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जाते-जाते...

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16 Jun 2010
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ऐसा था फैसले का दिन

भोपाल गैस त्रासदी में निचली अदालत का फैसला आ चुका है। फैसले से सभी लोग खफा होंगे और गुस्से में भी। लेकिन मैं यहां न तो हमारी सुस्त न्याय प्रणाली पर कोई बात दोहराना चाहता हूं और न ही एंडरसन के करोड़ों-अरबों के वारे न्यारे का जिक्र करना चाहता हूं। मैं तो
Jun 16 2010 03:21 PM
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एक तलाश: तुझमें अपनी

सफर शुरू होने सेमंज़िल पर पहुंचने तकखुद को अकेला ही पाता हूंबीच राहों मेंअकेले चलते, तन्हा भटकतेतेरे निशां पाता हूंजाने क्यूं मैं सदाअपने अस्तित्व कोतुझमें तलाशता हूंजाने क्यूं तुझमेंअपना ही अक्समैं अक्सर ढूंढा करता हूंपाता भी हूंहां ! पाता भी हूंखुद
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जाते-जाते...

दो लफ़्ज़...तुम्हारे वो दो लफ़्ज़…समा गए हैंइस दिल में,इस दिल की धड़कनों मेंगूंजते हैं कानों मेंतुम्हारे वो दो लफ़्ज़...तन्हा खोती ज़िन्दगी मेंनए जीवन की तलाश हैंहमसफर हैंइस नए सफर मेंतुम्हारे वो दो लफ़्ज़...कब से तमन्ना थीतुम्हारे होठों कोछूकर निकलेंचंद
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राजस्थान पत्रिका के एक लेख पर प्रतिक्रिया स्वरूप

आरक्षण के विकल्प : कितने सही कितने ग़लत विनय भार्गव का लेख ‘आरक्षण के विकल्प और भी’ पढ़ा। इसमें लेखक ने आरक्षण के कुछ विकल्प सुझाए हैं। लेकिन साथ ही लेखक ने अपनी कुछ चिंताएं भी जाहिर की हैं। उनकी इस चिंता पर चिंता होती है कि वह इतनी व्यर्थ चिंता क्यों कर
Mar 20 2010 11:25 AM
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चक्र सुदर्शन डोल रहा...करता नए प्रयोग...

जब कवियों का गान हो, सुधी श्रोताओं का मान हो और अपने गणतंत्र का गान हो तो माहौल देखते ही बनता है। रातों को सूनी हो जाने वाली लाल किले की दीवारें तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठती हैं। रात का सन्नाटा हंसी की फुहारों से गुलज़ार हो जाता है। लाल किले में
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भद्र लोक का अस्त और सूना पोलित बयूरो

इंसान जब संघर्ष करते हुए विजय हासिल करता है तो उसके हौंसले बुलंद होते हैं। लगातार 23 साल तक पश्चिम बंागाल के मुख्यमंत्री रहने वाले ज्योति बसु संघर्ष की ज़मीन पर सफलता की इमारत गढ़ने वाले एक जुझारू नेता थे। ऊंचे कुल में जन्मे बसु 1935 में बैरिस्टरी की
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वो चला गया...

वो जो प्रधानमंत्री न बन सकावो जो कम्यूनिस्ट था भी और नहीं भीवो जो सज्जनता की मिसाल थावो जो संघर्ष की मिसाल थावो जो पार्टी का असली काडर थावो जो त्याग की प्रतिमूर्ति थावो जो पार्टी का फैसला सर्वोच्च मानता थावो जो राजनीति का अमूल्य निधि थावो जो राजनीति की
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बाज़ारू होता मीडिया और बदलती भाषा

हर समाज की अपनी एक भाषा होती है। उस समाज का मीडिया या जनसंचार के माध्यम लोगों तक सूचनाएं पहुंचाने के लिए उसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं। हर समाज उत्तरोत्तर विकास करता है। समाज के विकास के साथ साथ उसकी भाषा का भी विकास होता रहा है। इस भाषाई विकास को लेकर
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यूपीए के सौ दिन

पिछले महीने की 29 तारीख को यूपीए सरकार के सौ दिन पूरे हो गए। अपनी दूसरी पारी की शुरूआत में इस सरकार ने सौ सूत्री कार्यक्रम की घोषणा की थी। इसकी रूपरेखा संसद में 5 जून के राष्ट्रपति के अभिभाषण में ही तैयार हो गई थी। एक बारगी उस वक्त लगा था कि जो काम य
Dec 29 2009 11:57 AM
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कहने को मैं जिए जा रहा हूं

