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मन वृन्दावन

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06 Jun 2010
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चुकाओ ग्रीष्म का कर्जा ...सजल जलधर से घिर आओ|

सरस घनश्याम आ जाओ! तरणि के ताप से व्याकुल धरा की गोद जलती है दिशाएँ तप रहीं लू से हवाएं गर्म चलती हैं| निराश्रित वृद्ध सी दोपहर कुंवारी साध सी ढलती बढ़ी आ रही गर्मी अब सरासर सीढियां चढ़तीं| ये कैसी उठ रही लपटें असहनीय दर्द सी चुभती उधर अम्बर सुलगता है धरा
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हर उम्र में भीगता सावन नहीं आता|.....

गुमशुदा मन का पता कोई नहीं पाता इस डगर से आजकल कोई नहीं आता| मुस्कुरा देती हूँ मैं कौन समझाए उन्हें हर उम्र में भीगता सावन नहीं आता| एक अनबोली व्यथा है आपकी बातों में, पर लाज का घूंघट उठाया भी नहीं जाता| नदी तो बहती रही और तट सूखे रहे काश ! कोई थाह का
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कोई उद्दाम अभिलाषा सभी प्रतिबन्ध तोड़ेगी|

अधूरी कामनाएँ अधूरी कामनाएँ फिर मेरे सपनों में आ पहुँची कोई उद्दाम अभिलाषा सभी प्रतिबन्ध तोड़ेगी| नियम के साथ क्या मन को हमेशा बाँधना होगा खुले आकाश के नीचे धरा को नापना होगा दिशाओं के निमंत्रण पर क्षितिज की माँग आ पहुँची उडानें पंछियों की फिर नए सम्बन्ध
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कुछ

कुछ कुछ, जो मेरे मन में है तुम जानते हो कहने को कुछ बाकी भी है आज साथी भी है आ! कुछ कह लें सुख - दुःख बाँट लें ताकि - जीवन के भावी दौर में दूर रहते हुए साथ चल सकें कुछ! शब्द अधूरे बातें कुछ जो ज़रूरी हैं कुछ भाव शायद - अभिव्यक्त हो सकें कुछ ! तुम ना दे
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नव बसंत

नव बसंत कल्पना के पर झुलाता दूर से नव गीत गाता गुनगुनाता फिर धरा में मुस्कुराता पास आया नव बसंत मूक प्रतिमाएं मुखर हो गा रहीं संगीत चंचल कौन रोके उन्मद लहर सा जो लहरता लहर आया मधु बसंत हो गया है क्या ना जाने ? लग रहा जैसे अंजाने आज मेरा दर्द कोई मस्तियों
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एन. एन. डी. भट्ट की याद में

सरल एवं मृदुभाषी श्री एन. एन. डी. भट्ट जी का जन्म १७ फरवरी १९४२ को उत्तराखंड के सुरम्य स्थल मुक्तेश्वर में हुआ था. अध्ययन काल से ही वह साहित्य, कला व रंगमंच के क्षेत्र में चर्चित रहे. उन्होंने हल्द्वानी में सन् १९७८ में वीरशीबा सेकेंडरी स्कूल की स्था
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पिया तेरी प्रीत जीवन संवार गयी

पिया तेरी प्रीत जीवन संवार गयी चमचमाती धूप घने कोहरे को छाँट गयी माथे अनुराग का टीका सजाए बैठी हूँ घूंघट मैं लाज का, आँखों में छिपाए बैठी हूँ हंसी तेरी, रूप मेरा कैसे निखार गयी पिया तेरी प्रीत जीवन संवार गयी हाथों में बंधन का रूप नहीं कंगन ये जिसका न
Oct 14 2009 07:58 PM
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मुझे तुम्हारा प्यार चाहिए .

मुझे तुम्हारा प्यार चाहिए नहीं चाहिए मुझको वैभव पर, सुख का संसार चाहिए नित नूतन धाराएं लेकर एक नदी बहती है कितनी बाधाएं टकरातीं पर आगे बढ़तीं हैं नहीं चाहती थम जाना पर, सागर का आधार चाहिए रहूँ वृक्ष से लिपटी सिमटी मैं वह बेल नहीं हूँ खेल सको आजीवन जिससे
Sep 16 2009 07:41 PM
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उनसे मिलकर उदास होना था

उनसे मिलकर उदास होना था अब ना हमसे मिला करे कोई हर फूल की जुबां में कांटें हैं कहाँ तक उनसे बचा करे कोई उम्रकैदी हैं हम रिवाजों के कैसे खुद को रिहा करे कोई मैं भी जीती हूँ जिन ख्यालों में डर है उनको ना छीन ले कोई क्यूँ चलूंगी मैं किसी की राहों पर अपनी
Aug 23 2009 10:19 PM
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स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ

अरुण सुनहरी उषा आई ! अगणित वीरों का त्याग लिए भूतल में तरुण प्रकाश लिए रातों के बंधन पट खोले मंथर गति से लहराई अरुण सुनहरी उषा आई जिसकी पावन किरणों ने सबके मन को बाँध लिया ममता की जंजीरों से वह हमको आज जकड़ने आई अरुण सुनहरी उषा आई यही गुलामी की जंजीरें
Aug 15 2009 02:53 PM
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तुमने बुलाया पास

तुमने बुलाया पास स्तब्ध हृद आकाश घुमड़ घुमड़ घिर गए बह चला हवा का तीव्र झोंका. युग संचित स्वप्न से अकस्मात जाग गया बिखरे रज कणिक से विचारों को वह बहा कर ले गया. मेरे कानों में चुपके से धीरे से कुछ मुस्का कर शर्माता सा बोला, वह यह उदासी किसलिए ? मुझ पर
Aug 08 2009 09:56 PM
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आज तुम्हारी ढेरों यादें आयी मेरे नाम से .....

