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सफ़ेद घर

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17 Jun 2010
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कैसी जुल्मी बनायी तैने नारी.......कि...... मारा गया ब्रह्मचारी..........सतीश पंचम.

मेरे यहां आज दुपहरीया आसमान में काले काले बादल जमा हो रहे थे। कुछ काले, कुछ श्यामल, कुछ उजले तो कुछ बेहद मटमैले। कुछ का आकार दैत्यों जैसा था तो कुछ पहाडों के होने का भ्रम दे रहे थे। एकाध को देख लग रहा था मानों कहीं आसमान में कोई आग जलाई गई है और उससे
 
सतीश पंचम
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बिन-गौना हुए पर्स में रखी पत्नी की तस्वीर, घाटकोपर स्टेशन, बोल राधा बोल के अनूठे संस्मरण के साथ एक रापचीक अल्हड़पन ...........सतीश पंचम

        क्या कभी आपका कोई चोरी हुआ सामान वापस चोर ने लाकर रख दिया है ?  कुछ भी….चोरी हुआ  सामान जैसे…. मोबाईल, घडी, उस्तरा, छेनी, हथौडी……कुछ भी ?     क्या कहा ? संभावना
 
सतीश पंचम
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ये ओढ़निया ब्लॉगिंग का दौर है गुरू......ओढ़निया ब्लॉगिंग.....समझे कि नहीं........सतीश पंचम

       आज कल ओढ़निया ब्लॉगिंग की बहार है। ओढ़निया ब्लॉगिंग नहीं समझे ? तो पहले समझ लो कि ओढ़निया ब्लॉगिंग आखिर चीज क्या है ?    कभी आपने गाँव में हो रहे नाच या नौटंकी  देखा हो तो पाएंगे कि नचनीया
 
सतीश पंचम
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मुलैमा, टीवी, महतो, माओ, उखाड पटरी, राजनीति वाली मुनिया......और अबूझा मन.....सतीश पंचम

          दिल की ये आरजू थी कोई दिलरूबा मिले……सितार वाले…   राजबब्बर.…….महेंद्र कपूर…….……चाय पी लो ठंडी हो रही है…..सी टी सी चाय ……..……गर्म हैंडल…..ए घुम ले ........ए घूम ले..... ये दुनिया बड़ी मजेदार….अमेरिकन
 
सतीश पंचम
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ब्लॉगिंग ऐसी हीर है कि बस्स...... की दस्सां............सतीश पंचम

       कभी मुझे अपने लेखन पर इतना कॉन्फिडेंस था कि जब पोस्ट लिखने के कुछ देर बाद तक यदि कोई टिप्पणी नहीं आती थी........ तब एक टेस्ट कमेंट लिख चेक करता था कि कहीं टिप्पणी आदि के बारे में कोई तकनीकी रूकावट तो नहीं है :) हंस
 
सतीश पंचम
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तोर रूप गजब...... धान के कटोरे की महक पहुँचाती एक अनुपम कृति.....सतीश पंचम

     कुछ उपन्यास ऐसे होते हैं जो कि कथा-कहानी की मान्य लकीरों को लगभग काटते हुए  सनसनाते हुए  निकल लेते हैं और जब तक कि आप समझें कि क्या हुआ, वह उपन्यास आगे किसी खेत में खड़ा मिलता है, हंसते हुए, अपने पीछे बुलाते हुए और इस बात का
 
सतीश पंचम
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देख रहे हो लॉर्ड कर्जन......तुम्हारी बात सच हो रही है....सतीश पंचम

देख रहे हो लॉर्ड कर्जनकभी तुमने कहा था ठीक धरती की तरह मंथर गति से हौले-हौलेभारत में फाईलें घूमती हैं इस टेबल से उस टेबल   उस टेबल से इस टेबल  वो देखो अफजल की फाईल वह भी घूम रही है राज्य और केन्द्र के बीचकेन्द्र और राज्य के बीचठीक
 
सतीश पंचम
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किताबे पढ रहा हूँ ....फिलहाल ब्लॉगजगत ठेलायमान है.....सतीश पंचम

  किताबों पर वक्त लगा  रहा हूँ....फिलहाल तो मुझपर पुन्नी सिंह रचित 'तोर रूप गजब'  किताब अपने जलवे बिखेर रही है ....एक सूकून मिलता है ऐसी किताबों को पढने से।      छत्तीसगढ की पृष्ठभूमि पर एक कस्बाई  कॉलेज में
 
