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नानकदुखिया

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16 Jun 2010
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राधे मेरी स्वामिनी मैं राधा को दास..........

राधाजी श्रीकृष्ण की अन्तरंग शक्ति हैं। श्रीकृष्ण फूल हैं तो राधाजी सुगंध हैं, श्रीकृष्ण मधु हैं तो राधाजी मिठास, श्रीकृष्ण मुख हैं तो राधाजी कांतिऔर सौन्दर्य। राधाजी श्रीकृष्ण का अभिन्न स्वरुप हैं। वह श्रीकृष्ण की आहलादिनी शक्ति हैं। श्रीकृष्ण का
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मीरा का एक भजन

पग घुंघरू बाँध............
May 07 2010 11:23 AM
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गुरु ग्रन्थ साहिब से एक भजन

गुरु ग्रन्थ साहिब के प्रकाश पर्व के तीन सौ साल पूरे होने पर, कुछ समय पहले 'गुरु मान्यो ग्रन्थ' नाम से चार सीडी का एक बहुत ही मधुर संगीत एल्बम जारी किया गया था। इसमें गुरुओं के बत्तीस पद शामिल हैं। इस एल्बम की खासियत ये है कि इसमें राशिद खान, बेगम परवीन,
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जय हनुमान

प्रस्तुत है, गुंडेचा बंधुओं के स्वर में ध्रुपद में हनुमान भजन। ध्रुपद हमारी संगीत की प्राचीन गायन शैली है। यह शैली ओजस्वी और वीर रस से परिपूर्ण होती है। हनुमान तेज और शौर्य की प्रतिमूर्ति हैं और उनकी महिमा व गुणों का गान ध्रुपद द्वारा ही किया जा सकता
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भजन

कारिदह पै खेलन आयो री मेरो...........
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नानकदुखिया

झूला पै झुलै प्यारी रानी राधिका जी...........
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भज गोविन्दम

'भज गोविन्दम' स्तोत्र की रचना शंकराचार्य ने की थी। यह मूल रूप से बारह पदों में सरल संस्कृत में लिखा गया एक सुंदर स्तोत्र है। इसलिए इसे द्वादश मंजरिका भी कहते हैं। 'भज गोविन्दम' में शंकराचार्य ने संसार के मोह में ना पड़ कर भगवान् कृष्ण की भक्ति करने का
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जैसे सूरज की गर्मी से जलते हुए तन को मिल जाए.....

जैसे सूरज की गर्मी से जलते हुए तन कोमिल जाये तरुवर कि छायाऐसा ही सुख मेरे मन को मिला हैमैं जबसे शरण तेरी आया, मेरे रामभटका हुआ मेरा मन था कोईमिल ना रहा था सहारालहरों से लड़ती हुई नाव कोजैसे मिल ना रहा हो किनाराउस लड़खड़ाती हुई नाव को जोकिसी ने किनारा
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नानकदुखिया

मुरली वाले ने घेर लई...................
Sep 18 2009 10:53 AM
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नानकदुखिया

ऊधो को गोपियों का उलाहना........................... भजन सूरदास का, स्वर पुरुषोत्तम दास जलोटा का और राग है-वृन्दावनी सारंग।
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मैली चादर...........

मैली चादर ओढ़ के कैसे द्वार तुम्हारे आऊँहे पावन परमेश्वर मेरे मन ही मन शरमाऊँ तुमने मुझको जग में भेजा निर्मल देके कायाआकर के संसार मैं मैंने इसको दाग लगाया जनम जनम की मैली चादर कैसे दाग छुडाऊँनिर्मल वाणी पाकर तुझसे नाम ना तेरा गायानयन मूंदकर हे परमेश्वर
Sep 16 2009 02:46 PM
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नन्द-नंदनम

करो मन नन्द नंदन को ध्यान। यह अवसर तोहे फिर ना मिलेगो, मेरो कहो अब मान॥ घूँगर वाली अलकें उसपर, कुंडल झलकत कान।नारायण अलसाने नयना, झूमत रूप निधान॥
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गोविन्द दामोदर माधवेति

ना मैं वैकुण्ठ में रहता हूँ और ना मैं योगियों के हृदय में बसता हूँ। हे नारद! जहाँ मेरे भक्त मेरा कीर्तन करते हैं, मैं वहीं रहता हूँ।
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मैं नहि माखन खायौ

