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रज़िया मिर्ज़ा

http://raziamirza.blogspot.com/
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16 Jun 2010
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आपकी छ्त्र छाया

धक..धक..धक..धक… मौत का काउनडाउन शुरु हो चुका था। मेरे “बाबा”(पिताजी) हम सब को छोडकर दुनिया को अलविदा कहने चले थे। अभी सुबह ही तो मैं आईथी आपको छोडकर “बाबा” । मैं वापस आने ही वाली थी। और जीजाजी का फोन सुनकर आपके पास आ भी गई। आपके सीनेपर मशीनें लगी हुईं
 
रज़िया "राज़"
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50 वीं सालगिरह मुबारक हो....

गुजरात और महाराष्ट्र को अपनी 50 वीं सालगिरह मुबारक हो। सदा खुशहाल रहो। सदा फलो और फ़ुलो। बूराई का साया तुमसे हंमेशाँ दूर रहे।
 
रज़िया "राज़"
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आई = माता

हाँ ! में "माँ" हुं। कभी मैं भी जवान थी। पर आज 63 कि उम्र में अब 100 से भी ज़्यादा लग रही हुं। कारन? ....... मेरे कुछ बेवफ़ा/ गद्दार "संतानों"कि वजह से। जिन्हों ने मुझे कमज़ोर कर दिया है। आज में आपको अपनी तस्वीर बतानेवाली हुं एक आत्मकथा के रुप में। पर अब
 
रज़िया "राज़"
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श्रध्धांजली"

बस बिल्कुल इसी समय आप हमें छोडकर चली गईं थीं। वक़्त भी यही था। दिन भी यही। अपनी सारी ज़िंदगी हमारे लिये न्यौछावर करदी। अपने लिये तो सोच लेती मेरी "माँ"!!!! हम तीनों बहनों को और भाई को समाज और ज़िंदगी में एक ऐसा मुकाम दिलाया। हमेशाँ बच्चों कि ही फ़िक्र में
 
रज़िया "राज़"
Apr 22 2010 12:48 PM
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आप बहोत याद आती हो "अम्मी"

हाँ! एक साल पहले ही कि तो बात है। आज मैं आप ही के साथ थी। आज शाम को आपने हमें शादी में जाने की इजाज़त दी तो थी पर थकी थकी आवाज़ में आपने कहा था कि कल तो शादी थी फ़िर आज क्या है? हमने कहा रिसेप्शन है। रात को जल्द आ जायेंगे। मैं और बडी आपा कुछ ज़बरदस्ती ही जा
 
रज़िया "राज़"
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भारत का पहला ऑनलाइन चैनल " प्रहरी Live "

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जयराम “विप्लव” { jayram"viplav" }
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अपने ही देश में आतंकित क्यों?

मै कोई शायर नहीं और न ही मै कोई लेखक हूँ। भारी-भरकम शब्दों का प्रयोग कर अपने पांडित्य का लोहा मनवाने की कोई आवश्यकता नहीं समझता। मै सीधा-सरल व्यक्ति हूँ, पक्का मुसलमान और कट्टर राष्ट्रवादी हूँ। अकबर खान मेरा नाम है।कुछ बरसों तक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक
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आख़िर बील पास हो ही गया.....

चलो मुबारक हो महिलाओं को।आख़िर महिलाओं की जीत हुई।लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण देने के महत्वाकांक्षी विधेयक को सरकार ने राज्यसभा में दो तिहाई बहुमत से शोर-शराबे के बीच पारित कर ही दिया।
 
रज़िया "राज़"
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"ब्रेकिंग न्यूज़"

"ब्रेकिंग न्यूज़"पुणे में आतंकी हमलाधमाके में दस की मौत। करीब चालीस ज़ख़मी। पुणे की जर्मन बेकरी में हुआ धमाका। बेकरी के पास एक लावारिस बैग मिला।दिल को दहला देनेवाली रोंगटे ख़डे कर देनेवाली ऐसी बडी ख़बर,,,! हमारे जीवन के साथ-साथ हमारे आस-पास के जीवों को भी
 
रज़िया "राज़"
Feb 13 2010 09:19 PM
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जैसी करनी!!वैसी भरनी!!

