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हलफ़नामा

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14 Jun 2010
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दुबे जी का जागरण

प्रभात रंजनपिछली सर्दियों में अनायास दुबे जी से मुलाकात हुई । एक राष्ट्रीय अखबार में दुबे जी पत्रकार हैं और बड़े पद पर हैं । बड़े पद पर हैं इसलिए उन्हें बड़ा पत्रकार भी माना जाता है । खैर, तब मेरे लिए बेरोजगारी का दौर था और मैं एक पुराने दोस्त से मिलने
 
प्रभात रंजन
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पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ?

जैसा कि हम जानते हैं, हमारे देश में गृह-मंत्रालय भी है। मंत्रालय है तो मंत्री हैं। मंत्री काबिल हैं और कमाल के हैं लेकिन परेशान हैं । उनकी बात किसी के समझ में नहीं आती। आम आदमी तो खैर उनकी जबान क्या समझेगा, चिदंबरम भद्र राजनेताओं के भी पल्ले नहीं पड़ते।
 
प्रभात रंजन
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जलेबी का समाजवाद

मेरे जीवन में एक ऐसा वक्त आ गया हैजब खोने कोकुछ भी नहीं है मेरे पासदिन, दोस्ती, रवैयाराजनीतिगपशप, घासऔर स्त्री हालॉकि वह बैठी हुई हैमेरे पास... ( श्रीकांत वर्मा )...मैं भी कह सकता हूं यह बात । अव्वल तो कई चीजे कभी हासिल नहीं हुई। कुछ मिलने के बाद खो गईं
 
प्रभात रंजन
May 14 2010 05:56 PM
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शहर में गालिब की आबरू क्या है

गरीबी का अपना एक अलग सौन्दर्य होता है- ऐसा सुना है । आजकल देख रहा हूं । सौन्दर्य भी ऐसा कि कलेजा मुंह को आता है और हाथ हड़बड़ाहट में कलेजे तक जाता है। पूरा मोहल्ला उसे देखने की बाट जोहता रहता है। दिख जाए तो आफत ना दिखे तो आफत । बस यूं समझें कि कमबख्त दिल
 
प्रभात रंजन
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तुझमें कोई कमी नहीं पाते

फिराक गोरखपुरी की गजलबन्दगी से कभी नहीं मिलतीइस तरह ज़िन्दगी नहीं मिलतीलेने से ताज़ो-तख़्त मिलता हैमांगे से भीख भी नहीं मिलतीएक दुनिया है मेरी नज़रों मेंपर वो दुनिया अभी नहीं मिलतीजब तक ऊँची न हो जमीर की लौआँख को रौशनी नहीं मिलतीतुझमें कोई कमी नहीं
 
प्रभात रंजन
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उफ ये तेरी हठधर्मिता

आजकल विनोद जी को पढ़ रहा हूं । खिलेगा तो देखेंगे । मौजूदा दौर में अपनी भाषा की ताकत का एक उदाहरण राग दरबारी है।अरूण कमल जी की पंक्तियां याद आ रही है कि भाषा की सभी हड्डियां चटका के शुक्ल जी ने रागदरबारी की भाषा का ईजाद किया है । यकीनन रागदरबारी अपनी
 
प्रभात रंजन
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तेरा जाना दिल के अरमानो का लूट जाना

भैया जी की नियत खराब नहीं थी । बस बात इतनी है कि निशाने पर आ गए । राजनीति के शिवपालगंज में थरूर भैया की एंट्री रंगनाथ की तरह हुई । तौर तरीकों में विदेशी थरूर भैया देसी माहौल में खप पाते , इससे पहले ही खपा दिए गए । क्या करें, इतने कम दिनों में गंजहापन
 
प्रभात रंजन
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सानिया और संगीता

सानिया मिर्जा की शादी में देश और खासतौर पर मीडिया ने बड़ी रूचि दिखाई । रोने गाने वाले अपनी- अपनी कला की नुमाईश करते नजर आए। बहरहाल शादी हो गई और देश की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा । ऐसा लगता था कि सानिया की शादी के बाद देश पर भारी आपत्ति आने वाली है। देश
 
प्रभात रंजन
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नक्शे पे अब कुछ नज़र नही आता-बाढ़ है या कि बिहार है क्या है ?

