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नयी प्रविष्टी लिखी
02 Jun 2010
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मैं एक तन्हा जज़ीरा पा लूं

मेरी ज़बीं पे वो ज़ख्म देगा तो खून से तर ग़ज़ल कहूँगीअगर लगाएगा सुर्ख़ बिंदी मैं सज संवर कर ग़ज़ल कहूँगीखमोशियों के समन्दरों का ज़रा कनारा तो ढूँढने दोमैं एक तन्हा जज़ीरा पा लूं वहीँ पहुंचकर ग़ज़ल कहूँगीए मीरे -मजलिस तेरी सदारत क़ुबूल करके कहा है सबनेमगर
 
लता 'हया'
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वो कुत्ता पाल सकता है मगर माँ ?

मदर्स डे तो बीत गया, लेकिन सिर्फ तारीख़ के हिसाब से, क्या हर दिन मदर्स डे नहीं होता? हमारा अस्तित्व जिसकी वजह से है - उस माँ के बगैर एक दिन भी सुकून से गुज़रता है ? - क़दम-क़दम पर उस माँ की ज़रुरत महसूस होती है, जिसके क़दमों तले ज़न्नत होने का दावा, ख़ुद
 
लता 'हया'
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और सब कुछ ठीक है ?

आज एक अप्रैल है ---अप्रैल फूल यानि बेवकूफ़ बनाने का दिन ...लेकिन हम तो सालों से हर दिन किसी ना किसी मुद्दे पर बुद्धू बनते रहे हैं ;जब हालात कुछ और होते हैं और हकीक़त कुछ और ,,,,,और फिर भी कहा यही जाता है कि सब कुछ ठीक है .........क्या वाक़ई ....और सब कुछ
 
लता 'हया'
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महिला दिवस पर मेरी एक गुज़ारिश

मेरी तमन्ना है की हर हिन्दुस्तानी इस पोस्टर को पढ़े और इसे अमल में लाये साफ़ साफ़ पढने के लिए: आप मेहरबानी करके इस पोस्टर पर क्लिक करें और जितने लोगों तक मेरी ये गुज़ारिश पहुंचा सकें पहुंचाएं...मैं तहे दिल से आप सब की शुक्रगुज़ार रहूंगी.
 
लता 'हया'
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होली और महिला दिवस पर मेरे ज़ज्बात

करूँ क्या खेल कर होली ? दिलों में फ़र्क़ हो तो फिर करूँ क्या खेल कर होलीसजा दो प्यार के रंगों से हिन्दुस्तान की डोली जलादो होलिका ज़ुल्मो-सितम ,नफ़रत की फिर देखो ख़ुशी के रंग से भर जायेगी हर शख्स की झोली सात शेर ,सात रंग [१] अना का रंग ; मैं जो तलवार उठा
 
लता 'हया'
Mar 04 2010 03:55 PM
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पस्ती -ऐ -इंसां

शर्मिंदा हूँ ,ग़मज़दा भी हूँ ,अफ़सोस और पछतावा भी है की इतने लम्बे अरसे के बाद ब्लॉग को छुआ है .कभी कभी इंसान चाहकर भी अपना मन पसंद काम नहीं कर पाता .क्या कहूं ,वक्त नहीं था ?किसी के पास नहीं है आज के दौर में, पर हकीकत येही है .प्रोग्राम्स और शूटिंग ने
 
लता 'हया'
Feb 23 2010 04:21 PM
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इबादत भी ज़रूरी है

चलो अब वार बन जाएँ ,के अब तलवार बन जाएँके अब तेज़ाब की बहती हुई इक धार बन जाएँबहुत ठंडी हवा बनकर बहे ,अब आंधियां बनकरबग़ावत का नया इक सिलसिला ,विस्तार बन जाएँगुज़िश्ता कई वर्षों के हालात को मद्दे -नज़र रखते हुए आप सबको नरम तेवर वाली दुआएं देने को दिल
 
लता 'हया'
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बिग बॉस का घर

ये इस साल की मेरी आखरी पोस्ट है ;चाहती तो हूँ कि हर हफ़्ते बल्कि हर दूसरे दिन कुछ न कुछ पोस्ट करूँ लेकिन हर रचना लोगों की राय से वाकिफ़ होना चाहती है ,ये उसकी ख्वाहिश भी होती है और एक कसौटी भी लेकिन ये भी एक कड़वा सच है कि आज इंसां के पास वक़्त ,नेकि
 
लता 'हया'
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हर कोई है ग़मज़दा

बहुत तवील सफ़र रहा और काफी तकलीफदेह भी,हर कोई हैरान और परेशां,बहुत सी दास्तानें सुनाना बाक़ी है और आप सबको पिछली पोस्ट का जवाब देना भी,लेकिन आज नहीं क्योंकि आज से ठीक एक साल पहले मेरे शहर मुंबई ने आतंक और खौफ़ का ऐसा सफ़र तय किया था जिसकी वहशतनाक दास
 
लता 'हया'
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शाख़ से फूल की तरह झरती गई

कल से तीन दिनों तक मुंबई से बाहर हूँ. मुशायरे के सिलसिले में आजमगढ़ और पटना जाना है. सोचा तो था के आ कर कुछ नया पोस्ट करुँगी, के तभी तुलसी भाई पटेल जी का मेल आया के लता जी आपकी पोस्ट का इंतज़ार है.उन्हें जवाब देना चाहा लेकिन विफल रही, फिर सोचा की लैप
 
लता 'हया'
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गोपियाँ रक्स करती रहीं

