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16 Jun 2010
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कुछ साँझा करना चाहती हूँ

मित्रो, कुछ साँझा करना चाहती हूँ.. आप से..  ''धूप से रूठी चाँदनी'' मेरे काव्य- संग्रह पर रवि कान्त पांडये की समीक्षा सृजन गाथा में पढ़ें.  लिंक है --http://www.srijangatha.com/pustkayn_30May2k10और 'गर्भनाल' में डॉ. आज़म द्वारा लिखित
 
Shabdsudha
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''धूप से रूठी चाँदनी'' का विमोचन

मेरे नए काव्य संग्रह ''धूप से रूठी चाँदनी'' का विमोचन...भारत और अमेरिका में  एक साथ हुआ..  उसकी विस्तृत रिपोर्ट आप इन लिंक्स पर देख सकते हैं....
 
Shabdsudha
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हिंदी चेतना अप्रैल- जून अंक २०१०

लीजिये एक बार पुनः हिंदी चेतना आपके पास है. अपनी भाषा में अपने लोगों के पास. आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी. हिन्दी चेतना में इस बार ..... - कहानियाँ-- उसके हिस्से का पुरुष (पुष्पा सक्सेना),  खो जाते हैं घर (सूरज प्रकाश), तमाचे
 
Shabdsudha
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कहानी ''कौन सी ज़मीन अपनी''

साहित्यिक पत्रिका ''समय के साखी'' में मेरी कहानी ''कौन सी ज़मीन अपनी'' छपी है... कहानियों में पृष्ट १४४ पर देखें.. लिंक है -- http://www.samaykesakhi.in/kahani/143.html
 
Shabdsudha
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सूचना

होली पर मेरी कहानी '' ऐसी भी होली '' अभिव्यक्ति पर छपी है..लिंक है ---http://www.abhivyakti-hindi.org/और तीन कविताएँ सृजन गाथा पर छपी हैं ..लिंक है ---http://www.srijangatha.com/
 
Shabdsudha
Mar 05 2010 04:51 AM
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मर्यादा/ लघु कथा

मर्यादा/ लघु कथा '' दादी, पापा रोज़ शराब पी कर, माँ को पीटते हैं. आप राम -राम  करती रहती हैं, उन्हें रोकती क्यों नहीं?''पोती ने नाराज़गी से पूछा. '' अरे तेरा बाप किसी की सुनता है?, जो वह मेरे कहने पर बहू पर हाथ उठाने से रुक जायेगा और फिर पति -पत्
 
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तुम्हें क्या याद आया--

कई बार यादें बहुत तंग करती है, अगर अपने साथ छोड़ चुके हों. तो कई बार मन छोटी सी बात पर भी भारी हो जाता है. ऐसे में कुछ लिखा गया-- पेश है-- तुम्हें क्या याद आया-- तुम अकारण रो पड़े-- हमें तो टूटा सा दिल अपना याद आया, तुम्हें क्या याद आया-- तुम अकारण रो
 
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शब्द्सुधा की सादर प्रस्तुति...............

अनुज अलबेला खत्री जी ने यह ब्लाग बना कर मुझे सौंप दिया और कहा कि दीदी अब तक आप ने इतने अनुभव समेटे हैं उन्हें लिख डालिए इस में. अपनी व्यस्तता के चलते , कई दिन इस तरफ ध्यान नहीं दे पाई. पर आखिर में अनुज की बात माननी पड़ी. मित्रो ! इसे शुरू करने से पहले
 
Shabdsudha
Dec 29 2009 11:59 AM
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''हिंदी चेतना'' का नया अंक

सम्माननीय एवं मित्रों, उत्तरी अमेरिका की त्रैमासिक पत्रिका ''हिंदी चेतना''  अपना नया अंक अक्तूबर २००९ में अपने पाठकों के लिए ले कर आई  है -- कहानी-- 'संस्कार शेष'--कृष्ण बिहारी (अबूदाबी ) संस्मरण --एक परंम्परा का अंत --रूप सिंह चंदेल हिन्दी
 
Shabdsudha
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नींद चली आती है.....

बाँट में, अपने हिस्से का सब छोड़, कोने में पड़ी सूत से बुनी वह  मंजी अपने साथ ले आई, जो पुरानी, फालतू  समझ फैंकने के इरादे से वहाँ रखी थी. बेरंग चारपाई को उठाते बेवकूफ लगी थी मैं, आँगन में पड़ी बचपन और जवानी का पालना थी वह. नेत्रहीन मौसी ने क
 
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मैं दीप बाँटती हूँ.....

