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03 Apr 2010
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नफरत के खिलाफ

मतभेद होने का अर्थकदापि नहींसिर कलम कर दिये जाएंमजबूत होने का अर्थकदापि नहींमासूम कलियों को मसल देंराष्ट्रसंघ का अर्थकदापि नहींधृतराष्ट्र की भांति चुप्पी साध लेंराजनीति का अर्थकदापि नहींघुटना ही टेकते रहेंइन्सान होने का अर्थ कदापि नहींस्वार्थ में
 
kamlesh
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प्रेम से देखिये तो सही!

जब आप फूलों को पहचानना छोड़साइबर नेट में उलझे होते हैंनासिका रंध्रों में जानी पहचानी बारूदी गंध छाई होती है,बच्चों के हाथ घरौंदे बनाने में, नहींखिलौना पिस्तौल चलाते होते हैं,ऐसे में भीकभी-कभी, कहीं-कहींवासंती बयार झूम ही आती है।जब रात भयावह लंबी हो उठती
 
kamlesh
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विक्टोरिया मैदान से गुजरते हुए

मैंकोलकाता केविक्टोरिया मैदान से होकर गुजरता हूंहरियायेवर्षा में धुलेनिखरे पेड़, चिकने झूमते पात।सड़केंपानी में भीगीसाफ धुलीबरसात के इस मौसम में।छोटे टेंट वालेहरे भरे पेड़ों से घिरेक्लब के मैदानों मेंफुटबाल खेलते, दौड़ते किशोरमानो लगी हो उत्साह व
 
kamlesh
Feb 22 2010 06:05 PM
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अभिव्यक्ति के खतरे

मैं अक्सर चुप ही रहता हूं क्योंकि अभिव्यक्ति के खतरे बहुत हैं। मेमने की तरह मिमियाते भी लोमड़ियां अपने दांत पैना करने लगती हैं। अक्सर ऍसा होता है नहीं चाहते हुए हमारी दुम हिलने लगती है। मैं नहीं समझ पाता - आदमी क्यों कर डर जाता है एक दूसरे से ? सच जा
 
kamlesh
Dec 29 2009 12:00 PM
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कंक्रीट का जंगल

छोटे से ताल में उतरे हैं धवल पाखी कंक्रीट के इस जंगल में। धड़के हैं हौले से कुछ शब्द किसी के सीने में सफेद पन्नों पर उतर आये हैं रक्ताभ, उष्मित शब्द। कविता बनती है पढ़ी, गुनी जाती भुला- बिसरा दी जाती है। नित्य पंख पसार उड़ते आते हैं श्वेत श्याम पाखी
 
kamlesh
Dec 29 2009 12:00 PM
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युवा मन

कई बार मैंने पाया मन काफी पहले बूढ़ा हो गया छुटपन में पीठ पर लाद दिये गये शब्दों के बोझ अब तक नहीं उतार पाया। बेजान पत्थर बन चुके शब्द भार स्वरूप कब तक ढोऊं उन्हें अकेले साथ बंटाने नहीं कोई हाथ लंबी डगर- अकेला सफर, औ सिर पर अगिया वैताल से नाचते शब्द
 
kamlesh
Dec 29 2009 12:00 PM
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इंतजार

है मुझे इंतजार कब होगी नयी सुबह जब फूलों के बीच बच्चे हंसते- कूदते- खेलते दौड़ते दिखेंगे उनकी पीठों पर नहीं होगा भारी बोझ, निरर्थक शब्दों का गठ्ठर। शब्द- वाकई असमर्थ नहीं बदल पाते हैं भाव- समाज- दुनिया। अंधेरा छाया है घना मन व रिश्तों में दिखती नहीं
 
kamlesh
Dec 29 2009 12:00 PM
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थामो हाथ

बहुत चहक कर मैंने बढ़ाये हैं तुम्हारी ओर हाथ। इस भीड़ में भी अकेले हैं कितने हमारे कदम नहीं मिलते कभी एक साथ एक जैसे पदचाप। हर कदम की अपनी अलग राह अनजान मंजिलों सुनसान डगर मापते थके पांव चलने को मजबूर हम-तुम कब तक ? बागीचों पर आज पहरा है हवाएं भी बंग
 
kamlesh
Dec 29 2009 12:00 PM
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अबोध बच्चा

