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काव्य संग्रह

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05 Apr 2010
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भाई बनना इतना आसान नहीं

आज का चिटठा आपके ह्रदय की मार्मिक कहानी को छू करके यादों के उस गहरे सागर में डूब जायेगा जिसकी व्यथा राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान जालंधर की लवर स्ट्रीट (यह वो सड़क है जो इंडस्ट्रियल डिपार्टमेंट और टेनिस कोर्ट के बीच में है जिसने इश्क की कामयाबी और
 
रवि शंकर शर्मा
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लेखक कठघरे में

राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान जालंधर के अतिभ्रमण के क्रमांक में कुछ ऐसे पहलु खड़े हो जाते है कि जिन पर अत्यधिक विश्वास और निष्ठां के साथ मनोरंजन के महल में बैठा लेखक यही सोचता रहता है कि मुझे उन सभी निष्ठावानों से माफी मांगनी चाहिए जिन्होंने मेरा पिछला
 
रवि शंकर शर्मा
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ख़ास चर्चा -माते से माइंडलेस मोटे तक

माते की सीमित अनुकम्पा में मैं इंजीनियरिंग भूगोल के उस भाग की बात कर रहा हूँ जिसे राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान जालंधर के नाम से जाना जाता है | और इस पवित्र स्थल पर समाधी विलीन माते कई तपस्वी और चरितार्थियों को अपनी तीव्र निगाहों और जटाओं स्वरूपी
 
रवि शंकर शर्मा
Feb 22 2010 03:09 PM
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उड़ गया अचानक ले भूधर

आशाओं के दीपक की, जब बत्ती बुझकर राख हुई,जब तेल रहा न बाती, तब छाती घुटकर राख हुई |मेरे अपने अहसासों की, जब मिटटी बनकर ख़ाक हुई,जब डूब गयी आँखें आँखों में, तो बातें भी नापाक हुई |उड़ गया अचानक ले भूधर (तूफ़ान), मेरे सपनो की बुनियादें,दे गया अनोखा पागलपन ,
 
रवि शंकर शर्मा
Feb 10 2010 12:12 PM
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जेरोक्स की जिंदगी

ये बात कोई याद रखने वाली है क्या, जिसे अब हमने अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लिया हो | कॉलेज के बाद कॉलेज का कुछ याद रहे या ना रहे पर मैं दो चीजें नही भूल सकता हूँ एक तो बंटी की जेरोक्स की दुकान और दूसरी कोमल के नोट्स जिसे पढ़कर आधी से अधिक क्लास पास होत
 
रवि शंकर शर्मा
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युवा वर्ग की युवा सोच

क्या यह सही है ... ख्वाहिशों की लपट ने मुझे इस तरह दबोच रखा है , कि हमारा अतीत क्या है, हमारा वर्त्तमान क्या है, हमारा शिखर क्या है , हमारा प्रखर क्या है जैसे हम सब भूल गए हो | मैं जब भी अपने अतीत के आँचल में होता हूँ , तो यही सच पाता हूँ कि क्या मैं
 
रवि शंकर शर्मा
Dec 29 2009 12:00 PM
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ख्वाहिश

ख्वाहिश कुछ पंक्तियाँ ... मेरी आंखों की ख्वाहिश है , उन्हें जीभर के देखूँगा , गुलाबी होश में रहकर , उन्हें बेहोश कर दूँगा | मैं उनकी खूबसूरत सी , निगाहों में लिपट जाऊं , जिक्र आंखों का होगा तो , उन्हें मदहोश कर दूँगा | उन्ही के भावः देखूँ मैं , उन्ही
 
रवि शंकर शर्मा
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ओ लिखने वालो

ओ लिखने वालो कलम खूब क्या लिखती है , अपने ही खून स्याही से , कागज़ के कोरे जीवन को , भरती है मुक्त सदाई से | लिखने वालों ने स्याही का मतलब और बना डाला , भाषा , मजहब , देश निहित में , नंगा नाच नचा डाला | ओ लिखने वालो तुमसे मेरी , यही गुजारिश है मत लिख
 
रवि शंकर शर्मा
Dec 29 2009 12:00 PM
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क्या समझा है पाकिस्तां ने

क्या समझा है पाकिस्तां ने क्या समझा है पाकिस्तां ने , मेरी भारत माता को , भूल गया है बिकल कटक ये माँ बेटे के नाता को | राम चरित में ठीक लिखा है , महामुनि तुलसी जी ने , ये भारत माँ के सपूत थे , जिनको जाया हुलसी ने | महाकाव्य में लिखा है , उनने ऐसा कलय
 
रवि शंकर शर्मा
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शहादत की वकालत

राजनीति की आपाधापी और कुर्शी के लालच ने इंसान को खोखला बना डाला | आज बड़े बड़े राजनेता इस बात पर बहस करते हुए नज़र आते है कि किसे शहादत कहना है और किसे नही कहना है , धर्म और व्यवस्था को तो जैसे मजाक बना डाला हो | तरस आता है मुझे उन धर्माज्ञों , ऋषियों
 
रवि शंकर शर्मा
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ख्वाबों की मलिका नहीं है तो,परियों का आना वाकी है|

खाना छोड़ दिया मैंने, और सोना छोड़ दिया मैंने , उनका नशा अनोखा था , मैखाना छोड़ दिया मैंने | अब कोरी धुंधली यादों में, विस्तर को तोड़ रहा हूँ मैं, पलकों की भीगी छाया में, आंसू को छोड़ रहा हूँ मैं | जब टूट रहे हैं तारे तो , गिरने से कौन बचाएगा? जब छूट
 
रवि शंकर शर्मा
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इसे पड़ना आपकी जिम्मेदारी ही नही बल्कि मजबूरी भी है ....

ये एक ऐसा पोथा है जिसे पड़ना आपकी जिम्मेदारी ही नही बल्कि मजबूरी है जिसमें दफ़न है गरीबी भुखमरी और कई ऐसी पीड़ित जिंदगियां जिनके बारें में सोचना हमारी मजबूरी बन गई है |आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि एक इंजीनियरिंग का क्षात्र इस तरह की घिसी पिटी वकवास क
 
Ravi Shankar Sharma
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काव्य संग्रह

रात के अंधेरे में जब एक बूँद भी आँसू की नही निकली, तब पता लगा की हमारे दिल की धड़कन इतनी तेज है कि जिसकी आवाज़ से सोना दूभर हो गया | मुझे पता है कि सोना इतना आसान नही होता है, न तुम्हारे लिए न मेरे लिए , कम्वक्त ये रात बनाई ही गई है सोने के लिए | पलक
 
Ravi Shankar Sharma
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कुछ नगमे .... उनकी आवारगी में ...

मोहब्बत की बनी बुनियाद पर , चलता रहा हरदम , कोई दिलवर नहीं मिलता , यही कहता रहा हरदम | तुम्हारे इश्क की खामोशियाँ , सहना गवारा है , गवारा है नही मुझको , अभी चुपचाप यूँ हरदम | हुस्ने - गुलशन की खुशबू में , मैं अक्सर डूब जाता हूँ , तुम्हारी मुस्कुराहट
 
Ravi Shankar Sharma
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