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अंतर्द्वंद का आइना

http://kavita-knkayastha.blogspot.com/
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29 May 2010
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मेरा कमरा...जीवन

मेरा कमराऔर मेरी याददाश्तदोनों हैं भरेसड़ी घुटन से,उनके बीच मेंमैं रहता हूँ....बदलते मौसमऔर गुजरते दिनलाते रहे हैंकितने बदलाव,अच्छे और बुरेमैं छांटता हूँ...कडवी यादों कोमिटा सकूँजेहन सेकिसी तरह,इसी प्रयास मेंमैं रहता हूँ...सुनहले पलों कोघर में अपनेसजा
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धुँआ-धुँआ जिंदगी...

धुँआ-धुँआ जिंदगी...तन्हा-तन्हा आदमी...कौन कहता हैहै आसान यह खेल,लेना जन्मऔर मर जाना एक दिन!!!धुँआ-धुँआ जिंदगी...तन्हा-तन्हा आदमी...कौन नहीं चाहता हैहै निभाना रिश्तों को,हो जाना किसी  काफिर जुदा होना
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बाँटो प्यार...

कभी आँखों से छलका दो प्यार,कभी बातों से बतला दो प्यार... बुरी आदत है अश्कों से इश्कखुदी के बल पे अपना लो प्यार...शमा को जलने दो सारी रात,हमें तो बुझकर दिखला दो प्यार...नहीं मोहब्बत आसां है यार,सको तो बाँटो जितना हो प्यार...
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बदन

जोश है इस जिस्म में, जज्बात से सिहरता बदनजंग से हालात हैं, हर रात है पिघलता बदन.आरज़ू-ए-वस्ल वो, खूंखार आज बाकी नहीं साथ हो इक हमसफ़र, तन्हा पड़ा तरसता बदन.कायदा संसार का, इंसान पे लिपटता कफ़न,फ़र्ज़ की आदायगी, है दर-बदर भटकता बदन. जिंदगी में ज़ख्म
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anurodh

प्रिय मित्रों...मेरे इस ब्लॉग पे बार-बार कुछ प्रोब्लेम्स आ रही है...इसलिए मैं अब अपनी सारी रचनाओं को धीरे-धीरे अपने दूसरे ब्लॉग पे स्थानांतरित कर रहा हूँ... कृपया उस पे जा कर अनुसरण  करें और मेरी पुरानी और नयी रचनाओं को पढ़ें और आलोचना-समालोचना
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किससे क्या कहें? (साभार: हिंदुस्तान)

जब उजाले साथ छोड़ दे,तो साए को दोष कौन दे?जब मांझी ही नाव डुबे दे,तो नाव को दोष दे?जब माली बाग़ उजाड़े,फूलों को दोष कौन दे?जब अपने कफ़न ओढ़ा दे,तो पडोसी को दोष कौन दे?जब मौसम रंग बदल ले,तो 'विवेक' को दोष कौन दे?
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...कैसे???

टुकडों में जी जाती है जिंदगी कैसे?ज़ख्मों की की जाती है गिनती कैसे?मेरा हर झूठ बन जाता है सच,इस सच पे लिखूं शायरी कैसे?हर तरफ़ अपनों की लगी है भीड़,इस शोर को कहूँ तन्हाई कैसे?अन्दर कुछ,बाहर कुछ और हूँ मैं,आईने में देखूं अपनी सच्चाई कैसे?कहते हैं फकीरी
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Feb 24 2010 06:41 PM
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संभला नहीं लेकिन...

मैं जब कहता हूँसोया नहीं कई रातों से,तुम्हें होता नहीं यकीन।मैं जब सोचता हूँघर से बाहर जाऊँ कैसे,कदम तले नहीं जमीन।मैं जब चाहता हूँभावों को पिरो दूँ कागज़ पे,शब्द मिलते नहीं जहीन।मैं जब ताकता हूँठहरे वर्तमान से पीछे,एक टुकडा नहीं सुकून.मैं तब कोसता
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Feb 24 2010 06:41 PM
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अपनी ख्वाहिश

लोगों को देखा तो ये सोच आयाहम अपनी कोशिशें रखेंगे ज़ारी!सफलता को छूने के लिए करेंगे मेहनतअपनी ख्वाहिशें न रहने देंगे अधूरी!इस सोच को न बदलने देंगे!आये हर सफलता को न जाने देंगे!!होगी यही कोशिश की करें खुद भी मेहनत !कुछ न छूटे हमसे, इसलिए हम लें सबसे मदद!!
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Feb 20 2010 10:38 AM
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मेरी कविता के बिखरे टुकड़े...

