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India i.e. Bharat which is not Hindustaan

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16 May 2010
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जाने क्या वो लिख चले.....................(बवाल)

जाने क्या वो लिख चले और, जाने क्या ये पढ़ चले ...?हम-क़लम के हर्फ़े-आख़िर, दिल में पुरदम गड़ चले............--- बवालहम-क़लम  = एक जैसा और एक साथ लिखने वाले, मित्र (...., ....., .....)हर्फ़े-आख़िर = अटल और अंतिम निर्णय, शब्द या बात
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किसिम किसिम की गुलाल................................

किसिम-किसिम की गुलाल लेकर,  हम उड़ चले थे उन्हें लगाने  !मगर वहाँ से वो उड़ चले थे, तमाम रंगत को ही मिटाने !!तभी  यकायक से मौसमे-गुल, ने हक़ में अपने जो दी गवाही !तो हैरत-अँगेज़ रँगे-जन्नत, लगे हमारी ग़ज़ल सजाने !!आप
Feb 28 2010 11:10 PM
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माटी की गागरिया................(बवाल)

दुपहरिया बीत चली,पनघट पर रीत चली !पनिहारिन फिर लौटी,भर रस की सागरिया ! माटी की गागरिया !!--- पद्मश्री पं. भवानी प्रसाद तिवारी !!  हमारे उस्ताद लुक़्मान जी के भी उस्ताद और संस्कारधानी के प्रथम महापौर पद्मश्री पं. भवानी प्रसाद तिवारी की पुण्य जयंती १२
Feb 12 2010 05:32 PM
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मैं जनाज़ा हो चला.............................(बवाल)

दोस्त तेरी महफ़िलों से, जी मेरा,   ले भर गयामैं जनाज़ा हो चला, ऐलान कर दे,   मर गयाकाश, दिल के दर्द को, पहले बता देता कभी !आज तेरे सामने, ज़िंदा न होता मैं अभी ?? 
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चचा लुक़्मान ज़िंदाबाद : बवाल का सलाम

कुछ ऐसी तसव्वुर की, महफ़िल सजाएँजहाँ हों वहीं से, उन्हें खैंच लाएँ क़व्वाले-आज़म तहज़ीबिस्तानचचा लुक़्मानहमारे उस्ताद की जयंती१४ जनवरी १९२५ (मकर संक्राति) परउन्हें ‍शत् शत् नमन(महाप्रयाण :- २७ जुलाई २००२)पद्मश्री पंडित भवानी प्रसाद तिवारी जी की
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अलसेट में हो गया लेट : नतीजा बवाल की रीमिक्स पहेली २००९ का

आदरणीय एवं प्रिय आत्मीयजनों, साल २००९ की और बवाल की अब तक की इकलौती “रीमिक्स" पहेली के नतीजे की घोषणा करते हुए हमें अत्यंत हर्ष हो रहा है। हालाँकि यह अपने निर्धारित समय से कई दिन बाद हो पा रही है क्योंकि इसके आयोजक पिछले दिनों ज़रा अलसेट में पड़े हुए थे,
 
लाल और बवाल (जुगलबन्दी)
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साल २००९ की "रीमिक्स" पहेली : आयोजक बवाल

ये पहेली - वो पहेली, फ़लाँ पहेली - ढिकाँ पहेली, यहाँ पहेली - वहाँ पहेली, आऊ पहेली - म्याऊँ पहेली - उबाऊ पहेली, उड़न पहेली - गिरन पहेली, पूछ पहेली - ताछ पहेली, राज़ पहेली -  फ़ाश पहेली,  इफ़ पहेली - बट पहेली, पहेली - पहेली, अहेली - अहेली, हेली हे
Dec 30 2009 12:16 PM
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महकीं हैं ये फ़िज़ाएँ........

