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पिताजी

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15 Jun 2010
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वह कठिन संकल्प!

                            मेरे पापा - कुछ कहूं तो अतिश्योक्ति लगेगी , लेकिन वे थे ऐसे ही साधू प्रकृति के व्यक्ति.
 
रेखा श्रीवास्तव
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ओ मेरे पिता!

ओ मेरे पिता! तुम्हाराअंश हूँ मैं सम्पूर्णमां के गर्भ में रचातुमने मुझे अपने लहू से  तुमसे मुक्त कैसेहो पाऊंगा कभीकैसे वापस लौटा सकूँगा तुझेउसका अंश भी जोतुमने दिया है मुझे  सब कुछ निछावर करके भीअपने आंसुओं के साथरखा तुमने मुझेजो करुणा  और
 
डा.सुभाष राय
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पिता के विश्वास .की अप्रतिम जीत (वाणी गीत)

," ये तो पूरी मिट्टी हो गयी है ...दूसरी बेटी है ना तुम्हारी , ले जाओ घर " उस एक महीने की नन्ही सी बच्ची के लगभग नीले पड़ते से चेहरे को देखते हुए चिकित्सक ने पिता को कहा ।फक्क चेहरा लिए सीढियां उतरते पिता उस बच्ची को कलेजे से लपेटे फफक पड़ा । दूसरी बेटी
 
वाणी गीत
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"मैं पिता हूँ तो क्या मुझमें दिल नही"

मैं पिता हूँ तो क्या मुझमें दिल नहीक्यूँ मुझे कमतर आँका जाता हैक्या मुझमें वो जज़्बात नहीक्या मुझमें वो दर्द नहीजो बच्चे के काँटा चुभने परकिसी माँ को होता हैक्या मेरा वो अंश नहीजिसके लिए मैं जीता हूँमुझे भी दर्द होता हैजब मेरा बच्चा रोता हैउसकी हर आह
 
वन्दना
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पिता और परमपिता

पिता दो होते हैं. एक पार्थिव शरीर का जनक और  दूसरा अपार्थिव शरीर का.एक पिता  होता है और दूसरा परमपिता. पिता पुत्र से कुछ पाना चाहता है. वह जानता है कि उसने जिसे जीवन दिया है, वह उसे कुछ न कुछ तो देगा ही. धन, यश या सुरक्षा. बहुत लोभी पिता पुत्र
 
डा.सुभाष राय
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दसवीं का रिजल्‍ट यहां मौजूद है

परिणाम जानने के लिए चटका लगाएंनहीं जानतेअपने माउस के कर्सर कोयहां पर लाएंऔर क्लिक करेंतथा खुली विंडो मेंअपना रोल नंबर भर करजानें अपना परिणाम।
 
अविनाश वाचस्पति
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मातृ दिवस पर स्मृति गीत: माँ की सुधियाँ पुरवाई सी.... संजीव 'सलिल'

मातृ दिवस पर स्मृति गीत:divyanarmada.blogspot.com माँ की सुधियाँ  पुरवाई सी....संजीव 'सलिल'*तन पुलकित मन प्रमुदित करतीं माँ की सुधियाँ  पुरवाई सीतुमको खोकर खुद को खोया, संभव कभी न भरपाई सी ...  *दूर रहा जो उसे खलिश है तुमको देख
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
May 09 2010 06:59 PM
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इंटरनेट पर प्रख्‍यात होने में जोखिम बहुत हैं (अविनाश वाचस्‍पति)

इमेज पर क्लिक करके पूरा पढ़ें। सतर्कता के लिए जरूरी है कि इस लेख को ध्‍यान से पढ़ा जाए, अन्‍यथा जोखिम कम नहीं होंगे। इस जानकारी से जनहित में सबको अवगत कराएं। इंटरनेट पर सब फेमस होना चाहते हैंपर अनजाने ही बेमोल ले लेते हैंजोखिम कैसे कैसे ??????????बतला
 
अविनाश वाचस्पति
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दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय का एक कॉलेज - क्‍या आप सिर्फ एक को पहचान सकते हैं

पहचानिए इस चित्र में कौन कौन हैंयह चित्र कहां का हैयह चित्र कौन से महीने का हैबहुत आसान हैआप इन सबको जानते हैंसिर्फ एक को नहीं जानतेजिनको नहीं जानतेउन्‍हीं का नाम बतला दें
 
