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मेरी डायरी के पन्ने...

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27 Apr 2010
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तुम सिर्फ एक कविता नहीं हो

तुम सिर्फ एक कविता नहीं हो ...तुम ...मेरे जिस्म की उस गंध के समान हो...जो लिपटी पड़ी हैं...मेरी हथेली की रेखाओं से ...एक समान दो जिस्मों की सुवास...जो एक अकेली गंध पर हावी है...जो एक अनकही... अनजानी...अनदेखी दुनिया में...कहीं ना कहीं ...मेरे वजूद का
 
हेमन्त वशिष्ठ
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वो खुद को गरीब महसूस करता है

वो खुद को गरीब महसूस करता है...क्योंकि जब वो भीख मांगने को बढ़ा हाथ देखता है...औऱ जेब से जब निकालता है ...एक अदद ब्रांडेड पर्स...तो उसमें 100-100 के 10-15 नोट ही पड़े होते हैं...काश ये 1000 रुपए के नोट बन जाते...पलक झपकते ही...ये सोचते हुए वो... भिखारी
 
हेमन्त वशिष्ठ
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पन्नों पर नमी है

कवर पर चढ़ी जिल्द... पपड़ाई है ...कमरे की सफेदी की तरह ...जो उतरना चाहती है...पर उतरी नहीं है...हाशिये पर कई...कटे-फटे से अक्षर हैं...पर नाम कोई नहीं है...सबसे पीछे वाले पन्ने पर ...आड़ी-तिरछी रेखाएं...खिंचीं हैं...अलग-अलग रेडियस वाले...कई अधबने वृत
 
हेमन्त वशिष्ठ
Apr 20 2010 09:18 PM
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कुछ बात यूं हई

तुझे जब-जब लिखना चाहा...कुछ बात यूं हुई...हम खींचते रहे स्केच...औऱ ...बात... चली गई ...तुझे जब-जब कहना चाहा...कुछ बात यूं हुई...तेरी बात कहते-सुनते...हर राह गुजर गई...तुझे जब-जब पढ़ना चाहा...कुछ बात यूं हुई...हर पन्ने की आखिरी लाइन पर...तू कहीं ठिठक
 
हेमन्त वशिष्ठ
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कोई शीर्षक मिला ही नहीं...

मैं अपने कम्प्यूटर के मॉनीटर में मानो घुसा पड़ा था... और वो जाने कब से चुपचाप... सहमा हुआ सा... मेरी कुर्सी के पास खड़ा था... आंख उठा कर मैने देखा... क्या बात है भाई... धीरे से उससे पूछा... पर वो मेरे सवालों को शायद सुन भी नहीं सका था... दिन भर की थक
 
हेमन्त वशिष्ठ
Dec 29 2009 11:57 AM
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बाबा के दर्शन...औऱ घर वापसी

सुबह जब आंख खुली तो एक अरसे बाद या कुछ यूं कहें कि बहुत अच्छा महसूस हुआ... ये सुबह वाकई सुबह की तरह थी... नीला आसमान... सूरज के आने के आभास से शर्माया सा... देख कर वाकई ऐसा लगा कि ... ये नया रंग कौन सा है... खैर... इसके बाद नज़र पड़ी चारपाई की बगल मे
 
हेमन्त वशिष्ठ
Dec 29 2009 11:57 AM
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बाबा का बुलावा ...

रात अपनी रफ़्तार से बढ़ रही थी... और हमारी रफ़्तार पर सड़क कभी-कभार जैसे ब्रेक से लगा देती थी । रास्ता एकदम अनजान... और रात के इस पहर एकदम सुनसान...वीरान... अंधेरी सड़क पर सावधानी से आगे बढ़ते रोशनी के दो बिंदु... औऱ सन्नाटे में सबको अपने गुजरने का अ
 
हेमन्त वशिष्ठ
Dec 29 2009 11:57 AM
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आज़ादपुर मंडी की बोरियों से एक मुलाक़ात

आज सुबह जब उठा तो लगा कि जैसे पूरे घर को खबर है... आज मेरी छुट्टी है... आदतन दो कप चाय पीने के बाद जब आंखें खुली तो 11 बज चुके थे ...अरे हां ...वाकई मेरी छुट्टी है... माता जी ने जैसे ही देखा कि मैंने उठते ही अखबार ढूंढना शुरु कर दिया है , उन्होंने फौ
 
हेमन्त वशिष्ठ
Dec 29 2009 11:57 AM
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हम ऐसे जीते हैं...