मैं दीप बाँटती हूँ..... इनमें तेल है मुहब्बत का बाती है प्यार की और लौ है प्रेम की रौशन करती है जो हर अंधियारे हृदय औ' मस्तिष्क को. मैं दीप लेती भी हूँ... पुराने टूटे- फूटे नफरत, इर्ष्या, द्वेष के दीप, जिनमें तेल है- कलह- क्लेश का बाती है वैर -विरोध
 
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नेक दिल

राले शहर, नार्थ कैरोलाईना में स्थापित गाँधी जी की प्रतिमा वह नेक दिल इन्सान था. लोगों के लिए भगवान था.   जिसने अपना सब कुछ लुटाया, ख़ुद को मिटाया कि देश आज़ाद हो सके.   भावी पीढ़ी सुख की साँस ले सके. कुर्बानी उसकी रंग लाई...... देश आज़ाद हुआ,
 
Shabdsudha
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कुछ अपनी कुछ पराई--२

पहचान की तलाश की बात पिछली पोस्ट में हुई थी. आज भी उस पर कुछ लिखना  चाहती हूँ. भारत में हम माँ-बाप, खानदान, दादा, परदादा और एक भरे पूरे परिवार से जाने जाते हैं. एक पहचान ले कर पैदा होते हैं. वहाँ  पहचान की तलाश की तलब नहीं
 
Shabdsudha
Sep 20 2009 12:40 AM
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कुछ अपनी कुछ पराई

बार्नस एंड नोबल पुस्तकों के स्टोर में स्थानीय अमरीकी कवियों का एक ग्रुप इकठ्ठा होता है, इस का पता जब मुझे चला तो मैं भी वहाँ जाने लगी. कुछ दिन तो औपचारिकता रही, फिर शीघ्र ही उन्होंने मुझे स्वीकार लिया.  हर माह के तीसरे रविवार हम मिलते थे. अपनी -अपनी
 
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कुछ कहना है....

मित्रो, आप लोगों के सुझाव मान कर शब्दसुधा का रंग रूप बदला है, कैसा लगा ? आप की प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा. एक मित्र ने एतराज़ किया है  कि अपने ही ब्लाग पर मैंने अपने नाम के साथ डॉ. लगाया है. जो सही  नहीं है. डॉ. दूसरे आप के नाम के
 
Shabdsudha
Aug 28 2009 04:56 AM
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खोज

उत्तरी अमेरिका की त्रैमासिक पत्रिका ''हिंदी चेतना'' का विशेषांकआज प्रैस में गया है और थोड़ी सी राहत मिली है. जिन दोस्तों कोमेरे ब्लाग का रंग पसंद नहीं आया, उनका सन्देश मैंनेअलबेला खत्री जी को पहुँचा दिया है।उन्होंने ही यह ब्लाग बना कर मुझे सौंपा है।देखती
 
Shabdsudha
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रक्षा बंधन की सब भाई -बहनों को शुभ कामनाएँ--

रक्षा बंधन ख़ुशी के साथ -साथ मुझे उदासी भी दे जाता है.आज के दिन मुझे अपने बड़े भैया बहुत याद आते हैं.तीन साल पहले वे मुझे छोड़ कर चले गए.मैं उनसे साढ़े दस साल छोटी हूँ. हम दो ही बहन- भाई थे.तीन साल पहले तक मैं मुन्ना थी.उनके जाने के बाद मैं अचानक सुधा बन
 
Shabdsudha
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Aug 25 2009 06:42 PM
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लघु कथा : दौड़

मैं अपने बेटे को निहार रही थी. वह मेरे सामने लेटा अपने पाँव केअँगूठे को मुँह में डालना चाह रहा था. और मैं उसके नन्हे-नन्हे हाथोंसे पाँव का अँगूठा छुड़वाने की कोशिश कर रही थी. उस कोशिश मेंवह मेरी उँगली को भी मुँह में डालना चाहता था. चेहरे पर चंचलता,आँखों
 
Shabdsudha
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रात भर

रात भरयादों कोसीने मेंउतारती रही,चाँद- तारोंको भीचुप-चापनिहारती रही.शांतवातावरणमें नहलचल हो कहीं,तेरा नामधीरे सेफुसफुसा करपुकारती रही.तेरी नजरेंजब भीमिलींमेरी नज़रों से,उन क्षणों कोसमेटपलकों का सहारादेती रही.उदासवीरानउजड़ेनीड़ को,अश्रुओंकुछ आहोंचंद
 
Shabdsudha
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''हिंदी चेतना'' का नया अंक '' कामिल- बुल्के विशेषांक ''.

मित्रो,उत्तरी अमेरिका की त्रैमासिक पत्रिका ''हिंदी चेतना'' का नया अंकप्रकाशित हो गया है. कामिल- बुल्के जन्मशती के उपलक्ष्य मेंहिन्दी चेतना देश- विदेश में फ़ैले अपने पाठकों के लिए ले कर आईहै--जुलाई २००९ अंक '' कामिल- बुल्के विशेषांक ''.इसे आप पढ़ सकतें
 
Shabdsudha
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शब्द सुधा की सादर प्रस्तुति .....२

मेरी पहली पोस्ट के बाद बहुत सी ईमेल आईं कि मैं अपने कुछ प्रियजनों को भूल गई हूँ. नहीं दोस्तों! प्रियजन प्रिय होते हैं, उन्हें कैसे भूला जा सकता है? वे मेरे ही नहीं जन -जन के प्रिय हैं, मेरे अनुज हैं और उनका स्नेह ही मेरी शक्ति है. छोटों की बारी हमेशा बाद
 
Shabdsudha
Jul 22 2009 08:43 AM