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17 Jun 2010
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कहानी तोते राजा की : मनोरंजन भी और सन्देश भी

नई किताब शीर्षक : कहानी तोते राजा की(पांच बाल रंग नाटक)नाटककार: हेमन्त कुमारप्रकाशक : काव्य प्रकाशन रेवती कुंज ,हापुड़ –245101फ़ोन(मो—09368461660पृष्ठ संख्या: 146 मूल्य:दो सौ रूपये। स्कूलों में गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही अभिभावकों को यह चिन्ता सताने
 
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कुछ तो ऐसा हो जाता----

( मैं सबसे पहले सभी पाठकों एव प्रशंसकों से क्षमा चाहती हूं।क्योंकि इधर मैं अपनी मां जी की अस्वस्थता के कारण इलाहाबाद में रही।इसीलिये न ही मैं पाठकों को जवाब ही दे पा रही थी न ही कोई नयी पोस्ट। साईं बाबा की अनुकम्पा से मां जी अब धीरे धीरे स्वस्थ हो रही
 
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मात-दिवस के अवसर पर सभी मांओ को कोटि-कोटि नमन

स्त्री जो हर रिश्तों के डोर से बधी हुई है।सबसे पहले किसी की बेटी बन कर,फ़िर बहन ,ननद,भाभी ,किसी कि सखा फ़िर किसी कि पत्नि और अन्तत: मां बनती है। हर रूप में वह अपने को समर्पित करति चलती है,पूरी तन्म्यता के साथ्। तभीतो स्त्री को मां के रूप में एक महान
 
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ओम साईं नमः

कल साईं बाबा की तस्वीर देखते देखते मेरे मन में कुछ भाव आते चले गये । उन्हीं भावों को मैंने शब्दों का रूप दिया है। आइये साईं बाबा की शरण में हम सभी कुछ पल बितायें। ओम साईं नमःजय जय साईं बाबातुमको नित नित प्रणामतुमको लाखों प्रणामतुमको कोटि कोटि प्रणाम।जय
 
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साकी

बहुत कुछ सुनने सुनाने को बाकी मगर पहले थोड़ी पिला दे तू साकी। सुना है इसमें बहुत है दम ताकत है इसमें भुलाने को गम असर मुझपे भी हो जाये ताकि-----। सुना है इसको जिसने पिया है वो हर बार मर –मर के ही तो जिया है। निभाता है साथ हर गम में बाकी----। माना गमे
 
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सागर तट पर

सागर तट पर खड़ी खड़ी निहार रही थी मैं उसकी अथाह गहराई और उफ़नाती लहरों को जो बीच बीच में मेरे कदमों को चूम कर वापस जाती फ़िर लौट आती मानों आपस में उनमें होड़ लगी हो। सागर की सतह पर पड़ता सूर्य का प्रतिबिंब अपनी अलग ही छटा बिखेर रहा था मानो वो चांदी की एक
 
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दोस्ती के नाम

नजदीकियां भी बन जाती हैं दूरियां, जब आपस में यूं ही हो जाती हैं गलतफ़हमियां। क्यूं मूक सी दीवार खड़ी है आज दिलों के दरमियां, कल तक जो डाले हाथों में हाथ करते थे खूब बातियां। भरोसे और विश्वास से ही चलती हैं जिन्दगानियां, इनके बगैर तो जिन्दगी हो जाती हैं
 
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भोर की सुगबुगाहट

भोर की सुगबुगाहट होती है शुरू हल्के से उजाले के साथ चिड़ियों की चूं चूं कुछ अलसायी कुछ अधखुली आंखें बाथरूम में तेज पानी की धार हर हर की आवाज। कहीं पर सूर्य देव को अर्ध्य हरी ओम का जाप घण्टे की आवाज नमाज की अजान। कहीं किचन में खटपट खटपट कहीं तेजी से चलते
 
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दर्दे --जिन्दगी

दवा ही बन ग़यी है जिन्दगी मेरी, दुआ कीजिये वो जहर न बने। लहू जो दौड़ रहा जिस्म में, दुआ कीजिये बेरंग न बने। पिये जा रही हूं गमों के चिलम, दुआ कीजिये वो कहर न बन॥ नहीं देख सकता जो औरों का चैन, दुआ कीजिये वो नज़र न बने। समझता नहीं जो दर्द जिन्दगी का, दुआ
 
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गौरैय्या दिवस के अवसर पर-------

उड़ते फ़िरते पक्षी सारे ज्यों घूमा करते बंजारे घूम घूम कर डाली डाली ढूंढ़ रहे अपने घर सारे। प्रेम की भाषा इनमें इतनी काश कि इन्सानों में दिखती इनमें आपस में विश्वास बड़ा तभी तो रहते घर को संवारे। देख रहे सूनी आंखों से अपने संवरे घर को उजड़ते सोच रहे मन
 