मेरे दफ़्तर में सीढ़ियां नहीं हैं... लोग लिफ्ट से चढ़ते हैं... हमारी इस दुनिया में ... ताज़ी हवा के लिए खिड़कियां नहीं है... हम शीशे के पार... पेड़ों के पत्तों को हिलते हुए देखते हैं... शीशे के पार देखकर... सर्दियों में धूप सेकते हैं... पहली बरसात के
 
हेमन्त वशिष्ठ
Dec 29 2009 11:57 AM
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विडंबना

एक पुरानी रचना है, आज भी सोचने पर अक्सर मजबूर कर देती है)... बाल बेतरतीब थे... अटपटी सी चाल चलते, रास्ते पर बिखरे कंकड़ों को ठोकर मारते, अनमने से यूंही, जाने किस उधेड़बुन में, बेतहाशा... पागलों की तरह, अपने आप से बातें करते, हम निरंतर चले जा रहे थे..
 
हेमन्त वशिष्ठ
Dec 29 2009 11:57 AM
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एक मजदूर (मजबूर) की मौत

कैलाश को अस्पताल में दाखिला तो मिला लेकिन इलाज के लिए नहीं, पोस्टमॉर्टम के लिए" जैसे ही एक साथी रिपोर्टर से पीटीसी की ये चंद लाइनें सुनी... सभी एक दम से उछल पड़े... वाह गुरु ! खबर बेच दी आपने... वर्ना किसको पड़ी है कि एक मज़दूर की मौत की खबर चलाए वो
 
हेमन्त वशिष्ठ
Dec 29 2009 11:57 AM
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कवि की कल्पना... पार्ट-2 (मोहब्बत की मेट्रो)

मोहब्बत की मेट्रो ... ये नाम दिया बंधु जिंदल साहब ने। दरअसल कुछ महीने पहले मैं रुटीन के मुताबिक ऑफिस आ रहा था , डीयू से मेट्रो पकड़ी। कश्मीरी गेट पहुंचा तो भीड़ का रेला ट्रेन को धकियाते भीतर आ घुसा। इस रेले में अपने जिंदल साहब भी थे , डिब्बे में उनकी
 
हेमन्त वशिष्ठ
Dec 29 2009 11:57 AM
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कवि की कल्पना ...

सुबह के 4 बज रहे हैं ... इतनी तड़के भी स्टेशन पर जैसे भगदड़ मची हुई है। स्टेशन के गेट पर जबरदस्त पहरा है ... एनएसजी तैनात है ... स्निफर डॉग जहां - तहां सूंघ रहे हैं ... औऱ पब्लिक जैसे एक ही ट्रेन से नि कल जाने को बेताब है। दिल्ली जैसे शहर में सुबह -
 
हेमन्त वशिष्ठ
Dec 29 2009 11:57 AM
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गांव बहुत याद आता है ...

वो पुरानी हवेली की दीवार पर उगा पीपल... अक्सर मुझे याद कर के मुस्कुराता है... खिल उठती है वो खेतों की पगडंडियां... जब पंछियों के साथ उड़ता मेरा बचपन... अब भी उनको कहीं दिख जाता है... गेंहू की अधपकी बालियों को खाने का स्वाद... कई बार की पिटाई के साथ य
 
हेमन्त वशिष्ठ
Dec 29 2009 11:57 AM
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ये ब्लॉग मैने क्यों बनाया

ये ब्लॉग मैने क्यों बनाया... इसका कौई सीधा सा जवाब मेरे पास नहीं है, लेकिन पहला पोस्ट करते वक्त मैं ये सवाल अपने आप से पूछ रहा हूं... और इस सवाल की पृष्ठभूमि में एक आदत छिपी है...वो है डायरी लिखने की.... हालांकि ये आदत वक्त-वक्त पर छूटती रही...और फिर
 
हेमन्त वशिष्ठ
Dec 29 2009 11:57 AM
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ये आखिर क्या है...

