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31 Dec 2009
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चारदीवारी....

जिसने जलाया पहला दिया अँधेरे के खिलाफ, हमने भी इस युद्ध में बुहारकर अपना घर-आँगन रोशन किया... खड़ी की चारदीवारी, तूफ़ान थामने को - युद्ध में अकेला नहीं - पहला दिया. माना अन्धकार ही पहला सच, नहीं मिटायेंगे जंगल में - उसका वजूद, घर-आँगन में रोशन कई दीपक,
 
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समलैंगिकता पर इतनी हाय-तौबा! आखिर किसलिए ?

यदि कोई विकलांग है तो क्या उसे त्याग देना चाहिए? यदि किसी का बेटा या भाई पागल है तो क्या उसे ख़त्म कर देना चाहिए? यदि किसी की बहन या बेटी बाँझ है तो क्या उसे मार देना चाहिए??? अगर नहीं, तो समलैंगिकों पर इतनी बहस के बजाय उनके साथ इंसानियत जैसा व्यवहार
 
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बरसे बरस लक्ष्मी न्यारी...

धनतेरस पर बरसे धन, चौदस पर चमके चन्दन. पावस बने अमावस काली, गोवर्धन पर हो खुशहाली. भाईदूज पर दुआ हमारी - बरसे बरस लक्ष्मी न्यारी...
 
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भारतीय राजनीति का आधार है वंशवाद

शुरूवात में विपक्षियों ने कांग्रेस में नेहरू वंशवाद का झंडा बुलंद करके वोटरों को लुभाने का सस्ता हथकंडा अपनाया, बाद में भाजपा, सपा, राजद, डीएमके और एनसीपी भी उसी राह चल पड़ीं। बुद्धिजीवी भी इसकी आलोचना पर उतर आए हैं। मैं मानता हूं कि यह वर्ग भी अब बु
 
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चौबीस घंटे, दो झूठ! पर्दे पीछे बेवकूफ?

झूठ नं. 1 - पोखरण-2 परमाणु परीक्षण में शामिल वैज्ञानिकों का कहना कि मई 1998 में भारत की कामयाबी महज एक छलावा थी। झूठ नं. 2 - हालैंड राष्ट्रीय संग्रहालय के कर्मचारियों का बयान कि पिछले 40 वर्षों से उन्होंने जिस 'पत्थर के टुकड़े' को ''चांद का टुकड़ा''
 
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कोख में किसका है बीज!!!

देना पड़ेगा इम्तेहान, जन्नत में है ऐसा रिवाज़।हर कदम अंगार पे, साबित करे अपना मिज़ाज।इक रोज़ शौहर ने जो पूछा, कोख में किसका है बीज।आंख भर आई जो साबित -हो गया उसका ही साज़।मैं अकेला ही चला था, यूं बदलने आसमां।पहले पैबंदे-निशां पे, दूं सफाई देख आज।सुन ले
 
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स्वाइन फ्लू कहीं मेडिकल आतंकवाद तो नहीं?

स्वाइन फ्लू के नाम पर जो भय का माहौल बनाया जा रहा है कहीं वह अंतरराष्ट्रीय मेडिकल आतंकवाद का हिस्सा तो नहीं? पीडि़त व परिजनों से माफी चाहूंगा, क्योंकि उनका दर्द वही समझते हैं। लेकिन देश में स्वाइन फ्लू से अब तक 10 मरे हैं, इसी अवधि में भुखमरी, कुपोषण या
 
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मिलाओ न सुर अजानों से, ये राग भड़क जाएगा

कुरेदोगे दिल की जानिब, ये घाव दरक जाएगा।मिलाओ न सुर अजानों से, ये राग भड़क जाएगा।हम तो समेट ही लेते, मुठ्ठी में आसमां यूं हीक्या खबर मंजिल से ही, ये पांव सरक जाएगा।अब ये सिला हमको कुबूल, दोजख में जो रुलाएगा।लो हटा लो तुम नकाब, ये दांव पलट जाएगा।क्यूं
 
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राखी बांधोगी..? मिलेगा सिंगट्टा..!!

झांसी के पास टीकमगढ़ जिले का गांव है जतारा। पांच रक्षाबंधन इसी गांव में 1978 तक मनाए। हम बच्चे हों या हमसे बड़े किशोर अथवा युवा, सभी लोगों के चेहरे राखी के तीन दिन पहले से खिल जाते थे। मन में उत्साह रहता था कि बहनिया कलाई पर फूल जैसी राखी सजाएगी और बदले
 
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पत्थरों का शहर

ये शहर है पत्थरों का, बेगाना कोई नहींइन दरख्तो-शाख में अब, याराना कोई नहीं।शीशा-ए-बुत चूर होगा, इल्म है सबको मगर,इस मदरसे का खलीफा, मौलाना कोई नहीं।कब्र हैं, ताबूत भी हैं, दौड़ती लाशें यहां,कील सबके हाथ में है, अंजाना कोई नहीं।मुफलिसों की भीड़ में दो-चार
 
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पंडित - मौलवी गरियाते रहे, समलिंगी जस के तस रहे???

हैदराबाद में एक मोहल्ला है - दिलसुख नगर, पांच साल पहले इस मोहल्ले में तीन परिवार रहा करते थे। पहला परिवार रविकांत का था, जिसमें उनकी पत्नी सुनीता और पैरों से लाचार दस साल का बेटा राजू एक किराए के मकान में रहते थे। दूसरा परिवार अनवर मियां का था, जिन्होंने
 
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