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यकीन

तुम्हारे यकीं का इंतजार करते करते अब थक चुकी हूं मैं फ़िर भी तुम्हें आया नहीं यकीं मुझ पर अब तक उससे तुम नहीं मेरा आत्म सम्मान टूटता है और मैं तुम्हें यकीन दिला के रहूंगी तब तलक जब तलक सांस में सांस रहेगी। अन्तिम सांस अंतिम क्षण तक तुम्हारे इंतजार में
 
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गीत जिन्दगी का

जहां को हंसाते हुये, खुद रोती हुई फ़िर हंसती हुई, पलकें झपकाती हुई जिन्दगी हूं मै आई,मै आई जिन्दगी जिन्दगी हूं मै आई,मै आई जिन्दगी । कुछ गुनगुनाती हुई, बुदबुदाती हुई थोड़ी-थोड़ी करती शरारती हुई नन्हीं सी कली सी मै आई जिन्दगी जिन्दगी हूं मै आई, मै आई
 
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संग छोड़ चले हम हिन्दी का

हालांकि यह विषय ऐसा नहीं है जिस पर गौर ना फ़रमाया गया हो। या पहले कभी इस विषय पर बात न हुयी हो। पर सोचने और लिखने का सबका अपना अपना नजरिया व अन्दाज होता है। हमारा ही यह देश है जिसमें हमें खुलकर कहने व लिखने की स्वतंत्रता है---हर सच्चाई और हर यथार्थ के
 
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फ़ागुन रीता जाये ना

दिन फ़ागुनी रंग बासन्ती मौसम भीना भीना सा इंतजार तेरा करते करते बीते सावन का महीना ना॥ मौसम ने ली है अंगड़ाई अब तो प्रियतम आ जाना तेरे बिन हर पल अब तो मेरे जी को भाये ना।… संग सहेलियां इतराती हौले हौले फ़ागुन गा्यें ना हंसी ठिठोली मुझसे करतीं जो मेरे जी
 
JHAROKHA
Mar 01 2010 05:55 AM
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पैगाम

ख्वाबों में ही छलनी हो, गया जिगर जिसका वही तो जिगर हमारा है, वहीं तो जिकर हमारा है। खयालों के धागे बुनते बुनते, कुछ बिगड़े कुछ सूत बने। वही तो फ़िर उम्मीद बने, वही तो फ़िर सहारा है। सूरज चांद बादल सारे, झिलमिल करते ये तारे वही धरती ,नील गगन हमारा, वही तो
 
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Feb 25 2010 08:17 PM
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वक्त की डोर

कहते हैं जो रात गयी सो बात गयी ऐसा भी कभी ही होता है पर बात जो दिल में जाये उतर क्या वो लाख भुलाये भी भूलता है। ये तो एक बहाना है अपने मन को बहलाने का वरना इतना आसान नहीं जो धोखे पे खाता धोखा है क्या दिल उसका इसे मानता है। है वक्त बड़ा मरहम सबसे जो बड़े
 
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Feb 19 2010 08:46 PM
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यादों के झरोखों में माँ

पिछ्ले साल आज के ही दिन पन्द्रह फ़रवरी को मां की याद में एक कविता लिखी थी,जो आज हकीकत में बदल गई ।पिछ्ले महीने सोलह जनवरी को मां का निधन हो गया । आज अपने ही जन्म दिन पर मां को अब तस्वीरों मे देख कर कुछ बातें दिल ही दिल ही में रूला गईं। वही कमरा वही आंगन
 
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Feb 15 2010 11:50 AM
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भोले बाबा के नाम

आप सभी को महा शिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें। भोले बाबा के नाम भंग का रंग जो चढ़ा भोले को तो इधर उधर फ़िर डोले फ़िर सोचे जरा रंग जमा लें डम डम बजा के डमरू बोलें। आओ उमा तुम भी आ जाओ थोड़ी सी भंग चढ़ा लें फ़िर देखो क्या होगा तमाशा बम बम बोले बाबा भोले।
 
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Feb 11 2010 11:35 PM
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कविता की जुबानी-----

आज कविता खुद अपनी दास्तां सुनाने आई है अपनी जुबान से अपने को आपका बनाने आई है। लोग कहते हैं मुझे पढ़ कर क्या हूं मैं कोई कहता है कविता तो दिल की आवाज है तो कोई उसे महज एक नजर देखकर समझता टाइम पास है किसी के लिये यह सिर्फ़ कोरी बकवास है तो किसी के लिये एक
 
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गीत...............: ज़िंदगी, मात्र कल्पना नही होती है.

