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अपूर्ण

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09 May 2010
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एक बूँद आत्मसम्मान...

अगर है आपके पास आत्मसम्मान की एक बूँद तो कौन सी नयी बात है ?हर कोई पैदा होता है यहाँ तक कि जानवर भी आत्मसम्मान ले कर ही |क्यूँ हर बात पर हर वजह की वजह में हर उधडती मायूसी को सीना चाहते हैं आत्मसम्मान के गुण गान से!जिंदा नही रख पाते सबअपने भीतर |आखिर
 
निपुण पाण्डेय
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इन शहरों के भी क्या कहने....

इन शहरों के भी क्या कहनेबस रंग बिरंगे कपडे हैं पहने ....दिन के उजियारे में जब सूरज तेज दिखाता हैधुंए के मोटे कम्बल को भेद कभी ना पाता हैवो चंचल किरणे जो कहीं ठिठोली करती हैंबैठ वहीँ, शहरों को अब देख देख वो रोती हैंइन शहरों के भी क्या कहनेबस रंग बिरंगे
 
निपुण पाण्डेय
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क्यों डरे ....वो किससे डरे !

बहुत दिनों से कुछ ऐसी व्यस्तता हो गयी है कि चाह कर भी ब्लॉग पर आने ...कुछ लिखने ...कुछ पढने का समय ही नही निकाल पा रहा ......इसी बीच कई दिन पहले लिखी कुछ पंक्तियाँ दिख गई ....सोचा ब्लॉग पर पोस्ट कर दूँ....सन्नाटा थोडा लम्बा हो गया अब एक हल्की सी हलचल हो
 
निपुण पाण्डेय
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हाशिया...!

याद है ना!एक हाशिया होता था!इसके उस पार लिखा तोकट जाते थे नंबरइम्तेहान में !एहतियात के लिएहर कोईकॉपी मिलते ही ,हर पन्ने परखींच देता था हाशिया !और फिर शुरू करता थालिखना |लेकिन ये तो आदत सी ही पड़ गई !हाँ !ज़िन्दगी एक किताब है !मानता हूँ मैं,और ये भीकि जीवन
 
निपुण पाण्डेय
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बिखरे गणतंत्र को बसाना है !

आप सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं !इस महानतम गणतंत्र कोचलो! पुनः हम आबाद करें !जो हुई गलतियाँ, सुधारेंछूटे लोगों को अब साथ करें !क्यों बड़ी बड़ी हम बातें करते ?डग एक नहीं जब भर सकते !अंश भर सहयोग हर एक करे,एक अरब फिर उसमे योग करे |सर्वोच्च
 
निपुण पाण्डेय
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कहाँ आया बसन्त.......!! किसने देखा ?

सुना है बसन्त ऋतु आई है ! अभी अभी कैलंडर पे नज़र गई तो पता चला ! बसन्त पंचमी की शुभकामनाएं ! :):)शुभ बसंत ये आया खिल उठी प्रकृति रे !मुस्काते स्वागत गीत मधुर हर तरु से फूटेशुभ्र पुष्प दल खिले खिले यूँ हुए मनचलेपल पल हर चंचल कोपल नयी छठा बिखेरेपीत वसन में
 
निपुण पाण्डेय
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दौड़........!!

दौड़ है !दौडाए जा रहे हैं सब !दौड़ रहा हूँ मैं भी,अपनी मर्जी से नहीं !लोग कहते हैंकौन हैं लोग किसे पता ?बस दौड़ना है इस तरफ ,कौन है आगे किसे पता ?क्यों दौड़ना है किसे पता ?लेकिन पीछे तो हैंसबकिसी ना किसी के !दिखता कहाँ किसी कोअंत बिंदु,पर ये भूख कैसी
 
निपुण पाण्डेय
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जय बोल....!

भारतीय सेना दिवस के अवसर पर भारत माँ के उस हर इक सपूत को समर्पित , जो हमारे इस सुखद जीवन के लिए अपने प्राणों की जरा भी फिक्र नहीं करता !जय बोल जय जय बोल जय जय बोलकर जयजयकार ए देश मेरे जय बोलनिज प्राणों की आहुति दे जो अमर हुएवीर, देश के सेनानी की जय जय
 
निपुण पाण्डेय
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माझी प्रथम मराठी कविता : संक्रांतीचे हार्दिक शुभेच्छा !

कितना महान देश है भारत ! अनेकता में एकता !कुछ सालों से महाराष्ट्र में हूँ तो इस धरती की संस्कृति को जानने और समझने का इससे अच्छा अवसर और कहाँ !धीरे धीरे कुछ मित्रों की मदद से मराठी भी सीखने लगा ! भाषा का क्या है , जितना जानो उतना कम !हर जगह मानव ही तो
 
निपुण पाण्डेय
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'सह्याद्रि' के लिए .....

