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नई क़लम - उभरते हस्ताक्षर

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05 Jun 2010
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फिल्म 'राजनीति' मेरी नज़र में--------------->>>दीपक 'मशाल

आपने इस शुक्रवार को रिलीज हुई फिल्म 'राजनीति' के बारे में वैसे कई लोगों के विचार पढ़े ही होंगे... पर फिर भी अपना नजरिया रख रहा हूँ और मेरा मानना है कि राजनीति एक ऐसी फिल्म है जिसने पहली बार मुझे अहसास कराया कि कोई ऐसी फिल्म भी बन सकती है जिसमे कोई भी
 
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श्री हरी प्रसाद शर्मा जी का साक्षात्कार

दोस्तों कल यानी ३ जून को नगरी-नगरी द्वारे-द्वारे ब्लॉग के स्वामी, चिरपरिचित ब्लोगर श्री हरी प्रसाद शर्मा जी का जन्मदिन था.. इस अवसर पर श्री धीरेन्द्र सिंह जी द्वारा उनका साक्षात्कार लिया गया.. जो कि आपके सामने है- मैं धीरेन्द्र सिंह आज श्री हरी शर्मा जी
 
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जा कहाँ रहे हैं???? देखिये तो किसका जन्मदिन है आज-------------------->>> दीपक 'मशाल'

दोस्तों आज पूरे दो साल हो गए उस लम्हे को जिसमे इस ब्लॉग को पंजीकृत किया गया था. सोच रहा हूँ इस दूसरे जन्मदिन पर आप सबको वो कहानी सुना ही दी जाये जो इस नाम 'नई कलम-उभरते हस्ताक्षर' के नाम के उद्भव से जुड़ी हुई है. कब से दिल में छुपा के रखे हूँ इस बात को
 
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वही मौसम - वही मंज़र

कभी इकरार चुटकी में, कभी इंकार चुटकी में,मरासिम का किया कुछ इस तरह इज़हार चुटकी में।वही मौसम, वही मंज़र,वही मैकश, वही साकी,हुई है आज फिर मेरी, कसम बेकार चुटकी मे।कभी वो प्याज़ के आंसू, कहीं पे अल्पमत होना,बदलती है हमारे देश की सरकार चुटकी मे।मेरा ये देश
 
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तुम आने वाले हों शायद

बहुत दिनों से आलोक उपाध्याय "नज़र" साहब को पढने का मौका नहीं मिल पा रहा था, आज इक नई रचना के साथ हमारे बीच में आइये लुत्फ़ लें- कुछ उजला कुछ धुंधला सा है दिल का मौसम बदला सा है जब उलझे तब तब समझे जीवन एक मसला सा है तेरी मेरी हालत एक तरह लोग कहें तू पगला सा
 
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इस तरह कहानी बन जाती

किस्मत की भूल सुधर जाती , जीने का अर्थ निकल आताइस तरह कहानी बन जाती, कुछ तुम कहती कुछ मैं कहता।तुम आये थे खुशियाँ लेकर, दिल बैठा सौ ग़म लेकर तुमने हँसना सिखलाया था, इस दिल को नया जनम देकरमैं उम्र बिता देता यूँ ही, तुम मुस्काती मैं हंस लेता।इस तरह कहानी
 
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इंजीनियरिंग का क्रेज

आजकल इंजीनियरिंग स्टुडेंट का हर जगह चर्चा है, और उनकी लाइफ स्टाइल की बात न हों तो शायद बात अधूरी है, आज हम आपको एक इंजीनियरिंग स्टुडेंट की सोच उसी की जुबानी सुनते हैं- हमारे बीच शिखा वर्मा "परी" अपना तजुर्बा बाँट रही हैं।-- hello friends !!!i a new
 
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ब्लॉगवुड को सांप्रदायिक दंगों की नींव बनने से रोकें ब्लोग्वानी, चिट्ठाजगत और अन्य एग्रीगेटर------>>>दीपक 'मशाल'