गीत...............: ज़िंदगी, मात्र कल्पना नही होती है.aadarniya sangeeta ji Aapaki es rachana ki har panktiyon ke ek ek shabd jindagi ki kathor aur komal dono hi kalpanaaon ko yathaarth ki dharatal tak ka aina dikhala gaeen. ek bhehatareen kavita .
 
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गजल

जो बात लगी दिल में उसे याद दिलाया न करो बार बार वो वाकया यूं दुहराया न करो। तुम कह के चले जाते हो अपने रस्ते मैं सोचती ही रह जाऊं यूं परेशां किया न करो। अपने कीमती समय से चन्द लमहे निकालते हो तुम फ़िर सब्र से बैठो जरा यूं खड़े ही चले जाया न करो। हर आहट
 
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गजल

मत दिखाओ मुझे वो आईना जिससे हो गई नफ़रत मुझे जिसमे अपना ही अक्स अब बदला नजर आता है। सोचती हूं खोती जा रही हूं अपनी ही पहचान मगर नहीं ,यहां तो हर शख्स ही गंदला नजर आता है। बेखुदी में जाने क्या कह गये हम उसे हैरान सा खड़ा उसे मुझमें पगला नज़र आता है। किससे
 
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बागबां

चमन आज भी खुशबुओं से गुलजार होता है ये कौन कहता है की चमन वीरान होता है जहां हर पर्व पर आज भी लगते हैं मेले जो लोगों की भीड से आबाद होता है जहां गंगा स्नान सूर्य प्रनाम की प्रथा आज भी है बनी जो जय गंगे और हर हर महादेव की नाद से गूंज उठ्ता है तीरथ धामों
 
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कुहरा

बादलों के रंग देखो उड़ उड़ के रह गये अश्कों की बरसात देखो बिन कहे ही बरस गये। शीत ने अपनी घनी चादर रंग में कुहरे के बिछाई उसके छंटने के इन्तज़ार में बस आंख मल के रह गये। सूरज ने भी ना निकल कर रंग दिखाये अपने ताव के चादरों के झरोखों से उसके दीदार को रह
 
JHAROKHA
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सुस्वागतम वर्ष 2010

“नववर्ष के नव प्रभात में याद सभी की आईशब्द शब्द बन हृदय हमारा देता सभी को बधाई।”आप सभी पाठकों को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें। नये साल का पहला दिन तो मेरेपरिवार के लिये दोहरी खुशी लेकर आता है।क्योंकि 1 जनवरी को मेरी छोटी बेटी नित्याशेफ़ाली का जन्मदिन भी
 
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बालगीत

आज मैं अपना एक बालगीत प्रकाशित कर रही हूं। वैसे आप लोग मेरे अन्य बालगीत फ़ुलबगिया ब्लाग पर पढ़ सकते हैं। नाना जी की मूँछ नाना जी की मूँछ जैसे गिलहरी जी की पूंछ अकड़ी रहती हरदम ऐसे जैसे कोई रस्सी गयी हो सूख। नाना जी मूँछों पर अपनी हरदम देते ताव पहलवान जी
 
JHAROKHA
Dec 29 2009 11:49 AM
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बारिश में

बारिश में माटी की सोंधी सी खुशबू से भीज उठा तन बहक गया मन। कलियों के होठों पे नहलाई धूप सा निथर उठा तन महक उठा मन। पक्षियों के कलरव सा अठखेलती लहरों सा नाच उठा मन थिरक उठा तन। सांझ की झुरमुट में प्रियतम की आहट पर गा उठा मन हुलस उठा तन। 00000000 पूनम
 
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मन

मन भीगा भीगा क्यों है तन भीगा भीगा क्यों है लगता है जैसे आने वाला हरियाली सावन है । मंदिर यूं सजने लगे घंटे यूं बजने लगे लगता है जैसे शिव शंकर का हो रहा अर्चन है । बिजली यूं चमकने लगी बादल यूं गरजने लगे लगता है जैसे सागर का हो रहा मंथन है । कोयलों का
 
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ग़ज़ल

दीदारे यार होने का जरा जश्न तो मनाने दो, यार मेरा फ़िर कहीं पर्दा नशीं न हो जाये। बड़ी मुद्दत से हमको तो खुदा से ये शिकायत थी, ये ख्वाब उनकी बेरुखी से फ़िर न खाक हो जाये। पर खुदा ने भी इनायत की मेहरबां हुआ हम पर, मोहलत इतनी दे ही दी तमन्ना अधूरी न रह जा
 
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सत्य के पर्याय

सच्चाई के आज मायने बदल गये, सच पर झूठ के ताले पड़ गये। कानून की आंख पर पट्टी बंधी, हाथ भी रिश्वत की तराजू में तौल गये । पैसों के बोझ तले गुनहगार बच गये, बेगुनाह आज देखो गुनहगार बन गये। अपराधी दण्डित हों पर बेगुनाह न सजा पाये, कानून की किताब से ये शब्द
 