बारिश कब की जा चुकी है,अब सर्दियाँ भी जाने को हैं,उसके तन सेएक एक वस्त्र झर रहा है |ये पत्ते धागे हैं इन वस्त्रों के,जिनमें लिपटजब खड़ा हो जाता है वो, मीलों दूर सेखींच लेता है नेत्रों को !मिटा देता है !ना जाने कितनों की थकानदे देता है !कितने अधरों को
 
निपुण पाण्डेय
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बन-मक्खन

कल रात नींद नहीं आईमन कियाबाजू वाले की रजाई खींच लूँ ,बंद आँखों के साथ उसकोबिठा लूँ पीछेबाईक पर!खूँटी पर टंगी, बिस्तर पर पड़ीअपनी या किसी कीपैंट कमीज की जेबें तलाशूँऔरनिकालूं कुछ १०-२० के नोटभर लूँ कमरे के सारे चिल्लरजेब में अपनी !फिर निकल पडूंसर्दी की
 
निपुण पाण्डेय
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नव वर्ष २०१० की शुभकामना

* आप सब को नवल वर्ष २०१० की हार्दिक शुभकामनाएं *मुस्कान सभी अधरों पर छाये, समग्र विश्व एक सुर में गाये ,दीप ख़ुशी के जग में हों रोशन नव वर्ष, सम्पूर्ण नवलता ले आये |तम के गलियारे सारे जग के जगमग हों अब शुभ्र ज्योति से कोपलें सुमति की फूटें हरसूधरा ज्ञान
 
निपुण पाण्डेय
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भारत तुझे फिर नमन करना चाहता हूँ !

सौभाग्य मेरा, जन्मा यहाँ पर खुशियों का सब तोहफा मिला हर कदम अपने मन से तेरे साये में जी रहा, ऐ महान देश मेरे , भारत तुझे फिर नमन करना चाहता हूँ ! सांसों में गर्व है हर पल तेरी ही वजह से लहू में स्वाभिमान भी बस तेरी वजह से आजाद हूँ मैं, उड़ रहा अपने पर
 
निपुण पाण्डेय
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किस ओर ?

कायर खुद को झकझोर कहूँ या विधि के विधान का जोर कहूँ? हिला स्वयं के अंतर्मन को श्वेत वस्त्र में लिपटा चोर कहूँ ? चाहत को इस कह दूँ लोलुपता और स्वयं को लोभी, अधीर कहूँ? या मानव मन की आदत समझूँ और ब्रह्म सृष्टी की रीत कहूँ ? पल पल भटके मन जो मेरा पागल स
 
निपुण पाण्डेय
Dec 29 2009 11:51 AM
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मैं अपूर्ण......

बहुत दिनों से ये रिश्ता कुछ ऐसा बन गया है की बस अब कभी भी तुम कुछ न बोलो तो लगता है जैसे कुछ अधूरा सा रह गया | सोचा आज तुम पर ही कुछ लिखूं या फिर तुम चली आई अपने आप कुछ बन कर ...... बादल उमड़ते हैं, तुम आती हो बादल बरसते हैं, तुम आती हो हवा की छुन-मु
 
निपुण पाण्डेय
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ज़िन्दगी का सफ़र...

लम्बा तो बहुत ये ज़िन्दगी का सफ़र है धूप है, छाँव है, ख़ुशी भी हर डगर है| बैठ के दो पल जो करें इसका सामना मुस्कुरा के देख यहाँ रंगीन हर सफ़र है| मौसम हैं कई इस दुनिया में खुदा की हर हाल में जीना है तू इंसान अगर है | साकी मेरे पैमाने में कुछ रंग तो भर
 
निपुण पाण्डेय
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साँस लेते बुत..

इंसान सब जाने कहाँ खोते गए साँस लेते बुत से सब बनते गए ज़िन्दगी के इस सफ़र में मुक्तसर खोजते थे कुछ, औ' खुद खोते गए | घर हुआ करते थे वो एक वक़्त था महल की ख्वाहिश में सब ढहते गए | घनी आबादियाँ वीरां होती रही पत्थरो के मकां बस बनते गए | शहर को किसकी न
 
निपुण पाण्डेय
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कानून में सुधार आया है**

चाहे मानसून लेट आया है पर एहसास नया ये लाया है, कानून में सुधार आया है देश में अब बदलाव आया है| लड़के को लड़की न खोजनी ना लड़की को लड़का, कोई भी मिल जाये चलेगा बस भिडे प्रेम का टांका | शायद अब किसी घर में मूंछों वाली भाभी आएँगी, कन्यायें कन्या को भी अब
 
निपुण पाण्डेय
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मिथ्या....

