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पंजाबी लघुकथा

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16 Jun 2010
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अपनी मिट्टी

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दीपशिखा
Jun 17 2010 07:48 AM
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साक्षरता आंदोलन

टेक ढींगरा ‘चँद’गाँव में साक्षरता आंदोलन बड़े जोर-शोर से चल रहा था। गाँव की पंचायत ने इस संबंधी व्यापक प्रबंध किए हुए थे। गाँव में से एक जुलूस निकाला जा रहा था। जुलूस में नारे लग रहे थे।“हाली-पाली करे कमाई, साथ-साथ वह करे पढ़ाई।”“आप पढ़ो, दूजों को पढ़ाओ,
 
दीपशिखा
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आराम की रोटी

जसवीर राणा ‘लगता है तीन बज चले होंगे! …सूरज भी ढल गया!…पर सरदार अब तक रोटी लेकर नहीं आया…।’ चहबच्चे की मुंडेर पर बैठे नीलू ने सूरज की ओर देखा। एक क्षण के लिए उसके चेहरे पर अफसोस-सा पसर गया। लेकिन अगले ही पल उसे चारपाई पर पड़े बीमार बाप की बात याद
 
दीपशिखा
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गुब्बारा

डा. श्याम सुन्दर दीप्तिगली में से गुब्बारेवाला रोज गुजरता। वह बाहर खड़े बच्चों को गुब्बारा पकड़ा देता और बच्चामाँ-बाप को दिखाता। फिर बच्चा खुद ही पैसे दे आता, या उसके माँ-बाप। इसी तरह एक दिनमेरी बेटी से हुआ। मैं उठकर बाहर गया और गुब्बारे का एक रुपया दे
 
दीपशिखा
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अंधेरा

कुलजीत ग़ज़ल उस दिन बस कुछ ज्यादा ही लेट हो गई थी। सर्दी के कारण सूरज के धुंध में छिपने से एकदम अंधेरा हो गया था। मन में डर था कि आज घर के सदस्यों ने मुझे नहीं छोड़ना। खैर! डरते-डरते अभी मैने घर के दरवाजे के भीतर पाँव रखा ही था कि सारा परिवार मेरी तरफ खा
 
दीपशिखा
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रिश्ते

यादविंदर सिद्धू“अरे तू बड़ा मास्टर बना फिरता है, मुझे भी कोई चार अक्षर सिखा दे।” दीपी ने अपने छोटे देवर से कहा।“पढ़ा देता हूँ भाभी, यह कौनसी बड़ी बात है।” वह खचरी हंसी हंसता है।“अच्छा मैं पढ़ने बैठ रही हूँ।” दीपी किताब खोल कर बैठ जाती है।“मास्टर जी, यह
 
दीपशिखा
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लोकतंत्र

अमर गम्भीर गाड़ी तेज रफ्तार से मंजिल की ओर बढ़ रही थी। डिब्बे में बैठी सवारियां अपनी बातों में मस्त थीं। “मेरा दिल करता है, जंजीर खींचूं।” एक यात्री बोला। “क्यों?” “बस मन करता है।” उसने अपनी इच्छा प्रकट की। और फिर सबने मिल कर फैसला किया, “इसे जंजीर खींच
 
दीपशिखा
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आसरा

सुरिन्द्र कैलेउम्र भर की नौकरी से पैसै-पैसा जोड़, उसने बढ़िया कोठी बनाने की तमन्ना पूरी कर ली। नौकरी से निवृत्त होने के पश्चात वह उस कोठी में रहने लगा। पेंशन घर का खर्च पूरा नहीं कर पाती थी। शहर से मिलने आए बहू-बेटे को अपनी आर्थिक-तंगी के बारे में बताते
 
दीपशिखा
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एहसास

गुरमेल मडाहड़ शादी से पहिले वे जब भी एक-दूसरे से मिलते, तो जसजीत वीना के जूड़े में बड़े प्यार से फूल लगाता। वह उसे काफी देर तक सहलाती रहती और कहती, “जसजीत, मुझे एक बेटा दे दे, बिलकुल तुम जैसी अक्ल-शक्ल हो।” “फिक्र न कर, तेरी यह इच्छा भी जल्दी ही पूरी हो
 