अविनाश वाचस्पति
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वृद्धाश्रम : मकान या मानसिकता

‘काल बेल’ की आवाज से ही नींद खुली। घड़ी देखी, अभी साढ़े छः ही बजे थे। दरवाजा खोला तो विश्वास नहीं हुआ। काका साहब सामने खड़े थे! उन्हें कोई वाहन चलाना नहीं आता। सायकिल भी नहीं। याने, लगभग सत्तर वर्षीय काका साहब, त्रिपोलिया गेट से कोई तीन किलोमीटर पैदल चलकर,
 
विष्णु बैरागी
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ललि‍त मोदी पर पिता की नजर : आईपीएल से चर्चा में हैं (अविनाश वाचस्‍पति)

ललित मोदी पर उनके पिता की नजरमतलब पुत्र पिता की नजरों मेंजरूर अच्‍छा ही होगासामान्‍यत: यही होता हैऔर होना भी चाहिएनवभारत टाइम्‍स दैनिक में आज प्रकाशित संपादकीय इस दृष्टि सेपठनीय हैआप भी पढ़ें।दैनिक नवभारत टाइम्‍स 28 अप्रैल 2010 को प्रकाशि‍त संपादकीय
 
अविनाश वाचस्पति
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खोज है इस खोज में मधुमास क्या बैसाख कैसा ?

यहां पढिये मत्स्य गंधी होके जल से आपको एतराज़ कैसाइस आभासी फलक पे आपका विश्वास कैसा..?पता था की धूप में होगा निकलना ,स्वेद कण का भाल पे सर सर फिसलनासाथ छाजल लेके निकले, सर पे साफा बाँधकेखोज है  इस खोज में मधुमास क्या बैसाख कैसा ?बागवां
 
गिरीश बिल्लोरे
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स्वतंत्रता सत्याग्रही श्रीमती सुशीला देवी दीक्षित के प्रति काव्यांजलि: संजीव 'सलिल'

भारत माँ रक्षा के हित, तुमने दी थी कुर्बानी.नेह नर्मदा सदृश तुम्हारी, अमृतमय निर्मल वाणी..स्निग्ध दृष्टि, ममतामय आनन्, तुम जग जननी लगती थीं.मैया की संज्ञा तुम पर ही सत्य कहूँ मैं सजती थी..दुर्बल काया सुदृढ़ मनोबल, 'आई' तुम थीं स्नेहागार.बिना तुम्हारे
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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ब्‍लॉगर सावधान हो जाना : जीवन में झांसे बहुत हैं इन झांसों में तुम न आना (अविनाश वाचस्‍पति)

झांसे में न आनाब्‍लॉगर सावधान हो जानाअपनी तो यही होली हैजब खुशी की भरती झोली हैपर भरती की पोस्‍ट सेमन को कहां खुशी मिलती हैपर मिल जाती हैं टिप्‍पणियांगिनी न जाएं इतनीपर इन पर स्‍वचालितगिनती चलती है।भ से भरतीभ से भड़कानाभ से ही भभकता हैआज ब्‍लॉग
 
अविनाश वाचस्पति
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पिताजी का बचपन (1)

मेरे पिताजी के बारे में लोग कहते थे कि वे अपने समय से पचास साल आगे की सोच रखने वाले इन्सान थे. बहुत ही खुले विचारों के, तार्किक, बुद्धिवादी, बेहद लोकतान्त्रिक, मस्तमौला और फक्कड़ किस्म के आदमी थे. वे नास्तिक थे. मतलब, ईश्वर में विश्वास नहीं करते थे. ये
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“पिता जी को पड़पोते ने साबुन मलकर नहलाया” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

आज का बिल्कुल ताजा संस्मरण पोस्ट कर रहा हूँ!मेरे पिता जी की आयु इस समय 90 वर्ष की है। इस उम्र में भी वे अपने दैनिक कार्य स्वयं ही करते हैं। यों तो उनके लिए निचली मंजिल पर भी स्नानगृह बना है। मगर उसमें गीजर नही लगा है। इसलिए पूरे जाड़ों-भर वह प्रति दिन
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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संजय कुंदन ने पिता की दुविधा बतलाई (अविनाश वाचस्‍पति)

