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एक बूँद

http://poojanil.blogspot.com/
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31 May 2010
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उन्हें हमारी जरूरत है

पिछले साल 22 मई को जब इस ब्लॉग की नींव रखी थी, तब यह पता नहीं था कि एक वर्ष बाद उन्ही बुजुर्गों के लिये काम कर रही होउंगी, जिनकी प्रेरणा से ब्लॉग बनाने का विचार पुख्ता हुआ था. पहली पोस्ट उन्हें ही समर्पित थी और आगे भी उन पर लिखती रहूंगी. इस ब्लॉग की पहली
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एकांत

दीवारें (अनधिकृत परेशानियाँ ) शोर करें और उन्हें शांत होने को ना कह सकें, ऐसा एकांत अपने ही वजूद में गहरे... और गहरे घाव करता जाता है. अध्यात्म की दुनिया से विवेचनाओं की कुछ बूंद अमृत प्राप्त करने को सिसकता मन दिमाग के बंद दरवाजों पर दस्तक देते हार जाता
Apr 30 2010 05:15 PM
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परछाईयों का शहर 4 (अंतिम भाग)

गतांक से आगे...."रामधारी ले चलो इन्हें पूछ ताछ के लिये.""येस सर."पुलिस के साथ उन तीनों की पूछताछ चल रही है. "ड्रग्स का तस्करी में पकड़ा गया है तुम लोगों को .... मालूम है ना कितना बड़ा जुर्म होता है ये?" तीनों गर्दन झुकाए अपनी आने वाली मुश्किल का ताना बना
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परछाईयों का शहर 3

5 महीने बादमनीष और उसके साथी शिपमेंट उतार रहे हैं, कुछ कस्टम ऑफिसर वहाँ पर चेकिंग के लिये आये हैं, मनीष के 3 साथी तत्काल भाग जाते हैं, मनीष और उसके दो साथियों से ऑफिसर जांच पड़ताल करते हैं."क्या हो रहा है यहाँ?""माल उतार रहे हैं साहब.""तुम्हारे साथी भाग
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परछाईयों का शहर 2

मनीष के घर का दृश्य "आई....!!! ओ आई!!!""दरवाजा खोल आई!! मैं हूँ, मनीष.""आज बड़ी देर कर दी आने में मनु!!! कहाँ गया था रे? बाबा अभी अभी तेरी राह देख सोया है."हाँ आई, आज एक भला मानुस मिल गया था, रस्ते में , उसके साथ बातें करते देर हो गयी.""कौन था रे? यूँ
Mar 31 2010 06:39 PM
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परछाईयों का शहर 1

"रुको!!" "ए! तुम!!" "रुक जाओ!!" जैसे जैसे आवाज़ पास आ रही थी, उसके कदम और तेजी से आगे बढ़ रहे थे, पर पीछा करने वाले के कदमों की गति हवा की तरह रही होगी जो पल भर में ही उसके पास पहुँच कर उसे पीछे से पकड़ लिया... उसने डर के मारे पीछे मुड कर देखना भी गवारा
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कुछ यूँ ही....

"तेरे जीने को लम्बी उम्र मांग तो ले पूजा,फिर सवाल न करना कि मेरी खता क्या थी?" "दुश्वार जीवन को हासिल ख़ुशी कर दे मौला,मेरे ग़मज़दा होने की दुआ में तेरी रज़ा क्या थी?" "ले आज फिर मेरी बलाओं का सदका ए खुदा,मेरी चाहतों की इस से बड़ी सजा क्या थी?"आँख से
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जिंदगी

मेरे भाई गौरव ने आज पहली बार एक कविता लिखी और मुझे भेजी. जीवन के छुए अनछुए पहलु अपनी झलक दिखा कर हम सभी के अन्दर छिपे एक कलाकार को कभी ना कभी बाहर ले ही आते हैं, ऐसा ही कुछ इनके साथ भी हुआ. और उसी कवित्व भाव को बनाए रखने के लिये और उभरती प्रतिभा को
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नमक रोटी

"जसुमति नंदन रोटी खावे,भीम रे जैसो बड्को होवे""क्या माँ...तू रोज़ एक ही बात कहे है.." मुझे नी खानी सूखी रोटी- अचार...... तीखा लगे है अचार, तू दही क्यूँ ना लाती? ""कल ला दूंगी मेरे लाल ... आज खा ले रे, अब अपनी माँ को और ना सता, चल खा ले." "जसुमति!!! ओ
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मेरी माँ

मेरी माँ मैं घिरी सघन वृक्ष लताओं से, तुम तेजस्विनी / अरुण्मय प्यार तुम्हारा, स्वर्णिम, सूर्य रश्मियों सा छनकर, दस्तक मेरे दिल पर देता। तुम्हे देख रही मैं बचपन से, कहाँ जान पाई पूरे मन से!!! तुम आत्मसात कर लेती सबको, अपने विशाल ह्रदय में. करती सबके ब
Dec 29 2009 11:59 AM
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नाराजगी का हक

गीतिका , शर्मा जी के ऑफिस में सेक्रेटरी है , शर्मा जी उसके काम से बहुत खुश रहते हैं। एक दिन शर्मा जी ने गीतिका से ५ फाइल मंगवाई , पर गलती से एक फाइल गीतिका के डेस्क में ही रह गयी और उसने ४ ही फाइल शर्मा जी तक पहुंचाई। बाद में शर्मा जी ने उस से फोन कर
Dec 29 2009 11:59 AM
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THEY NEED US - उन्हें हमारी जरूरत है