दीपशिखा
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मन्नत

अवतार सिंह कंवर“ए सीबो, तूने मुझे बताया ही नहीं कि तेरी माँ मेले में जाएगी!”“चाची, बस अचानक ही तैयारी हो गई। मैंने तो कहा था कि क्या लेना है मेले में, पर माँ नहीं मानी। बोली—पाँच पीरों की समाधि पर माथा टेक आऊँगी। मन्नत की थी तेरे भाई की, जब उसे मियादी
 
दीपशिखा
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चिंता

अमरजीत हांसवह सहमी-सी हमारे पास जम्बो सर्कस में आ बैठी। चारों ओर देखते हुए वह मेरी पत्नी से बातें करने लगी। उसके सुंदर चेहरे पर उदासी झलक रही थी। दर्द भरी आवाज में वह बोली, “बहन जी, मेरा आदमी भी वहाँ सामने बैठा है।”हम दोनों आश्चर्य से एक साथ बोले, “आप
 
दीपशिखा
Mar 08 2010 06:18 AM
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बेबसी

डॉ. हरभजन सिंह नंगे पाँव, फटे-पुराने वस्त्र व माटी से सना वह मासूम बच्चा कूड़े के ढेर में से कागज बीन रहा था। कागज बीनते-बीनते उसके हाथ एक पुरानी पुस्तक लग गई। वह वहीं बैठकर पुस्तक के पन्ने पलटने लगा। पुस्तक में छपे अक्षरों की तो उसे कुछ समझ न आई, लेकिन
 
दीपशिखा
Feb 27 2010 06:45 AM
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छोटे-छोटे ईसा

जसबीर ढंड“शिंदर, तू कल क्यों नहीं आई?”“जी, कल मेरी माँ बहुत बीमार थी।”“क्यों क्या हुआ तेरी माँ को?”“जी, उसकी न बगल के नीचे की नस भरती है। कल मानसा दिखाने जाना था।”“दिखा आए फिर?”“नहीं जी।”“क्यों?”“जी, कल पैसे नहीं मिले।”“फिर?”“जी, आज लेकर जाएगा मेरा
 
दीपशिखा
Feb 15 2010 06:40 AM
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पलाल का सेंक

कारखाने की भट्टियों को चलाने के लिए पलाल जलाया जाता था। जब से यह शराब का कारखाना लगा, तब से ही भंता अपनी भैंसा गाड़ी में पलाल ढो रहा था। सारे सीजन में मुश्किल से पाँच-सात हजार ही बनते। बहुत जोर मारता, लेकिन भैंसे और गाड़ी ने तो अपनी ही चाल चलना था। घर में
 
दीपशिखा
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बंधन

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दीपशिखा
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स्टार

केसरा राम जैसा कि किस्से सुने थे, नये पुलिस कप्तान ने आते ही आदेश जारी कर दिए— ‘सभीगुंडे-बदमाश चौबीस घंटे में शहर छोड़ जाएं। यहाँ कोई भी गैर-कानूनी काम नहीं करने दियाजायेगा। बाजार में कोई भी खुलेआम शराब नहीं पियेगा।’खबर सारे शहर में जंगल की आग की तरह फैल
 
दीपशिखा
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निर्माता

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दीपशिखा
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बोहनी

रणजीत कोमलगर्मी पूरे जोरों पर थी। गाँव को जाती सड़क पर सिर्फ उसी की साइकिलों की मरम्मत की दुकान थी। परछाइयाँ ढलने पर थीं, पर अभी बोहनी ही नहीं की थी। उबासियां लेता वह ग्राहक का इंतजार कर रहा था। कभी वह बक्से में पड़े सामान की तरफ देखता और कभी सड़क की
 
दीपशिखा
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पुण्य

अणमेश्वर कौर “ कब आया विलायत से, भई टहल सिंह? ” “ हो गए कोई पंद्रह-बीस दिन, अपना ब्याह करवाने आया था। अब तो कल सुबह की फ्लाइट से जाना है। ” “ वाह भई वाह! टहल सिंह, जहाँ तक मुझे याद है, यह तेरी तीसरी शादी है, ” बात को जारी रखते हुए सरवण पूछने लगा, “ क
 
दीपशिखा
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यादगार

अमृत जोशी कुछ लोग दान देकर रसीद ले रहे थे, कुछ गोलक में रुपए-पैसे डाल रहे थे। लोग आ-जा रहे थे। ईंटों, बजरी, सीमेंट का ढ़ेर लगा था और निर्माण कार्य ज़ोर-शोर से चल रहा था। यह वही जगह थी जहाँ पिछले दिनों दो अनजाने व्यक्तियों द्वारा अंधाधुंध फायरिंग करने
 
