माना कि आप कद में मुझसे बहुत बड़े हो पर मेरे सामने तो सिर झुकाये खड़े हो हमें तो सिर उठाकर जीने की आदत है रास्ता दीजिये मुझको, क्यूँ रास्ते में अड़े हो चित्र : गुगल सर्च से साभार
नेपथ्य में : माता के जागरण के लिये कुल चन्दे से आयी रकम : 23900 रूपये माता के जागरण पर कुल खर्च : 8600 रूपये बचत (लाभ) : 15300 रूपये आयोजक नशे में धुत्त, संख्या में कुल तीन. तीनों ने अपने हिस्से का 5100 रूपये लिया और अपना-अपना जाम उठा लिया.
मार साले को .... अबे तेरे बाप की गाड़ी है जो खरोच मार दिया. पकड़ लो साले को ! और मैं भी नई चमचमाती गाड़ी को देखने लगा. खरोंच को भी देखने की जिज्ञासा हुई. पूरी गाड़ी देखा पर खरोंच नजर नही आई. उधर उस आटो चालक को पकड़ कर पीटने का भी कार्यक्रम शुरू हो चुका था.
तीन दिनों से मेरे यहाँ ब्लागवाणी नहीं खुल रहा है. क्या ब्लागवाणी सर्वर बन्द है या सिर्फ मेरे यहाँ ही समस्या है. यदि यह सिर्फ मेरी ही समस्या है तो इसका उपाय क्या है? कृपया मेरी मदद करें.
.......................................... .......................................... पप्पू तुम क्या कर रहे हो? जी हम खेल रहे हैं. फिर यह गालियों की आवाजें क्यों आ रही हैं? जी हम ब्लागर-ब्लागर खेल रहे हैं.
उसने उस दिन मेरे गाल पर झन्नाटा लिखा था कोई ताड़ न पाये इसलिये मैनें सन्नाटा लिखा था . उसकी गली में आया था कुत्ते पीछे पड़ गये थे पढ़कर देखते मेरे चेहरे पर ज्वार-भाटा लिखा था . चमन में आया था मैं चश्मे-नम करने की ख़ातिर मेरे भाग्य में तो निगोड़ा यह सूखा कांटा
नीचे के चित्र में कौन हैं यह नहीं पूछना है. ये हैं विनोद कुमार पाण्डेय. आपको सिर्फ़ ये बताना हैं कि : 1. ये कहाँ पर हैं? 2. आँखे बन्द करके ये किस चीज का आनन्द ले रहे हैं? 3. उनकी यह मुद्रा क्या प्रदर्शित कर रही है?
आज अपनी एक व्यंग्य कविता आपको सुना रहा हूँ. कविता का शीर्षक है : आततायी शहर की तरफ़ आ रहे हैं -- और यह मेरी तलवार जो सिरहाने रखकर सोया था .................
ढिंढोरापीटू साफ़्टवेयर की बुकिंग चालू है चार अतिसम्मानित लोगों ने बुक करवाया. 1. sangeeta swarup 2. पं.डी.के.शर्मा"वत्स" 3. माधव 4. विनोद कुमार पांडेय सीमित मात्रा मे उप्लब्ध. जल्दी करें मौका चूक न जायें. विस्तार से जानने और बुक
प्राचीनकाल से ही ढिंढोरा पीटने की आवश्यकता पड़ती रही है. मुगलकाल में इसका उत्कर्ष हुआ. इसका अन्य नाम मुनादी है. पहले यह राजा-महराजाओं तक ही सीमित था, वे ही ढिंढोरा पिटवाते थे. यह तो सामान्य सी बात है कि यदि किसी को पिटवाया जायेगा तो कोई न कोई पिटेगा ही.