कहीं एक गाँव में एक आदमी रहता था। लोग कहते थे कि वो कहीं ओर से आ बसा था। पर उसने अपने आपको ये गांव काठेकेदार बना रख्खा था।गांव में आनेवाला हर नया शख़्स उसके पैर छूए बगैर जैसे यहाँ बस नहिं सकता था। ठेलेवाले हो याकोई ढाबे वाले। सब पर एक ही नियम रहता था। अब
 
रज़िया "राज़"
Feb 12 2010 11:01 PM
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स्वयं को समय दे पाना भी दूभर I

आज की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में इंसान इस कद्र लिप्त हो चुका है कि अपने-आपको समय दे पाना भी दूभर हो गया है. ऐसे में वह कह उठता है :-ज़रा देर में  आना  ऐ होश Iअभी कहीं मै गया हुआ हूँ IIhttp://www.thenetpress.com/
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२६ जनवरी के गौरवमई पर्व पर भाईचारे का सन्देश

ना तेरा खुदा कोई और है Iना मेरा खुदा कोई और है II* ये जो रास्ते हैं जुदा-जुदा Iये मामला कोई और है II* जिसे ढूंढता है तू यहाँ-वहाँ Iदिल में तेरे वो मौजूद है II* जिसे मिल गया एक बार वो Iउसका सारा संसार है II* ना तेरा खुदा कोई और है Iना मेरा खुदा कोई और है
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रज़िया मिर्ज़ा

हर सप्ताह चुने हुए आलेख को 500रू का नकद ईनाम दिया जाएगा।प्रिय पाठकों , आप सभी को नये दशक के पहले नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें ! आपको यह जानकार ख़ुशी होगी कि "जनोक्ति " ने बहुत ही कम समय में अपनी एक अलग पहचान स्थापित की है . पत्रकारिता के
Jan 16 2010 09:36 PM
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एक बात सोचने वाली........

एक बात सोचने वाली है कि एनडी टीवी इमैजिन के कार्यक्रम "राज़ पिछले जन्म का" की आज तक प्रसारित प्रत्येक कड़ी में हर व्यक्ति पिछले जन्म में भी इंसान ही क्यों था या थी ???http://www.thenetpress.com/
टैग: 094 165 57 786
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.....तेरी यादें....

मैं चुराकर लाई हुं तेरी वो तस्वीर जो हमारे साथ तूने खींचवाई थी मेरे परदेस जाने पर। में चुराकर लाई हुं तेरे हाथों के वो रुमाल जिससे तूं अपना चहेरा पोंछा करती थी। मैं चुराकर लाई हुं वो तेरे कपडे जो तुं पहना करती थी। मैं चुराकर लाई हुं पानी का वो प्याला
 
रज़िया "राज़"
Dec 29 2009 11:50 AM
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मेरी बिदाई.....

घर में कुछ चहल पहल हो रही है। तैयारी की जा रही है किसी कार्यक्रम की। देखुं , आज कौन कौन मेरे घर पर आय ा है? एक कोने में दादा दादी और नाना नानी बैठे है। अंकल आंटी भी आये हुए हैं। मामा मामी के साथ चिंकु, बंटी, भी आये हैं। सुरतवाले अंकल ने तो मेसेज भेजा
 
रज़िया "राज़"
Dec 29 2009 11:50 AM
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देख़ो लोगों मेरे जाने का है पैग़ाम आया.

देख़ो लोगों मेरे जाने का है पैग़ाम आया..(2) ख़ुदा के घर से है ये ख़त, मेरे नाम आया….देख़ो लोगो… जिसकी ख़वाहिश में ता-जिन्दगी तरसते रहे। वो तो ना आये मगर मौत का ये जाम आया। ख़ुदा के घर….. ज़िंदगी में हम चमकते रहे तारॉ की तरहॉ । रात जब ढल गइ, छुपने का ये मक़ाम
 
रज़िया "राज़"
Dec 29 2009 11:50 AM
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मुझे यें पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगती हैं

दीपक राग है चाहत अपनी , कैसे सुनाएँ तुम्हें ? ख़ुद तो सुलगते ही रहते हैं , क्यूँ सुलगाएं तुम्हें ??
 
Akbar Khan +919416557786
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......काश!!!!थोडा और रुक जाते...

हाँ ! जैसा आपने चाहा था वैसे ही हमारी बेटी की शादी हुई। बड़ी प्यारी लग रही है। बड़ी खुश भी है। सारे रिश्तेदारों ने हमारी इस खुशी में वक्त देकर हमारी ख़ुशीयों को जाने और बढ़ा दिया। यहां दुर्रेशाहवार की सहेलियाँ भी शादी में शरीक होने दिल्ली से आई हुई है
 
रज़िया "राज़"
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" आभार" अपनी बेटी की शादी पर मुझे आप सब की मुबारक बादी के लिये।

मेरे तमाम ब्लोगर साथीयों को नमस्कार, आदाब। मैं लगातार अपनी प्यारी बेटी की शादीकी तैयारीयों में लगी हुई थी। पहले अपने वतन में उसकी शादी और फ़िर रीसेप्शन ।इसी दरम्यान मुझे मेरे ब्लोगर साथीयों ने मेरे मोबाईल पर मुबारकबादी पहोंचाई। मैं सभी साथीयों की आभार
 
रज़िया "राज़"
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"मेरी प्यारी बेटी" की शादी में ज़रूर आना!!!!