कल मिला मुझे अबोध बच्चा एक आंखों में आंसू होंठों पर सिसकियों के साथ न जाने उसका अपना कौन, क्या कहां गुम था ? सुनाई पड़ रही थी उसके रोने की हिचकियां चुप कराने की बहुत की कोशिश नहीं माना नहीं थम रहे थे आंसू आंखों में टंगा था किसी के लिए मानो न कभी खत्म
 
kamlesh
Dec 29 2009 12:00 PM
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मित्र

बड़े दिनों बाद तुमसे मिलना हुआ मित्र। ऍसा लगा मानो खुद से ही मैं मिला सच - कठिन हो गयी है अब खुद से खुद की मुलाकात, ऍसे में तुमसे मिलना मानो किसी फूल का खिलना तपती दोपहरी में बदली की छांव का पसरना किसी अबोध के चेहरे पर निश्छल मुस्कान का उभरना। अकेला
 
kamlesh
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सपने

मैं थोड़े सपने बोता हूं थोड़े सपने बांटता हूं बिना सपनों के मुझे अपने होने पर ही शक होता है नहीं जानता बिन सपनों के आदमी कैसे होता है ? थोड़े- बहुत बचे हैं पास अपने उन्हें सजोने उन्हें बढ़ाने मैं बोता सपने बांटता थोड़े सपने। बंधु गर अब भी बचे हों तुम
 
kamlesh
Dec 29 2009 12:00 PM
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मित्र

मित्रता दिवस पर विशेष) मित्र अंधेरे में साथी जब सूझती नहीं है राह भय से लरजते कांपते हैं पैर सामने घना अंधेरा राह अदृश्य। सामने कौन- कैसा पहचानना मुश्किल। वाकई घना है अंधेरा, दिन के उजाले में भी पहचानना मुश्किल कई बार अपने तक को ? चेहरे की लकीरें ढंक
 
kamlesh
Dec 29 2009 12:00 PM
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तुम चुप क्यों हो ?

तुम चुप क्यों हो - लंबे अरसे से सोचता हूं मैं वजह क्या है होठों के सिले होने की कई बार मैंने देखा है आंख मूंद कर निकल जाते हैं हम अपने साथ के लोगों को बेचैन छोड़ उनकी अपनी पीड़ा के साथ हमें भी तो अपने सलीब ढोने पड़ते हैं कई- कई ईसा अपने सच को ताजिंदग
 
kamlesh
Dec 29 2009 12:00 PM
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सुबह

कई बार नयी सुबह की प्रतीच्छा करते रह जाते हैं हम घोर अंधियारे में नहीं सूझता किस दिशा में है सही राह। अंधेरे में ठोकर खाते उलझते - गिरते उलझाते - गिराते बढ़ते जाते हैं हम। सच - अंधेरा घना, औ आंख में टंगे रूपहले ख्वाब बदरंग दुनिया के स्याह रंग इतने मो
 
kamlesh
Dec 29 2009 12:00 PM
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बहुत दिनों बाद

बहुत दिनों बाद एक बार फिर कूकी कोयल चुप बैठा काक भी कुछ बोला टूटी मनहूस छायी चुप्पी बोला कुछ तो बोला। पर तुम हो क्यों चुप होंठ हैं क्यों सिले ? आंखों से उतर खामोशी जिह्वा तक है क्यों फैली ? चुप रहना न कुछ कहना भला, यह भी कोई बात हुई - कहते हैं - न कु
 
kamlesh
Dec 29 2009 12:00 PM
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kamlesh pandey

साहित्‍य को समर्पित
 
kamlesh
Dec 29 2009 12:00 PM
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बात अधूरी/ जीवन अधूरा

