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के.सी.वर्मा

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17 Jun 2010
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कौन कहता है ..............मै इन्सान नहीं हूँ ..!!

कौन कहता है ........मै इन्सान नहीं हूँ ,हरकतें तो वही हैं ,मतलब भगवान नहीं हूँ ॥मन में सब दुनियावी इच्छओं का ढेर लगा है ,सब है फिर भी मुझको भी, ९९ का फेर लगा है ॥ मन की सारी चिंताएं बिलकुल, सबके जैसी हैं ,मेरी हैं सबसे अलग, तुम्हारी बताना कैसी है ॥हम तो
 
कमलेश वर्मा
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हम ख़ुशी-ख़ुशी दूसरे, भोपाल -कांड का इंतजार करेंगे ॥???

हम कैसे भुला दें जहन से, भोपाल कांड को ,जिसने हिला के रख दिया ,पूरे ब्रह्माण्ड को ॥ भोपाल मे इंसानी लाशों के, अम्बार लगे थे ,बुझ गए जीवन दिए जो, अभी-अभी जगे थे ॥कोई किसी का ,कोई किसी का ,रिश्ता मर गया ,जिंदगी समेटने की कोशिश मे ,सब कुछ बिखर गया ॥जिनकी
 
कमलेश वर्मा
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इक बार क्या मिला वो...!!!

इक बार क्या मिला वो ,हर दिल अज़ीज़ हो गया ,पल दो पल में वो मेरे दिल के, करीब हो गया ॥अनजान थे जो अब तक, उसके असरार से ,अंजुमन में हुई जब उसकी आमद, हबीब हो गया ॥फिजां में ना था कही पे, उसका नामोनिशां ,है हर शख्श की जुबां पर, यही ''मेरा नसीब हो गया ॥जो
 
कमलेश वर्मा
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भीग जाती थी तेरी आँखें...!!!

भीग जाती थी तेरी आँखें, मुझे याद करके , तब क्यों न देखा !तुमने मुझे जी भर के ॥ जब सामने थी तो न ,टिक सकी ये मुझ पर , अब क्यूँ करती हैं शिकवा, ये रह -रह करके ॥ इनकी उल्फत का न कोई ,सानी है इस जहाँ में , बसाये रखती हैं ये यादें ,अपने में मर करके ॥ कौन समझे
 
कमलेश वर्मा
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आज तक ....!!! नही मिली ..

आज तक वो नही मिली ,जिसकी दरकार थी , झूठी निकली मेरी तमन्ना ,पीड़ मिली हार बार थी ॥ तिनका -तिनका जोड़ परिंदों ने, घर अपना बना लिया , ना मिला कोई मेरे घर को,वैसे इनकी भरमार थी ॥ जब तक उसने मुड कर देखा ,तब तक हम दूर थे , मुड कर उन तक जा ना सके ,पैर बहुत
 
कमलेश वर्मा
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आएगा मज़ा ...!!!

क्यों ?निरर्थक बोझ लाद कर फिरते हो सीने में ,फ़िक्र मुक्त करो जिन्दगी ,आएगा मज़ा जीने में ॥इत्र -सुगंधों से नही आती वो ...खुशबू !!जो भीनी-भीनी आती,मेहनत के पसीने में ॥हमने शराब पी के मरते बहुत देखे हैं.....गर जानी है तो जाये दूजों के गम पीने में ॥जिदगी तो
 
कमलेश वर्मा
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इक-इक कतरे का हिसाब चाहिए ...!!!

अपने लहू के इक -इक कतरे का हिसाब चाहिए ! फंदे पर लटकते 'अजमल 'और 'कसाब'चाहिए! जिनका बहा है खून जरा ,उनके दिल से पूछिए , जो देखा था आँखों ने वो , सुंदर सा ख्वाब चाहिए ! कितनी गैरत बाकि है इस देश में ,गैरों के लिये ,क्यों ? ये मेहमान नवाजी इनकी .जवाब चाहिए
 
कमलेश वर्मा
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अपनी मां का ख्याल रखना...!!! ९ मई के सन्दर्भ में ..