भूतनाथ वाया राजीव थेपरा (िजसने जहां से देखा...मंजर उसे उदास कर गया। बस एक तकलीफ ही है जिसे हम बांट रहे है...आपस मेें... अपनों से । इस उदासी को भी आपसे बांट रहा हूं, राजीव जी से बगैर पूछे। और इस आशा के साथ कि दुख की ये रात भी आखिरकार ढ़ल जाएगी) कई दिन
 
प्रभात रंजन
Dec 29 2009 11:54 AM
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कौशल्या देवी(मां) को श्रद्धांजली

प्रभात रंजन कभी कभी सोचता हूं कि चन्द्रशेखर भाई जैसे लोग आखिर कैसे बनते हैं? सीवान जैसे शहर के एक दूर दराज गांव में पैदा होने वाला लड़का... कद-काठी समान्य...बाप- दादा की दी हुई कोई जागीर नहीं... लेकिन फिर भी ऐसा असाधारण व्यक्तित्व । अन्दर और बाहर दोन
 
प्रभात रंजन
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पतझड़ के बाद का दुख

सुनन्दा राय -इलाहाबाद से ये कविताएं सुनन्दा ने भेजी है... एक हल्के से संकोच के साथ । लिखा है - कच्चा पका सा कुछ लिखती हूं , जिसे मुमकिन है लोग, कविता की श्रेणी में ना रखे - लेकिन पूरी होने के बाद तो कविता स्वायत्त होती है जिस पर लिखने वाले का भी कोई
 
प्रभात रंजन
Dec 29 2009 11:54 AM
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मारे गए गुलफाम

प्रभात रंजन बात इतनी सी थी कि, दीवार गिरने से, एक बकरी मारी गई थी । राजा के इंसाफ का तकाजा था कि बकरी के जान के बदले में दोषी आदमी को फांसी दी जाए । लेकिन ये भी गजब हुआ कि भिश्ती से लेकर कोतवाल तक सभी बारी- बारी बेगुनाह साबित हुए । अब बेचारा राजा इंस
 
प्रभात रंजन
Dec 29 2009 11:54 AM
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जिसका गुन हरचरना गाता है....

मिथिलेश कुमार सिंह आइए...भारतीय राजनीति के मछली बाजार में...मैं आपका स्वागत करता हूं...हिचकिए मत...चले आइए...अगर आप शरीफ हैं...इस बाजार से आपका पहले वास्ता नहीं पड़ा है...तो नाक पर रूमाल रख लीजिए...सड़ांध है यहां...आप गश खाकर गिर सकते हैं...मुझे आदत
 
प्रभात रंजन
Dec 29 2009 11:54 AM
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तमाशा-ए -अहल-ए-करम देखते हैं

प्रभात रंजन कल की बात है । घर से अॉफिस के दरम्यान मेरे साथ एक हादसा हुआ । हादसा कुछ यूं नहीं कि सिर-पैर- हाथ टूट जाएं । हुआ कुछ यूं कि दिमाग कि नसें झनझना गईं। मैं बस में चलता हूं और दिल्ली की बसों में आए दिन किसी न किसी ऐसी चीज का सामना होता ही रहता
 
प्रभात रंजन
Dec 29 2009 11:54 AM
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एक ताज़ा खबर और लड़की

मिथिलेश कुमार सिंह (इस ब्लाॉग पर कविता को लेकर खासी चर्चा हो चुकी है ... और इसीलिए किसी भी कविता को यहां देने से पहले एक संशय लाजिमी था... फिर भी मिथिलेश की ये कविता एक बार पढ़े जाने की मांग करती है ... इसलिए इसे सरेआम करने को मजबुर हूं .... मिथिलेश
 
प्रभात रंजन
Dec 29 2009 11:54 AM
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दि थर्ड वर्ल्ड

गुलज़ार साहब की नज़्म (आज किताबों की धुल पोंछते हुए करीब एक दशक से ज्यादा पुरानी एक मैगजीन में गुलज़ार साहब की ये नज़्म मिल गई । तब नई थी और मौज़ूं भी... । पढ़ने में आज भी अच्छी लगी तो ले आया ) जिस बस्ती में आग लगी थी कल की रात उस बस्ती में मेरा कोई
 
प्रभात रंजन
Dec 29 2009 11:54 AM
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तब तो ओबामा हार जाएगें।

जैसे ही हिलेरी क्लिंटन की दावेदारी ख़त्म हुई वैसे ही कहा ये जाने लगा कि हिलेरी ओबामा का समर्थन करेगी। इसके बाद से ही हिलेरी के समर्थक असमंजस में हैं। अमेरिका में कई सर्वेक्षण इस तरफ इशारा कर रहे हैं कि हिलेरी को समर्थन देने वाले कई वर्ग ओबामा का समर्
 
Omprakash Das
Dec 29 2009 11:54 AM
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ख़बर ख़ास है...

