ची हैफिरतपा कर स्वयं कोकुन्दन न बना देगी....!
 
हेमन्त कुमार
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ख्वाब से हकीकत की यात्रा में

ख्वाब से हकीकत की यात्रा मेंअनेक पड़ाव हैं....मीमांसाजहांतय होता हैभविष्य यात्रा का ...!नकारात्मकताजिससे लड़ना हैयदि बढ़ना हैआगे....!कुछ दूर और चलने परमिलेगा....सकारात्मक भावबढ़ेगा हौसलाऔरहो सकोगे यथार्थोन्मुख....।
 
हेमन्त कुमार
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ले जाना है मुझे........!

समय का सामनानिष्ठा से होकुछ भी कठिन नहींचट्टान सी समस्या भीदरकने लगती है.....।उसके बीच सेराह खुद-ब-खुदआमंत्रण दे रही होती हैं....देखो.....मैं राह हूंआओ ..!ले जाना है मुझे.....!वहांजहांमंजिल के पारऔर भी बहुत कुछ हैक्योंकि जानता हूं मैंमंजिल तो बस ...एक
 
हेमन्त कुमार
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उस व्यक्ति के लिये ....

उस व्यक्ति के लिये जिसका कोई स्थानापन्न नहीं मेरे जीवन में ---आदर्श चुक जाता है वहाँ, विचार झनझनाने लगते हैं । चिन्तना कुछ मुखरित हो अपने सम्पूर्ण स्वरूप में संकलित होने लगती है । दृष्टि उलझने लगती है - कुछ अनचीन्हें, कुछ अनजाने या फिर अन्तर्निहित तत्वों
 
हेमन्त कुमार
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तरलता से ही जुड़ते तुम..

तुम नहीं होयह अनुभव नयन सजल कर देता है,तुम्हारा होना भीआँखे भर देता है ।तरलता से ही जुड़ते तुमहर कहीं, कभीं भी ।
 
हेमन्त कुमार
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समय व असमय की सार्थकता......

समय व असमय की सार्थकता द्वन्दात्मक रूप मेंक्षण-प्रतिक्षणउकेरना आरंभ कर देते हैंहर रंग को बारी-बारी सेअतीत की घटी घटनाओं मेंठीक वैसे हीजैसेकोई व्याख्याताप्रस्तुत कर रहा हो..शोधपरक पत्र.....!सरकते हुए विगत मेंदर्ज होना कौन नहीं चाहेगापरिस्थितिजन्य
 
हेमन्त कुमार
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सायास ही किसी का रुदन नहीं होता......

सायास ही किसी का रुदन नहीं होता , वेदना जब असीम हो जाय सब कुछ धरा का धरा  रह जाता  है चाहे वह कोई खुशी हो , त्यौहार हो या नव वर्ष ...!  कल एक ओर सारे लोग नूतन वर्षाभिनन्दन में मग्न थे और पास में ही पड़ोसन का बेटा गुम हो गया । माहौल अफरातफरी
 
हेमन्त कुमार
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अरे ! नया साल, नया साल.....

पड़ोस के बच्चे ने अपने साथी से कहा--"नया साल तुम्हें मुबारक हो"साथी ने कहा -अरे !साल तुमने दिया ही नहींयह क्या कह रहे हो ...?अरे ! नया साल, नया सालमेरी मांजब कहती है-अरे बाबा !किताब मुबारक होवह हमें किताब जरूर देती हैतुमने हमें साल कब दिया.......?जो कह
 
हेमन्त कुमार
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मर्म की टोकरी भरने को है......

मर्म की टोकरी भरने को है चलायमान सुधियों में जिसने देखा कदम से कदम मिलाते हर क्षण को चक्रारैव पंक्ति में जहां स्थान तलाशती नित अभिनव होने को अनगिन खुशियां....। हां तुम हो पास ही पर तीसरा नेत्र कहां वंचित हूं न......!
 