पिता जी की ''अंतिम नसीहत '' -------आपस में तुम अपने प्यार ,एकता ,हार हाल रखना 'बस तुम सब मिलकर 'अपनी माँ का ख्याल रखना ' -- कमलेश
 
कमलेश वर्मा
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सम्वेदनाओं के शून्य...!!!

सम्वेदनाओं के शून्य को ,जगाना चाहता हूँ ! विचारो के उत्तेज से ,हलचल मचाना चाहता हूँ !मर्म को पहचान, चोट करारी होनी चाहिए , बंद आँखों को नींद से ,जगाना चाहता हूँ !खून की गर्म धारा ,बह रही ही जिस्म में , देश-भक्ति का इसमें ,उबाल लाना चाहता हूँ !जज्बों में
 
कमलेश वर्मा
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अधूरी ...!!!

प्यार की अभिव्क्ति साधन मौन मन से इच्छाओं की तरंग पल-पल चलती जाती गन्तव्य की ओर दम तोड़ जाती वहीं नही मिलता सामजस्य उस अनुभूति का जो थी इधर इस किनारे पर तरंग के रूप में कठिन था मुड़ना भंवर में साँस टूटी गुजरती रही अनजानी अनदेखी लहरें हस्र यही होना था
 
कमलेश वर्मा
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के.सी.वर्मा

गरमी में नन्ही -नन्ही बरसात की बूँदें ,शीतलता देती जीवन को ,आ जाती स्फूर्ति तन मन में,जीवन जीवित हो जाता कण-कण में !!
 
कमलेश वर्मा
May 02 2010 11:31 AM
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मेरे प्यारे वतन ..!!

ऐ मेरे अहले -वतन तू , ज्यादा उम्मीद न कर , क्यूँ की तेरे ही गद्दार तुझे, बेचने पे तुले हुए हैं !जिन को दी थी चाबी ,सम्भालने को इस देश की ,उनके इमानो के त्ताले, पहले ही खुले हुए हैं !पाक- दामन समझ, जिनको पूजती है दुनिया ,अरे ।!! बाप ये सब आपस में घुले
 
कमलेश वर्मा
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निगाहों में तेरी सूरत ..!!

आज भी तेरी प्यारी सूरत निगाहों में बसी है ,लगाई थी जो प्यार की मेहंदी , हाथों में रची है ! सुर्ख होठों पर सजी मोहक सी मुस्कान तेरी ,लगे ऐसे गुलाबों में लड़ी, मोती की फंसी है ! जो भी देखे तेरी उडती ,जुल्फों का नजारा , लगे बदली बादलों की, लहरों में फंसी है
 
कमलेश वर्मा
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पोस्टो के शतक का सफर..और मैं...!!!आपका आशीर्वाद चाहिए..!

आदरणीय ब्लॉगर भाइयों .बहनों ..कमलेश वर्मा का आप सभी को सादर प्रणाम ,नमस्कार एवम आशीर्वाद ......आज आप लोगों के अपार स्नेह एवम भावपूर्ण मार्ग दर्शन में मै भी उस मुकाम पर आ गया हूँ ,जहाँ पर इस विधा या इस क्षेत्र से सम्बन्ध न रखते हुए भी अपने आप को किसी न
 
कमलेश वर्मा
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जलन -यह -कैसी -जलन ..!!!

थी चांदनी तारों के आगोश में ,देख!चाँद जल गया ! जलन भी थी इतनी तेज, सूरज भी पिघल गया ! तपिस तेरे मेरे प्यार की, पहुंच गयी कूंचों तक ! बारास्ता जो भी गुजरा इधर से ,वो भी मचल गया ! ऐसा नही की विरानियाँ ही हैं, इस राहे-गुजर में , जो भी आया दर-ए-इश्क में
 
कमलेश वर्मा
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मन की का दर्द ...???

भाव विह्वल सजल नैनो में, अवसाद भरा ,कांपती है आत्मा थर्राती है नभ-धरा ।कैसी अनहोनी घटित हुई ,है जीवन में ,मात्र पात के स्पंदन से भी है ,ये!मन डरा ,सदियों की बातें करता रहा मै सदा ,सब कुछ विलुप्त हो गया ,बस पलक झपकी थी जरा ,क्यों नहीं भाता कोई आश्वासन मन
 
कमलेश वर्मा
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जेल में पढ़े जो चेहरों के भाव ...!!!