1.पतंग डोर मेरे हाथ मेंसरसर उड़ती पतंग,जैसे ईश्वर और इंसान का संग।2.पंखापंखा घूमें कमरे मेंहवा में फैले तरंग,जैसे कर्म भाग्य का संग।3.शराबतन में उतर कर शराबतनकर बाहर आए,जैसे सफलता इतराए।4.अखबारआजकलमैं पढता नहीं अखबार,एक ही ख़बरबार-बार।
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भोला इंसान

सुबह रात सी कालीआसमान में खुनी लाली खाली जूठी प्याली।भय से फैली आँखसमाचारों की टूटती साखमासूम सपनो की राख।गहरी जेबों का प्रहाररिश्तों को बेचते बाज़ारखोखले वादों की सरकार।शिक्षा का अभिमानभोला बड़ा तू इंसान व्यावहारिक नहीं तेरा ज्ञान.
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यकीन कर लो

यह ग़ज़ल मैंने "तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो" कीतर्ज़ पर लिखा था और पहले भी प्रकाशित कर चूका हूँ.  आज पुन: प्रस्तुत कर रहा हूँ...आशा है पसंद आएगी ... धन्यवाद...तुम जो इतना मुस्कुरा रहे होक्या है कहना जो छुपा रहे हो!नज़रें ये तेरी बता रही हैंनगमे
Feb 01 2010 04:24 PM
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अश्कों के मायने अलग होते !!!

रहमोकरम पे आपके/हमने गुजारें हों/कुछ पल अगर,यूँ ना समझना/सुकून से जीकर/मर सकें हैं हम।टूटते रहे थे/मेरे आसमान के तारे/एक-एक कर,रौशनी की लकीर/दीखती न थी,बढ़ता जाता था/अंधेरे का डर।अजीबोगरीब हुए हादशे/जिंदगी में हमारे/यकीन ना होगा,तबियत से
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बने एक सवेरा

दूर हटे बीते साल का अँधेरा,सबके लिए बने एक सवेरा!फूलों की खूसबू मिले हर इंसान को,खूसगवार ज़िन्दगी मिले हर इंसान को!आतंक की अर्थी उठे इस देश में,हम दिखें हमेशा भारतीयेता के देश मेंनफरत खाक में मिलेहर जगह प्यार के फूल खिले!हम हर इंसान को,इंसानियत का पाठ
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बनो मेरी दुल्हन...

कभी मेरे दिल में ठहर के तो देखोहजारों हैं यादें, गुजर के तो देखो।बनाया है ये घर तुम्हारे लिए ही,किसी सहर यहाँ पे नहा के तो देखो।मचलती हैं बाहें कहें तुमको कैसेआगोश में मेरे सिहर के तो देखो।सजाया है कमरा गुलाबों से ऐसेबनो मेरी दुल्हन बिखर के तो
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मैं न रहूँ

मैं हूँ खुशियाँ हैं खट्टा-मीठा संसार है। मैं हूँ जीवन है जीवन के आदर्श हैं। मैं हूँ जिंदगी है जीने की चाह है। मैं हूँ सफलता है सफल होने की योग्यता है। मैं न रहूँ संसार नहीं जीवन नहीं आदर्श नहीं योग्यता नहीं...
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जीवन से बिछुड़ा श्याम

यह मेरी एक सात-आठ वर्ष पुरानी कविता है जो पहले भी इस ब्लॉग पर प्रकाशित हुई थी ... यादों के कुछ टुकड़े खूंटी से लटके कपड़े कोने में रखे मटके और भाग्य के झटके... बीता अभी बचपन उम्र लगे पचपन टूटा हुआ तन-मन और बर्तन करें ठनठन... ज्ञान की बड़ी-बड़ी बातें भूख
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स्वतंत्र हैं हम?

मैंने यह कविता १९९२ में लिखी थी...इसे मैं अपनी पहली कविता कह सकता हूँ ... यह हिंदी-युग्म के काव्य-पल्लवन पे भी छाप चूका है...एक बार इस ब्लॉग पर भी लिखा था परन्तु आप लोगों की नज़र में नहीं आ पाई...पुन: आपकी आलोचना-प्रसंशा हेतु प्रस्तुत कर रहा हूँ....आश
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अफ़सोस है मुझे

हमें सभी के लिए बनना था और शामिल होना था सभी में हमें हाथ बढ़ाना था सूरज को डूबने से बचने के लिए और रोकना था अंधकार से कम से कम आधे गोलार्ध को हमें बात करना था पत्तियों से और इकठ्ठा करना था तितलियों के लिए ढेर सारा पराग हमें बचाना था नारियल के पानी और
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शायरी (एक नज़र)

इश्क के गुलशन को गुल गुज़र न कर! ऐ नादान इंसान कभी किसी से प्यार न कर! बहुत धोखा देतें हैं मोहब्बत में हुस्न वाले इन हसीनो पर भूल कर भी ऐतबार न कर! मौसम के हर वक़्त को बदलते देखा है! चांदनी के लिए चाँद को तरसते देखा है! जिसे लोग कहते हैं आंसू उन्हीं
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जाने क्यूँ...