हेमन्त कुमार
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जब जब उठने का अवसर मिला

जब जब उठने का अवसर मिला धड़ाम से गिरा दिया जाता हूँ मैं कभी प्रकृति कभी नियति कभी किसी बड़ी बीमारी का आकस्मिक अटैक कि झट से उबर भी न सको असर पड़त्ता है मनोदशा पर रुटीन इकोनोमी पर अपनों पर जुड़े शुभेक्षुओं पर । सुबह से शाम तक सरकती जिन्दगी रात को आराम ले
 
हेमन्त कुमार
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कितना उचित है....?

अपने ही देश में राष्ट्र-भाषा की अवहेलना करने को आतुर होना कितना उचित है....? यह ठीक है हर प्रान्त की अपनी आंचलिक भाषा हो बात समझ में आती है पर काम-काज में हिन्दी अपनाने से भागना कहीं से उचित है भला...। हिन्दी की स्थापना से आशय यह कदापि नहीं कि आपकी आ
 
हेमन्त कुमार
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चली जा रही थी वह ....

चली जा रही थी वह .....!अपनी यादों को झोली में डाल ....। डोली में बैठ ....। छूटा जा रहा था..। बाबुल का घर...। मानो पीछे छूटता हुआ...., नैहर और घनीभूत हो हृदयंगम हो उठा हो । अश्रुधारा अपने कोमल अहसासों को बार-बार समेटे गालों से नीचे तक धार बना बह रही थ
 
हेमन्त कुमार
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कहीं यह मेरे पैरों से.....

राह पर चलता हुआ आदमी निहार रहा है राह के कंकड़ों को जिसने कितनों से  खाया होगा ठोकर उसकी ओट में जा दुबकती चींटी को यह समझ कर कि कहीं यह मेरे पैरों से दबने के डर से ही नहीं जा चिपकी है उसकी ओट से नन्हीं सी जान जिसे बोध है जीवन मरण का आज आदमी महत्व
 
हेमन्त कुमार
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अहंकार के बादल......

रुतबा शब्द आते ही सायास दिलो -दिमाग के किसी कोने में अहंकार के बादल घुमड़ - घुमड़ हवा के साथ - साथ गलबहियां शुरु कर देते हैं सार्थक विचार खुद को समेटना शुरू कर देते हैं ठीक वैसे ही जैसे कछुआ विपरीत समय में सही अवसर के इन्तजार में समेट लेता है अपने - आप
 
हेमन्त कुमार
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दोराहा......

पापा क्यों नहीं घर आ रहे मम्मी ! दीवाली भी बीत गयी ! बहुत दिन पहले आये भी तो बस पीछे का दो कमरा बनवा गये । बिटिया के सवालों का जवाब मीरा कैसे देती । पिछले कई बार से उनके आने पर बदले हुए हाव -भाव कुछ नकारात्मक संकेत दे ही रहे थे कि बच्चों के बार-बार प
 
हेमन्त कुमार
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इन बन्धनों से ..........!

नारी....... त्याग और उत्तरदायित्वों से सराबोर परंपरायें भी सिर चढ़ के बोलती हैं हां तुम्हें नहीं मुंह मोड़ना बरकरार रखना है अपनी परंपराओं को बरबस ही कैसे बच सकती है सामाजिक सरोकार अपनी संपूर्णता लिये आच्छादित हो जाते हैं विरोध का स्वर छिप सा जाता है न
 
हेमन्त कुमार
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कलरव

आईये दीपावली मनायें प्राकृतिक और पारंपरिक ढंग से कम से कम एक दिन साल में ऐसा हो जिस दिन घर- आंगन रोशन हो कृत्रिम रोशनी से नहीं पारंपरिक घृत व तेल के दीयों से आतिशबाजी हो पटाखों की नहीं सार्थक विचार - अभिव्यक्ति की गूंज उठे जहां सारा.....।   &nbs
 
हेमन्त कुमार
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कहां जायेंगे अरमान...

