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मेरे बोलों को तुम अपनी रवानी दे दो !!!

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03 Apr 2010
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सारे जहां से अच्छा

सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा,हम बुलबुलें हैं इसकी ये गुलगुला हमारा।बुड्ढे कुंवारियों से नैना लड़ा रहे हैं,मकबूल माधुरी की पेंटिंग बना रहे हैं,ऊपर उगी सफेदी भीतर दबा अंगारा,सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।सत्ता के सिंह बकरी की घास खा रहे
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पथ की पहचान

पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।पुस्तकों में है नही छापी गई इसकी कहानीहाल इसका ज्ञात होता है न औरों की ज़बानीअनगिनत राही गए इस राह से उनका पता क्यापर गए कुछ लोग इस पर छोड पैरौं की निशानीयह निशानी मूक होकर भी बहुत कुछ बोलती हैखोल इसका अर्थ पंथी पंथ
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प्यारे कृष्ण कन्हैया

कलयुग में अब ना आना रे प्यारे कृष्ण कन्हैयातुम बलदाऊ के भाई यहाँ हैं दाउद के भैया।।दूध दही की जगह पेप्सी, लिम्का कोकाकोलाचक्र सुदर्शन छोड़ के हाथों में लेना हथगोलाकाली नाग नचैया। कलयुग में अब. . .।।गोबर को धन कहने वाले गोबर्धन क्या जानेंरास रचाते पुलिस
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हमको अपनी मौहब्बत बना लीजिए

हमको अपनी मौहब्बत बना लीजिएमैं मुसाफ़िर हूँ एक भटका हुआअपने दिल में हमें अब पनाह दीजिएमैं करूँगा सदा आपका शुक्रियाअपनी पलकों में हमको बसा लीजिएहमको अपनी मौहब्बत बना लीजिए..इश्क़ में आपके हम तो पागल हुएअब ज़माने से हमको शिकायत नहींदेखने की अदा आपकी इस
Feb 16 2010 03:22 PM
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मेरे बोलों को तुम अपनी रवानी दे दो !!!

होने दो सागर का मंथन विष निकलेगा- यह भय क्यों हो क्यों हो क्रंदन- पाना तुमको यदि अमृत है मंथन तो करना ही होगा छोड़ रहे क्यों मध्य मार्ग में यात्रा को पूरा करना है थकित रहे तन तो क्या डर है मन तो थका नहीं करता है उठो करो तुम शक़्ति प्रदर्शन होने दो सा
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थोड़ा और मिल जाता तो...

यह pashchima के किसी देश की बात है, जहाँ रोटियों की जगह आमतौर पर ब्रेड खाई जाती है। वहां एक व्यक़्ति रोज़ रेस्तरां जाता और ब्रेड के साथ सूप का ऑर्डर देता। रेस्तरां का मेनु तय था। वे लोग एक कटोरी सूप के साथ ब्रेड की चार स्लाइस देते थे। एक दिन मैनेजर ग्र
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वक़्त नहीं

हर खुशी है लोगों के दामन में, पर एक हँसी के लिये वक़्त नहीं, दिन रात दौड़ती दुनिया में, जिन्दगी के लिये ही वक़्त नहीं, माँ की लोरी का एहसास तो है, पर माँ को माँ कहने का वक़्त नहीं, सारे रिश्तों को तो हम मार चुके, अब उन्हें दफ़नाने का भी वक़्त नहीं, सारे ना
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तुम कह देना कोई ख़ास नहीं

कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं , तुम कह देना कोई ख़ास नहीं . एक दोस्त है कच्चा पक्का सा , एक झूठ है आधा सच्चा सा . जज़्बात को ढके एक पर्दा बस , एक बहाना है अच्छा अच्छा सा . जीवन का एक ऐसा साथी है , जो दूर हो के पास नहीं . कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं , तुम
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मेरा ज़िक्र ना करना

किसी महफिल या वीरानों में मेरा ज़िक्र ना करना, किन्ही अपने बेगानों में मेरा ज़िक्र ना करना, हर कोई समझ ना सकेगा हमारी दोस्ती को, अपने दीवानों से मेरा ज़िक्र ना करना, अकेले बैठ कर सोचो जब मेरे बारे में, देखो कहीं लफ्ज़ों का सहारा ना लो तुम, कुछ सोच के चाह
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वो लड़की एक पागल सी

ये कविता मैंने अपनी सबसे अच्छी दोस्त के लिये लिखी है..उसके बारे में कविता के माध्यम से अपने शब्दों को अभिव्यक्ति बहुत दिनों से देने की सोच रहा था पर कभी समय नहीं मिल पा रहा था तो कभी चाहते हुये भी शब्द कागज पर नहीं उतर पा रहे थे... मैं सिर्फ यही कहना
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मिलन

मेरे ज़ेहन में उठनेवाले सारे सवालों में मिलना । रात- दिन तुम मुझको मेरे ख़यालों में मिलना ॥ मैं हवा हूँ, कर न पाऊँ 'ग़र मुलाक़ात हर रोज़ पलकों के अँधेरे में मिलना, धड़कन के उजालों में मिलना । हर पल पसंद है तेरा रुप- श्रृंगार मुझको बंद ज़ुल्फ़ों में मिलो
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ये डीग्री भी लेलो

ये डीग्री भी लेलो, ये नौकरी भी लेलो ये डीग्री भी लेलो, ये नौकरी भी लेलो, भले छीन लो मुझसे USA का वीसा मगर मुझको लौटा दो वो कॉलेज का कैन्टीन, वो चाय का पानी, वो तीखा समोसा…… कडी धूप मे अपने घर से निकलना, वो प्रोजेक्ट की खातीर शहर भर भटकना, वो लेक्चर म