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कुछ लम्हे दिल से...

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07 Jun 2010
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बस आँखों में दिखता पानी

सूखे खेत, सरोवर,झरने, बस आँखों में दिखता पानी हाहाकार मचा है जग में, छाए मेघ न बरसा पानी। भ्रष्टाचार के दलदल में अब, अपना देश धंसा है पूरा कौन उबारे, सबके तन में ठंडा खून रगों का पानी। अब रक्षक को भक्षक कहिए,कलियां रौंद रहे है माली लोग तमाशा देख रहे हैं,
 
अर्चना तिवारी
टैग: ग़ज़ल
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क्यों ?

BODY { MARGIN: 8px } .LW-yrriRe { FONT: x-small arial } जवां दिलों में कहीं हौसला नहीं है क्योंमेरे वतन में कोई रहनुमा नहीं है क्योंचमन को सींच रहा है लहू से जो मालीउसे चमन में कहीं आसरा नहीं है क्यों हजारों बोझ तले क्यों सिसकता है बचपनवो खुल के हंसता,
 
अर्चना तिवारी
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बाघ १४११

रहने दो आशियाँ मेरा भीमेरी भी ईश ने रचना कीवाहन बना भवानी माँ का हूँ बाघ शान भारत माँ की क्यूँ मारता मुझे है मानवक्यूँ मैं बना सभी का दोषीगिनती हजार की है केवलसंख्या बहुत बची कम मेरी अस्तित्व गर मिटाया मेराहो जाएगी समाप्त सृष्टीहैं ये हरे वसन धरती के मत
 
अर्चना तिवारी
टैग: ग़ज़ल
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तेरे आंचल में माँ

आप सभी को मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ !!इस ग़ज़ल को मैं अपनी माँ के चरणों में समर्पित करती हूँ । वो अब इस दुनिया में नहीं हैं , फिर भी हमेशा मेरे साथ हैं "माँ" सारे जहाँ भर का सुकूं मिलता तेरे आंचल में माँ जब ग़म सताएं सैकड़ों, लिपटा तेरे आंचल में माँ
 
अर्चना तिवारी
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दुश्मन

मिलते हैं यहाँ दुश्मन, हमसाज़ नहीं मिलतेजो दोस्त हैं उनके भी अंदाज़ नहीं मिलतेये ज़ुल्मो-सितम कैसे मिट पाएँगे दुनिया सेबुजदिल हैं सभी चेहरे जांबाज़ नहीं मिलतेजख्मी है बदन अपना ये रूह भी जख्मी हैहाल अपना बताने को अल्फाज़ नहीं मिलतेकोई भी किसी से अब कुछ भी
 
अर्चना तिवारी
Feb 15 2010 04:30 PM
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न समझो कि खुद से जुदा कर रहे हैं

तुम्हारी सफलता कि दुआ कर रहे हैंले आँखों में आंसू विदा कर रहे हैंनिभाया गुरू का फर्ज था जो हमनेन समझो कि खुद से जुदा कर रहे हैंअधूरी तमन्ना कोई रह न पाएयही रात दिन हम सजदा कर रहे हैंखिलाए चमन को तू अपने गुणों सेयही कामना हम सदा कर रहे हैंबुलंदी के आकाश
 
अर्चना तिवारी
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चंद अशआर

दिल कि तनहाइयों से घबराकर प्यार किया प्यार ने भी तनहाइयों का सिला दिया संग गुजरती थी मेरे जिनकी हर शाम रहती है अब बेखबर मेरे उनकी हर शाम कहते थे कि बिन तेरे न अब मेरी सहर होगी मगर अब हर शाम भी उनकी मेरे बगैर होगी आँख खुल जाती थी जिनकी मेरी आहट सुनकर
 
अर्चना तिवारी
Dec 29 2009 11:58 AM
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वो पूनम की रात...

ख़त्म होगा आज इन्तजार फिर से आई वो पूनम की रात आया है पैगाम उनका आएँगे वो आज रात करेंगे दीदार उनका मेरे ये चंचल नयन होगा फिर धरा का गगन से चाँद का सितारों से घटा का पर्वतों से लहरों का साहिल से मिलन गूँज उठेंगी गलियां आज उनके कदमों की आहट से फिर चली
 
अर्चना तिवारी
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तेरी आँखें...