जग जग घूमा नगरी नगरी माया की ये दुनिया पूरी, आखिर में मैं खुद से बोला चल वापस ये शाम घनेरी| मन तो निश्चल पावन था ये ना समझा था कुछ कुटिलाई, मनभावन जो इसे लगा था उस पथ की थी आस जगाई | पल पल महकी खुशबू आई दूर मरीचिका जब इठलाई, देख उसे तब चंचल मन में लो
 
निपुण पाण्डेय
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समझ..बौनी हो गई है

अक्सर कुछ ऐसा होता है कि कुछ लिख रहा होता हूँ और मन भटकता हुआ कहीं और चला जाता है और अंत में कुछ और ही बन पड़ता है .... इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ .... आज समय के चक्र में घूमता हुआ आ चुका हूँ दूर पर अब चाहता हूँ लौटना | लौटना चाहता हूँ , फिर से जीना चा
 
निपुण पाण्डेय
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पागल ये मन

पगला ये मन भटकता ही फिरे जाने क्या आस है कोई तो प्यास है कुछ तलाश है खोजता ही रहे चाहे क्या ये पागलSSSSS पगला ये मन ............. बैठा रहे कहीं खोया सा गुम कहीं जाने कुछ भी नहीं चैन पल भर नहीं भटके भटके पागलSSSSS पगला ये मन .......... चाहे इसको कभी च
 
निपुण पाण्डेय
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पहली वर्षा............

पवन एक मदमस्त आई मेघ को तब याद आई गगन का अभिमान टूटा धरा को वरदान जैसा प्यासी पड़ी कुम्हला गई थी व्याकुल जमीं ऐसी हुई थी जब मेघ गर्ज़न कर उठे फिर विटप पादप खिल उठे धरा कुछ यूँ मुस्कुराई अमृतमयी जब फुहार आई घनन घन घन मेघ गरजे झिमिर झिम झिम फिर जो बरसे
 
निपुण पाण्डेय
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मुझको ले चल उड़ा..........

आज सुबह तकरीबन ३ बजे खिड़की पे बैठा हुआ था ......भीनी भीनी सी हवा बह रही थी ...कुछ झकझोर गई मन को और बहुत दिनों बाद कुछ पंक्तियाँ बन गई ...... सोंधी सोंधी हवा, भीनी भीनी हवा, प्यारी प्यारी सी हौले सुनो सरगम गाती हवा, मुझको छूती चले रेशमी सी लगे तार म
 
निपुण पाण्डेय
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खामोश आवाज़.....

दिन भर, रात भर सुबह से शाम खेलता हुआ गोद में उछ्लते कूदते असंख्य विचारों की पाता हूँ कभी खिलखिलाता हुआ खुद को और कभी गुमशुदा खुद को, खुद से फिर गूंजती है एक खामोश बहुत खामोश सी आवाज़ और वापस लौट पड़ता हूँ उसी की और न जाने कहाँ से कहाँ को कहाँ तक.....
 
निपुण पाण्डेय
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ख्वाहिशें

१ . सुनती हैं ,बोलती हैं ,हंसती हैं ,रोती हैं बेखौफ,बियाबां में,बस भटकती रहती हैं खाव्हिशें क्यों इतनी अजीब होती हैं ? २. लोग ख्वाहिशों पे क्यों लगाम नहीं बाँधते हमेशा से इनकी उडाने लम्बी हुआ करती हैं चाँद के बाद सूरज पे पहुँच, झुलस पड़ती हैं|
 
निपुण पाण्डेय
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आशाओ मेरी ! कब तक मेरा साथ दोगी ?

समय के भंवर को ,कठिन हर लहर को तुम्हारे ही दम पे तरा हूँ , जिया हूँ, लड़ा हूँ समय से ! जब चल पड़ा हूँ हर पथ पे मेरे पथ की प्रदर्शक ! जीवन की गति की अनूठी है भाषा, मन की तरंगों से अपनी उमंगों को, मैंने छुआ है तुम्हारे ही दम से , सुप्त मन में तुम दीप्त
 
निपुण पाण्डेय
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बंद आँखें....

खुली आँखों से तो दिखता है सब ! पर इन दिनों बंद आँखों से देख लेता हूँ कहीं ज्यादा | खुली आँखें ! दिखाती हैं सच | और बंद आँखें ? दिखा देती हैं उस सच के भी भीतर, शायद अपना सच | सुना था बंद आँखें देखती हैं स्वप्न , अवास्तविक और भंगुर ! लेकिन... मेरी दुनि
 
निपुण पाण्डेय
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मेरा "मैं" !!!

सवालों से मेरा रिश्ता थोडा गहरा है शायद आज उलझ रहा था फिर खुद से ही पनपने लगा फिर एक सवाल मैं दो हूँ क्या.... हाँ ! मैं एक नहीं, दो हूँ और दोनों पूरा दिन लड़ते रहते हैं बस ! अगर मैं कहूँ ऐसा तो दूसरा कहे वैसा कोई निश्चय हो टांग अड़ा देता खुद मैं ही, द
 
निपुण पाण्डेय
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अर्थ जीवन का !!!

