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10 Jun 2010
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सन्तुष्टि…….

वह बोला मेरे खेतों में सोना है मैं हँसी ये सोच कर कि यह अक्ल से कितना बौना है सोना होता,तो क्या इसके कपड़ों में पैबन्द होता ? वह भी तुरंत मुस्कराया और बोला …….बहन जी , खेतों में नीचे का सोना तो सरकार का है ऊपर धनवान का है मुझे तो अपना सोच कर
 
Dr. Veena Srivastava
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तुम नदी हो……..

तुम नदी हो बहो……. बहना तो प्रकृति है और तुम्हारी नियति भी जो चाहो बहा कर ले जाओ तिनका हो या काठ मर्ज़ी तुम्हारी तुम्हारा वेग तुम्हारा सम्बल है और,अपने प्रिय सागर से मिलने की आकुलता भी इसी आकुलता ने न जाने कितने पत्थर तराशे और न जाने कितने
 
Dr. Veena Srivastava
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आओ चलो बोएं ……..

आओ चलो बोएं संवेदना के बीज खेतों में नहीं पगडंडियों के किनारे,बगीचों में …. जहाँ सैर करने निकलते हैं लोग सुबह-शाम और सबसे पहले तो अपने-अपने आँगन में लगी तुलसी के घरुए में अंकुरण से फैलेगी वो खुशबु, वो महक जो दिल ओ दिमाग के पर्यावरण को रखेगी मुक्त
 
Dr. Veena Srivastava
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बाउजी

बाउजी,हम सबके बाउजी बैठक मैं बैठे हुक्का पीते बाउजी शतरंज खेलते बाउजी कभी न हारे बाउजी शेर कहते बाउजी नज़्म लिखते बाउजी ग़ज़लें जब उनकी तरन्नुम में गाती पाँच का सिक्का ईनाम देते बाउजी बीड़ी के बण्डल से जब कूपन चुराती जाने कैसे जान लेते बाउजी पाई-पाई का हिसाब
 
Dr. Veena Srivastava
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मैं सिर्फ सुनती रही….कोरियन पुस्तक में छपी जिसका कोरियन अनुवाद सत्यांशु ने किया .

जब -जब मैं छत पर आती बादलों में छुप जाता था चाँद ऐसा तुम कहते थे ……. जब-जब मैं हँसती-खिलखिलाती तब-तब आँगन में झरता हरसिंगार ऐसा तुम कहते थे ……. जब-जब मैं मायूस होती पत्तों से झरती ओस ऐसा तुम कहते थे ……. पर\ जब मैंने
 
Dr. Veena Srivastava
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पौध ……

बेरोजगारों की पौध तैयार कर रहे हैं अधिकांश स्ववित्त-पोषित महाविद्यालय ……..नक़ल करा के दुकान तो चलाई जा सकती है परन्तु योग्य पौध तो योग्य शिक्षक ही शिक्षा के मंदिर में तैयार कर सकता है .बच्चों के भविष्य के प्रति हम शिक्षकों को अपनी जवाबदेही
 
satyanshu
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पौध ….

बेरोजगारों की पौध तैयार कर रहे हैं अधिकांश स्ववित्त-पोषित महाविद्यालय……… नक़ल करा कर दुकान चलाई जा सकती है परन्तु योग्य पौध तो योग्य शिक्षक शिक्षा के मंदिर में ही तैयार कर सकते हैं .बच्चों के भविष्य के प्रति हम शिक्षकों को भी अपनी
 
satyanshu
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माँ के आंसुओं से लिखी ये इबारत ……

माँ, मेरी माँ,जिसके आंसुओं से लिखी है इबारत मैंने गुब्बारे सा फूटा था गुबार , रोती रही थी अनवरत धीरे-धीरे ….जी हल्का हुआ सिसकियों के बीच डबडबाते आंसुओं और थरथराते अधरों से बही थी वेदना…. ढाढस ने तोड़ा था बाँध , बौनी हो गई थी संवेदना परम्पराओं
 
satyanshu
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माननीय कांशीरामजी के जन्मदिवस पर ……

सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय मनरेगा……. मनरेगा का धन ग़रीबों के पेट में नहीं माननीयों की तिजोरी में ‘ मजदूरों के बजाय जे सी बी मशीनों से नहरों की भराई करा श्रमदान घोषित ‘ और आप कहते हैं
 
satyanshu
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जब मैं चौंकी ….

एक छोटी सी बच्ची को सिर पर गोबर से भरी डलिया लिए हुए जब मैंने देखा ‘ मैं तब नहीं चौंकी चौंकी तब …जब मैंने उसे एक स्कूल के सामने अन्दर पढ़ते हुए बच्चों को एकटक निहारते हुए पाया हांलाकि उसकी पीठ जरूर मेरी ओर थी लेकिन मैं…… उसके
 
satyanshu
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आज की नई पीढ़ी के लिए …..