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लघुकथा-- मजबूरी

रोज सबेरे इधर उधर काम करती हुई बरबस ही निगाह किचेन की खिड़की से बाहर चली जाती है ।रोज की तरह मैं देखती हूं उस औरत को जो अपने कंधे पर बोरे जैसा बड़ा सा थैला लटकाये अपने दो छोटे छोटे बच्चों के साथ अपने काम में जुटी होती है ।पूरी तन्मयता के साथ ।कूड़ा बीनत
 
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आंसुओं के नाम

इन आंसुओं को नाम क्या दूं दोस्तों जिन्होंने धोखा हर बार दिया है वक्त को पल में बदल देते हैं जो इन्होंने अपना रूप हजार किया है। अछूता नहीं कोई इनसे जहां में सभी का इनसे पड़ता है वास्ता कहीं खुशी के इजहार में छलके आंसू तो कभी गम में भी बरसात किया है। तर
 
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नारी

मैं किसी बंधन में बंधना नहीं जानती नदी के बहाव सी रुकना नहीं जानती तेज हवा सी गुजर जाये जो सर्र से मैं हूं वो मन जो ठहरना नहीं जानती। वो स्वाभिमान जो झुकना नहीं जानती करती हूं मान पर अभिमान नहीं जानती जो हाथ में आ के निकल जाये पल में मैं हूं ऐसा मुका
 
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अहसास

अहसास ही जिन्दगी है और जिन्दगी को हर तरह से जीना ही जीवन है। जीवन से जुड़ती हैं यादें बहुत सी बातें उनमें भी होती है एक बात खास जो जुड़ी होती है जिन्दगी के साथ जिसके बिना कोई पल भी आपके लिये है कोरी किताब वो है जीवन का ही दूसरा रूप जिसे हम कहते हैं अहस
 
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बच्चे मन के सच्चे------

कुछ कुछ तलाशती, कुछ खोजती नजरें। आपके चेहरे के भावों को बनते बिगड़ते देखती नजरें। कभी कभी अपने अगल बगल झांकती नजरें। कभी अपनों से ही नजर चुराती नजरें। आर्द्रता के साथ याचना और थोड़ी कड़वाहट से भरी नजरें।थोड़ी सी सहमी भी फ़िर भी आपसे सवाल करने की हिम्मत जु
 
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वो भयानक दिन

आज वो खूनी मंजर फ़िर याद आ गया सब की आंखों को फ़िर से वो बरसा गया। मांएं इंतजार में बैठी बस नजरें बाट जोह रही विधवायें सूनी मांग लिये हर कोने में सिसक रहीं। बेबस अनाथ बच्चे जैसे अपनों को भीड़ में ढूंढ़ रहे खो चुके जो अपनी पहचान खुद अपना परिचय पूछ रहे। कह
 
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टिक टिक घड़ी

जीवन की अविरल चलती घड़ी कभी मुड़े ना पीछे बस आगे ही बढ़ी कभी दुख की घड़ी तो कभी खुशियों की लड़ी हर पल को सिलते बुनते हुये सतरंगी सपने संजोते हुये घावों पे मलहम लगाते हुये सबसे हाथ मिलाते हुये हर तरह से साथ निभाते बढ़ी जीवन की अविरल चलती घड़ी। कानों में ज्यो
 
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गजल-- आख़िरी सलाम

खूने जिगर से लिख रहा हूं आखिरी सलाम इल्तजा बस जरा सी कबूल इसको कर लेना। इन्तजार करते करते हो गई इंतहा इंतजार की दिले खयाल तब आया नहीं नसीब में तेरा दीदार होना। जीते जी ना सही जब हो जाऊं सुपुर्दे खाक मैं मजार पर आके मेरी अश्क दो बहा लेना। तेरे दो अश्क
 
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जीना इसी का नाम है

कुछ बूंदें ओस की टपकीं टप से बिखर गयीं फ़ूलों की कोमल पंखुड़ियों पर बिना विचारे कि वहां उनका स्वागत करेंगे नुकीले बेदर्द कांटे जिनका काम ही है दर्द बांटना। पर क्या मतलब इससे दीवानी बूंदों को उन्होंने तो खुद को कुर्बान कर चार चांद लगाया फ़ूलों के सौन्दर्
 
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लेख --- जिम्मेदार कौन--?

बचपन में देखा करती थी और देख देख के खुश भी होती थी कैसे चिड़ा चिड़िया का जोड़ा अपने घरौंदे को बनाने में मशगूल रहता था।दोनों ही खुशी खुशी ,बारी-बारी से एक एक तिनका तोड़ कर लाते और अपने घरौंदे को सजाते। अपने बच्चों को सुरक्षित रखने की पूरी कोशिश करते कि कह
 
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