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पुनर्वालोकन

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31 Dec 2009
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रिश्ते" (1) कल रात एक और रिश्ते की मौत हो गई पड़ोस में अतिवेदना के स्वर कुत्ते-बिल्ली का रोना था सुबह-सवेरे उठ कर कोई नया रिश्ता जोड़ना था तकियों में सिर छुपाये लंबी तान सो रहे भई किसे फुर्सत है मरने की मिट्टी परआँख भरने की ! (2) एक बार फिर कोई रिश्ता
 
©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah)
Dec 29 2009 11:57 AM
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पुनर्वालोकन

बदलते आदर्श" (3) और द्रोण तुम्ही ने तो आदर्शों का अंगूठा था काटा तभी तो शत-शत आदर्श बाण बन बिछौना बने थे भीष्म का ! - डा0अनिल चड्डा
 
©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah)
Dec 29 2009 11:57 AM
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बदलते आदर्श" (1) मैं इसी भारत में सहस्त्रों भरत पैदा कर दूँ कहीं से राम तो ढूंढ कर लाओ मैं घर-घर में सीता दिखला दूँ कोई राम तो दिखाओ
 
©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah)
Dec 29 2009 11:57 AM
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मेरी कविता" मेरी कविता यौवनावस्था प्राप्त होने से पहले ही बुढ़ा चुकी है आँख खोलने से पहले ही अंधा चुकी है कपड़े ओढ़ कर भी तो नंगी ही है पेट भर कर भी तो भूखी ही है क्योंकि यह उन बदनसीब भूखे, नंगें अंदर के धधकते लावे को आँख-नाक से बहाते जर्जर कंकालो के सा
 
©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah)
Dec 29 2009 11:57 AM
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अपना-अपना संस्कार" मैं आदतन उन पर भरोसा कर बैठा उन्होने आदतन भरपूर की दगा पर कैसी शिकायत किससे शिकायत दोनों ने ही तो किया अपने-अपने संस्कार का निर्वाह !
 
©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah)
Dec 29 2009 11:57 AM
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उपदेशक" तुमने कहा था एक दिन यह जग छलावा है हर मोड़, हर रिश्ता भुलावा है इसलिये मोह न कर भौतिकता की दीवानगी में न पड़ पर तुमने जो मुझे समझाना चाहा सिखाना चाहा क्या कर के दिखाना चाहा अब समझा तुम्हे तो चाहिये था एकछत्र राज्य सारी धरती के सुखों का साम्राज्
 
©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah)
Dec 29 2009 11:57 AM
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भटकन" आसमान मेरे सिर से इतना ऊंचा उठ चुका था कि मैं स्वय को स्वयं से ही बौना मह्सूस कर रहा था शाम जब धुंधला रही थी - रात के आंचल में छुपने को - मेरे मन के भीतरी साये शनै: शनै: सिर उठा रहे थे ताले में बंद मेरे उन्मादों पर चुपके से सेंध लगा रहे थे आँख
 
©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah)
Dec 29 2009 11:57 AM
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आदत" धुएं सी टूटन उभर कर जब-तब मन को घेर लेती है ज़रा सी बात भी शूल सी लगती है जीवन का पर्दा हालात की हवाओं से जब उड़-उड़ जाता है तब भावना तिनके सी बिखर-बिखर जाती है तुम्हे कहा भी था उबड़-खाबड़ रास्तों पर फूल न बिछाओ छाले पड़ जायें गें कांटों पर चलने की आद
 
©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah)
Dec 29 2009 11:57 AM
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भिज्ञ-अनभिज्ञ" कौन हूं? क्या हूं ?? कुछ ज्ञात नहीं अज्ञात नाम ??? शायद अपना नहीं जोड दिया गया है मेरे साथ कहीं से उठा कर या फ़िर चुरा कर अनजाना अस्तित्व, वस्तुत:स्थापना नहीं पर पाऊं कहां स्वत्व अपना - खोजता फिरता हूं यहां,वहां,जहां,तहां! लगता है कहां
 
©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah)
Dec 29 2009 11:57 AM
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एक और दोगला ! मेरी आँखों के आँसुओं को केवल नमकीन पानी समझना और, अपने आँसुओं को खून के आँसुओं की संज्ञा देना तुम्हारे दोगले स्वभाव का परिचायक ही तो है वगरना मेरे जिस आघात से तुम्हे चोट पहुँची मुझे भी तो वैसे ही तुम्हारे आघात से अधिक नहीं तो कुछ तो दर्
 
