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13 Jan 2010
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ग़ज़ल लेखन प्रतियोगिता में जतिन्दर परवाज़ को प्रथम पुरस्कार

इस लिंक पर जाएँ -- ग़ज़ल लेखन प्रतियोगिता में जतिन्दर परवाज़ को प्रथम पुरस्कारhttp://hindi-khabar।hindyugm.com/2010/01/jatinder-parwaz-gets-first-prize-ghazal.html
 
JATINDER PARWAAZ
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ख़्वाब देखें थे घर में क्या क्या कुछ

ख़्वाब देखें थे घर में क्या क्या कुछ मुश्किलें हैं सफ़र में क्या क्या कुछ फूल से जिस्म चाँद से चेहरे तैरता है नज़र में क्या क्या कुछ तेरी यादें भी अहल-ए-दुनिया भी हम ने रक्खा है सर में क्या क्या कुछ ढूढ़ते हैं तो कुछ नहीं मिलता था हमारे भी घर में क्या
 
JATINDER PARWAAZ
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दूरदर्शन पर आज शाम 6 बजे

सूचना ... जतिन्दर परवाज़ को आज शाम (Monday 16th November, 06.00PM) को BAZM (URDU PROGRAMME) में देखें ।
 
जतिन्दर परवाज़
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आंधियों में दिया जलाऊंगा

आंधियों में दिया जलाऊंगा मैं हवाओं को आजमाऊंगा इतना प्यासा हूँ ऐसा लगता है इक समन्दर तो पी ही जाऊंगा अपनी क़िस्मत संवार लूँ पहले फ़िर तेरी ज़ुल्फ़ को सजाऊंगा आंसुओं का बनाऊंगा दरिया और फ़िर उस में डूब जाऊंगा उस को खुश देखने की चाहत में उस के हाथों मैं हार
 
जतिन्दर परवाज़
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दिल मचल रहे हैं

दिल मचल रहे हैं ख़्वाब पल रहे हैं आप की गली के लोग जल रहे हैं शाम ढल चुकी है और चल रहे हैं धूप चुभ रही है दिन बदल रहे हैं बदलो कहाँ हो खेत जल रहे हैं
 
जतिन्दर परवाज़
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सूरज-चन्दा जैसे रौशन

सूरज-चन्दा जैसे रौशन हो जाएँ दिल सब के रौशन आप जो मेरे साथ चलेंगे हो जाएँगे रस्ते रौशन दिल को रौशन करने वाले मेरा घर भी कर दे रौशन खिड़की से कुछ जुगनू आकर कर जाते हैं कमरे रौशन इक दीपक के जल जाने से दीवारो-दर सारे रौशन चाँद सा चेहरा कब आएगा मेरे घर क
 
जतिन्दर परवाज़
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क्यों खड़ी हम ने की हैं दीवारें

क्यों खड़ी हम ने की हैं दीवारेंदूर जब कर रही हैं दीवारेंजैसे कोई सवाल करता हैइस तरह देखती हैं दीवारेंअब मुलाक़ात भी नहीं मुमकिनदरमियाँ आ गई हैं दीवारेंइक झरोका भी इन में रख लेनारौशनी रोकती हैं दीवारेंबारिशों ने गिरा दिया छप्परसिर्फ़ अब रह गई हैं दीवारेंलग
 
JATINDER PARWAAZ
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आँखें पलकें गाल भिगोना ठीक नहीं

आँखें पलकें गाल भिगोना ठीक नहींछोटी-मोटी बात पे रोना ठीक नहींगुमसुम तन्हा क्यों बेठे हो सब पूछेंइतना भी संज़ीदा होना ठीक नहींकुछ और सोच ज़रीया उस को पाने काजंतर-मंत्र जादू-टोना ठीक नहींअब तो उस को भूल ही जाना बेहतर हैसारी उम्र का रोना-धोना ठीक
 
JATINDER PARWAAZ
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यूँ ही उदास है दिल बेक़रार थोड़ी है