कुछ एबस्ट्रैक्ट सा है... एकदम अनगढ़... बिना किसी शेप में... अबूझ सा... या फिर एकदम एबसर्ड बिना किसी मतलब के... जबरदस्ती...एक हठ की तरह... शायद बेतरतीब भी... वाहियात... किसी कूड़े की तरह... जैसे कोई इंटेलेक्चुअल खरपतवार हो... नकारा विचारों को समेटे...
 
हेमन्त वशिष्ठ
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मुस्कान वाले फ्रेम

उसके पास ... मेरे होठों की मुस्कान थी... औऱ मेरे पास... उस मुस्कान को सहेजते... अनगिनत फ्रेम... गोल ...चौकोर... तिकोने... रंगबिरंगे फ्रेम... हर एक फ्रेम के साथ... एक अदद मुस्कान... कुछेक ब्लैक एंड व्हाइट फ्रेम भी हैं... क्योंकि कभी-कभी गुस्से वाले फ्
 
हेमन्त वशिष्ठ
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कुछ खो गया है ...

कमरे में रौशनी ना के बराबर है...बिखरे पलों को ...सहेजती... सन्नाटे की एक चादर....कई महींनों की गर्द से दबी है......दरवाजे की झिर्रियों से... छुप-छुपकर आते...रौशनी के साये...बिस्तर पर सिरहाने की तरफ...तुम्हे तलाशते हैं...जहां बैठना तुम्हें बहुत पसंद
 
हेमन्त वशिष्ठ
Sep 12 2009 01:06 AM
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चैन की सांस ...

शाम को जब पापा ऑफिस से वापस आए...हाथ से टिफिन लेने मैं बढ़ा...कि अचानक उन्होंने ...ज़ोर से छींक दिया...हाथ बढ़ते-बढ़ते रुक गए...कदम जैसे वहीं थम गए...मैं किसी बहाने से...वापस कमरे में आकर बैठ गया...पापा वहां आए...मेरी आंखों में तैरते संशय को...शायद वो
 
हेमन्त वशिष्ठ
Aug 27 2009 12:56 PM
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जब तुम नहीं थी...

आज सुबह जब खुली मेरी आंख...तो तुम नहीं थी...नहीं मिला बिस्तर के सिरहाने रखा...वो चाय का कप...कसमसा कर रह गया मेरा हाथ...जाने क्यूं तुम नहीं थी...उनींदी आंखों को मसलती रह गई ...तेरी जुल्फों को तलाशती उंगलियां...जब बिस्तर को सहेजते वक्त भी नहीं मिला
 
हेमन्त वशिष्ठ
Aug 26 2009 10:50 AM
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हर रोज़ जीने की कोशिश करता हूं मैं...

नींद से बोझल आंखें लिए...हर सुबह अपने शरीर को ...किसी तरह ढोता हूं मैं...रात किस कदर बीत जाती है......कभी पता ही नहीं चलता...और कभी ...बीत ही नहीं पाती...दिनभर फिर जागता हूं...दिनभर टुकड़ों में सोता हूं मैं...... हां उस दिन ... उसी रात के साथ हर पल...हर
 
हेमन्त वशिष्ठ
Aug 21 2009 07:44 PM
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दो हज़ार में घर का खर्च कैसे चलाउं...

दो हज़ार रुपए में क्या होता है...ये सुनकर मैं ठिठका...आवाज़ जानी -पहचानी लगी तो ...धीरे से पलटा...वो खड़ी थीं... अपनी सास के साथ...अपने मोहल्ले के भोलू की ब्याहता...शादी के करीब ७ साल बाद...अपने दो बच्चों का हाथ थामे...वही सवाल फिर से किया अपनी सास
 
हेमन्त वशिष्ठ
Aug 15 2009 10:57 AM
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तुम नहीं थी... पर तुम सही थी...

बुझते कशों के बीच...याद आई वो हर बात...जो तुमने हर कश के बीच...कही नहीं पर ...सही थी...हां...तुम नहीं थी... पर तुम सही थी...जब दम घोंटने लगे अपने ही विचार...और घुटनों के बीच सिर दिए...जागते रहे सारी रात...खुद में ही सिमटे... सिकुड़े से ...सिसकते रहे...
 
हेमन्त वशिष्ठ
Aug 13 2009 11:40 AM