दीपशिखा
Dec 29 2009 11:54 AM
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पंजाबी पत्रिका मिन्नी से जान-पहचान

पंजाबी लघुकथा की विकास-यात्रा में पत्रिका ‘मिन्नी’ का विशेष योगदान रहा है। • त्रैमासिक पत्रिका ‘मिन्नी’ का प्रवेशांक अक्तूबर 1988 में प्रकाशित हुआ था। • लघुकथा विधा को समर्पित इस पत्रिका के 83 अंक पाठकों तक पहुँच चुके हैं। • पत्रिका की और से प्रत्येक
 
दीपशिखा
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रिश्ते का नामकरण

दलीप सिंह वासन उजाड़ से रेलवे स्टेशन पर अकेली बैठी लड़की को मैंने पूछा तो उसने बताया कि वह अध्यापिका बन कर आई है। रात को स्टेशन पर ही रहेगी। प्रात: वहीं से ड्यूटी पर जा उपस्थित होगी। मैं गाँव में अध्यापक लगा हुआ था। पहले घट चुकी एक–दो घटनाओं के बारे
 
दीपशिखा
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ममता

जंग बहादुर सिंह घुम्मन वृद आश्रम में करीब पैंसठ वर्ष की एक औरत को उसका बेटा दाखिल करवा गया था । रब्ब जैसा मैनेजर उसे सहारा देता हुआ एक कमरे तक ले गया । “यह चारपाई-बिस्तर आपके लिए है, मां जी । आपको यहां घर जैसी सुविधा मिलेगी । फिर भी ’गर किसी चीज़ की
 
दीपशिखा
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पहाड़ों पर चढ़ने वाली

तरसेम गुज़राल दिनेश साहब का केबिन कुछ इस तरह था कि कांच की दीवारें चारों तरफ ज़्यादा से ज़्यादा कर्मचारियों पर नज़र रख सकें । पिछले कुछ दिनों से पार्वती माई पर उनकी खास नज़र थी । पार्वती पिछले दस सालों से वहां काम कर रही थी । पहले चरखे पर ऊन अटेरती थ
 
दीपशिखा
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तरकीब

हरभजन खेमकरनी रसोईघर में काम कर रही अमनजोत अपने दो वर्षीय बेटे मिंटू की ओर से बड़ी चिंतित थी–लड़का सारे दिन में मुश्किल से एक गिलासी दूध ही पीता है। रोटी की तरफ तो देखता भी नहीं। फल-फ्रूट काट-काट कर फेंक देता है। डाक्टर कहते हैं कि पेट की कोई तकलीफ न
 
दीपशिखा
Dec 29 2009 11:54 AM
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भूकंप

डा. कर्मजीत सिंह नडाला बेटा सोलह वर्ष का हुआ तो वह उसे भी अपने साथ ले जाने लग पड़ा। ‘कैसे हाथ-पाँव टेढ़े-मेढ़े कर चौक के कोने में बैठना है, आदमी देख कैसे ढ़ीला-सा मुँह बनाना है। लोगों को बुद्धू बनाने के लिए तरस का पात्र बनकर कैसे अपनी ओर आकर्षित करना
 
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दायित्व

डा. बलदेव सिंह खहिरा “देख बापू! मुझे आए महीना भर हो गया। सभी रिश्तेदारों से पूछ लिया है, कोई भी आप दोनों को रखने के लिए तैयार नहीं। इस वृद्धावस्था में मैं आपको अकेले इस कोठी में नहीं छोड़ सकता। आप अपना लुक आफ्टर कर ही नहीं सकते।” माता-पिता को खामोश द
 
दीपशिखा
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सूरज

सुधीर कुमार सुधीर कच्चे मकानों के बीच में बनी छप्पर वाली अंधेरी कोठरी में बैठा रुलदू शराब पी रहा था। उसकी घरवाली चूल्हे के पास बैठी धुआं फांक रही थी। सात साल का बेटा सूरज माँ के पास बैठा आटे की चिड़िया बना रहा था। रुलदू ने भीतर से आवाज दी, “ रोटी-पान
 
दीपशिखा
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नई पगडंडी

परमजीत थेड़ी गुरमुख सिंह व उसकी पत्नी विकासशील विचारों के थे। विवाह के बारह साल बाद भी उनके कोई औलाद नहीं हुई थी। उन की इच्छा थी कि परमात्मा उन्हें एक बच्चा दे दे, जो उनके बुढ़ापे का सहारा बने। वह लड़के-लड़की में कोई फर्क नहीं समझते थे। और एक दिन उनक
 