। आज पहली बार, मारिया अमेलिया लोपेज़ , के ब्लॉग पर गई, जिसने ९५ साल की उम्र में, अपने पोते के द्वारा भेंट किए हुए ब्लॉग से ब्ल ोगिंग शुरू की । उनके ब्लॉग पर बुजुर्ग व्यक्तियों के जीवन से सम्बंधित देखने और पढने के लिए कई बातें हैं, किंतु विशेष तौर पर
Dec 29 2009 11:59 AM
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झूलमझूली

झूला झूलने की है ठानी , झूले पर बैठी गुडिया रानी , मन में आया तेज चलाऊं , ऊँची थोडी पेंग बढ़ाऊं , माँ ने बोला, धीरे चलाना , तेज गति से गिर ना जाना , पर उसने ना माँ की मानी, करती रही अपनी मनमानी , तेज उडाने से वो पलटी, गिरी धरा पर होकर उलटी , आंसू टप
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दर्द

दर्द दुनिया से अनचाहे मिलते रहे, हम तोहफे समझ अपनाते रहे. हमदर्द कुछ बांटने को आये दर्द, (तो) मुस्कुराहटों में आँसू छिपाते रहे. मुश्किलों ने बार बार दस्तक दी, उन्ही से दरो दीवार सजाते रहे. जो आँसूओं पर भी लग गए पहरे, शब्द समेटने में रातें बिताते रहे.
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एक रक्षा कवच

तुम्हारी मीठी बातें, मुझे ही नहीं, मोह लेती हैं बाकी सब को भी, इन बाकी ´सब´ में शामिल हैं, तुम्हारे दादा-दादी, नाना - नानी, और मोहल्ले के सभी चाचा- चाची, भुआ, भैया और दीदी. तुम्हे देख कर चहक उठता है मन, दौड़ जाती हैं खुशियों की लहरें, फिर अचानक आती ह
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कुछ खुशियाँ चुराई हैं मैंने

जब तक मुझे विश्वास थाकि तुम्हारी दो आँखें मुझे देख रही हैं ,मैं कहता रहा तुमसेअपना ध्यान रखा करो और खुश रहा करो ,बहुत स्वार्थी था मैं,कभी शुक्रिया ना कह पाया. तुम्हे यह जताता रहा कि मुझे फ़िक्र है तुम्हारीऔर तुम मेरा ध्यान रखती रही .आज जब तुम चली गयीकभी
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Aug 17 2009 05:35 PM
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जश्न ए आज़ादी

जब भी स्वतंत्रता दिवस मनाने का समय आता है, हमारा मन खराब हो जाता है. आप सब जानना चाहेंगे कि ऐसा क्यों? क्या हम हमेशा गुलाम रहना चाहते हैं? नहीं जनाब, ऐसी कोई बात नहीं है. हमें भी अपनी आज़ादी से बड़ा प्रेम है.अब बात यह है कि बचपन से ही स्वतंत्रता दिवस को
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भाई

रक्षा बंधन के पावन पर्व पर मेरे भाई और भाई -बहिन के पवित्र रिश्ते को समर्पित एक कविता.पिता के सपनों का संसार,आधा आधा बांटा प्यार,नन्हा शिशु, माँ आँचल में,पेड़ आम का, आँगन में,रेशमी धागा,नेह की रीत,प्रेम की डोरी, सच्चा मीत,बहना होती उसकी प्यारी,ली रक्षा
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मृत्यु

घनघोर अंधेरे मेंखो सी गयी थी कहीं ,बैचेन आँखेथक करसो ही गयीं थी यहीं .राह सूझती ना थी कोई ,सफर का साथी नहीं कोई .अकेले कहाँ तक ले जातीये हमदर्द राहें !!!तभी नज़र आईइककिरण उजाले की ,उसे थाम लेने की देर थी बस....पर,इंतज़ार ,किसी और कोथा मेरा ,मेरे गुजर जाने
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Jul 29 2009 11:11 PM
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मन को गुरु बनायें

गुरु की महिमा को हमारे शास्त्रों में खूब बखाना गया है, इस सन्दर्भ में एक दोहा याद आ रहा है, गुरु गोविन्द दोनों खड़े, काके लागूँ पाय, बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय। तात्पर्य यह कि इस दुनिया में गुरु ही हैं जो ईश्वर तक पहुँचने के लिए भी हमारा मार
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आकर शब्द को जोड़ दे

कभी कभी अतीत में झांकना, सुखद स्मृतियों का खुशगवार झोंका साबित होता है. और उस पर यदि कोई मीठी सी कविता हो और उसमें अपने ही दोस्तों का जिक्र हो तो सोने पर सुहागा. ऐसे ही अपनी पुरानी डायरी के पन्ने पलटते हुए एक कविता ने आवाज़ दी, हम भी उसकी आवाज़ अनसुन
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एक बूँद

स्वार्थ.......अच्छा या बुरा??? कल हमारे एक मित्र से बातों बातों में बात निकल पड़ी कि स्वार्थ अच्छा होता है या बुरा? उनका कहना है कि स्वार्थ दो तरह का हो सकता है, अच्छा, जो कि जनहित में स्वार्थ हो, अथवा बुरा, जिसमें कोई लालच छिपा हो। अब हमारा यह कहना ह
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यह है हमारा यूनियन रूम

चलिए आज कुछ हलकी फुलकी बातें करते हैं, एक कॉलेज के यूनियन रूम की सैर कर आते हैं। जहाँ तक हमने देखा है, सभी कॉलेज में एक कॉलेज यूनियन होती है और उनके लिए एक यूनियन रूम.....तो हमारे कॉलेज में भी एक यूनियन रूम है , एक बार हमें वहाँ काम पड़ गया, तो जो कुछ