सतीश पंचम
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डिस्कवरी के Man v/s Wild कार्यक्रम से कई बातें सीखी जा सकती हैं....जरा ध्यान से देखें अबकी बार.....सतीश पंचम

      टीवी पर तमाम बेतुके, गैर जरूरी और नासमझी भरे तमाम कार्यक्रमों के बीच ही डिस्कवरी चैनल पर एक बहुत ही रोचक और एडवेंचर से लबरेज, इंसानी जज्बे को दिखाता  एक कार्यक्रम आता है Man v/s Wild. उसके किरदार हैं Bear
 
सतीश पंचम
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गाँव में छत पर सोना...पुरूआ बयार....टूटता तारा....छूटता लुक्क....चंदा मामा... आरे पारे......ग्राम्य सीरिज....और मैं सतीश पंचम

   गाँव में खुले छत पर सोने का आनंद ही कुछ और होता है। आप छत पर पडे पडे आकाश में लटके सितारों को देख रहे हैं…..चाँद दिख रहा है….उसमें किसी का चेहरा ढूँढा जा रहा है….बचपन की लोरी याद आ रही है…चंदा मामा आरे आवा…पारे आवा…नदिया किनारे आवा…दूध
 
सतीश पंचम
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मेरे पिया गये रंगून....लुंगी कौन पहनता है बे......नवाबिन से पूछो.... मूर्ति बनवा दूँ......क्या बकता है ..लछमी दासिन....सतीश पंचम

एक कोलाज :  फिल्म और साहित्यलोग अब जहर बोते हैं बाबू...... मेरे पिया गये रंगून..... किया है टेलीफून..... तुम्हारी याद .......मोबाईल की अम्मा......अब कौन लुंगी में घूमता है रे.......पैंट पहन कर चलने में नवाबी फटकती है.....चप्पल फटकारते हुए
 
सतीश पंचम
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गेहूँ की लदवाई....कण्डाल....पर्ची... ग्राम्य सीरिज ......सतीश पंचम

     जिस काम की आदत न हो और वही काम अदबदाकर किया जाय तो  उसका कुछ न कुछ उल्टा असर, हो जाता है।      ऐसा ही कुछ मेरी इस बार की ग्राम्य यात्रा के दौरान हुआ।...... हुआ यूँ कि घर में गेहूँ के करीब आठ-दस बोरे
 
सतीश पंचम
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ये देखिये खुल्ले में नहा रहा हूँ.....हरियाली के बीच....ग्राम्य सीरिज चालू आहे ...सतीश पंचम

         क्या कभी आपने खुले में नहाया है ? पोखर में, नलकूप पर, बाल्टी लेकर रास्ते में ही, या सींचे जा रहे खेत में  पाईप से.......कभी नहाया हो तो उसका आनंद भी पाए होंगे जरूर।     यहाँ देखिए मैं गाँव में
 
सतीश पंचम
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सन्तों के चरण छूते हुए चिकोटी काटने का मन हो रहा है....कहीं आप का भी मन लहक रहा हो

     जहँ जहँ चरण पड़े सन्तन के, तहँ तहँ बंटाढार……यह बात मेरे गाँव के पोखरे के लिए सटीक बैठती है। ठीक दो साल पहले के ये तीन चित्र हैं और ठीक दो साल बाद के ही सूखे पोखर वाले चित्र है…..नरेगा का भरपूर उपयोग हुआ है…..पैसा पानी की तरह बहा
 
सतीश पंचम
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अबे तू लड़की से लभ करता है तो बोल दे उसको, सैंडिल का नम्मर ईयाद है, गजे-गज्ज, जियो राजा.....अब तो..... ....सतीश पंचम

            कबसे कह रहा हूँ कि टायर में हवा कम है साहेब.........फिर भी लादे जा रहे हैं लोग त बताईये मैं क्या करूं........... लाईसेंस........ई ल्यो चाह पा ..............ट्रैफिक हवलदार न हुए
 
सतीश पंचम
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जासूस छिनारी, पलंग तोड़- मर्द चौड़ी पत्ती, जेल यात्रा, मट्ठा, गोदान, रोवनछा और मैं .........सतीश पंचम

     गाँव की ही  एक दुकान में बैठे हुए  कुल्हड़ वाली चाय पी रहा था कि तभी नजर पान – तमाखू और जर्दे आदि के बीच रखे एक तमाखू वाले डिब्बे पर जा टिकी। लिखा है – पलंग तोड़, मर्द चौड़ी पत्ती……… तमाखू …..साथ ही डिब्बे पर एक दाढ़ी मूँछ
 