पश्चिम की आंधी में देशी बच्चे बहने आज लगे हैं साठ लाख का बुरा है क्या ये पैकेज कहने आज लगे हैं लैपटॉप मोबाइल इन्टरनेट ही अब इनकी दुनियाँ है गूगल याहू डॉट कॉम के घर में रहने आज लगे हैं बुलंदियां छू रहे हो तुम जिन बुनियादों पर खड़े हुए हो मुड़कर तो देखो वो
 
satyanshu
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महिला दिवस पर

नारी जीवन आज तुम्हारे यही मायने पंख लगाकर खुले गगन में उड़ी उड़ानें आसमान हो, अंतरिक्ष या पार क्षितिज के अब सब लगते घर जैसे जाने पहचाने नारी हो नर से आगे या नर नारी से आगे कोई फरक नहीं पड़ता जो टूट न पायें धागे आसमान विस्तृत सागर सी जब सोच हमारी होगी तब
 
satyanshu
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Mar 08 2010 02:40 PM
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खेलूं मैं होरी

कृष्ण होली खेलने के लिए गलियों में निकलते हैं उन्हें देखते ही सारी गोपियाँ छुप जाती हैं लेकिन तभी एक कमसिन गोपी उनके हाँथ आ जाती है और वो उसी से होली खेलने लगते हैं. तो वह गोपी क्या कहती है… बारी उमरिया है मोरी ओ कान्हा मोसें खेलो न होली रंग नहीं
 
satyanshu
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परिवार और संस्कार…

बचपन के सच बचपन की तरह कितने कोमल और सहज होते हैं । कभी चांद को आंगन में उतार लाने की हठ का सच! कभी आंगन में फुदकती गौरैया को पकड़ने की अजानी कोशिश का सच और कभी झाड़ू की सींक से बनाए गुड़िया के स्वेटर बुनने का सच! याद आती है वो पुराने स्वेटरों की उधड़ी [...]
 
satyanshu
Aug 19 2009 01:09 AM
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कितने अपने

परिवार के सदस्य न होते हुए भी कुछ लोग कितने अपने होते थे। लगता ही नहीं था कि ये परिवार के नहीं हैं। इतना सम्मान व इतनी इज़्ज़त जो उन्हें दी जाती थी। और वे भी तो उसी तरह बराबर से संबंधो का निर्वाह करते थे। उनमें से एक थीं परमट वाली बहू। सांवला रंग, [...]
 
satyanshu
Jul 27 2009 04:15 PM
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पीपल की शादी…

उत्सव जीवन के अंग हुआ करते है । किसी न किसी बहाने हम उत्सव मनाते रहते हैं इससे हमारा मनोरंजन भी होता है। और साथ ही साथ हम समाज से परम्परा से जुडे़ भी रहते हैं । परन्तु उत्सव मनाने का बिल्कुल नया पहलू देखने को तब मिला जब हमारे ही पड़ोस में पीपल की [...
 
satyanshu
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यामिनी…

भोर जागने को है, पर उससे पहले जाग जाती है यामिनी टूटे सपनों को बुहारती आँगन, द्वार पूरती चौक हल्दी आटे से भीगी धोती में, लातों से झरती ओस फटकारती है जब जब फूट पड़ती है किरणे पीली, नारंगी, सुनहरी और फूट पड़ता है अधर-कलियों से लोक गीत चकिया की घरर-घरर प
 
satyanshu
Jun 30 2009 12:57 PM
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कुल्फी और बाइस्कोप…

शाम को लगभग चार-पांच बजे घंटियों की आवाज़ सुनते ही गली के लगभग सभी बच्चे चैतन्य हो जाया करते थे। ‘पैवलाव’ के सिद्वान्त सा सौ फीसदी सम्बन्ध घंटी, लार व कुल्फी के बीच जो जुड़ा हुआ था। अमूमन लोगों को कुल्फी वाले व बाइस्कोप वाले की घंटियों में
 
satyanshu
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वह तोड़ती ईंट…

बहुत मज़ा आता था उसे पत्थर मारने में । हम बच्चों की टोली पत्थर मारते हुए जब तक उसे गली के बाहर नहीं खदेड़ देती,जब तक चैन नहीं लेती थी। वो भी पलट-पलट कर दौड़ाती थी। बहुत अच्छा लगता था चूहे-बिल्ली के खेल जैसा। वह अक्सर तीसरे-चैथे दिन आती और गली-मोहल्ले की
 
satyanshu
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रंग पासी…

हर जगह होली जलने के बाद रंग खेला जाता, पर हमारे घर होलिका दहन वाले दिन ही सुबह रंग खेलने की परम्परा है जिसे रंगपासी कहते हैं। सबसे पहले रामजी चाचा हमारी मां पर रंग डालते थे सबसे बड़ी भाभी जो थीं । चाहे कितने अच्छे कपड़े पहने हो बदलने का कोई मौका न देते
 
satyanshu
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अब वो मिठास कहाँ…

पहले संयुक्त परिवार हुआ करते थे । दादी-बाबा, ताई-ताऊ, चाचा-चाची, बुआ, भइया, दीदी, मां-पिताजी सभी तो एक साथ रहते थे । एक चूल्हा जलता था। सुबह की जली आग ठंडी भी नहीं हो पाती थी कि उसी आग से रात का चूल्हा जल जाता था । बड़ी पतीली में दाल, बड़े भगौने में चा
 
satyanshu
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गुरू कृपा…

कहते हैं कि गुरू की कृपा जिस पर हो जाए, उसका जीवन सफल हो जाता है। और यह सत्य भी है। मेरे ऊपर भी ये कृपा हुई थी, जब मुझे एक झन्नाटेदार थप्पड़ का प्रसाद मिला था। मै संगीत विषय में परास्नातक कर रही थी गुरू जी मुझे घर पर सिखाने आते थे। पूरे वर्ष मुझसे [..
 
satyanshu
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माँ के गहने

मैं बहुत छोटी थी जब घर में सेंध लगी थी। गर्मी के दिन थे। सभी लोग छत पर सो रहे थे। सुबह जब नीचे उतर कर आए तो देखा हमारा कमरा अन्दर से बन्द था। दरवाजे की झिरी से झांककर देखा, अन्दर काफी रोशनी थी और पूरा कमरा अस्त-व्यस्त था। समझते देर न लगी कि [...]
 
satyanshu