बहुत दिनों से अपने आप को रोकने की कोशिश में लगा था कि जैसा चल रहा है चलने दो दुनिया के अन्य विभागों की तरह यहाँ ब्लॉग विभाग में भी हर तरह के लोग हैं उन्हें झेलना ही पड़ता है और यहाँ भी झेलना पड़ेगा. लेकिन अबअपनी ही लिखी एक कविता की पंक्तियाँ-''के हदें
 
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3 चुटकियाँ------->>>दीपक 'मशाल'

१-अक्स धुंधला पड़ा है मेराखो सा गया हूँ मैंजाने क्या-क्या ख्वाहिश लिएसो सा गया हूँ मैं..वो हर घड़ी मुझेगैर किये जाते हैंमोहब्बत देखे वगैरवैर किये जाते हैं.. २-अपनी तो आदत है समझो, तुमको चिढ़ाने कीकभी तुमको सताने की कभी तुमको हंसाने कीकहने को कह दूँ दोस्त
 
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टैग: 'मशाल'
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ये कैसी है जीत तुम्हारी---------->>>>दीपक 'मशाल'

ये कैसी है जीत तुम्हारीये प्रश्न उठे हैं आहों से हो लेते हो खुश तुम कैसेइंसानी चीखों सेक्या मकसद पूरे कर पाओगेखून सने तरीकों से कितने चूल्हे बुझा दिएबस अपनी रोटी पाने कोकोख सुखाकर कितनी तुमनेडायन अपनी माँ को सिद्ध किया अपने घर किलकारी भरने कोऔरों का दीप
 
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तेरी आहट से कटती है

कहते हैं कि एक शायर किसी एक के लिए लिखना शुरू करता है। और वक़्त के साथ , संग अपने पूरी दुनिया को शरीक कर लेता है , आज एक शुरूआती दौर कि कवियत्री से रूबरू करा रहा हूँ।तुम कुछ इस तरह से मेरी ज़िन्दगी में आये कि हर शाम इक सुबह लगती है हर आग शमा लगती है मेरी
 
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चला गया , वो तो चला गया

चला गया - चला गयाआखिर वो चला गयाएक टीस देके चला गयाएक टीस लेके चला गयाचला गया वो तो चला गया मैं ग़ज़लों और किताबों में ही रह गयावो इसे हकीकत का नाम देके चला गयाअब पलट करमैं देखता तो क्या देखतासिर्फ धुंध थीजो आँखों में भर के चला गया मैं तनहा थाऔर तनहा ही
 
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Apr 02 2010 05:29 PM
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हार गया तुमको खोकर

आज आपको साहित्य के दिग्गज और सम्पद्किये पेज पर अक्सर अपने का दर्ज करने वाले कवी से रूबरू करा रहा हूँ। उनकी ये वो रचना है जो उन्होंने अपने शुरूआती दिनों में लिखी। पेशे नज़र है-मैं लड़ा बहुत इस दुनिया से सह गया बहुत कडवे ठोकर तुम साथ रहे , मैं जीत गया पर हार
 
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तुम्हें क्या मालूम ये शादी का घर है ?

वो शादी का घर है वहां बहुत काम है तुम्हें नहीं मालूम ? क्या -क्या नहीं लगता इक शादी का घर बनाने के लिए कोने- कोने से टुकड़े जोड़ने होते हैं तब जाके कहीं एक बड़ा सा- नज़रे आलम में दिलनशीं टुकड़ा शक्ल अख्तियार करता हैतुम्हें क्या मालूम। नहीं कटा वक़्त उठाई कलम
 
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तुम अगर साथ दो

अब न जिद यूँ करो ज़िन्दगीकुछ मेरी भी सुनो ज़िन्दगीमैं अकेला शराबी नहींलड़खड़ा के चलो ज़िन्दगीमुफलिसों का खुदा है अगरमुफलिसी में रहो ज़िन्दगीबात तेरी सुनूंगा नहींबात फिर भी कहो ज़िन्दगीफिर कहाँ है तेरी वो तपिशअब तलक जिंदा देखो ज़िन्दगीमौत "दर्शन" डराती
 