सतीश पंचम
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गठरी- मोठरी..... मुलैमा... गाड़ी इस्लो.... चुल्ली गुरूजी.... मयगर महतारी ..... बिटिया....सूप..पिसान...नईहर....ऐ रिक्सा.....चाँप दूंगा...चढ़े

                       गाँव जाने के लिये तैयार हो रहा हूँ.... …..नॉस्टॉलिजिया चोंक रहा है……बस अड्डे पर खलासी का चिल्लमचिल्ल………..एक सवारी एक सवारी……रोक के.... रोक के…….चलाsss……ए भाई साईकिल
 
सतीश पंचम
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इस्तिफित मंत्री करूर और उनके ड्राईवर के बीच की एक्सक्लूसिव बातचीत - सर, चिंता नको... महान कवि और समाज सुधारक श्री गोविंदा जी का कहना था कि खाओ,

           मंत्री करूर अपना इस्तीफा देने के बाद जल्दी जल्दी मीडिया से नज़रें बचाते हुए अपनी गाड़ी में जा बैठे। ड्राईवर को कहा चलो जल्दी कहीं रोकना मत। मीडिया वालों के सामने तो कत्तई मत धीमे
 
सतीश पंचम
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सड़क....बैनर....देखो गधा मू........टन्न्....कच्चा आम...औरत का मन....शर्तिया....खट्टा......एक 'मन्नाद'....

               सड़क पर चला जा रहा हूँ.............सारिका साड़ी सेन्टर............महमूद गैरेज.......इंडियाना जोन्स रेस्टोरेण्ट.......सामान बेचते दुकानदार...... कोई सब्जीवाला ......... कोई
 
सतीश पंचम
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और मेरे मित्र ने मुंबई को हमेशा के लिए छोड़ दिया...............सतीश पंचम

            वैधानिक चेतावनी : इस पोस्ट में कुछ शब्द अश्लील हैं इसलिए उन्हें तारांकित कर पेश कर रहा हूँ। यार दोस्तों के बीच ऐसी ही बातें होती हैं इसलिये शाब्दिक पवित्रता के आग्रही, इस पोस्ट में किसी
 
सतीश पंचम
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ख़बरों में आज का यह दौर है कि.........ज़रा रूको भी.......मुंह उस तरफ़ फेर लेने दो.........सतीश पंचम

'ख़बरनवीसी' का है ये आलम, शहीदों के घर था मातम रो रही थी संगिनी, रो रहे थे बच्चे मईया बिलख रही थी, गईया भी चुप खडी थी थी देहरी भी सूनी-सूनी, रस्ते भी चुप पडे थे और ख़बरें चल रही थीं बहुत तेज़ चल रही थीं कुछ दौड़ रही थीं कुछ हाँफ रही थी सेहरा कब बँधेगा,
 
सतीश पंचम
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तरकश के पन्ने - जावेद अख्तर जी की जुबानी ( पार्ट - 2)...........सतीश पंचम

 जावेद अख्तर जी की रचना  'तरकश' में उन्होंने खुद की जो जीवनी लिखी है उसका पहला भाग आपने मेरी पिछली पोस्ट में पढा होगा ।  पेश है  तरकश के उन्हीं पन्नों का शेष भाग जावेद जी की ही जुबानी................ - सतीश
 
सतीश पंचम
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तरकश के पन्ने.......जावेद अख्तर जी की अनुमति से यह पोस्ट प्रकाशित कर रहा हूँ, उम्मीद है आप लोगों को भी कुछ आपबीती याद आए............सतीश पंचम

          जब मैंने जावेद अख्तर जी की लिखी किताब ‘तरकश’ के यह पन्ने पढे तो लगा कि आप लोगों से इसे साझा किया जाय।  यही सोचकर मैंने जावेद जी से बात की और इसे अपने ब्लॉग पर देने की ख्वाहिश जताई और जावेद जी ने
 
सतीश पंचम
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देसी मोरनी की शादी विदेशी मुर्गे से तय क्या हुई कुकड खाँ 'हुल्ल' की ट्रैक टू डिप्लोमेसी परवान चढने लगी है........सतीश पंचम

          इधर  मोरनी की शादी एक विदेशी मुर्गे से तय होते ही दोनों पक्षों में गजब की खदबदाहट चल रही है।  मुर्गा पक्ष के लोग खुश हैं कि इसी बहाने हम मोरनी पा गये वहीं मोरनी पक्ष के लोग इसलिये खुश हैं कि उन्हें
 