हरदिल-अज़ीज़ प्रभु यीशु के पावन अवतरण पर उनकी शान में--- अब तक सलीब पर तो, मिलती रही सज़ाएँ ! पर अब सलीब से ही, महकीं हैं ये फ़िज़ाएँ !! ---बवाल सलीब = सूली भावार्थ :- जब तक यीशु सूली पर नहीं चढ़े थे तब तक तो सूली (क्रॉस) , पर क्रूरता पूर्वक सज़ाएँ दी जाती
Dec 29 2009 11:43 AM
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मिसरा-ए-ऊला .... मिसरा-ए-सानी (नव-वर्ष पर :- बवाल)

ब्लॉगिस्ताँ के सभी अहबाबों और अजीजों को नव-वर्ष की बहुत बहुत शुभकामनाएँ और बधाइयाँ --- हमारी नज़र में, ये दुनिया-ए-फ़ानी है मिसरा-ए-ऊला, है मिसरा-ए-सानी ---बवाल भावार्थ :- ये नश्वर संसार ज़रूर है, पर नष्ट होता नहीं। यही बीता वर्ष (मिसरा-ए-ऊला) भी है और
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मुहम्मद रॉबर्ट सिंह दुबे .............(बवाल)

आलाप:- जो अल्लाह से आग़ाज़ करे, और गणपति से भी शुरू करे ! उसका हर काम सफल साईं, प्रभु यीशू वाहे गुरू करे !! नफ़रत की रातों को बना दे, मुहब्बत की सुबे (सुबह) ऐसा एक इंसान है ये, मुहम्मद रॉबर्ट सिंह दुबे कोरस :- हर हर महादेव, अल्लाहो-अकबर, जो बोले सो निहा
Nov 22 2009 11:07 PM
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तुहमत वो हम पर...............(बवाल)

आपकी तारीफ़ में, जो हम क़सीदे पढ़ चले तालियों के सिलसिले, तड़ तड़ तड़ा-तड़ तड़ चले उल्फ़तों की राह में, जो हम ज़रा सा बढ़ चले बस, ज़माने भर की नज़रों में, सरासर गड़ चले हम परिन्दे थे, ज़माना बेरहम सैयाद था क़ैद में भी पर हमारे, फड़ फड़ा-फड़ फड़ चले वो झलक थी आपकी, जिस प
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मेरे सपनों का एग्रिगेटर (बवाल)

हाय, ये भी कोई बात है मैथिली जी, कि दुनिया भर को अपनी बात कहने का मंच देने वाले होकर भी विजय पर्व पर हार मान बैठे। वो भी इसीलिए माननी पड़ी कि आपकी ब्लॉगवाणी ब्लॉग मंच से हटकर एक युद्ध क मैदान बन पड़ी थी। आज सबसे अधिक पसंद प्राप्त, आज सबसे ज्यादा पढ़े गए
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दिल में .............(बवाल)

वाह, क्या दीवान तेरा, नूर सा फबता हुआ !जिसमें ख़ुद को पा रहा हूँ, तुझसे मैं कटता हुआ !!ख़ैर दिल की बात दिल तक ही, रखूंगा यार अब !और कर भी क्या सकूंगा, मोहरा हूँ पिटता हुआ !!--- बवाल
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सबब ................(बवाल)

मैं सब्रो-रंगे-सुकून में हूँ , मुझे संभालो मेरे सहारों सबब है इस इल्तिजा के पीछे, के चल बसा हूँ ओ मेरे यारों ---बवाल
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आज महफ़िल में कोई

कभी कभी ये जो आप सबका प्रिय ‘ बवाल ’ है ना, इसे हमें ‘रय दुष्ट ’ कहने का मन किया करता है. पता है क्यों ? इसका मूडे-मंज़र अजीब ही होता है. ये शायर-वायर टाइप के लोग ऐसे ही होते हैं क्या ? अब देखिए ना. एक ज़माने में गुरूजी पंकज सुबीर साहब ने, इस साल होली
Jul 13 2009 08:19 AM
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ख़ुद ही पड़ा ........................(बवाल)

क़ातिल अदा का तेरा, क्या ख़ूब था निभाना ! मैं फ़ौत हूँ ये मुझको, ख़ुद ही पड़ा बताना !! ---बवाल फ़ौत = मृत
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अपनी हदों को वापस........ (बवाल)