दुविधा ये सबकी हैपर नहीं ये अबकी हैजानते हैं सब कबकी हैसंबंध ही ऐसा हैसंबंध कोई भी होसावधानी जरूरी हैसंजय जी कुंदन हैंकहानी में कविता मेंव्‍यंग्‍य में जाहिर हैंलिखने में शब्‍दों काअहसासों का, भावों का अच्‍छा उदाहरण हैं।दैनिक नवभारत टाइम्‍स में 27 मार्च
 
अविनाश वाचस्पति
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27 मार्च 2010 को शालीमार बाग दिल्‍ली में ब्‍लॉगरों का दस नंबरी चित्र : पहचानिए हमें ? (अविनाश वाचस्‍पति)

घटना सुबह 11 बजे से सांय बजे तक की हैइसकी संपूर्ण सूचनाएं आपको अन्‍य ब्‍लॉगों पर मिलेंगीयहां पर तो आपने बस पहचानना हैकि इनमें कौन कौन हैं ?
 
अविनाश वाचस्पति
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रंग बरसे ... दो चुटकी सच्‍चाई का (अविनाश वाचस्‍पति)

जो ब्‍लॉगर टिप्‍पणी दें अनुकूलवही दोस्‍त मत जाना तुम भूलटिप्‍पणी भर-भर बाल्‍टीलोटा भर हो जो पोस्‍टबाल्‍टी भर हो पोस्‍ट तोबिना टिप्‍पणी दिए लौट।
 
अविनाश वाचस्पति
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वो लाश किसकी थी ? / त्रिपुरारि कुमार शर्मा

शाम का मंज़र... कितना खौफज़दा है । आसमान खून से तर है । ऐसा मालूम होता है किसी ने सूरज का कत्ल कर दिया है । शायद आखिरी साँस उफ़क की बाहों में लेना चाहता है । वह डूबता ही जा रहा है । पुरानी यादों की आहट दिल पर दस्तक दे जाती है । कुछ ज़ख्मी लम्हों का काफिला
 
त्रिपुरारि कुमार शर्मा
टैग: wo lash kiski thi
Feb 25 2010 11:21 PM
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पापा कहते हैं ... गीतकार बड़ा या सिने-कलाकार ? (अविनाश वाचस्‍पति)

गीतकार बड़ा हैया सिने-कलाकारजिस पर होता हैगीत का फिल्‍मांकन।मुद्दा यह गर्म हैहल निकले धर्म हैसमझना हमें मर्म हैकरना सत्‍कर्म है।करते हैं जी देखियेअब वे तीखी तकरारफिर कैसे आयेगा करारसारी मेहनत हुई बेकार।पहले करो प्‍यारफिर दो आदरमैंने सुना हैटीम वर्क
 
अविनाश वाचस्पति
Feb 18 2010 08:55 AM
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स्मृति गीत: हर दिन पिता याद आते हैं... --संजीव 'सलिल'

स्मृति गीत:हर दिन पिता याद आते हैं...संजीव 'सलिल' *जान रहे हम अब न मिलेंगे. यादों में आ, गले लगेंगे.आँख खुलेगी तो उदास हो-हम अपने ही हाथ मलेंगे. पर मिथ्या सपने भाते हैं.हर दिन पिता याद आते हैं...*लाड, डांट, झिडकी, समझाइश.कर न सकूँ इनकी पैमाइश. ले पहचान
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
Feb 11 2010 09:53 PM
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दिल्‍ली हिन्‍दी ब्‍लॉगर मिलन : चित्रों का करिश्‍मा : पहने रहिये चश्‍मा (अविनाश वाचस्‍पति)

विनोद कुमार पांडेय ने तो लिख ही दी कविताचाय में भी लग रहा है उन्‍हें शायद तीखाहमें संभल संभल कर चलना हैअपनी राह को खुद ही चुनना हैमैं तो भूल ही गया तब क्‍या कह रहा थामेरी आदत है कि अक्‍सर भूल जाता हूंविनीत कुमार ही नहीं सभी विनीत हैहिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के
 
अविनाश वाचस्पति
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पिताजी

स्मृति गीत / शोक गीतयाद आ रही पिता तुम्हारीसंजीव 'सलिल' *याद आ रहीपिता तुम्हारी...*तुम सा कहाँ मनोबल पाऊँ?जीवन का सब विष पी पाऊँ.अमृत बाँट सकूँस्वजनों को-विपदा को हँससह मुस्काऊँ.विधि ने काहेबात बिगारी?याद आ रहीपिता तुम्हारी...*रही शीश पर जब तव छाया.तनिक
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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पिता की याद