यूँ ही उदास है दिल बेक़रार थोड़ी हैमुझे किसी का कोई इंतज़ार थोड़ी हैनज़र मिला के भी तुम से गिला करूँ कैसेतुम्हारे दिल पे मेरा इख्तियार थोड़ी है मुझे भी नींद न आए उसे भी चैन न होहमारे बीच भला इतना प्यार थोड़ी है खिज़ा ही ढूंडती रहती है दर-ब-दर मुझकोमेरी तलाश मैं
 
JATINDER PARWAAZ
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सहमा सहमा हर इक चेहरा मंज़र मंज़र खून में तर

सहमा सहमा हर इक चेहरा मंज़र मंज़र खून में तर शहर से जंगल ही अच्छा है चल चिड़िया तू अपने घर तुम तो ख़त में लिख देती हो घर में जी घबराता है तुम क्या जानो क्या होता है हाल हमारा सरहद पर बेमोसम ही छा जाते हैं बादल तेरी यादों के बेमोसम ही हो जाती है बारिश दिल
 
JATINDER PARWAAZ
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मुझ को खंज़र थमा दिया जाए

मुझ को खंज़र थमा दिया जाए फिर मिरा इम्तिहाँ लिया जाए ख़त को नज़रों से चूम लूँ पहले फिर हवा में उड़ा दिया जाए तोड़ना हो अगर सितारों को आसमाँ को झुका लिया जाए जिस पे नफरत के फूल उगते हों उस शजर को गिरा दिया एक छप्पर अभी सलामत है बारिशों को बता दिया जाए सोचता
 
JATINDER PARWAAZ
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Aug 04 2009 11:43 AM
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ज़रा सी देर में दिलकश नज़ारा डूब जायेगा

ज़रा सी देर में दिलकश नज़ारा डूब जायेगा ये सूरज देखना सारे का सारा डूब जायेगा नजाने फिर भी क्यों साहिल पे तेरा नाम लिखते हैं हमें मालूम है इक दिन किनारा डूब जायेगा सफ़ीना हो के हो पत्थर हैं हम अंज़ाम से वाकिफ़ तुम्हारा तैर जायेगा हमारा डूब जायेगा समन्दर के
 
JATINDER PARWAAZ
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Jul 31 2009 08:25 PM
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शजर पर एक ही पत्ता बचा है

शजर पर एक ही पत्ता बचा है हवा की आँख में चुबने लगा है नदी दम तोड़ बैठी तशनगी से समन्दर बारिशों में भीगता है कभी जुगनू कभी तितली के पीछे मेरा बचपन अभी तक भागता है सभी के खून में गैरत नही पर लहू सब की रगों में दोड़ता है जवानी क्या मेरे बेटे पे आई मेरी आँखों
 
JATINDER PARWAAZ
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बारिशों में नहाना भूल गए

बारिशों में नहाना भूल गएतुम भी क्या वो ज़माना भूल गएकम्प्यूटर किताबें याद रहींतितलियों का ठिकाना भूल गएफल तो आते नहीं थे पेड़ों परअब तो पंछी भी आना भूल गएयूँ उसे याद कर के रोते हैंजेसे कोई ख़ज़ाना भूल गएमैं तो बचपन से ही हूँ संजीदातुम भी अब मुस्कुराना भूल गए
 
JATINDER PARWAAZ
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वो नज़रों से मेरी नज़र काटता है

वो नज़रों से मेरी नज़र काटता हैमुहब्बत का पहला असर काटता हैमुझे घर मैं भी चैन पड़ता नही थासफ़र में हूँ अब तो सफ़र काटता हैये माँ की दुआएं हिफाज़त करेंगीये ताबीज़ सब की नज़र काटता हैये फिरका-परसती ये नफ़रत की आंधीपड़ोसी, पड़ोसी का सर काटता हैतुम्हारी जफा पे
 
JATINDER PARWAAZ
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यार पुराने छूट गये तो छूट गये

यार पुराने छूट गये तो छूट गयेकांच के बर्तन टूट गये तो टूट गयेसोच समझ कर होंट हिलाने पड़ते हैंतीर कमाँ से छूट गये तो छूट गयेशहज़ादे के खेल खिलोने थोड़ी थेमेरे सपने टूट गये तो टूट गयेइस बस्ती में कौन किसी का दुख रोये भाग किसी के फूट गये तो फूट गये छोड़ो
 
JATINDER PARWAAZ