माता पिता के अरमानों में लग जाते हैं पंख बड़ा ही विशाल फलक हो जाता है निर्मित जब नन्हा सा बालक स्कूल जाना शुरू करता है पिता हर जगह से खर्च में करता है कटौती मां घर का बजट है सुधारती कि कहीं से कोई कमी ना रह जाय हमारे अरमान तो धूल धूसरित हो गये बच्चे क
 
हेमन्त कुमार
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......सभी पूर्णांक हो जाते हैं नतमस्तक

जब तुम्हारी उपस्थिति होती है अनोखा पर्यावरण निर्मित हो जाता है सभी पूर्णांक हो जाते हैं नतमस्तक उसमें नहीं होता ओजोन छिद्र का प्रभाव नहीं होती है मात्रा आर्सैनिक की पानी में नहीं चिन्ता घटते जल स्तर की नहीं है विषाक्त गैसों का प्रभाव और कुछ भी नहीं ह
 
हेमन्त कुमार
Oct 14 2009 07:43 PM
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...साथ ही भूल सुधार के लिये भी

अस्वस्थता गजब का अवकाश है चेतन अवचेतन से परे बस गुजरना भी चिकित्सकीय परीक्षण से अस्वस्थता से स्वास्थ्य-लाभ की यात्रा में बड़े सरोकार हैं और पैरोकार भी बन जाता है स्वास्थ्य-लाभ एक उत्सव-सा इस भागमभाग से कुटुम्ब और समाज ऐसे अवसर पर यथोचित भागीदारी से नह
 
हेमन्त कुमार
Oct 14 2009 07:43 PM
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हां सर्वस्व मेरे.......!

सर्वस्व मेरे ! तम छंटा.. हूं मैं तुम्हारे आलोक में । क्या है ... निजशेष उठा लिया है अपनी गोद में तुम्हारी दृष्टि का सावन मुसलाधार है या मद्धम ज्ञात अब क्या बचा है । तुम्हारे आशीर्वचनों ने समूचे दुःखों को हर लिया ...! हां सर्वस्व मेरे.....!
 
हेमन्त कुमार
Oct 14 2009 07:43 PM
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आओ ! बातें करें.....

आओ ! बातें करें आज क्यों नहीं है सुख-शान्ति ? आओ ! बातें करें कितना अस्त-व्यस्त है जन-जीवन ? आओ ! बातें करें इतना क्यों हाहाकार मचा है ? आओ ! बातें करें अरमानों ने क्यों दम तोड़ा है ? आओ ! बातें करें इन्तजार की घड़ी इतनी लम्बी क्यों है ? आओ ! बातें करे
 
हेमन्त कुमार
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समय की तूलिका से........!

जीवन का एक-एक पल समय की तूलिका से रच रहा अप्रतिम इतिहास जब भी पलट कर देखता हूं नित अधुनातन हो रहा अतीत की एक-एक ईंट से चुनी दीवारों पर अरमानों के छ्त न जानें कब पड़ेंगे विचारों के कपाट संवेदनाओं के वातायन कहीं ढूंढते ने फिरें अपनी पहचान को यही सोच कर
 
हेमन्त कुमार
Oct 14 2009 07:43 PM
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उसके उड़ानों के कोई पंख न काटे....

एक नारी अपनी ही बिरादरी की कैसे हो जाती है दुश्मन शुरू हो जाता है अत्याचारों का सिलसिला.. एक, दो,तीन ही नहीं अनेकों प्रताड़ना है कि अपना स्वरूप बदल-बदल कर आ जाती है सामने रुकने का नाम ही नहीं लेती शायद वह भूल जाती है उसने भी लिया होगा मां के ही कोख से
 
हेमन्त कुमार
Oct 14 2009 07:43 PM
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ईमानदारी और आस्था ने क्या दिया उसे

आज उसके घर में चूल्हा नहीं जला हांडी बर्तन सब कोसते रहे अपने को खैरात में मिला अनाज लौटा जो दिया था...! ईमानदारी और आस्था ने क्या दिया उसे सिवाय आशा के ढिबरी भी ढुलक गयी मां का आंचल भी जल गया । बच्चों ने भी कहा - बाबू को कल काम जरूर मिलेगा मां का कले
 
हेमन्त कुमार
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हार जीत का मोल नहीं......