कलमैंने बहुत कोशिशें कीतुम्हें पुकारूंकई बार आवाजें दींपरगला रूंधा ही रहानहीं निकल रही थीकोई आवाजमहसूस हुआगले में बंधा हैकोई पट्टाजिसके दबाव मेंचुप है मेरी जुबान।चाहाउतार फेंकूउसे पर नामुमकिनपट्टा रूप बदलता रहाबहुरूपिया की भांतिकभीभूख/ अहम / जरूरत/ समय
 
kamlesh
Sep 16 2009 07:42 PM
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कसी लगाम

मैं कई बार कुछ कहना चाहता हूं पाता हूं मुंह पर कसी है लगाम और अब वे सपनों पर भी हक जमाने की कर रहे हैं आपस में बात। हम धृतराष्ट्र बनने को अभिशप्त कारण दौड़ रहा है हमारी धमनियों में उनका नमक व टंगी है हमारी आंखों भयावह कल की तस्वीरें। सच हममें से हरेक
 
kamlesh
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अबोध बच्चा

कल मिला मुझे अबोध बच्चा एक आंखों में आंसू होंठों पर सिसकियों के साथ न जाने उसका अपना कौन, क्या कहां गुम था ? सुनाई पड़ रही थी उसके रोने की हिचकियां चुप कराने की बहुत की कोशिश नहीं माना नहीं थम रहे थे आंसू आंखों में टंगा था किसी के लिए मानो न कभी खत्म
 
kamlesh
Sep 16 2009 06:29 PM
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kamlesh
Sep 16 2009 06:29 PM
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संकल्प

संकल्प जिंदगी क्यों इस कदर बदरूप होती जा रही ?कल तक जिनके चेहरे थे जाने -पहचानेअचानक उन चेहरों पर उभर आती हैं ऍसी लकीरेंजिन्हें देख अक्सर भेड़ियों का ख्याल उभरता है।आदमी अब क्यों नहीं दिखता सहज इन्सान की भांतिचारों ओर दिख रहे हैंसिर्फ रीछ, भालू, मगरमच्छ,
 
kamlesh
Sep 04 2009 07:36 PM
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आजादी

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर कल मैंने सोचा मिली कौन सी आजादी है मुझे ? अपने बास को देख किसी कुत्ते की पूंछ सी अचानक झुक जाता हूं मैं क्यों ? सुना मैंने आजादी हमें देती है बराबरी का अधिकार सिर उठा बात कह पाने का साहस पर नहीं, पाया मैंने हममें काफी कुछ अब
 
kamlesh
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चुप रहो

चुप रहोदिन अभीप्यारे नहीं हुएजिनसे थी उम्मीदअब तक हमारे नहीं हुए।किया थाहमने जिन पर जान से बढ़ भरोसामुंह मोड़ चले ऍसे, मानोकभी अपने ही नहीं हुए।चुप रहोदिन अभीरात से हैं स्याहदिख रहे हैंजो हमें रहवरमुंह फेरते ही झट वे सय्याद हुए।चुप बैठोकिदिन अभी
 
kamlesh
Aug 04 2009 08:31 PM
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रात

कितनी भीअंधेरी - घनीक्यों न हो रातकोख में छिपी होती हैउजाले की किरण।कितना भीतुम क्यों न सताओकिसी को-अपने बच्चे को देखउभरती है तुम्हारे चेहरे परअब भी मुस्कान।अंधेरा-नहीं पहचानने देता हैखुद की शक्लऔरअंधेरे की उपजतमाम अनबुझी कामनाएंसुरसा की तरहफैलाती हैं
 
kamlesh
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कब से

पुकारता हूंमैं कब से तुम्हेंपरतुम चुप क्यों हो ?यह भी भला कोई बात हुई -राह लंबीडगर कठिनभरी भीड़ में तमाम अकेलेअपने कांधे पर टिकाये सिरचले जा रहेन जाने किस राहदिन के उजाले में भीपहचानना मुश्किलचलें किसके साथकिस डगरहै कौन अपना हमसफर ?तुम कहोराह कटेन चुप
 
kamlesh
Aug 01 2009 07:32 PM
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kamlesh pandey

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kamlesh
Mar 17 2009 08:40 PM
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