मेरे ब्लोगर साथीयो। आप सभी को नुतन वर्ष की शुभकामनाएं। आप सभी को लगता होगा कि मैं कहां ख़ो गई? आज बता रही हुं कि "मेरी बेटी की शादी ' की तैयारी में जुटी रही हुं। अभी बिल्कुल वक़्त नहिं है पर आप सभी को आमंत्रित करने के हेतु से मैं आज ये पोस्ट लिख रही हु
 
रज़िया "राज़"
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एक माँ की ज़ुबानी! अपनी बेटी की कहानी!!!

पता ही नहिं चला कि वक़्त कहाँ गुज़र गया? लगता है कि तुम अभी भी हमारी गोदी में खेल रही हो ! मुझे याद है तुमने जब हमारे यहाँ आने की दस्तक दी थी। नर्स ने पहले तुम्हें तुम्हारे पापा की गोदी में दीया। पापा ने तुम्हारे कानों में “ अज़ान ” देकर अम्मी की गोदी म
 
रज़िया "राज़"
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"सत्य और अहिंसा का पूजारी"

एक सामान्य व्यक्ति, जो एक बडे साम्राज्य के सामने अड गया। देश की आज़ादी की ख़ातिर बिना हथियार के लड गया। सत्य और अहिंसा का वो पूजारी अपने काम से सारे विश्व में अपना और अपने देश का नाम कर गया। ना तो उसे कोई सत्ता का लालच रहा ना हि कोई पद का। देश की ख़ातिर
 
रज़िया "राज़"
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.....अभी न जाओ छोडकर.....

अभी तक तो अपनी पोस्ट लिखती रही। ..... पर आज एक ऐसी पोस्ट लिखने जा रही हुं जो अनदेखा होते हुए भी हमारा , और.... हम सब का है। वो है " ब्लो ग वा णी ' । कल ही सुब्हा , जब असत्य पर सत्य के त्यौहार " विजयादशमी " की बधाई देने जैसे ही ब्लोगर का पन्ना खोला ..
 
रज़िया "राज़"
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....ईद के दिन....

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रज़िया "राज़"
Sep 25 2009 09:09 AM
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"तेरी गवाही"....

तेरी गवाही हमें आनेवाले एक नये दिन का संदेश देती है।तेरी गवाही के लिये हमलोग तुझे ढूंढते रहते हैं आसमान में।पर तूं है कि .......छूप जाता है कभी बादलों में। कभी पेडों के पीछे, हर नये महिने की शुरुआत, तेरी गवाही के बिना मंज़ूर नहिं।आज भी इंतेज़ार है रोज़दारों
 
रज़िया "राज़"
Sep 20 2009 05:32 PM
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....हमें संभालो बेटा!!!!!!!!

मैं गिर जाउंगा पापा मुझे सहारा दो ना! ना बेटा! डरो मत ! दे खो ऐसे सहलाते हैं इन्हें। ये तो ऊंची नस्ल का घोड़ा है। पापा ने अपने डरे हुए 10 साल के बेटे हौसला दिया। पाँच साल बाद..... पापा कल मेरी 10वीं बोर्ड का पहला पेपर है। आप आयेंगे न मेरे साथ? अरे बेटा!!
 
रज़िया "राज़"
Sep 13 2009 12:40 PM
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????क्यों देर हुई साजन ..तेरे यहाँ आने में???

क्यों देर हुई साजन तेरे यहाँ आने में?क्या क्या न सहा हमने अपने को मनानेमें।तुने तो हमें ज़ालिम क्या से क्या बना डाला?अब कैसे यकीँ कर लें, हम तेरे बहाने में।उम्मीदों के दीपक को हमने जो जलाया था।तुने ये पहल कर दी, क्यों उसको बुज़ाने में।बाज़ारों में बिकते है,
 
रज़िया "राज़"
Sep 10 2009 10:04 AM
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..महेमान बनके वो!!!!

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रज़िया "राज़"
Sep 10 2009 09:43 AM
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......उसे तलाश करो....

सफर में ख़ो गई मंज़िल,उसे तलाश करो।.किनारे छूटा है साहिल, उसे तलाश करो।.था अपना साया भी इस वक़्त साथ छोड़ गया।कहॉ वो हो गया ओझल उसे तलाश करो।ना ही ज़ख़म,ना तो है खून फिर भी मार गया।कहॉ छुपा है वो कातिल, उसे तलाश करो।भूला चला है वक़्त जिन्दगी के लम्हों को।मगर
 
रज़िया "राज़"
Sep 07 2009 03:38 PM
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.....वक़्त ने साथ छोडा हमारा तो....