दीपावली जा चुकी लेकिन ब्लॉग जगत अब भी रौशन है आप अदीबों के ज़हनी चरागों से निकली अशआर की रौशनी से ;दीपावली इतनी शायराना होगी सोचा न था ;आयोजक थे सुबीर जी और मुझे आमंत्रित करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी नीरज गोस्वामी जी को जो हैं तो मेरे ममेरे भाई लेकि
 
लता 'हया'
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ये तितली

एक तरफ दीपों के त्यौहार की सजावट तो दूसरी तरफ चुनावी माहौल की गिरावट ,गोया खूबसूरत मखमल पर पैवंद लग गया हो ;ख़ुदा करे सब शांति से संपन्न हो जाये ;कहीं मेरी ग़ज़ल फिर न सिहर के कह उट्ठे ; अंधेरों मैं जो आज इक रौशनी मालूम होती है ये बस्ती अम्न की जलती
 
लता 'हया'
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दुआ चाहिए

मुझे पढ़ने वाले ,समझने वाले ,हौसला अफजाई करने वाले तमाम ब्लॉगर्स का मैं तहे-दिल से शुक्रिया अदा करती हूँ जो अपने बेशकीमती कमैंट्स से मुझे नवाज़ते हैं ;कुछ तो रूह में उतर जाते हैं हालांकि सबका ज़ाती तौर पर जवाब नहीं दे पाती इसके लिए शर्मिन्दा भी हूँ पर आप
 
लता 'हया'
Sep 26 2009 10:47 AM
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हिंदी दिवस

हिंदी दिवस पर समस्त हिंदी प्रेमियों और हिन्दुस्तानियों को बधाई.सोचा तो था के सुबह सुबह मुबारकबाद पेश करुँगी लेकिन कवि सम्मेलनों का सिलसिला चालू है,पूरा हिंदुस्तान हिन्दीमय होगया है,हिंदी को याद करने के नए नए तरीके ढूंढे जा रहे है,हर ऑफिस हर विभाग में
 
लता 'हया'
Sep 14 2009 11:02 PM
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मुहब्बत हूँ

मेरे दिल पर किसी की भी हुकूमत चल नहीं सकती मुहब्बत हूँ मेरे आँचल में नफ़रत पल नहीं सकती करोगे इश्क़ नफ़रत से तो धोखा खाओगे इक दिन मुहब्बत नाम की औरत कभी भी छल नहीं सकती उन्हें हिंसा गवारा है, हमें इंसान प्यारा है कभी इंसानियत खूनी सड़क पर चल नहीं सकती
 
लता 'हया'
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जुर्म अब ईमान.....

आदमी शैतान होता जा रहा है क्या उसे भगवान होता जा रहा है ये निठारी काण्ड तौबा देख कर हा! ख़ुद ख़ुदा हैरान होता जा रहा हैहैं मेरे हालत तो ईराक़ जैसे हौसला ईरान होता जा रहा हैधर्म तो नेताओं के हत्थे चढ़ा हैजुर्म अब ईमान होता जा रहा हैमैच फिक्सर या पुलिस की
 
लता 'हया'
Sep 07 2009 10:30 AM
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औरत हूँ आईना नहीं

पहले तो अपने आप से नज़रें मिलाईये फिर चाहे हम पे शौक़ से तोहमत लगाईये मेहनत की भट्टियों में झुलसना तो छोडिये रिश्तों की आंच में ज़रा तप कर दिखाईये औरत हूँ आईना नहीं जो टूट जाउंगी इन पत्थरों से और किसी को डराईये बनना है ग़र अमीर तो बस इतना कीजिए ज़िस्मों
 
लता 'हया'
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बीवियां तो नहीं

नफरतों की कमी यां वहां तो नहींपर मुहब्बत भी कम शय मियां तो नहीं क्या गिराएंगी यकजहतियों के समनये हवाएं हैं ये आंधियां तो नहींइतनी भी जी हुजूरी नहीं है भली कुरसियां हैं जी ये बीवियां तो नहीं उनको नेता कहा तो ख़फा हो गए नाम ही है दिया गालियां तो नहीं जो है
 
लता 'हया'
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कैसी कैसी सरहदें

धर्म की कुछ जात की कुछ हैसियत की सरहदें आदमियत की जमीं पर कैसी कैसी सरहदें मुल्क को तो बाँट लें लेकिन ये सोचा है कभी दिल को कैसे बाँट सकती हैं सियासी सरहदें माँग भर कर उसने मेरी मांग ली आज़ादियाँ अब क़फ़स है और मैं हूँ या सिन्दूरी सरहदें मैं मोहब्बत
 
लता 'हया'
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मेरी शर्म है मेरा ज़ेवर

हमने वीराने को गुलज़ार बना रखा है क्या बुरा है जो हकीक़त को छुपा रखा है दौरे हाज़िर में कोई आज ज़मीं से पूछे आज इंसान कहाँ तूने छुपा रखा है ? वो तो खुदगर्जी है ,लालच है, हवस है जिसका नाम इस दौर के इन्सां ने वफ़ा रखा है मैं तो मुश्ताक़ हूँ आंधी में भी
 
हया
टैग: poetry
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पिंजरा ले उड़ूंगी

हमें अब जगमगाना आ गया है चरागे़ दिल जलाना आ गया है मेरी खामोशियां भी बोलती हैं उन्हें भी गुनगुनाना आ गया है मैं जब चाहूंगी पिंजरा ले उड़ूंगी परों को आज़माना आ गया है ये मेरी जुर्रते परवाज देखो उफ़क़ के पार जाना आ गया है क़यामत या बाला समझो के आफत शबा
 
HAYA