प्रभात रंजन इतिहास को भले ही बदला नहीं जा सके , लेकिन आंखो में अगर शर्म हो तो अपनी कारगुजारियों के िलए माफी तो मांगी ही जा सकती है। ब्रिटिश इतिहासकार अॉिलवर बियारर्स को भारत पर ब्रिटिश जुल्म ने इस कदर आहत किया कि, उन्होने इसके लिए सरेआम माफी मांगने क
 
प्रभात रंजन
Dec 29 2009 11:54 AM
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जब तलक रिश्वत न ले हम दाल गल सकती नहीं, नाव तनख़्वाह की पानी में तो चल सकती नहीं।

आज से लगभग 60 साल पहले जोश मलीहाबादी का लिखा ये शेर उनके पहले भी लागू होता था और आज भी हर्फ-ब-हर्फ लागू होता है। ये सच्ची कहानी है कि एक बाप उस दिन बहुत खु़श हुआ। जब उसके दो बेटों में से छोटा बेटा सिविल इंजीनियर बना और टेबल के नीचे के कारोबार से कुछ
 
Omprakash Das
Dec 29 2009 11:54 AM
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जरा देखिए, रिल्के क्या कहते हैं कविता लिखने वालों के लिए

एक अच्छी कविता लिखने के लिए तुम्हें बहुत से नगर और नागरिक और वस्तुएं देखनी-जाननी चाहिए। बहुत से पशु और पक्षी ...पक्षियों के उड़ने का ढब, नन्हें फूलों के किसी कोरे प्रात: में खिलने की मुद्रा, अज्ञात प्रदेशों ...अनजानी सड़कों को पलटकर देखने का स्वाद। अप
Dec 29 2009 11:54 AM
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तेल की फिसलन !

ओमप्रकाश सब सांस रोके इंतज़ार कर रहे हैं कि पेट्रोल-डीज़ल के दाम आज बढ़े कि कल । बढ़ेगें तो ज़रुर। एक कमाल की बात है। एक तरफ सरकार और सरकारी तेल कंपनियां इस बात पर माथा खपा रही हैं कि बढ़ते पेट्रोलियम सब्सिडी से कैसे छुटकारा मिले। क्योंकि, चालू वित्त
 
Omprakash Das
Dec 29 2009 11:54 AM
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कविता मत लिख चिरकुट

अनामदास की कविता (अनामदास बित्ते भर के आदमी हैं। लेकिन इन्हें लघुमानव कतई नहीं कहा जा सकता । काम-धाम कुछ खास नहीं लेकिन शागिर्द लोग उस्ताद मानते हैं। वैसे तो मेरे अच्छे मित्र है लेकिन डंडा चलाने में पूरे समतावादी हैं। इसलिए मुझ पर भी नजरे इनायत हो गई
 
प्रभात रंजन
Dec 29 2009 11:54 AM
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बेतुका सर्वे हैं बापू, सुभाष और भगत की तुलना....

वैसे तो इस तरह के सर्वे बड़े ही बेतुके किस्म के होते हैं कि कौन बड़ा है और कौन छोटा, ठीक उसी तरह जैसे माता और पिता में तुलना करने कह दिया जाए। लेकिन अगर मेरी व्यक्तिगत राय मानें तो गांधी का योगदान व्यापक और ठोस था। गांधी के आलोचकों का कहना है कि गांध
Dec 29 2009 11:54 AM
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वाटर प्रुफ

शिखर कभी- कभी लगता है मेरी आँखे वाटर प्रुफ है तभी तो बाहर का पानी बाहर और भीतर की आर्द्रता हमेशा भीतर गलती सडती है..... सचमुच वाटरप्रुफ चीजो के अन्दर पानी ही नही धूप का भी निषेध होता है तभी तो भीतर की चीजे सूख नही पाती बल्कि सीलन समाते समाते भरभराने
 
प्रभात रंजन
Dec 29 2009 11:54 AM
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पायदान पर पिता

प्रभात रंजन ( संदर्भ -- हुआ यूं कि कुछ दिन पहले अनायास इंडिया टूडे के विशेषांक पर नजर पड़ गई । इसमें 60 महानतम भारतीयों का चयन है... (मापदंड का जिक्र नहीं )। इसमें दस लोगों की एक और सूची है जो इंटरनेट और दूसरे तरीकों से जनता की राय लेकर बनाई गई है ।
 
प्रभात रंजन
Dec 29 2009 11:54 AM
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अब क्या करेगी सरकार ?