©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah)
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मेरा जीना जीना है" मीरा ने तो किया था एक बार विषपान मुझे बार-बार करना है गुज़री थी एक बार अग्निपरीक्षा से सीता मुझे बार-बार जलना है जितना विष पिलाओगे तुम मुझे होगा नुकीला उतना ही मेरा दंश पिलाओगे आग जितनी मुझे उगलेगी कलम उतनी ही बन दबंग चाहो तो कर डाल
 
©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah)
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विष-अमृत" जब से आस्तीनों से साँप निकलने लगे तब से मैंने आस्तीनों वाले वस्त्र ही पहनने छोड़ दिये पर अपनी भुजाओं का क्या करूँ ? जो साँप बन मुझे ही डसने को तत्पर हैं ! मेरे दोस्त,संगी, साथी, पत्नी, बेटा-बेटी सब ही तो मेरी भुजाएँ थी कैसे काटता इन्हे ? काट
 
©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah)
Oct 14 2009 07:56 PM
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"रोना"हँसता रहातो सब आयेरोना पड़ाअकेला थामैं भी अकेलातू भी अकेलाजग सारा ही अकेला थामैं भी रोयातू भी रोयाजग सारा ही रोया थाकिसके लिए परकौन कह यहाँ रोया थामैं समझा थामेरे लिये तोकोई यहाँ पर रोया हैअज्ञान था वो सबसारा जन्ममैंने जो बोझा ढ़ोया थाकौन बनेगा ढ़ोने
 
©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah)
Sep 23 2009 09:08 PM
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"हार-जीत" हारता रहा मैं हर कदम पर एक और विश्वास संजोते रहे तुम जीत-जीत कर अविश्वासों की ट्राफियाँ ! हार कर भी मेरे पास है वेदना-लिप्त तृप्ति पर तुमने क्या पा ली इस जीत अभियान से शाँति !! - डा0 अनिल चड्डा
 
©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah)
Sep 02 2009 12:41 PM
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"बदलते आदर्श"(2)हे रामयकीनन तुम भगवान न थेकुंठित समाज़ कीकठपुतली - मात्र इन्सान थेतभी तोआदर्शों की होली मेंझोंक दिया थासीता का तनकेवल लांछन सेछोड़ दियाभटकने को बन-बनयह तो सोचा होताकल कौन बनेगी सीताजिसे केवलअहंतुष्टि के लियेयूँ ही जलना पड़ेबन-बन भटकना
 
©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah)
Aug 09 2009 08:48 PM
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अकुलाहट मैं जानता था मेरी अकुलाहट किसी दिन ज़रूर रंग लायेगी शब्दों में गुंथ कर पन्नों पर उतर आयेगी हर क्षण हर पल ह्रदय के द्वार पर जो आहट सी होती थी मेरे आसपास की वेदना को चेतना में पिरोती थी मेरी रचना तो इसी समाज़ की धाती है यह मेरे नहीं समाज़ के गीत गाती
 
©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah)
Jul 27 2009 08:16 PM
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ताजमहल(1)कयामत तकमहल में हीचाहिये था बिछौनावर्नाएक बादशाह कादुशवार हो जाता सोना!(2)आशचर्य है आठवांदूधिया सफेदीशोषितों का रक्ततब क्या सफेद होता था !- डा0अनिल चड्डा
 
©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah)
Jul 26 2009 08:23 PM
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स्पंदन" मेरे ह्रदय के स्पंदन से एक तरंग उठी भावनाओं में ढ़ल कर शब्द-बद्ध हुई इसे समझने को न केवल मेरी दृष्टि ही बल्कि चाहिए मेरे ह्रदय का सा स्पंदन और चाहिए भावना ऐसी ही किन्तु भावना-शून्य यह जग क्या समझ पाये गा इन शब्दों में छुपी मेरे अन्तस की प्रताड़
 
©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah)
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पुल" मेरे तुम्हारे बीच भावनाओं का पुल कच्ची रेत सा ढह गया ! बस, सागर सी उमड़ती-घुमड़ती लहरों का तूफान रह गया !! न वो सेतु ही रहा न वो भावना ही स्वार्थ की रेल-पेल में सारा जीवन बह गया ! - डा0अनिल चडडा
 
©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah)
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गीत - अस्थियों के जंगल में" अस्थियों के जंगल में, भटकी हैं, संवेदना की तितलियां ! यंत्र - चालित से ह्रदय हैं, पानी से भरी धमनियां !! भावना है व्यर्थ यहां, सब का अर्थ है, अर्थ यहां, बस माया ही अर्धय यहां, सब दे के मिले दर्द यहां, स्वार्थ की ये नगरी है
 
©डा0अनिल चडड़ा(Dr.Anil Chadah)