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ग़ज़ल

दिल में याद लिए तेरी बैठा हूँ मैं फ़क़त तसव्वुर में तेरे दुनिया भुलाये बैठा हूँ मैं खंजर सी तेरी नज़रें वो हुस्न कातिलाना अंजामे वफ़ा के जख्म लिए बैठा हूँ मैंइक तबस्सुम की खातिर सौ जिल्लतें सही हैं उजड़े हुए गुलशन में ख़ार लिए बैठा हूँ मैं तेरे हुस्न
 
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माटी मेरे देश की

शत्रुओं को सदा मुँहतोड़ देती है जवाब किन्तु मित्र की है मित्र माटी मेरे देश की भारत की रक्षा करें मौत से कभी न डरें ऐसे देती है चरित्र माटी मेरे देश की शौर्य की भी जननी है शान्ति की भी अग्रदूत सचमुच है विचित्र माटी मेरे देश की सीने से लगाओ चाहो माथे
 
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Dec 29 2009 11:48 AM
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तुम्हारा है नहीं जो क्यों उसे अपना बताते हो....

काव्य जगत के अनुभवी एवं हमारे मार्गदर्शक कवि 'खलिश' जी की एक रचना जो वास्तव में जीवन दर्शन है... तुम्हारा है नहीं जो क्यों उसे अपना बताते हो जो अपना हो नहीं सकता उसे अपना बनाते हो ये नश्वर देह नित्य है मगर देही है अनित्य भला क्यों भेद देह और देही का
 
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Dec 29 2009 11:48 AM
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नया नहीं बन पाया तो...

नया नहीं बन पाया तो सम्बन्ध पुराना बना रहे, आखिर जीने की खातिर कोई बहाना बना रहे, सच कहती हूँ कभी नहीं मैं तुमसे कुछ भी चाहूँगी, बस बेगानी बस्ती में इक ठौर ठिकाना बना रहे. सहन कभी क्या कर पायेगी मेरे दिल की आहट यह, तुम बेगाने हो जाओ, गुलशन गुलज़ार ये
 
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Dec 29 2009 11:48 AM
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दो कवितायें

मन चंचल गगन पखेरू है, मैं किससे बाँधता किसको. मैं क्यों इतना अधूरा हूँ, की किससे चाह है मुझको. वो बस हालात ऐसे थे, कि बुरा मैं बन नहीं पाया. मैं फ़रिश्ता हूँ नहीं पगली, कोई समझाए तो इसको. ज़माने की हवा है ये, ये रूहानी नहीं साया. मगर ताबीज़ ला दो तुम,
 
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Dec 29 2009 11:48 AM
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क्षणिकाएं

जमीं से आसमां बहुत दूर है, फिर मिलते से नज़र आते क्यों हैं, जब गिराने ही होते हैं मुकीमों को वो सारे मकाम, तो आसमां से मिलते मंजरों को बनाते क्यों हैं? अपने आप को खुद से छिपाए बैठे हैं, हम तो दर्द को भी दिल में दबाये बैठे हैं. जो अपने दर्द से प्यार कि
 
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Dec 29 2009 11:48 AM
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''व'' अक्षर इतना विनाशकारी क्यों है????

व" अक्षर इतना विनाशकारी क्यूँ है क्यूँ इससे मिलते शब्द रोते हैं वैश्या, विकलांग, विधवा तीनो दर्द से भरे होते हैं. वैश्या कोई भी जानम से नही होती हालत या मजबूरी उससे कोठे पर ले जाती है., बाँध कर घूँगरू नाचती है रिज़ाति हैं. छुप कर आँसू बहती है. दो प्य
 
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इस बार दिवाली सूनी सी है,

इस बार दिवाली सूनी सी है, दिल की उदासी दूनी सी है. बेटा है परदेस में बैठा, माँ-बाप की आँख में धूली सी है. कितने दीप जले आँगन में, पर अँधेरा फैला था मन में. इकबार अगर तू आ जाता, हलचल सी हो जाती तन में. देखो-देखो तो ये बाती, बुझी-बुझी सी लगती है, कितनी
 
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ब्लोगिंग को देश के लिए अभिशाप बनने से रोकें......