आज तुम्हारी ढेरों यादें आज तुम्हारी ढेरों यादें आयी मेरे नाम से बढ़ने लगा दर्द का पहरा टुकड़ा - टुकड़ा शाम से दिन रात अगरु सा जलता मन चुपचाप राख बनता है निर्मोही सा कोई मेरे जीवन को छलता है जो बात किसी से कही नहीं वह भी तो मेरी रही नहीं तुमसे तो अच्छी
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तुम मेरे दर्द को फूलों का घर देना

हम तेरे जीवन की राह को संवार देंगे तुम मेरे दर्द को फूलों का घर देना नयनों में प्यार का सागर उतार कर साँसों को चंदन सी खुशबू का हार दो उड़ते समय के पंछी से पूछ लो कब तक मनाओगे फागुन के फाग को हम तेरी प्रीति को नए प्रतिमान देंगे पहले मेरे आँचल को वासं
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अपमानित जीवन से अनुबंध क्यूँ करें?

क्यूँ सहें अपमानित जीवन से अनुबंध क्यूँ करें? आँसुओं के मोल पर सम्बन्ध क्यूँ करें? तन से मन का अवसाद बड़ा होता है आदमी से ज़्यादा जल्लाद कोई होता है पीना पड़े रोज़ अगर लान्छ्नाओं का ज़हर मौत से भयानक हुई ज़िन्दगी की दोपहर वर्जनाओं के असंख्य पहरे में क
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कोई पूछे इसके पहले .......

कोई फागुनी गंध तुम्हारी साँसों में भर जाए तो, मेरी सुधियों की थाती को अपनी बांहों में भर लेना बोझिल हो जाएंगी रातें दिन हो जाएँगे आवारा सूनी रातों के सपनों को अपने सिरहाने रख लेना अवश नेह के पागलपन ने कैसा गठबंधन जोड़ा है यह बंधन दुखदाई हो तो सुलह ज़म
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अब बरस भी जाओ बादल ....

सरस घनश्याम आ जाओ तरणी के ताप से व्याकुल दिशाएं तप रहीं लू से हवाएं गर्म चलती हैं निराश्रित वृद्ध सी दोपहर कुँवारी साध सी ढलती बढ़ी आती है गर्मी अब सरासर सीढियां चढ़तीं ये कैसी उठ रही लपटें असहनीय दर्द सी चुभती उधर अम्बर सुलगता है धरा पर आंधियाँ चलतीं
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याद बहुत आते हैं मुझको

वो सपनीले दिन याद बहुत आते हैं मुझको खट्टी मीठी बातों वाले अमियों वाले दिन कैसी धूप कहाँ का जाड़ा सर पर लू की चादर ओढे सखी सहेली के घर जाना बात - बात पर हँसने वाले टीस जगा जाते हैं अक्सर बचपन वाले दिन गली मुहल्ला एक बनाते बारी से सबके घर जाते उनकी रसो
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तुमने आँखों ही आँखों में .....

तुमने आँखों ही आँखों में क्या संकेत दिया अनजाने मेरे आँगन में खुशियों ने पावन बन्दनवार सजाया तुमने बातों ही बातों में क्या बातें की थीं अनजाने मेरे भावों ने भाषा का परिणय स्वर के साथ रचाया हर मौसम मधुमास बन गया हर पक्षी कोकिल सा बोले मुझको लगता इस धर
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अभी बाकी है

अभी बाकी है बरसी हुई आँखों की प्यास अभी बाकी है थक गए पाँव मगर ज़िन्दगी तो बाकी है दोस्तों की भीड़ में दोस्तों का पता नहीं फ़िर किसी नीड़ की तलाश अभी बाकी है खोए हुए लम्हों को ढूँढा न कहाँ मैनें मिट गए नक्श मगर याद अभी बाकी है हर कोई अकेला है अपने - अ
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ब्लोगिंग के क्षेत्र में यह मेरा पहला कदम

साथियों ..अपनी बेटी शेफाली के आग्रह पर..ब्लोगिंग के क्षेत्र में यह मेरा पहला कदम है आप लोगों का प्रोत्साहन मिलेगा तो शायद इस उम्र में फिर से लिखने की इच्छा जाग्रत होगी . .. आज पहले दिन मैं अपनी मनपसंद ग़ज़ल प्रस्तुत कर रही हूँ ...ग़ज़ल के तौर तरीकों
Jun 16 2009 03:39 PM