वक़्त ने साथ छोड़ा हमारा जो था, हाय तेरा, तड़पना मुझे याद है। मुंह छिपाकर तेरा मेरी आगोश में, हाय कैसा बिलख़ना मुझे याद है।…हॉ मुझे याद है। प्यार की वादीओ में गुज़ारे जो पल, कैसे दिल से ओ साथी भूला पायेंगे? जिन लकीरों पे कस्मे जो खाइ थीं कल, आज हम वो लकीरें
 
रज़िया "राज़"
Sep 03 2009 04:41 PM
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.......दर्पण.....

जाने कैसा ये बंधन है? उजला तन और मैला मन है। एक हाथ से दान वो देता। दूजे से कंइ जानें लेता। रहता बन के दोस्त सभी का। पर ये तो उनका दुश्मन है। इन्सानो के भेष में रहता। शैतानों से काम वो करता। बन के रहता देव सभी का। पर ना ये दानव से कम है। चाहे कितने भेष
 
रज़िया "राज़"
Sep 01 2009 11:46 AM
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घर का "दीपक"

“ सुनती हो? अभी तक तुम्हारा लाड़ला घर पहुंचा नहिं है’। रसोई से ज़रा बाहर तो आओ”! प्रोफ़ेसर अनिल अपनी पत्नी से बोले। हाल में ही कालेज से आकर बैठक में बैठी राजुल दैनिक पेपर में अपना मुंह लगाकर चुपके से अपने बाबू जी का गुस्सा देख रही थी। अपने हाथों को रुमाल
 
रज़िया "राज़"
Aug 30 2009 03:08 PM
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....जब वो गाती है तब....

झुमती गाती और गुनगुनाती गज़ल,गीत कोइ सुहाने सुनाती गज़ल। ज़िंदगी से हमें है मिलाती गज़ल, उसके अशआर में एक इनाम है,उसके हर शेर में एक पैगाम है। सबको हर मोड पे ले के जाती गज़ल। उसको ख़िलवत मिले या मिले अंजुमन। उसको ख़िरमन मिले या मिले फ़िर चमन, वो बहारों को फ़िर है
 
रज़िया "राज़"
Aug 26 2009 09:24 PM
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मुझे आज मेरा वतन याद आया

मेरे ख्वाब में आके किसने जगाया। मुझे आज मेरा वतन याद आया। जो भुले थे वो आज फिर याद आया। मुझे आज म्रेरा वतन याद आया। वो गांवों के खेतों के पीपल के नीचे। वो नदीया किनारे के मंदिर के पीछे। वो खोया हुआ अपनापन याद आया। मुझे आज मेरा वतन याद आया। वो सखियों
 
रज़िया "राज़"
Aug 19 2009 11:02 AM
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मुस्कुराता तूं चला जा

आदमी है, आदमी से मिल मिलाता तू चलाजा। गीत कोइ प्यार के बस गुनगुनाता तू चलाजा। गर तुझे अँधियारा राहों में मिले तो याद रख़, हर जगह दीपक उजाले के जलाता तू चलाजा। जो तुझे चूभ जायें काँटे, राह में हो बेखबर, अपने हाथों से हटा कर, गुल बिछाता तू चलाजा। सामने तेरे
 
रज़िया "राज़"
Aug 18 2009 11:27 AM
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तूं लेजा ना लेजा मूझे...

मैं तो आऊंगी तेरी गली। चाहे कोइ कहे पग़ली।तू लेजा ना लेजा मुझे(2) वादीओं में बसेरा मेरा, तुज़से हो सवेरा मेरा।(2) मैं बनके ऊडुं तितली…तू लेजा ना लेजा मुझे। तुज़से हो उजाला मेरा,तू ही है सहारा मेरा।(2) तुज़से मैं बनी बिजली…तू लेजा ना लेजा मुझे।मैं तो आऊंगी…ये
 
रज़िया "राज़"
Aug 17 2009 11:16 AM
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फ़िर आज़ तिरंगा छाया है।

देख़ो भारतवालो देख़ो, फ़िर आज़ तिरंगा छाया है। है पर्व देश का आज यहाँ, ये याद दिलाने आया है। रंग है केसरीया क्रांति का, और सफ़ेद है जो शांति का। हरियाला रंग है हराभरा, पैग़ाम देशकी उन्नति का। अशोकचक्र ने भारत को प्रगति करना जो सिखाया है। देख़ो भारतवालो देख़ो ।
 
रज़िया "राज़"
Aug 14 2009 08:33 PM