हसरतों को जहाँ रोज, मरते-बेहाल देखा है ,बे-मतलब अपना चेहरा, लाल करते देखा है । जो करके आये हैं , उसका उनको ख्याल है,मै तो था बे-कसूर .!ये मलाल करते देखा है । करें भी क्या इनके बस में, है भी नही ,यादों के नश्तरों को, हलाल करते देखा है ,। कुछ ने तो कर लिया
 
कमलेश वर्मा
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पर उपदेश कुशल बहुतेरे !! .. कमलेश जीवन

बाटों खुशियाँ इस जीवन में,कल को किसने देखा है;यही सत्य है इस जीवन, बाकी सब धोखा है ;उद्यम करो सत्कर्मों का, दुष्कर्मों से दूर रहो;जन्म म्रत्यु के भय को त्याग करो, जीवन से भरपूर रहो;कर्म से किस्मत को जोड़ो,भाग्यवाद का त्याग करो;दीन-हीन की सेवा से ,जीवन
 
कमलेश वर्मा
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मन का अन्तर्द्वन्ध..किसी कोने से ...!!!

मेरा तन- मन उचाट क्यूँ है? इस पूरे जहान से , चिड़ियों ने भी समेट लिये , घोंसले मेरे मकान से ।! इंसानों में खुदगर्जी हो गयी ,इस कदर हावी , जड़ भी कहने लगे ,हम अच्छे है इस इन्सान से ।! फिजां की इन सरसराती हवावों में है ,बू साजिश की, इनकी दोस्ती से है कहीं
 
कमलेश वर्मा
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चंद लम्हे ..उस मुलाकत के ...!!!

चंद लम्हों की मुलाकात बनी सबब जिन्दगी की ,ता उम्र साथ मिलता तो क्या बात थी ।!संवर जाती सूरत मेरे आने वाले कल की ,हमेशा आफ़ताबे -नूर होता तो क्या बात थी ।! यूँ न छोडो भंवर में किश्ती मेरी जिन्दगी की ,तुम किश्ती की पतवार बनती तो क्या बात थी ।! गर डूबे
 
कमलेश वर्मा
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समीर भाई ,साहब की सेवा में ....

दोनों फलों के रंग में जो फर्क है ....वह 'रंग भेद 'किसी भेद करके नहीं है .....
 
कमलेश वर्मा
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अरमानो के महल ...!!!

मेरे अरमानों !के महल कब के ढह गये , और वक्त की लहरों के संग बह गये ,क्या इतनी कच्ची थी मेरे प्यार की नीवं , जमाने के थपेड़े भी इससे सहे न गये । सच्चे प्यार से बनाते गर आशियाने अपने , जो आये थे बर्बाद करने वो यहीं रह गये । अब भी वक्त है संभालो अंजुमन अपनी
 
कमलेश वर्मा
Apr 10 2010 09:31 PM
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के.सी.वर्मा

गुस्ताखियाँ ...!!!कमलेश वर्मा मन तडपता है देख कर, उसकी नादानियाँ ,न समझ 'दिल की' करती है मनमानियां । पहले जैसा अब कुछ भी नहीं ऐसा ,अब तो बस होती हैं ,हैरानियाँ । जहाँ मचलती थी बहारें चमन में ,आज बस !बसती हैं उधर वीरानियाँ । ऐसी फितरत नही थी, उसकी कभी ,ये
 
कमलेश वर्मा
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खुद-गर्ज़ जमाना ....!!!

देखो? इन्सान कितना खुद- गर्ज़ हो गया ,खून के रिश्ते निभाना भी, इक कर्ज़ हो गया । जिन्दगी भर उठाये रखा ,जिनको सीने पर ,वही अहसास -अपनों का ,मर्ज़ हो गया । आज महसूस हुई जब, जरूरत उनकी ,उनका पल भर का आना , अदा-फर्ज़ हो गया । क्यों ?बेरुखी करते है ,जमाने के
 
कमलेश वर्मा
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कंक्रीट के जंगलों में...!!!