कहने को मैं जिए जा रहा हूं हर घड़ी आंसूं पिए जा रहा हूं नहीं हर तरफ सन्नाटा मेरे फिर भी ख़ामोशी से कहे जा रहा हूं खुद ही जो कहते थे वो मेरी अनकही बातें तलाश में उनकी मैं पागल हुए जा रहा हूं हैं तैर कर चले गए वो दूर कहीं शायद मैं दरिया में मोहब्बत के
Dec 29 2009 11:57 AM
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पल पल में मेरी मौतें बहुत हैं...

करने को तुमसे बातें बहुत हैं मगर बांध देते हैं जो मुझे ऐसे कम्बख़त दायरे बहुत हैं हर लहज़े में मेरे तुम ही तुम हो इन आंखों में तुम्हारे सपने बहुत हैं एक दूजे में हम समा जाएँ मगर जुदाई में जो कटनी हैं वो रातें बहुत हैं होनी हैं तुमसे जो छुप छुप कर चंद
Dec 29 2009 11:57 AM
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दो दिल कुछ कह रहे हैं...सुनिए तो!

ओबामा – कौन कहता है कि हम देखते हैं...हम तो उनकी इक अदा पर आह भरते हैं... सार्कोजी – तुमसे बढ़ कर दुनिया में ना देखा कोई और... ओबामा – लंदन देखा, पैरिस देखा और देखा जापान... सारे जग में कोई नहीं है तुझ सा मेरी जान... सार्कोजी – तुम आ गए हो...नूर आ गय
Dec 29 2009 11:57 AM
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वो बूढ़ी औरत...

पिछले दिनों एक साक्षात्कार के सिलसिले में लोकसभा जाना हुआ। इसकी आरंभ सीमा के पास ही एक बूढ़ी औरत बैठी रो रही थी। मैनें उनसे पूछा क्या हुआ मां जी, मगर कुछ कहने के बजाय उनकी सिसकियां और बढ़ गई। मैंने फिर उनसे कहा कि देखिए मैं आपके बेटे के समान हूं। कुछ
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अब तो आओ बरखा रानी...

गर्मी से निकलती आह दिल में बरसात की चाह हर दिन एक आस कि अब घिरें काली घटाएं अपनी ठंडी बूंदों से समस्त भूतल को भिगो जाएं घनघोर घटा कुछ ऐसी छाए बूढ़े, बच्चों और जवानों को भी रिमझिम बारिश राहत दे जाए किसानों की दुआओं में भी है सिर्फ आजकल पानी मानसून में
Dec 29 2009 11:57 AM
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...दिल करता है

कुछ कहने को दिल करता है बातें करने को दिल करता है दिल की बात कब तक रखें दिल में प्यार जताने को दिल करता है तुम न मानो मर्ज़ी तुम्हारी तुम्हारा ही ख्याल दिल में आता है कुछ कहने को दिल करता है... रात हो, दिन हो, हो सुबह या शाम हर घड़ी तुम्हे सोचने को दि
Dec 29 2009 11:57 AM
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जाते जाते...

हमने उन्हें रोका तो बहुत जाते-जाते... वो रुके तो नहीं, मगर अपनी याद छोड़ गए जाते जाते... हाथों में हाथ लिए... आंखों से ही ढेरों बातें करते... बातों में होती थी नोंक झोंक भी, फिर भी सदा मुस्कुराते रहते... उनका मुड़ मुड़ कर देखना जाते जाते... याद आता ह
Dec 29 2009 11:57 AM
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अख़बारों को क्या हो गया है...

नवंबर को गन्ना किसानों ने सड़क से संसद तक अपना रोष ज़ाहिर किया। वे दिल्ली पहुंचे क्योंकि हमारी सरकार को ऊंचा सुनने की बीमारी हो गई है। उनका मकसद केवल सरकार के कानों में अपनी बात को डालना था। वे डालकर गए भी, लेकिन अगले दिन अखबारों ने बड़ा चौंकाने वाला
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नहीं रहे कागद मसि के मसीहा !