सतीश पंचम
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गिलकारी और उरियानी.......सतीश पंचम

गिलकारीजमीं पर हो रहे तमाम बहस मुबाहसोंतमाम तकरीरों,तमाम तहरीरों का है ये असर कि आसमां के पलस्तर अब झडने लगे हैं गिलकार* से कहोहाथ आसमां पर दुबारा फिरा दे। गिलकार* – छतों / दीवारों पर प्लास्टर करने वाला
 
सतीश पंचम
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चहबच्ची......इसराफील........और मैं ..............सतीश पंचम

चहबच्ची**                                     वो चहबच्ची अब कहां से खोद लाउं छिपाये जिसमें थे दिन अमनों- सूकून केअब तो वह जमीन भी बंट चुकी है नपी है चहबच्ची भी जमकर
 
सतीश पंचम
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हरा लिहाफ ओढे हुए मेरा यह तुलसी-बिरवा और कच्ची जमीन को छूती मेरी आराधना.........सतीश पंचम

     मेरे घर में काफी  पुराना तुलसी का पौधा सूख जाने पर,  पिछले दिनों हमने तुलसी का एक नया पौधा लगाया। यह पौधा एक फेरीवाले से लिया गया था जो कि अक्सर मेरी बिल्डिंग में अपने सिर पर फूल-पौधों के छोटे छोटे पौधे एक
 
सतीश पंचम
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महिला आरक्षण की वजह से पनपेंगे इमोशनल अत्याचार

        मुझे लगता है कि महिला आरक्षण से ऐसे नेताओं की मुसीबत बढने वाली है जिनके घर में राजनीतिक आकांक्षाएं लिये कई कई महिलाएं होंगी…कोई देवरानी होगी, कोई जेठानी होगी, कोई ननद होगी। पहले जब तक पुरूषों को ही लडना होता था तो ठीक था,
 
सतीश पंचम
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हिरन, चाँद, सूरज, तारे आदि के निशान उकेरे गये पत्थरों के कोल्हू....कहीं आपके गाँव में भी तो नहीं हैं .....सतीश पंचम

           मैंने अपने गाँव में बडे बडे आकार के गोल पत्थरों वाले कोल्हू देखे हैं। उन पर इंसानों, जानवरों, चाँद, सितारों, हिरन आदि की आकृतियां बनी हैं। मैं  हैरान होता हूँ कि इसे कैसे बनाया जाता होगा, सडक, परिवहन के अभाव
 
सतीश पंचम
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Mar 06 2010 05:06 AM
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1411: गुलजार के लिखे 'दिल तो बच्चा है' वाला गीत सुन कर जब एक बाघ को बीडी जलाने की इच्छा होने लगे तो........सतीश पंचम

और भई बाघ, इस खडखडीया दोपहरी में कहां मारे मारे फिर रहे हो ? गुलजार जी को ही ढूँढ रहा हूँ। क्यों, तुम गुलजार को क्यों ढूँढ रहे हो भई।उन्हें ढूँढ रहा हूँ क्योंकि वही हैं जो कि हमारे बाघों के  मन की बात पढ लेते हैं और न सिर्फ पढ लेते हैं बल्कि
 
सतीश पंचम
Feb 27 2010 06:45 PM
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चालीस साल बाद बडे परदे पर आराधना देखते हुए लोग अपने मोबाईल कैमरे से इन लम्हों को क्या कैद करते……लम्हों ने इन लोगों को खुद ब खुद कैद कर लिया....सतीश

     हाल ही में 1969 की फिल्म आराधना देखने मुंबई के रीगल सिनेमा हॉल में गया था। नॉस्टॉल्जिया पूरे शबाब पर था।आखिर चालीस साल बाद फिर वही फिल्म बडे पर्दे पर जो थी। रेडियो मिर्ची ने यह शो आयोजित किया था पुरानी जीन्स कार्यक्रम के तहत। आर
 
सतीश पंचम
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Feb 21 2010 07:13 AM
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जैसे हमारे बरम बाबा, हरसूबाबा, डीह बाबा हैं , वैसे ही अंगरेज लोगन के बलटिहान बाबा ।कालेज के छोकरा-छोकरान तक उन्हें मानते हैं।

     आज सदरू भगत वैलेंटाईन डे मना रहे हैं। एक नई नीली रंग की पट्टेदार चढ्ढी, उस पर सेन्चुरी मिल वाली परमसुख छाप धोती, सफेद रंग का कुर्ता, एक नया अँगोछा कंधे पर रख यूँ चले, मानों समधियाने जा रहे हैं। धोती में नील इतना ज्यादा लगवा लिये
 