पिताजी को गुजरे आज १२ वर्ष हो गए ...मगर जेहन में उनके साथ बिताये आखिरी तीन दिन हमेशा की तरह ताज़ा ही हैं ...माँ के घर उपरी मंजिल का निर्माण कार्य चल रहा था जिसके कारण माँ यही आई हुई थी ...पापा को अपने किसी काम से दिल्ली आना पड़ा था ...26 जनवरी और रविवार
 
वाणी गीत
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बाबू जी सेवानिवृत्त हो गये हैं.

हाथों में सब्जी का थैला, अंतर्मन में सवालों का झमेला, उलझते, रीझते,खीझते, और कभी मुस्‍काते , गोलमटोल आँखों में, एक उम्मीद लिए, कभी इस कभी उस दुकान जाते, इधर-उधर,भागते,मोल भाव करते, बहू -बेटे की कमाई के चार पैसे, बचाने की जद्दोजहद में कितनी तल्लीनता से
 
विनोद कुमार पांडेय
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गीत: हे समय के देवता! --संजीव 'सलिल'

गीतहे समय के देवता! संजीव 'सलिल' *हे समय के देवता! गर दे सको वरदान दो तुम...*श्वास जब तक जल रही है,आस जब तक पल रही है,अमावस का चीरकर तम-प्राण-बाती जल रही है.तब तलक रवि-शशि सदृश हम रौशनी दें तनिक जग को.ठोकरों से पग न हारें-करें ज्योतित नित्य मग को.दे सको
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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मै क्या करूँ मेरे तो एक ही मम्मी पापा हैं ना

कल मेरी बहन से बात कर रही थी तो उसने प्रसंग मे कुछ ऐसा कहा जो लगा कि वाकई मे सबके सामने यह बात बोली जानी चाहिये। यह बात सिर्फ मेरे पापा जी के लिये नहीं बल्कि उन सबके लिये है जिनके एक से ज्यादा बच्चे हैं।वैसे तो हम सब जानते हैं कि मम्मी पापा का प्यार अपने
 
गरिमा
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मेरी झूठी जिंदगी की सच्चाई...

Respected papa,मेल लिखते हुए अच्छा तो नहीं लग रहा पर मेरे लिए जरूरी था... आपको भी मालूम है मैं अपनी कोई भी बात आज तक सीधे तरीके से नहीं कह पाया बस यही तरीका समझ में आया... आप कह सकते है कि मुझ में हिम्मत नहीं है आपको face करने की. कहाँ से शुरू करूँ और
 
अभिषेक प्रसाद 'अवि'
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शुभ कामनाएं सभी को... संजीव "सलिल"

शुभ कामनाएं सभी को...संजीव "सलिल"salil.sanjiv@gmail.comdivyanarmada.blogspot.comशुभकामनायें सभी को, आगत नवोदित साल की.शुभ की करें सब साधना,चाहत समय खुशहाल की..शुभ 'सत्य' होता स्मरण कर, आत्म अवलोकन करें.शुभ प्राप्य तब जब स्वेद-सीकर राष्ट्र को अर्पण
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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पिता हैं साथ तो पुत्र तन्‍हा नहीं होता (अविनाश वाचस्‍पति)

जिसको कभी लालच नहीं होताहोता है, पर अपने लिए नहींचाहता है मन सब करे अर्पणसमर्पण सब यहीं पर है होता।पिता पर्याय है सदा देने कापुत्र तैनात सदा सब पाने कोदेकर भी सब कुछ यहां परपिता बीज सदा सुख के बोता।देता है सब कुछ खुशी खुशीचाहे संतान रहे सदा सुखीपिताजी का
 
अविनाश वाचस्पति
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" पापा कब आओगे ?"