कंक्रीट के जंगलों में ,इंसानियत खो गयी , इन्सान हो गये पत्थर के ,जिन्दगी कंक्रीट हो गयी । अब नही बहते आंसूं यहाँ ,किसी के लिए , इन पत्थरों के आंसूओं को, ये आदत हो गयी । ढूंढें से नही मिलती, जिन्दगी इन मकानों में , मतलब परस्ती यहाँ की, रिवायत हो गयी ।
 
कमलेश वर्मा
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अपना प्यारा हिदुस्तान ..!!कमलेश वर्मा

तिरछी नजर से देखे ,किसकी? हिम्मत हिंदुस्तान को ,मिनटों में धुल चटा देंगे ,उस पाजी शैतान को ।हमदर्दी का रुख को समझो , न हमारी कमजोरी है ,जब-जब किसी ने गलती ,उसकी बांह मरोड़ी है ।उन्नति के शिखर पर चढ़ते रहना ,इस देश का जनून है ,देश के हर रग-रग में दौड़े
 
कमलेश वर्मा
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हम कब के मर गये थे ...!!!

हम कब के मरगये थे तेरे प्यार मे ,अदायगी रसमे -जनाज़ा तो है ज़माने की,पता चल गया होता बहुत पहले,पर तूने कसम दी थी ना बताने की ,,बन गयी थी जिंदगी एक बेजान बुत जब हमने ,आहटसुनी थी किसे बेगाने की,,जिंदगी हो गयी थी मौत पर भारी ,जब आया था वक़्त ,प्यार मे मिट
 
कमलेश वर्मा
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इश्क ...!!!

दुनिया की नजर में इश्क करना हराम है ?तभी तो इश्क इतना दुनिया में बदनाम है । कहते हैं इश्क में अँधा है सारा जमाना ,कौन ? फिर इस को करता इतना बदनाम है । इश्क बिना न चलती इस कायनात की रवायतें ,इश्के-खुदा से रवां दुनिया की हर शाम है । गर खुद जिन्दगी करती है
 
कमलेश वर्मा
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हसरत -ए-दिल ...!!

तेरी हसरत थी जो दिल को ,वह खत्म हो गयी ,अब वादे-वफा निभानी बस रस्म हो गयी । जी जाते गर तूने, रस्मे -उल्फत निभायी होती , बर्बादी की जगह, जिन्दगी की राह दिखाई होती । कहाँ ? देखे थे इन आँखों ने बहारों के सपने ,तपती रेत के सहरा में फुहारों के सपने । उम्मीदों
 
कमलेश वर्मा
टैग: जमाना
Feb 25 2010 10:43 PM
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किस्मत....???

किस्मत में था न तेरा साथ, ये था नही पता ,भुगत रहा दिल जिसने, प्यार की थी खता.......? मेरा तडपता है दिल, लब भी सिले हुए हैं ,खता -ए- दिल के ,ये सिले मिले हुए हैं ।कोई हाले मंजर मेरा उसे देता क्यों नही बता .......?जिस बिन इक दिन भी जीना मुहाल था ,रातें थी
 
कमलेश वर्मा
Feb 24 2010 08:15 PM
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सरूर ....!!!

हुई सुबह तो उनकी आँखों में इक सरूर था ,आँखों की लाली थी कह रही थी ,कुछ हुआ जरूर था ।उलझी हुई लटों में, कुछ प्रश्न भी थे अनसुलझे ,न लटें ही सुलझी ? कुछ प्रश्न और भी उलझे ।उल्टा प्रश्न आँखों ने किया जरूर था ........ तन की उमंग मन की तरंग होठों पर थी आयी
 
कमलेश वर्मा
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जिन्दगी -सफरनामा ..

मुश्किलों से निकला बचपन ,कल छोड़ ,वर्तमान का नही था पता ,..रिश्तों ने दिए सहाराजीवन बेल को निखारा ...समझौते किये अहसानों के बदले ॥?क्यूँकर मंजिल पानी थी ....कितनी बार हारी हिम्मत ...पर फिर हिम्मत ने सम्भाला ....मंजिल मिली कुछ अच्छे सच्चे रिश्तों से
 
कमलेश वर्मा
Feb 23 2010 05:03 PM
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उल्फत नही थी दिल में...!!!