आलम को ज़द में लेकर, फिर मैं सम्भल पड़ा हूँ ! अपनी हदों को वापस, फिर मैं निकल पड़ा हूँ !! --- बवाल आलम = दुनिया ज़द = रेंज आदरणीय समीर लाल (उड़न तश्तरी) की मशहूर किताब "बिखरे मोती" के अंतरिम विमोचन के ज़माने से ही हम गायब पाए जाते रहे हैं। शिकायत भी लोगों
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अलग रही है.............(बवाल)

जो बख़्ते-खुफ़्त: सी लग रही है, वो रफ़्त : रफ़्त: सुलग रही है ! मेरी कहानी ज़माने वालों, अज़ल से ही कुछ अलग रही है !! ---बवाल बख़्ते-खुफ़्त: = सोया हुआ भाग्य रफ़्त: रफ़्त: = आहिस्ता आहिस्ता अज़ल = अनादिकाल
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आता है रफ़्त: रफ़्त: ......................(बवाल)

मकीं जो होते हैं आ के दिल में, उन्हीं से होता है दिल-शिकस्त: ये वो हक़ीक़त है जिसपे सबको, यक़ीन आता है रफ़्त: रफ़्त: मकीं = रहने वाले , शिकस्त: = टूटता
Mar 31 2009 11:27 AM
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वो खू़न बाक़ी बचा कहाँ अब ? ............(बवाल)

वो ख़ून बाक़ी बचा कहाँ अब ? जो इन रगों में बहा किया था हमीं ने शायद बफ़ज़्ले-साक़ी, बवाल इनमें रवाँ दिया था ---बवाल बफ़ज़्ले-साक़ी = पिलाने वाले की मेहरबानी से बवाल = यहाँ शराब के लिए इस्तेमाल किया गया रवाँ = प्रवाहित करना
Mar 23 2009 12:09 AM
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आज सबके रंग ही उड़ जाएंगे........(लाल-और-बवाल .. जुगलबंदी)

हमें, याने मुझे और बवाल को पूरा होश है कि यह कोई वक्त नहीं ब्लॉगपोस्ट करने का। जिस वक्त सब होली के रंग में डूबे हों, भांग की पिनक में अजूबे हों और उस वक्त आप लट्ठ लेकर खड़े हो जायें कि हम लिखे हैं, पढ़ो, कितनी ग़लत बात कई लोग नहीं समझते, आप देख ही रहे
 
लाल और बवाल (जुगलबन्दी)
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Mar 11 2009 06:34 AM
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तामीले-हुक्म (मुकुलजी, समीरलालजी, सीमा गुप्ताजी, और ताऊजी का) ---बवाल

आज जब हम प्रिय भाई "मुकुल" के ब्ला॓ग पर गए, तो ख़ुद के लिए एक प्यारे से हुक्म को सैर करते पाया। "बवाल भाई इसे पूरा करें"। हम घबराए के हमसे क्या अधूरा रह गया जी ? जब नीचे लिखी ये चतुश्पदियाँ देखीं तो माजरा समझ आया। और उस पर टिप्पणियों में आदरणीय समीरला
Feb 20 2009 06:14 PM
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पुरवाई में ??.............(बवाल)

नाम उनका पुकारा गया बज़्म में, थे जो मसरूफ़ अपनी ही तन्हाई में ! लोग ठिठके, ठहर सोचने ये लगे ! किसने तूफ़ाँ को छेड़ा है पुरवाई में ??
Feb 19 2009 08:43 AM
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लिखा जो ख़त तुझे.......................(बवाल)

ब्ला॓गिस्ताँ के प्रियजनों, निम्नलिखित प्रेम-पत्र, हमने अपनी गर्लफ़्रैण्ड को १४ फ़रवरी सन १९८८ को लिखा था। आप भी मुलाहिजा फ़रमाइए, हँसियेगा कतई नहीं--- प्रिय ............, तुम्हें इतना सारा प्यार के जितना ...... राम को सीता से, कृष्ण को राधा से, जहाँगीर
Feb 14 2009 12:34 AM
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ऐसी क्या बात है ? ...... नीरज

बाद मेरे हैं यहाँ और भी गाने वाले स्वर की थपकी से पहाड़ों को सुलाने वाले । उजाड़ बाग़ बियाबान औ सुनसानों में छंद की गंध से फूलों को खिलाने वाले ॥ इनके पाँवों के फफोले न कहीं फूट पड़ें इनकी राहों से ज़रा शूल हटा लूँ तो चलूँ ऐसी क्या बात है चलता हूँ अभी चलत
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जोल्ट फ़्रा॓म जबलपुर ...........!! नर्मदे हर !!