दीपशिखा
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एक राह और

नूर संतोखपुरी वह मेरे आगे-आगे चली जा रही थी। गले में पड़ी हलके लाल रंग की चुनरी के दोनों छोर मेरी ओर देख कर हंस रहे थे। बालों की एक ही चोटी इस तरह गुंथी हुई थी, जैसे किसी ने बलखाती बेल कोरे सफेद कागज पर बड़ी रीझ से बनाई हो। उसके कानों की सुनहली बालिय
 
दीपशिखा
Oct 14 2009 07:52 PM
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पहुँचा हुआ फकीर

भूपिंदर सिंह ए क कमरा कह लो या छोटा घर। वही सास-ससुर, वहीं पर बड़ी ननद, वहीं पर छोटा देवर। और एक तरफपति-पत्नी की दो चारपाइयाँ। जब-तब बहू का जबड़ा भिंच जाता। पल भर में हाथ-पांव ठंडे होने लगते। होठों का रंग नीला पड़ जाता। हकीमों कीदवा-बूटियां करके देखी
 
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लोक लाज

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दीपशिखा
Sep 21 2009 07:59 AM
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नज़र और नज़र

हरभजन खेमकरनीबड़ी कठिनाई से मीनाक्षी रेल के आरक्षित सीट वाले डिब्बे में चढ़ तो गई, लेकिन सीट मिलना तो दूर, खड़े होने के लिए भी जगह नहीं थी। राजधानी में हो रही राजनीतिक रैली में भाग लेने जा रही बे-टिकट भीड़ ने गाड़ी के आरक्षित डिब्बों पर भी कब्जा कर रखा
 
दीपशिखा
Sep 07 2009 05:59 AM
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माँ

डॉ श्याम सुन्दर दीप्ति“ मम्मी, मम्मी! मेरा शार्पनर कहाँ है?”“ मौम! कुछ खाने को बना दो।”“ मौम…”बेटा बार-बार कुछ मांग रहा था।“ तू आवाज देने से न हटना। तू एक ही बार नहीं मांग सकता सब कुछ। बता, क्या मौम-मौम लगा रखी है?”वह भी परेशान थी, अपने सर्वाइकल के दर्द
 
दीपशिखा
Aug 29 2009 11:28 AM
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कड़वा सच

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मां

गुरदीप सिंह पुरीउस दिन मां के साथ जब मामूली–सी बात पर उसका झगड़ा हो गया तो वह बिना नाश्ता किए ही ड्यूटी पर जाने के लिए बस–अड्डे की ओर चल पड़ा । घर से निकलते वक़्त मां के यह बोल उसे ख़ंजर की तरह चुभे, “ तेरी आस में तो मैने तेरे अड़ियल और नशेबाज बाप के साथ
 
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इज्जत

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खून के व्यापारी

अमरजीत अकोई “डाक्टर साब, यह लो पर्ची और दवाइयाँ दे दो।” फटेहाल रिक्शा-चालक ने कैमिस्ट की दुकान पर पर्ची पकड़ाते हुए कहा। “भई पैसे दो, अब ऐसे दवाई नहीं मिलती।” “तुम दवाई दो जल्दी से, मैं अभी आकर खून की बोतल दे देता हूँ।” “न भई न, खून का धंधा तो बंद कर
 
दीपशिखा
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वापसी

श्याम सुन्दर अग्रवाल “ अपने काम से थोड़ा समय निकाल कर, घर पर ज़रूर होकर आना। मम्मी का हालचाल पूछना और अगर रात रुकना ही पड़े तो घर पर ही ठहरना। ” पत्नी ने सफर के लिए तैयार होते पति से कहा। “ कोशिश करुंगा, ” कहते हुए वह मन ही मन हँस रहा था कि पगली तेरे
 
दीपशिखा
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फासला

धर्मपाल साहिल किसी कैदी के जेल से छूटने की तरह, वह भी विभाग द्वारा लगाए गए एक माह के रिफ्रेशर कोर्स से फ़ारिग होकर, अपने परिवार के पास उड़ जाना चाहता था। घिसे-पिटे से बोर लेक्चर। बेस्वाद खाना। अनजान साथी। बेगाना शहर। फुर्सत के क्षणों में उसे अपने सात
 
दीपशिखा