उल्फत नही थी दिल में ,तो दिल को रुलाया कैसे ? मंजिल तलक कसमों को, यूँ ही तुमने भुलाया कैसे ? गर पता होता दिल को, तेरी इस बात का,क्या दर्द भरा सिला दिया ,मेरे जज्बात का । पहले ही मोड़ लेते अपने ,अरमानों की नाव को , गर न दिलाया होता यकीं , प्यार कि बरसात
 
कमलेश वर्मा
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जो जीते थे मेरे लिये वो...!!!

जो जीते थे मेरे लिये वो ,अजनबी कैसे हो गये ,बड़ी जतन से संजोये रिश्ते ,ये कैसे ऐसे हो गये । न आवाज आयी टूटने की ,न लगा कुछ है गिरा,फिर ये दिलों के टुकड़े तार-तार कैसे हो गये । शिकवों की सिसकियाँ थी ,सुनी शायद किसी ने ,उन छलकती आँखों के आंसू ,इतने बे-जार
 
कमलेश वर्मा
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देखो ? न्याय में देरी का सिला खूरेंज(ख़ूनी) निकला..???

देखो ? न्याय में देरी का सिला खूरेंज(ख़ूनी) निकला ,विक्षिप्त मस्तिष्क अच्छे - अच्छों से तेज निकला । उसने हल निकाला ,खुद, उलझा था जिन सवालों में ,जिसको न ढूंढ पाया जमाना , इन उन्नीस सालों में ,। ऐसे ही गर चलता रहा न्याय इस जमाने का ।, जब कोई ओर रास्ता नही
 
कमलेश वर्मा
Feb 11 2010 04:36 PM
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जन्म -दिन

भाइयों एवम बहिनों ,आज मेरा जन्म दिन है ,श्री पाबला के पास शायद मेरे जन्मदिन की सूचना नही है ...
 
कमलेश वर्मा
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शरद ऋतु के होते..!!

शरद ऋतु के होते , अपने अलग ही रंग ,मन प्रफुल्लित हो झूमता ,प्रिय प्रियवर के संग । मीठी-मीठी ठंडक, तन को प्यारी लगती है ,जो धूप तडफती थी ,वो भी प्यारी लगती है । भूल गये वो गर्मी के दिन ,जब धरती रही धधकती ,जिन चिड़ियों की जान फंसी थी ,वो भी फिरे फुदकती । हर
 
कमलेश वर्मा
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कोशिशें तमाम की उनसे...!!

कोशिशें तमाम की उनसे मुलाकात की ,ताशीरे-ए-कशिश न समझे वो जज्बातकी । .......गर्दिश में हों सितारे तो ,हर कोशिश नाकाम है ,जलाते उनकी यादों के दिए ,बीती हर शाम है ,कभी रौशनी उन तलक पहुंचेगी इस बात की .........बुझती उम्मीदों को अपनी बाँहों का सहारा दे दो
 
कमलेश वर्मा
टैग: जिद
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दिल के अरमानो को...!!!

दिल के अरमानो को गर अल्फाज़ मिले होते , आज जमाने के रूबरू न लब सिले होते । लग ही जाता पता दिल-ए-दर्द जमाने को ,.. संग दिल भीड़ के सामने लब हिले होते । शुक्र - गुजार होता उन बेगानों का,न अपनों से कोई शिकवे -गिले होते । अपनी मंजिल मिल जाती खद-ब-खुद , खुली
 
कमलेश वर्मा
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बादलों में छुपकर...!!

बादलों में छुपकर चाँद खो गया , थपकी दी पवन ने चाँद सो गया । झिलमिल सितारों की सुनहरी रात है, दे गयी अपने मिलन की सौगात है । खुली पलकों से तेरे सपने देखती आँखें , तेरी लहराती जुल्फों के सपने देखती आँखें । जवां रात की अंगड़ाई में खिला योवन , चांदनी के जलाल
 
कमलेश वर्मा
टैग: कानो