फिर आ गया हूँ प्रश्न लेकर अपना पुराना गतिमान मैं भी , जीवन भी मेरा नए पथ , नूतन बसेरा | प्रश्न मेरा आज भी है किस तरफ पग चल पड़े हैं क्या है अब इसका किनारा ? मूंदता हूँ नेत्र अपने खोलता जब पट घनेरे दंभ भरता हूँ यकायक मोह में किसके बंधा मैं ? जान पड़ता
 
निपुण पाण्डेय
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मैं 'घुमन्तू '

बहुत दिन हो गए | कई दिनों से जरा घूमने के शौक में व्यस्त हूँ | पता नहीं क्यों आजकल घर पे नहीं टिक पाता | एक अलग एहसास है घूमने में भी | आज फिर से कविता लिखने की कोशिश की तो वही कुछ लिख पड़ा | गुम हूँ कहीं लेकिन, खोया नहीं हूँ खोज ही रहा हूँ अब तक आजम
 
निपुण पाण्डेय
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तिरंगा कह रहा है ...

स्वतन्त्रता दिवस की वर्षगाँठ पर हार्दिक शुभकामनाएं.....:)लहरा रहा है मदमस्त हो करपर नम इसका कोई कोना है,देख हमको, तिरंगा कह रहाकोई इसकी, अधूरी कामना हैगुलामी के चंगुल से मुक्त हुआ कुर्बानी दे कर इसको छीना हैपर जो दिखाए थे इसको सपने उनको अभी साकार होना
 
निपुण पाण्डेय
Aug 16 2009 10:42 AM
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पांडे बैठे कविता लिखने.....

थोडा हास्य लिखने का प्रयास किया | खुद पे ही लिखी है कविता | कुछ मित्रों ने मुझसे ऐसा बोला तो वही लिख पड़ा .....पांडे बैठे कविता लिखनेबड़ी बड़ी कर देते बातेंकोई समझे, कोई न समझेसबसे वाह वाह मांगत फिरते |यार दोस्त सब कहने लागेअब तो पांडे गयो पगलाय,भरी
 
निपुण पाण्डेय
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मैं चुप हूँ..

मैं चुप हूँबोलता था बहुत ,कभी कभी तोबहुत से भी थोडा ज्यादा,लेकिन अब मैं चुप हूँ |जब बोलता थातो सब कुछ बोल देता था,अब चुप हूँतो बस टटोलता हूँ,टटोलता हूँकुछ खुद में ,कुछ दूसरों में |ज्यादा बोलना ही चुप कर गया एक दिनमहफिलों कि शान था कभीऔरलोगों कि हंसी की
 
निपुण पाण्डेय
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ख्याल...

बहुत दिनों बाद फिर से जी चाहा कुछ लिखूं, जंग खा गए लगते हैंदिल-ओ-दिमाग के पुर्जे,सूझ रहा है बहुत कुछ लेकिन कुछ रुकता ही नहीं !मक्खियों सी भिन-भिन है बस,कुछ सुन नहीं पा रहा कि कौन क्या कहना चाहता है आखिर! अजीब सी हलचल है रूकती ही नहीं बस हुए जाती है, हुए
 
निपुण पाण्डेय
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आखिरी अलविदा.....

कुछ देर, इक दिन या इक हफ्ता बस ! यही कह कर गए थे न तुम ? और ये उम्मीद जगी रह गई वापसी की....... शायद मुसलसल मिलती रही माफियाँ बेफिक्र कर गई मुझको खौफ ही न रहा, कि कोई लकीर भी है हमारे दरमियाँ शायद मैं ही न समझ पाया था या दोस्ती या फिर लकीरें या फिर भ
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आशियाँ दरख्तों पर बसाने चले हैं....

आशियाँ दरख्तों पर बसाने चले हैं गुल कोई नया अब खिलाने चले हैं| कभी कोई आये खयालो में जैसा फिर समां आज वैसा बनाने चले हैं| खुदा से ही पूछो कहाँ जायेंगे अब खुद तो न जाने किस ठिकाने चले हैं| सबर अब न है ना ही कोई उम्मीदें आज खुद को ही हम आजमाने चले हैं|
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तरकीब...

कोई तरकीब सोचता हूँ सूझती ही नहीं ताने बाने में इस फिर निकल पड़ता हूँ जब खोजने खुद को, शौक है शायद मेरा, अक्सर उग पड़ता है दिल में वर्षा में उगने वाली हरी घास की तरह, फिर सूख जाता है , एक दिन फिर उग पड़ता है अनायास ही बिलकुल जब कभी कोई एक डोर आ जाती