कहानी घर घर की या सास बहु का झगडा देखने के बाद जिस तरह की बातें मध्यम वर्गीय परिवारों की महिलाओं के बीच सुनने को मिलती थीं काफी कुछ वैसी ही बातें आजकल हम ब्लोगर लोग करने लगे हैं। अच्छा लिखने को कुछ रह नहीं गया इसलिए इसके-उसके लिखे में कमियां निकालते
 
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ग़ज़ल

शजर पर एक ही पत्ता बचा है हवा की आँख में चुभने लगा है , नदी दम तोड़ बैठी तषनगी से समंदर बारिशों में भीगता है, कभी जुगनू कभी तितली के पीछे मेरा बचपन अभी तक भागता है, सभी के ख़ून में ग़ैरत नही पर लहू सब की रगों में दोड़ता है, जवानी क्या मेरे बेटे पे आई मेर
 
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मुक्तक

वक़्त के बदलाव संग रिश्ते भी बदलने लगे,जहाँ को जाँ दी जिसने उसे 'माल' कहने लगे,इक बन गई दुर्गा तो डरने लग गए उससे,बाकी सबके साथ हरकत फिर वही करने लगे.दीपक 'मशाल'
 
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Sep 19 2009 10:28 PM
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ग़ज़ल

ज़रा सी देर में दिलकश नजारा डूब जायेगाये सूरज देखना सारे का सारा डूब जायेगानजाने फिर भी क्यों साहिल पे तेरा नाम लिखते हैंहमें मालूम है इक दिन किनारा डूब जायेगासफ़ीना हो के हो पत्थर हैं हम अंजाम से वाक़िफ़तुम्हारा तैर जायेगा हमारा डूब जायेगासमन्दर के सफ़र में
 
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Sep 16 2009 10:55 PM
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औरत की क्या हस्ती है?

औरत की क्या हस्ती हैचीज़ वो कितनी सस्ती हैकहीं वो दिल की रानी हैकहीं बस एक कहानी हैकितनी बेबस दिखती हैजब बाज़ार में बिकती हैकहीं वो दुर्गा माता हैइस संसार की दाता हैकहीं वो घर की दासी हैनदिया हो कर प्यासी हैसब के ताने सहती हैफिर भी वो चुप रहती हैसरस्वती
 
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Sep 13 2009 04:40 PM
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नन्हे मुन्ने बच्चो

आज ग़ज़ल, नज़्म और बड़ी बड़ी बहसों जो समाज से सम्बन्ध रखती हैं , इन सब बड़ी- बड़ी बातों के दरमियाँ कोई बाल साहित्य के बारे में भी सोचे तो वाकई बड़ी अच्छी और सुंदर पहल है, आज हम अपने पाठकों को ऐसी ही एक रचना सौंप रहे हैं आपका ध्यान अपेक्षित है- ऐ नन्हे मुन्ने
 
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Sep 10 2009 01:52 PM
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Dipak 'Mashal' ki 3 rachnayen

1-क्या खूब पायी थी उसने अदा, ख्वाब तोड़े कई आंधिओं की तरह.कतरे गए कई परिंदों के पर,सबको खेला था वो बाजियों की तरह.हौसला नाम से रब के देता रहा,औ फैसला कर गया काजिओं की तरह. ख़ास बनने के ख्वाब खूब बेंचे मगर,करके छोडा हमें हाशिओं की तरह.साहिलों को मिलाने की
 
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Sep 02 2009 03:53 AM
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ग़ज़ल

कोई इक खूबसूरत, गुनगुनाता गीत बन जाऊँ ।मेरी किस्मत कहाँ ऐसी, कि तेरा मीत बन जाऊँ॥तेरे न मुस्कुराने से, यहाँ खामोश है महफ़िल।मेरी वीरान है फितरत, मैं कैसे प्रीत बन जाऊँ।।तेरे आने से आती है, ईद मेरी औ दीवाली।तेरी दीवाली का मैं भी, कोई एक दीप बन
 
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Aug 26 2009 09:06 PM
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ग़ज़ल