जाने क्यूँ... तन पर ओढी मायूसी की चादर उतारकर बेरंग जमाने पर रंग उडाने का जी नहीं करता! जाने क्यूँ... फुलझडी जलाकर रौशनी की बूंदे पसरे अंधकार पर छिडकने का जी नही करता! जाने क्यूँ... अहले सहर पत्तों पे बिखरे शबनमी मोटी उठाकर आँखों से लगाने का जी नहीं
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ग़ज़ल... तो नहीं...

जिंदगी ईंटों से बनी कोई इमारत तो नहीं! कब्रिस्तान में लाशों को शिकायत तो नहीं? सिकंदर बड़े-बड़े वक्त की मिट्टी में मिले, मौत शहंशाह की भी क़यामत तो नहीं! दाग मेरे दामन में थे पुराने कितने, दिखाया था तुझे, की वकालत तो नहीं। मासूमों के खून से रंगी है सर
Dec 13 2009 08:36 AM
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टूटा घडा

मैं चाहता हूँ मिल जाना मिट्टी में, लेकिन आह! मैं मिल नहीं पाता क्यूंकि मैं साधारण मिट्टी नहीं एक घडा हूँ, टूटा हुआ घडा...
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बापू सुन ले!

बापू! तू ये क्या लाया है? सवारों की गालियाँ सुनता तू, सवारों को गलियां देता तू, कभी-कभी हाथापाई करता तू जो पैसे कमाता है; उनसे लाई ये टाफियाँ, ये कापियाँ मुझे गालियों जैसी लगती हैं, लातों और थप्पडों जैसी लगती है। बापू! तू क्यों रिक्सा चलता है?
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दोहा

वचन गुरु पिता के हैं, लगते बड़े कठोर। निज स्वारथ साधन हेतु, पकडे रहते डोर॥ काली-काली भैंस को, देख मुझे कुछ होय। रंग-भेद के कारण न, गौ माता कहलाय॥ उतने कदम बढाइये, जितनी जरुरत होय। जंगल सागर ना बचे, धरती मरू बन जाय॥ रामराज की चाह में, जनता हुई शहीद। र
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इन्तहां इम्तहान की

खुदी को किया बुलंद हिम्मत से अपने, दुश्मन थे जो सर झुकाने लगे हैं॥ गलियों से आजकल गुजरने पर मेरे झरोखे भी अब मुस्काने लगे हैं॥ सड़कों पे अजनबी जितने थे चेहरे आसपास महफ़िल सजाने लगे हैं॥ जमाने का ऐसा हो गया है रिवाज, उन्नति को अपना बताने लगे हैं॥ जिंदग
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ग़ज़ल:- (साभार:- हिंदुस्तान अखबार)

वो साहिल पे गाने वाले क्या हुए! वो कश्तियाँ चलाने वाले क्या हुए! वो सुबह आते-आते रह गई कहाँ जो काफिले थे आने वाले क्या हुए! मैं जिन की राह देखता हूँ रात भर वो रौशनी दिखने वाले क्या हुए! वो कौन लोग हैं मेरे इधर-उधर वो दोस्ती निभाने वाले क्या हुए! इमार
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बेबस आह!

अधखिली कली वो जूही की मेरे बचपन की माली थी, मेरे सपनो की गलियों में फिरती बनी मतवाली थी। चंचल चितवन, गोरी शबनम सोम-सुधा की प्याली थी, वह वसंत के दिन में मेरे जीवन की हरियाली थी। जब यौवन सावन घिर आया दूर खड़ी भरमाती थी, गुमसुम गुपचुप नयनों से उसकी छुअन
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आपसे मिलकर

कुछ कदम ऐसे मिले जो अर्सों से दूर थे! कुछ बात ऐसी सुनी जो अर्सों से गुमशुदा थी! पुराने दोस्त लौट आए! पुरानी यादें लौट आई! ढूंढ रहे थे जिसे हम वो अब हैं मिल पाये! खुश हुए हैं आपसे मिलकर खुश हो जाइये आप भी! मत सोचिये अब मुझे और कुछ कीजिये भी!
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चौराहा पे राही

हर वक़्त ख़ुद को चौराहे पर खड़ा पाता हूँ, टार्च पास नहीं, अंधेरे में भटक जाता हूँ। जो सीधे रास्ते चले थे आगे निकल गए, हम नए राह की खोज में पिछरते चले गए। वक्त का तकाजा समझा मैं ठोकरों के बाद लहूलुहान थी शख्सियत, खुले थे मेरे हाथ। गर चाहते हो तुम, दामन
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फांस

लगी पलंग टटोलने, व्याकुल होकर आज। उठी तुंरत विचारने, रात्री के परिहास॥ कहीं मतंग तरंग में, निकली ऐसी बात। लगी पिया के ह्रदय, गहरी कोई फांस॥ चली भ्रमित देखने, रुकी हुई है साँस। लगी भयभीता फिरने, बुझी हुई है आस॥ तभी किचन की ओर से, आई एक आवाज। बर्तन सार
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एक और रात.....