हार जीत का मोल नहीं बस खेले जा रहे हैं बच्चे ये छक्का ये चौका एक रन दो रन ये रहा तीन अब तेरी बारी अब मेरी बारी आउट हुआ तो क्या हुआ फिर से खेलेंगे रन बना के  छोड़ेंगे । इन्हें नही मतलब रिकार्डों से आइ सी सी से हार जीत से इनका खेल तो बस आनन्दोत्सव&
 
हेमन्त कुमार
Oct 03 2009 10:32 AM
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सांझ बिहान की यात्रा में...

सांझ बिहान की यात्रा में अनेकों पड़ाव रात्रि रात्रि के पहर अगला चरण भोर का ब्रह्ममुहूर्त पक्षियों का कलरव मानस को झंकृत करने को आतुर....! सूरज की किरणें नित नयेपन को आमंत्रण दे रही हैं ...!
 
हेमन्त कुमार
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अर्श और फर्श के बीच का अन्तराल.......!

कहते हैं गत कर्मों का फल यहीं मिला करता है शायद यह सच भी है ! प्रकृति बार बार सचेत कराती है आओ ! अपने साथ हो रहे घटित से सबक लो....! अहंकार में मदमस्त मानव अर्थ और काम में मस्त हो खुद को लुटते देखकर भी होश में जाने कब आये क्या पता........? उसे संजीवन
 
हेमन्त कुमार
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खिड़की से आकाश ......!

खिड़की से आकाश अपने सीमित फलक वाला दिखता है क्षितिज का भी अपना पता नहीं यह बोध कब होगा...! ऐसा क्यों होता है कमरे में बैठ कर सामान्य चर्चाओं में नुक्ताचीनी आकाश ऐसा है आकाश वैसा है खुद को आवरण में रखकर बेहतर अभिव्यक्ति की अपेक्षा संभव है....? किसी भी
 
हेमन्त कुमार
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राम-राज्य की परिकल्पना .....!

विजयादशमी आश्विन शुक्ल की दशमी अपने अमरत्व को लेकर सदियों से इतरा रही होगी.....! भगवान राम के अधर्म पर धर्म की असत्य पर सत्य की विजय और गृह-नगर-आगमन का श्रेय मुझे ही मिला ! जायज भी है जिसके हिस्से लग जाय इतना बड़ा श्रेय वह अपने आगत को लेकर भी सुनिश्चि
 
हेमन्त कुमार
Sep 28 2009 07:53 AM
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हाईकू.....!

भोर हुआ धरती पर"मानस"जाग उठा ..!तुम न थेपरतुम्हारी याद साथ - साथ थी..!तुमसे रूखसत हुआ तोहोश आया..!स्वप्न सलोना हो तेरे जैसा..!बचपन का भोलापनयहां ईश्वर बसता है..!
 
हेमन्त कुमार
टैग: हाईकू
Sep 26 2009 11:28 AM
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बादल मंडरा रहे हैं...!

बादल मंडरा रहे हैंखुशियों केजाने कब बरस जांयकर दें सराबोर इस पूरे आभामंडल को ।रोम रोम हो जाय पुलकिततुम्हारे आने की तमन्नाओं का सफरजल्द ही रंग लायेगा ।ऐसा लगता हैमंजिल अपनी ओर सायास ही रंग बिरंगे स्वप्न लियेआकर्षित कर रही है ।तुम साथ हो तभी सारी खुशियों
 
हेमन्त कुमार
टैग: कविता
Sep 25 2009 04:43 AM
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फूल जाते हैं हांथ पांव.....!

दिन -ब - दिन समस्याएं साथ नहीं छोड़ रहींइस जंजाल से मुक्ति पाने का अनूठा मार्ग हैसमस्या के साथ ही साथ ।जितनी गहरी समस्याउतनी मोटी रकमघूस के रूप में समस्या हल हो जायगीबिना किसी योग्यता के ।मोटी रकम से निर्धारित मानक क्षण भर मे सारे मानक खुद - ब - खुद पूरे
 
हेमन्त कुमार
टैग: कविता
Sep 23 2009 04:42 PM