देखा तेरी आँखों में अक्स कुछ अपना सा ढूंढती थी तेरी आँखें मुझमें कुछ अपना सा देखा तेरी आँखों में अक्स कुछ अपना सा अनजान थी मैं खुद से हाले दिल से बेखबर पाया मैंने उनमे इक हमसफ़र अपना सा देखा तेरी आँखों में अक्स कुछ अपना सा आँखों की गहराइयों में कोई रा
 
अर्चना तिवारी
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तेरा आना...

इक तेरे आने से ... ए जाने बहार ... जिन्दगी बन गई है सावन की फुहार सिमटी सी थी जिंदगी बिन उमंग बिन तरंग अपनें आगोश में लिए तनहाइयों की चुभन साँसें थी पर खुशबू नहीं दिल था पर धड़कन नहीं होली थी पर वो रंग सुर्ख नहीं दीवाली थी पर नूर - ए - रोशन नहीं ईद थ
 
अर्चना तिवारी
Dec 29 2009 11:58 AM
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तेरा इन्तजार....

तनहाइयों से घबराया दिल इसलिए तेरा इन्तजार सरे शाम करते हैं छुपती नहीं मोहब्बत इसलिए जिक्र इसका सरे आम करते हैं कोरी थीं दिल की दरो - दीवारें इसलिए अब उनपे तेरा नाम लिखते हैं कटी पतंग थी जिन्दगी इसलिए जिन्दगी का दामन अब तेरे नाम करते हैं तन्हा कटती नह
 
अर्चना तिवारी
Dec 29 2009 11:58 AM
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रक़ीब

रक़ीबों के दरमियां कोई हमसाज़ न मिला हमसफ़र दुनिया में कोई दूरदराज़ न मिला लगा बैठे दिल को तेरी चाहत का रोग जो दिल को बहलाने का कोई अंदाज़ न मिला हज़ार ज़ख्म खाकर भी जुबां खामोश रही हाल - ए - दिल को कोई अल्फ़ाज़ न मिला सिसकती रही ज़िन्दगी ठोकरों में उनक
 
अर्चना तिवारी
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देखा तेरी आंखों में...

देखा तेरी आँखों में अक्स कुछ अपना सागाने लगा मन इक प्यार का नगमा साछू गई मेरे दिल का कोई तार कहींछाया था पलकों पे इकरार का सपना साअनजान थी मैं खुद के हाले दिल से देखा मैंने उनमें इक हमसफ़र अपना साले गई वो मुझको चुराकर मुझ ही सेकर गई महफिल में मुझको तनहा
 
अर्चना तिवारी
Aug 31 2009 10:56 PM
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उम्मीद

शामें ग़म तन्हाई के साज बजते रहेतेरे दर पर दिल के पैगाम भेजते रहेघटाओं की बेवफाई का गिला क्या करेंआँखों के समंदर में नमी सहेजते रहेवो गए ऐसे कि फिर न आए कभीक़दमों की आहट से मकान गूंजते रहेअश्कों से बुझी जली बस्ती दिल कीअरमानों की ख़ाक के गुबार लरजते रहेबन
 
अर्चना तिवारी
Aug 30 2009 10:49 PM
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इक रिश्ता आसमानी

चलो इक रिश्ता आसमानी बना लाएँजिसकी छाँव में ग़मों को हम भुलाएँआगोश में है जिसकी ठंडक चांदनी कीबिखेर रही दोस्ती वही कोमल फिजाएँगर्दिश-ए-दौरां से घायल जज्बातों केग़मों का इजहार तुझ ही से कर पाएँपलकों पे ढलकी अश्कों की बूँदें भीतेरे दिल की सीपी में मोती बन
 
अर्चना तिवारी
Aug 30 2009 05:56 PM
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इक तारा गर्दिशों में कहीं खो गया

