रे मानव ! उठ जाग निद्रा से देख कराह रही ये धरा तेरी पुकार रही ये माँ तेरी उठ जा अब तो ओ मेरे लाल-नंदन घायल करते लूटते इसका यौवन चुन रहे पत्थरों में इसके सुंदर, विशाल और कोमल तन उसके हरियाले वसन का करते चीर-हरण कुछ दुःशासन -दुर्योधन जो करते नाश इस धरन