अगस्त 2009 मेरी ज़िंदगी का सबसे बुरा दिन था क्योंकि उस दिन मैंने अपने पापा को हमेशा के लिए खो दिया ! पापा अब कभी नहीं आयेंगे लेकिन फिर भी मुझे हमेशा पापा का इंतज़ार रहेगा ! शायद ये इंतज़ार कभी ख़त्म नहीं होगा ! ) “ पापा कब आओगे ? “ पापा कब आओगे ? जान
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स्मृति दीर्घा: संजीव 'सलिल'

स्मृति दीर्घा: संजीव 'सलिल' * स्मृतियों के वातायन से, झाँक रहे हैं लोग... * पाला-पोसा खड़ा कर दिया, बिदा हो गए मौन. मुझमें छिपे हुए हुए है, जैसे भोजन में हो नौन.. चाहा रोक न पाया उनको, खोया है दुर्योग... * ठोंक-ठोंक कर खोट निकली, बना दिया इंसान. शत वन
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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मेरे पिता और पक्षी फीनिक्स

खुली खिड़की से कुलवंत हैप्पी कुछ दिन पहले मैं अहमदाबाद के रेलवे स्टेशन पर खड़ा बठिंडा को जाने वाली रेलगाड़ी का इंतजार कर रहा था, मैं खड़ा था, लेकिन मेरी नजर इधर उधर जा रही थी, लड़कियों को निहारने के लिए नहीं बल्कि कुछ ढूंढने के लिए, जो खोया भी नहीं था। इत
 
Kulwant Happy
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"कुछ सूत्र" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

अनमोल बातें !! (1) बच्चों को दण्ड नही दिशाएँ दें!  (अज्ञात) (2) अच्छी बात बच्चे की भी मान लो लेकिन बुरी बात फरिश्ते की भी मत मानो!  (अज्ञात) (3) प्रणाम लेने का अधिकार उसी का है, जो प्रणाम करने वाले से अधिक योग्य हो!  (अज्ञात) (4)
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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शोकगीत: नाथ मुझे क्यों / किया अनाथ? संजीव 'सलिल'

पूज्य मातुश्री स्व. शांति देवि जी की प्रथम बरसी पर शोकगीत: नाथ मुझे क्यों / किया अनाथ? संजीव 'सलिल' नाथ ! मुझे क्यों किया अनाथ?... * छीन लिया क्यों माँ को तुमने? कितना तुम्हें मनाया हमने? रोग मिटा कर दो निरोग पर- निर्मम उन्हें उठाया तुमने. करुणासागर!
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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स्‍मृति-शेष पिता ! (सुभाष नीरव)

पिता अब नहीं रहे। गत 22 अक्‍तूबर बृहस्‍पतिवार रात्रि 10.30 बजे) उन्‍होंने मुझसे छोटे दो भाइयों की गोद में अंतिम सांस ली। जीवन भर दुख - तकलीफों और मुश्किलों से लोहा लेने वाले पिता अपनी भयंकर बीमारी से भी अपनी जीर्ण-शीर्ण काया में भी बची खुची शक्ति से
 
अविनाश वाचस्पति
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पिता की याद संदीप जोशी : दैनिक जनसत्‍ता में प्रभाष जोशी के पुत्र ने लिखा हैहै

दैनिक जनसत्‍ता के आज दिनांक 9 नवम्‍बर 2009 के अंक में संपादकीय पेज पर उनके सुपुत्र संदीप जोशी को स्‍मृतिलेखा स्‍तंभ के अंतर्गत पढि़ए। साभार जनसत्‍ता
 
अविनाश वाचस्पति
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स्मृति गीत: संजीव 'सलिल'

स्मृति गीत: संजीव 'सलिल' सृजन विरासत तुमसे पाई... * अलस सवेरे उठते ही तुम, बिन आलस्य काम में जुटतीं. सिगडी, सनसी, चिमटा, चमचा चौके में वाद्यों सी बजतीं. देर हुई तो हमें जगाने टेर-टेर आवाज़ लगाई. सृजन विरासत तुमसे पाई... * जेल निरीक्षण कर आते थे, नित
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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एक पत्र अपने पिताजी के नाम...

आदरणीय पा,सादर प्रणाम। अपनी २५ सालों की जिंदगी में पहली बार कुछ कहना चाहता हूँ आपसे पा। कुछ ऐसी बातें जो हमेशा मुझे परेशान करती है। जिसे कहने की हिम्मत मैं आज तक नही जुटा पाया।शम्भू चाचा से कई बार आप दोनों भाइयों की तकलीफों की कहानियाँ कई बार सुन चुका
 
अभिषेक प्रसाद 'अवि'
टैग: khamoshi