अजीब-सा रास्ता भूली हुई राह एक और रात लो फिर आ गई! भुला-भुला-सा प्यार भूली-भूली-सी जगह एक और रात लो फिर आ गई! मुझे समझ में नहीं आया कहानी की क्या विषय थी एक और रात लो फिर आ गई! चेहरे पर उदासी मन में क्या बात थी एक और रात लो फिर आ गई! मन प्रसन्न था बा
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मेरी कुछ बातें

मैं सोचता हूँ हर दिन कुछ करुँ नया ! सोचते - सोचते कुछ न मिला और वो दिन बीत गया ! मेरा सवेरा होता था कुछ ख़ास लम्हों के साथ ! बीतती थी मेरी रात एक नए सोच के साथ ! दीवार बनकर उदासी मेरे दिल पर ! क्या करुँ , क्या न करुँ बचकर रहता हूँ इससे मैं घबराकर ! म
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छोटी-सी एक ग़ज़ल

घर की तामीर चाहे जैसी हो इसमें रोने की जगह रखना! जिस्म में फैलने लगा है शहर अपनी तन्हाईयाँ बचा रखना! मस्जिदें हैं नमाजियों के लिए अपने दिल में कहीं खुदा रखना! मिलना-जुलना जहाँ जरुरी हो मिलने-जुलने का हौसला रखना! उम्र करने को है पचास को पार कौन है किस
Oct 14 2009 07:45 PM
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इरादे

इरादे अच्छे होते होते हैं इरादे बुरे होते हैं पर क्यों होते हैं वे अच्छे या बुरे? दिल तो बुरा नहीं होता, दिल भी बुरा नहीं होता और इनमें ही बनते हैं इरादे! फिर क्यों हो जाते हैं इराद अच्छे या बुरे? समाज के मानक पर जो खरा वो अच्छे, समाज के मानक पर जो ख
Oct 14 2009 07:45 PM
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आज की नारी

बेटी आज की गाय नहीं जिसे खूंटे में बाँध दो और चरणे को थोरी सी घास दाल दो! वह आज की नारी है उसकी प्रगति जारी है! आज... न वह जलती हुई मोमबत्ती है और न पिघलता हुआ मोम, आज की नारी उन्नति की ऐसी शिला है जिसके सहयोग से समाज का नया रूप खिला है!
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क्या होगा !!!

मंजिल-मंजिल सोच रहा था,कदम-कदम पर खोज रहा था,मिला नही जवाब कोई...मैं आज तकतड़प-तड़प कर मर रहा था!पूछता था हर कोईक्या हुआ है, बता तू?उनसे डर कर,सोच-सोच करमैं ये दिल से पूछ रहा था-नसीब में मेरे क्या लिखा थाये मैं नहीं जानता था!आगे क्या होगा मेराये मैं नहीं
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Sep 26 2009 05:20 PM
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आने वाला कल...

ज़िन्दगी के सफर में रोज नया तूफान खड़ा !तू क्या सोच रहा कुछ कर के दिखा! ये पल बीत जाएगा ये कल कभी न आएगा! जो बीत सो बीत आएगा कुछ आगे करने की सोच जरा! तूने जो किया अब तक, उसे अपने सोच से हटा दे! तेरे साथ क्या होगा अब ये सबको तू बता दे! तेरी जब कभी
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सपना और सच...

मुझे हक हैआगे बढ़ने काकुछ करने का !मन से कहता हूँइच्छा जताता हूँबैठता हूँ करनेकर नहीं पाता हूँ!कोशिश करता हूँसफलता पाने कीअसफलता हाथ लगती है!मन की इच्छापूरी नहीं हो पातीमन में अजीब-सीहरकत होने लगती है!आसन से काम को लेकरचिंता में रहता हूँ!मन में समस्याएं
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कुछ नए पल

एक नया एहसास लेकरनए जीवन जीने कीमैं निकला हूँछोर पकरने!एक नई खुशी लेकरअपनी उदासी कोमैं निकला हूँअलविदा कहने!कुछ नए पलजीने को मिलेये सोचकर निकला हूँमैं अपनी मंजिल ढूँढने!दिल की उदासी दूर हो!दिल को खुशी हो!दिल की प्यास बुझे!दिल में नया एहसास जगे!ये सोचकर
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