अपनी कलम का जादू बिखेरने की तैयारी में लगे प्रभाष जोशी की आंखे जैसे सचिन के बल्ले से निकले एक-एक शॉट को जेहन में उतार लेना चाहती थी। हैदराबाद में सचिन जब अपने पुराने अंदाज़ में खेलते नज़र आ रहे थे तो पत्रकारिता के उस शीर्ष के हर पाठक को शायद सुबह का
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प्यार में ऐसा होता है...

रग़ रग़ में प्यार भर जाता है और जीवन संवर जाता है प्यार करो तो जानो यारों प्यार में ऐसा होता है... प्यार मिले जब प्यार से अपने प्यार में महके तन मन सारा देखो अपने दिल को देखो दिल खोया खोया रहता है प्यार करो तो जानो यारों प्यार में ऐसा होता है... फुलव
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एक दुनिया ये भी

दुनिया से परे भी एक दुनिया है ऐसी बहुत सुनी-बहुत देखी, फिर भी है अनदेखी सी सोचो तो है आम ये दुनिया, लेकिन है कुछ खास वो दुनिया सोचो तो बेगानी सी और सोचो तो है अपनी सी बचपन बढता इसके सहारे, फिर इसमें जवानी ढलती है बुढ़ापे में भी साथ निभाए, कुदरत की ये
Oct 14 2009 07:57 PM
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क्या आपको हिंदी बोलने पर गर्व होता है?

इन दिनों विभिन्न संस्थानों में हिंदी पखवाड़ा मनाया जा रहा है या कुछ में मना लिया गया है। एक तो हिंदुस्तान में हिंदी की यह हालत हो गई है कि यहां इसी के लिए पखवाड़े मनाए जाने लगे हैं। दूसरा इन पखवाड़ों में एक दिन हिंदी की (दुर्) दशा पर गोष्ठी का आयोजन कर
Sep 25 2009 06:49 PM
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पुस्तक मेला या बाज़ार

अगस्त के महीने की आखिरी तारीख थी। पिछली रात हुई बूंदाबांदी से उमस हो गई थी। पसीने में तर बतर प्रगति मैदान पहुंचा। टिकट के लिए लगी लंबी लाइन को देखकर एकबारगी थोड़ा परेशान हुआ लेकिन अगले ही पल थोड़ी तसल्ली भी हुई। यह किसी सिनेमा की टिकट खिड़की नहीं थी
Sep 16 2009 07:32 PM
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मेरे हमदम

मिल नहीं सकते कभी नदिया के दो तीरलहरों को है मोहब्बतसाहिल से बहुतमगर रह जाता है साहिल परउनके आंसुओं का नीरडूबते सूरज की भीजाने क्या है आरज़ूआभास देता है समंदर से मिलन कामगर अगले दिनफिर वही जुस्तज़ूउषा और निशा को भी हैतड़प बस मिलन कीएक आती भी है तो साथ
Sep 16 2009 07:22 PM
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बोल के लब आज़ाद हैं तेरे...

आवहुं सब मिलिकै रोवहुं भारत भाईहा हा भारत दुर्दशा देखी न जाई। भरतेन्दु हरिशचन्द्र की ये पंक्तियां उस समय भारत की दुर्दशा पर विलाप थी। यदि आज इन पंक्तियों को एडिट कर मीडिया दुर्दशा लिख दिया जाए तो ग़लत नहीं होगा। इन आम चुनावों में मीडिया द्वारा किये गये
Aug 05 2009 05:18 PM
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राग मल्हार...

आज सुबह से ही मौसम कुछ खुशगवार लग रहा था। भगवान भास्कर बादलों की ओट ले ले कर आंख मिचौली खेल रहे थे। ठंडी हवा तन मन को शीतल किए जा रही थी। सावन लगने के बाद यह पहली सुबह थी जो सावन की सी लग रही थी। सावन हमारे कवियों, फिल्मकारों, और संगीतकारों के लिए बड
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मंगलम् भगवान विष्णु मंगलम्...

मंगलम् भगवान विष्णु मंगलम् गरुड़ध्वज, मंगलम् पुंडरीकाक्षं मंगलाय तनो हरि’...यह मंत्र है सृष्टि के पालनहार भगवार विष्णु का जिसमें उनके रूप का बखान करते हुए उनसे मंगल कामना की गई है। मगर ‘कम्बख्त इश्क’ में जिस तरह से इसे फ़िल्माया गया है उससे लगता है क