इक तारा गर्दिशों में कहीं खो गयाअपनी ही तन्हाई में तल्लीन सो गयाभटक रहा जुस्तजू की तलाश के लिएघूम रहा कन्धों पे अपनी ही लाश लिएइक शायर बदनाम कहीं हो गयाकश्ती क्या डूबती जो चली ही नहींरिश्ते क्या टूटते जो बने ही नहींअपनी ही कशमकश में ग़मगीन हो गयाइक तारा
 
अर्चना तिवारी
Aug 23 2009 11:04 AM
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इक शाम तनहा ढलने को है

इक शाम तनहा ढलने को हैइक सुबह से सूरज मिलने को हैवक्त के पाटे पर तार-तार हुएइक रूह नए कपड़े सिलने को हैसमंदर के तूफानों से गुजर आईइक कागज़ की कश्ती गलने को हैचिता की लपटों की गरमी पाकरजज्बातों की बर्फ पिघलने को हैअश्कों की बारिश में भीगकरदिल का मैल अब
 
अर्चना तिवारी
Jul 26 2009 07:48 PM
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राहें

कहती हैं लम्बी सूनसान राहेंहर पल राहों पे आते-जातेदिखाती हूँ भटकते मुसाफिरों कोमंजिल का रास्ताकरके खुद की गुमराह राहेंकहती हैं लम्बी सूनसान राहेंसाथ देती हूँ राही का हर मोड़ पे पर वो भूल जातें हैंखुद की मंजिलों को पा केकहती हैं लम्बी सूनसान राहेंशिकवा
 
अर्चना तिवारी
Jul 22 2009 09:36 PM
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सावन के बहाने ...

सावन के बहाने अश्कों को हम बहा आए आसमां से दर्द का इक रिश्ता निभा आए सुलगते अरमानों को धुआं बनाकर घटाओं के परिंदों को हम उड़ा आए अश्कों की बूंदों से नमी को जब्ज कर बादलों के दिल की आब पाशी करा आए जज्बा-ए-दिल की शमा को पिघलाकर बरसते सावन में दर्द को हम
 
अर्चना तिवारी
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शब्-ए-खामोश

बादलों के आगोश में गुम आज चांदनी धुंधली सी है सबा के आँचल में जब्ज आज थोड़ी नमी सी है कुमुदनी के रुखसारों पे इक बूँद शबनमी सी है शब् - ए - तनहा महफ़िल में छाई जैसे कोई ग़मी सी है रुत की खामोशियों में इक ग़ज़ल की कमी सी है ( चित्र गूगल सर्च से साभार)
 
अर्चना तिवारी
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सावन की वो घड़ियाँ....

लगी जब - जब सावन की फुहारों की लड़ियाँ याद आने लगी हमारे मिलन की वो घड़ियाँ सोचा नहीं था मिलेंगे हम इक दिन देखा जब मैंने तुम्हारी आंखों में उस दिन वो भीगा सा आँचल वो भीगी फिजाएं वो सड़कों पे ढूंढ़ना दरख्तों के साए वो चंचल शोख हवाओं का बहना वो हाथों को
 
अर्चना तिवारी
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चाहत की तल्खी नहीं देखी......

ए गम - ए - दिल तूने अभी चाहत की तल्खी नहीं देखी सपनों से भरे दिल के अरमानों की अर्थी नहीं देखी बहार - ए - गुलशन को सराहा गया तो बहुत आग शबनम की बूंदों में सुलगती नहीं देखी मिलन के सिलसिले रुखसत हो जाते हैं मगर उन लम्हों की कशिश मिटती नहीं देखी आँख तो
 
अर्चना तिवारी
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ऐसा क्यूँ है?...

जावां तमन्नाओं की रौ में दिल गमगीन क्यूँ है वक़्त है उमंगों का फिर भी काया में थकान क्यूँ है जज्बातों को ना समझ सके उन अपनों की आकांक्षाओं का फ़रमान क्यूँ है भरी महफ़िल में हो फिर भी अपनों में भी इंसान अकेला सा क्यूँ है जिंदादिली की ना पूछो दोस्तों ज
 
अर्चना तिवारी