सतीश पंचम
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मोर बाबू पढे अंगरेजी, तिलक काहे थोडा चढाया......विवेकी राय रचित एक विवाह प्रसंग पर हास्य फुहार लिये शानदार लेख.....सतीश पंचम

            छछलोल राय गाँव के एकमात्र दिखाउ वर थे। उनके पैर इतने बडे बडे कि दुकानों में उनके नाप के जूते नहीं मिलते। और सिर इतना बडा कि सिली सिलाई टोपी नहीं मिलती। बहुत दिनों तक उनके छोटे भाई की शादी इसलिये रोक कर
 
सतीश पंचम
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Feb 13 2010 09:47 AM
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ज्यादा धूप सेंकने से काम जीवन खुशहाल होता है वाली नई रीसर्च पर जनसंख्या और पर्यावरण मंत्रालय में जब ठन जाय :)

    जब से वैज्ञानिकों ने एक रीसर्च कर बताया है कि वाईग्रा से ज्यादा  सिर्फ धूप सेंकने से मनुष्य का काम जीवन खुशहाल रहता है तब से सडक पर तंबू गाड कर शिलाजीत बेचने वाले धुन्नी राम के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आई है। सोच रहे हैं कि इस
 
सतीश पंचम
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सोचते रहना भी एक कला है....... प्याज, अमर सिंह, राहुल गांधी, ईब्नबतूता, शरद पवार, बीटी बैंगन.....और मैं:)

       यह सोच भी बडी अजीब चीज है।  आप बाल संवारते वक्त भी सोचते रहते है, शर्ट पहनते वक्त,  चश्मा पहनते वक्त, चप्पल पहनते वक्त यानि हर वक्त सोचते रहते हैं। सोच…..सोच……..और सोच।        
 
सतीश पंचम
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अमां मुर्गों की लडाई देख रिया था, लो खां तुम भी देखो, वो मुटल्ले को देखो कैसे फडक रिया है ...

         अबे पकड ना उसको, साला देखता नहीं क्या रकत आ रेला है। जा ले जा के मालिश कर। थोडा पानी जास्ती मार।            ये वह शब्द थे जो मैंने कुछ मुर्गे लडाने वालों के मुंह से सुने थे जो
 
सतीश पंचम
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देश की तिकोनी चौकोनी कटी दरारों के बीच की बरफी पर गदहे घूम रहे हैं, बकरीयां उछल-कूद कर रही हैं। कौए सीपियों में खाना ढूँढ रहे हैं।

  अब वे दिन सपने हुए हैं कि जब सुबह पहर दिन चढे तक किनारे पर बैठ निश्चिंत भाव से घरों की औरतें मोटी मोटी दातून करती और गाँव भर की बातें करती। उनसे कभी कभी हूं-टूं होते होते गरजा गरजी, गोत्रोच्चार और फिर उघटा-पुरान होने लगता। नदी
 
सतीश पंचम
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डुबकी लगाना भी एक कला है। थोडा पाप, थोडा पुण्य और ढेरों अहमक बातें....

      कुंभ के समय डुबकी लगाना भी एक कला है। यकीं न हो तो एक बार आप भी हो आओ कुंभ। समझ जाएंगे कि आखिर यह कला क्यों हैं।  कोई  कुलांचे मारते हुए डुबकी लगाता है, तो कोई खडे खडे तो कभी उ हू हू कर ठंड में सिकुडते हुए।
 
सतीश पंचम
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लोकभारती द्वारा प्रकाशित - 'साबुन' कहानी अपने आप में बेजोड और बहुत ही दिलचस्प है।

        कुछ कहानीयां अपने आप में बेजोड होती हैं। बहुत ही दिलचस्प।  ऐसी ही एक कहानी है ‘साबुन’।  यह उस दौर की कहानी है जब कि साबुन का इस्तेमाल करना एक तरह से लक्जरी ही माना जाता था, खास करके लोअर मिडिल क्लास के लिये जो
 
सतीश पंचम
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'अफसरी' पर लिखे एक लेख का बहुत ही 'रोचक अंश'

    हाल ही में एक बहुत ही रोचक लेख   डॉ विवेकी राय जी रचित एक ग्रामायण पढ रहा था। पढते हुए लगा कि इसे आप लोगों से बांटा जाय । बांटने का कारण यह भी है  कि अब भी भारत के गाँवों में इस तरह की परिस्थिति
 
सतीश पंचम