चलो योग करें सूर्य नमस्कार से शुरू करो फिर ताड़ासन की बारी है कुछ तो करना होगा क्योंकि अपना तो बदन बहुत भारी है सौन्दर्य प्रतियोगिता में जाना है मुझको तो प्रथम स्थान पाना है योग हरे ब्याधि तन-मन के गरूणासन से स्लिम बन जाऊँगी फिर चूहों के पीछे दौड़ लगाऊँगी
दिनांक 7 मई 2010 को विश्व रेडक्रास दिवस के अवसर आयोजित काव्य गोष्ठी में मैनें दो कविताओं का पाठ किया जिसका प्रसारण आकाशवाणी से दिनांक 8 मई 2010 को किया गया. कविताएँ पढ़े और सुने : तुम मुझे गोली मार दो तुम मुझे गोली मार दो क्योकि मै जिन्दा ही कहाँ
खुजाना एक कला है. खुजाया तब जाता है जब खुजली होती है. कभी-कभी खुजली उठाने के लिये भी खुजाया जाता है. खुद को खुजाने और किसी और को खुजाने में फर्क है. खुजली उठने का क्योकि कोई वक्त नहीं होता है, इसलिये खुजाने का भी कोई वक्त नहीं होता. खुजाना लाभदायक भी है
वे बेचैनी से कमरे में टहल रहीं थी. अभी तक फोन क्यों नहीं आया? पता नहीं प्रबन्ध हुआ कि नहीं. "बेटा तीन साल से फेल हो रहा है. चिंता हो किसी को तब न. अबकी तो कुछ भी करके पास करवाना ही होगा." ट्रिंग -- ट्रिंग "हलो, क्या हुआ?" "हो
लगता है फिट हो गई गोटी, वाह भई वाह सांझ ढले अंगूर की बेटी, वाह भई वाह . मुर्ग मुसल्लम की दावत खाने दौड़े आये दाँत नहीं पर नोचे बोटी, वाह भई वाह . पानी-पानी चिल्लाते हो प्यासे अधरों से देखो खुला छोड़ दिया टोटी, वाह भई वाह . कल दिखे गुलछर्रे उड़ाते कनाट प्लेस
बेजुबान हूँ कुछ कहूँगा तो लोग कहेंगे कि कहता है इसलिये चुप रहूँगा एक अनुमान लगाईए आखिर ऐसा क्या लदा होगा कि इस बेजुबान को अधर में लटकना पड़ा ------------
मेरी कुछ पुरस्कृत/प्रकाशित रचनाओं के लिंक्स. आपका पदार्पण अपेक्षित है : हिन्द युग्म पर 1. जनवरी 2010 यूनिकवि प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त : कबूतर तुम कब सुधरोगे? 2. अक्टूबर 2009 यूनिकवि प्रतियोगिता में पाँचवा स्थान : तुम अपनी मुट्ठियाँ हवा में
उस दिन बैठी थी तुम यही ... थोड़ा सा फासला था हमारे और तुम्हारे बीच. मैं न जाने कब से उस फासले को कम करने की कोशिश कर रहा था. पहाड़ सा यह फासला ... टूटता हुआ प्रतिपल हौसला मेरा. घास की हरीतिमा के बीच रह रह कर चहकती हुई तुम .... पेड़ के गिरते पत्ते सा मैं
पाबला जी ब्लागजगत की बिना किसी निजी स्वार्थ या अपेक्षा के सेवा में रत है. हम सब उनके आभारी हैं जिससे रचनाओं के प्रकाशन के उपरांत हमें सूचना देते हैं. शायद ही कोई हो जो उनके इस योगदान की महत्ता को नकार सके. किसी की रचना को अस्वीकार करना, उसे नापसन्द करना
अबे पैसे किस बात के हम तो स्टाफ़ हैं कोई बात नहीं, आप अपना परिचय पत्र दिखा दीजिये. अच्छा, तेरी ये औकात कि तुम परिचय पत्र मांगेगा. सर, फिर तो टिकट लेनी ही होगी. अच्छा, तो तूँ मुझे टिकट देगा. खुद का टिकट कटवाना है क्या? और फिर कंडक्टर ने बस रोकवाकर उसे उतार
आज महफूज जी से बात हुई यूँ समझो मुलाकात हुई जबलपुर से बोल रहे थे अपनी गुत्थी खुद खोल रहे थे कल परसो नही बात हुई है आज बातों ही बातों में खोला राज जो बात हुई सुनकर तो शुभचिंतकों का दिल खिलेगा अमरीकी सम्मान मिला सो मायानगरी में भी सम्मान मिलेगा आपको
यह रचना किसने लिखी है मुझे नहीं पता. यह मुझे ईमेल से प्राप्त हुई है. मै इसे यथावत रख रहा हूँ. किसी को रचनाकार का नाम पता चले तो मुझे भी सूचित करने का कष्ट करें.
मैनें गुगल सर्च किया अपना टाईम खर्च किया और उपरोक्त चित्र पाया अपने ब्लाग पर लगाया प्रश्न पूछे महज दो ये कौन सा आसन कर रहे है? ये क्या सोच रहे है? लोगो ने सोचा अपना अपना बाल नोचा और जो जवाब आये वे चौकाने वाले थे योग की दुनिया में हलचल मचाने वाले थे
नीचे का चित्र ध्यान से देखें, और उस पर आधारित कतिपय बिलकुल आसान सवालों के जवाब दें 1. यह महाशय कौन सा आसन कर रहे हैं. 2. यह क्या सोच रहे हैं? सही/श्रेष्ठ जवाब मिलने पर 1 अप्रैल 2010 को शानदार समारोह में जवाबदाता को ऊपर प्रदर्शित शावक पुरस्कार