और तो कुछ न हुआ, पी के बहक जाने से बात मयख़ाने की, बाहर गई मयख़ाने से शाइर ने यह शेर कहते वक्त कभी भी यह न सोचा होगा के ये इतना अधिक प्रासंगिक बन जाएगा के हर जगह फ़िट बैठेगा। हा हा ! पिछले तीन चार दिनों की ज़ोरदार आल्हा-ऊदली बड़ी ही मज़ेदार रही। क्या कहना
Feb 05 2009 09:28 AM
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क्यूँ है..........? (लाल-और-बवाल)

वही हमारे वही तुम्हारे, तो फिर मचा ये बवाल क्यूँ है ? मेरे शहर की बुलंदियों की, ये हद से गिरती मिसाल क्यूँ है ?
 
लाल और बवाल (जुगलबन्दी)
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गणतंत्र दिवस पर शर्मिंदगी......... (लाल-एन-बवाल)

सना करें औ सलामियाँ हों , है सद्र शर्मिंदगी कहीं कुछ ? फ़तह का सामाँ दिखा रहे हों, के टाटे-पैबंदगी सभी कुछ !! --- समीर 'लाल 'और 'बवाल शब्दार्थ :- सना = स्तुति, वन्दना, प्रशंसा सलामियाँ = गणतंत्र दिवस पर होने वाली परेड सद्र = राष्ट्रपति और तमाम सियासतद
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फ़ुरसतों में .............. (बवाल)

ज़रा सा इनकी तरफ़ तो देखो, हैं दोनों आलम सँभाल रक्खे औ’ तुमने पहली ही फ़ुरसतों में, उबल-उबल कर बवाल रक्खे ---बवाल निहित शब्दार्थ :- दोनों आलम = चल (मूक श्वान) - अचल (शिला), तुमने = मानव ने, उबल उबल = असंतुलित वाणी
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लुक़्मान को दिखाना ..... (लाल-एन-बवाल)

क़व्वाले-आज़म तहज़ीबिस्तान चचा लुक़्मान हमारे उस्ताद की जयंती १४ जनवरी १९२५ (मकर संक्राति) पर न ग़ज़ल है न गीत है प्यारे आपसी बातचीत है प्यारे उस्ताद कहाँ और क्यूँ चाहिए ? ये बतलाने के लिए दो शेर पेश हैं --- साक़ी-ए-गुलबदन का, अन्दाज़ क़ाफ़िराना उल्फ़त का भी जत
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सोचेगा क्या ? ? ? --- बवाल

हौवा का मेरे आगे, क्या ख़ूब था बहाना ! आदम हो तुम क्या जानो ? सोचेगा क्या ज़माना !! ---बवाल
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क्या फिर किसी केशव का इंतज़ार है ???

आज अगर हम आशा करें कि कोई कृष्ण फिर अवतार लेगा और किसी अर्जुन का मार्गदर्शन कर विजय का मार्ग प्रशस्त करेगा तो शायद अतिशयोक्ति ही कहलायेगी. आज के हमारे रहनुमा तो स्वयं अर्जुन टाईप हैं, कहो न कहो वो कृष्ण जी को ही अपने हिसाब का संदेश दिलवाने के लिए उन्
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इंडिया देट इज़ भारत विच इस नॉट हिन्दुस्तान

कुछ दिन पहले समीरलाल जी के बारे में एक पोस्ट पर श्री संजय बेंगाणी जी ने टिप्पणी देते हुए पूछा था के लाल-एन-बवाल के उपरोक्त शीर्षक का अर्थ समझाया जावे । दरअस्ल हम इसी इंतज़ार में थे के कोई तो हो जो इस बात को पकड़ ले और संजय जी ने आख़िर वो काम कर दिया ।