ओमप्रकाश मुहावरा मुंह चिढ़ाने का सही उदाहरण शायद इससे बेहतर कोई नहीं हो सकता। महंगाई का आंकड़ा जैसे-जैसे ऊपर जा रहा है वैसे-वैसे हमारे महान अर्थशास्त्री चिदंबरम साहब और प्रधानमंत्री महोदय की फ़जीहत भी नए रिकॉर्ड बना रही है। आज मुद्रास्फीति 7.83 फीसदी
 
Omprakash Das
Dec 29 2009 11:54 AM
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तेरी याद में

गोपी कृष्ण सहाय चले गए तब ज्ञात हुआ , अपना खोना क्या होता है ! याद में तेरे साथी मेरे , घर आंगन भी रोता है !! वही आंगन ढ़ूढते थे तुम , मै कहीँ छुप जाता था कई सवाल पूछोगे ये , सोच नजर चुराता था !! बड़े जटिल लगते थे , प्रश्न तेरे सीधे सादे !लौट के ना आ
 
प्रभात रंजन
Dec 29 2009 11:54 AM
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जीवन मृत्यु

आज मै चुपचाप बैठी सोच रही थी अपने ही भावो मे कितनी उल झ रही थी कि जिन्दगी और मौत कितनी करीब है एक संसार मे लाती है तो दुसरी ले जाती है लेकिन शमशान घाट पर ही जाकर वैराग्य क्यो जागते .है और मृत्यु पर ही सारे सगे सम्बन्धी , बिलख बिलख कर रोते क्यो है शाय
Dec 29 2009 11:54 AM
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मासूम बुश और मुटाते हम

ओमप्रकाश हम फिल्मों में काफी पहले से देखते आ रहे हैं कि जुड़वा भाईयों के बीच इतना प्यार होता है कि एक को मारे तो दूसरे को लगे। ऐसा ही कुछ रिश्ता हमारा अमेरिका के साथ हो गया है। खाएं हम पेट दरद हो उनका। अरे, अब ये दरद नहीं है तो और क्या है। बुश साहब क
 
Omprakash Das
Dec 29 2009 11:54 AM
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मल्ल युद्ध

मनोज भाई को बतकही के दौरान सुनना एक शानदार अनुभव है लेकिन पढ़ना तो बस कमाल है । तलवार की नोक से गुदगुदाने की कला जानते है, बशर्ते सुनने वाला लापरवाह न हो। मनोज मेहता आजकल इंडिया न्यूज में विशेष संवाददाता हैं। अपने संकलन से एक कविता हलफ़नामा के तौर पर
 
प्रभात रंजन
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ईश्वर इन्हे माफ मत करना

प्रभात रंजन...क्योंकि ये अच्छी तरह जानते हैं कि इन्होने क्या गुनाह किया है।सैकड़ो-हजारों बार सुने हुए से अल्फाज...मीडिया और मीडिया के नाम पर थोथे,बेकार से शब्द...बाजार उपभोक्तावाद न्यूज रूम की मजबूरियां...हाय री सिर होने की दुश्वारियां...हाय री
 
प्रभात रंजन
Aug 07 2009 03:36 AM
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गांव लौट जाना चाहता हूं

मित्रों को मजाक लगता है.कुछ ज्यादा संवेदनशील मित्र इसे काम का दबाव मानते हैं.कुछ ऐसे भी हैं जो इसे बकवास करार देंगे.दरअसल मेरी ख्वाहिश ही कुछ ऐसी है जिसे लोगबाग गंभीरता से नहीं लेते.मैं वाकई गांव वापस लौट जाना चाहता हूं.इसके पीछे कोई ठोस वजह नहीं है.
 
प्रभात रंजन
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मुद्दाविहीन चुनाव, लहर और जनसरोकार

अभी एक टेलिविजन डेवेट देख रहा था जिसमें राजदीप, आशुतोष. योगेंद्र यादव और श्रवण गर्ग भाग ले रहे थे। जाहिरन मुद्दा लोकसभा चुनाव ही था और बात घूमफिर वहीं आ अटकी थी कि चुनाव के बाद क्या होनेवाला है। एक बिन्दु पर लगभग सभी सहमत थे कि ये चुनाव मुद्दाविहीन च