आँखें पलकें गाल भिगोना ठीक नहींछोटी-मोटी बात पे रोना ठीक नहींगुमसुम तन्हा क्यों बैठे हो सब पूछेंइतना भी संज़ीदा होना ठीक नहींकुछ और सोच ज़रीया उस को पाने काजंतर-मंत्र जादू-टोना ठीक नहींअब तो उस को भूल ही जाना बेहतर हैसारी उम्र का रोना-धोना ठीक
 
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Aug 26 2009 09:05 PM
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नज़्म

बेज़ार मैं रोती रही, वो बे-इन्तेहाँ हँसता रहा,वक्त का हर इक कदम, राहे जुल्म पर बढ़ता रहा। ये सोच के कि आँच से प्यार की पिघलेगा कभी,मैं मोमदिल कहती रही, वो पत्थर बना ठगता रहा। उसको ख़बर नहीं थी कि मैं बेखबर नहीं,मैं अमृत समझ पीती रही, वो जब भी ज़हर देता
 
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Aug 26 2009 08:57 PM
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बचाव भाग-२

पिछले अंक से आगे पढ़ें....इस सब के बावजूद निंदिया का विवाह पल्लव अग्रवाल के साथ तय कर दिया गया। जिसे उसकी माता जी स्नेह से लल्लन कहकर पुकारती थीं। लोलुप लल्लन के लार से लिपे होंठ देखकर निंदिया को उल्टी आने लगती। अपने इकलौते बेटे के लिए माता जी को निंदिया
 
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Aug 22 2009 05:32 AM
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बचाव

दोस्तों,आज मैं एक दिल कि बात कहना चाहता हूँ, मेरा ख्वाब वो ख्वाब है जो शायद हर सच्चे हिन्दुस्तानी के दिल में हो, आँखों में हो और अगर नहीं है तो होना चाहिए. मैं हिंदी को एक बार फिर उस मुकाम पर पहुँचाना चाहता हूँ जिस पर उसे देखने के लिए और दूसरी भाषाओँ को
 
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Aug 22 2009 05:29 AM
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गुमसम तनहा बैठा होगा...

बहुत ही सरल तरीके से सीधे दिल में उतर जाने वाली बात कहने वाले मुखर कवि जतिंदर 'परवाज़' का नई कलम पर आगाज़ देखिये-गुमसम तनहा बैठा होगासिगरट के कश भरता होगाउसने खिड़की खोली होगीऔर गली में देखा होगाज़ोर से मेरा दिल धड़का हैउस ने मुझ को सोचा होगासच बतलाना कैसा
 
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अगर कुछ शेष होगा तो वो होगा हमारा प्रेम..

जीवन के रंगों और सपनों को एक पन्ने में समेटने की गार्गी जी की एक सफल कोशिश......वक्त का पहिया चलता जाता नये - नये ये रूप दिखता हर पल एक सीख दे जाता की हमको है बस चलते जाना बचपन छोड युवा बन जाऊ चाहत थी कोई अपना पाऊ मन में उनका अरमान लिये आंखो में एक सपना
 
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Aug 19 2009 03:06 AM
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ग़ज़ल

लहू पहाड़ के दिल का, नदी में शामिल है,तुम्हारा दर्द हमारी ख़ुशी में शामिल है.तुम अपना दर्द अलग से दिखा न पाओगे,तेरा जो दर्द है वो मुझी में शामिल है.गुजरे लम्हों को मैं अक्सर ढूँढती मिल जाऊँगी,जिस्म से भी मैं तुम्हे अक्सर जुदा मिल जाऊँगी.दूर कितनी भी
 
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Aug 09 2009 11:07 PM
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सिमटता आदमी

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अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको

अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको मैं हूँ तेरा तू नसीब अपना बना ले मुझको - क़तील यूँ तो मैं एक लंबे अरसे से तुम्हें कुछ लिखना चाहता था। मगर सब कुछ ऐसा होता रहा और मैं लिखने का वक्त ही नहीं निकल पाया। आज ख़त की शक्ल में पहला पन्ना सौंप रहा हूँ...
 
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