प्रबल प्रेम के पाले पड़कर, प्रभु को नियम बदलते देखा,अपना मान रहे ना रहे, पर भक्त का मान ना टलते देखा,जिसकी केवल कृपा दृष्टि पर, सकल विश्व को पलते देखा,उनको गोकुल के गौरस पर, सौ सौ बार मचलते देखा।
Sep 04 2009 01:10 PM
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संगीतमय मधुराष्टकं

पद्मपुराण में भगवान् कहते हैं, हे नारद! ना तो मैं वैकुण्ठ में रहता हूँ और ना ही योगियों के हृदय में। मैं तो वहीं रहता हूँ जहाँ मेरे भक्त मेरा कीर्तन करते हैं।प्रस्तुत है, मधुराष्टकं का संगीतमय रूप। इसे मधुर गायक येसुदासजी ने गाया है।Madhurashtakam.mp3
Aug 27 2009 03:13 PM
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बिल्वमंगल

भगवान् श्री कृष्ण के अनेक अनन्य भक्त हुए हैं जिन्होंने अपने एकनिष्ठ प्रेम, समर्पण और भगवद ज्ञान से लोकमानस में भक्तिभाव का संचार किया। ७०० वर्ष पहले केरल में ऐसे ही एक असाधारण भक्त बिल्वमंगल हुए। कहा जाता है कि उन्हें एक वेश्या चिंतामणि से प्रेम हो गया
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गोपीगीत

श्रीमदभागवतम भगवान श्रीकृष्ण का वांग्मय स्वरुप है। इसीलिए इसके बारह स्कंध उनकी देह के बारह अंग के समान हैं। उनमें से दसवां स्कंध इस देह रुपी महापुराण का हृदय है। इस स्कंध के पाँच अध्याय देह के पञ्च तत्त्व हैं और इन पाँच तत्त्वों में गोपी गीत सबसे
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जय जगन्नाथ

जगन्नाथजी जगत के स्वामी हैं और सभी प्राणियों पर कृपा करनेवाले हैं। वे कृष्ण के लीलामय स्वरुप हैं और श्यामवर्णी हैं। जगन्नाथजी का उल्लेख स्कन्दपुराण, ब्रह्मपुराण और अन्य पुराणों में विस्तार से दिया गया है।कई बार भक्तों को जगन्नाथजी का आदिरूप विचित्र लगता
Aug 18 2009 04:10 PM
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पवनसुत हनुमान

भगवान की कृपा से मुझे हनुमानजी के अनेक स्वरूपों के दर्शन करने का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इन विविध रूपों में कहीं तो पवनसुत स्वप्रकटित शिलाकार में हैं तो कहीं संगमरमर में उकरी छवि के रूप में, कहीं वे मोटे हनुमान जी बनकर प्रतिष्ठित हैं तो कहीं एक ही
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मधुराष्टकं

मधुराष्टकं की रचना महान वैश्न्वाचार्य श्री वल्लभाचार्यजी ने की थी। यह एक अत्यन्त सुंदर स्तोत्र है जिसमें मधुरापति भगवान् कृष्ण के सरस और सर्वांग सुंदर रूप और भावों का वर्णन है। मधुराष्टकं मूल रूप से संस्कृत में रचित है। मधुराष्टकं में आठ पद हैं और हर पद
Jul 23 2009 04:41 PM
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भक्ति वेदांत स्वामी

जो भक्त मेरा अनन्य ध्यान करते हैं और सदैव मेरी उपासना करते हैं, मैं उन्हें अप्राप्त प्रदान करता हूँ और उनके प्राप्त की रक्षा करता हूँ। -श्रीमदभगवद्गीता 1965 में जब भक्ति वेदांत स्वामी अमरीका में कृष्ण भक्ति का प्रचार करने के लिए जलदूत नामक जहाज पर सव
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ताज बेगम

कहते हैं कि मुगलों के ज़माने में दिल्ली में ताज बेगम रहा करती थीं जो शरियत की सीमाओं से अलग खुदा की बंदगी में दिन गुज़ारा करती थीं। जब सच्चे प्रेमी से लौ लग गई तो पूजा पाठ कौन करे, नमाज़ कौन पढ़े? जहाँ प्रेम तां नैम नहीं, तां नहीं बुद्धि विचार।प्रेम मग
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