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मुक्तिबोध

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13 Jun 2010
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ब्रह्मराक्षस

शहर के उस ओर खंडहर की तरफ़ परित्यक्त सूनी बावड़ीके भीतरीठण्डे अंधेरे मेंबसी गहराइयाँ जल की...सीढ़ियाँ डूबी अनेकोंउस पुराने घिरे पानी में...समझ में आ न सकता होकि जैसे बात का आधारलेकिन बात गहरी हो।बावड़ी को घेरडालें खूब उलझी हैं,खड़े हैं मौन औदुम्बर।व
 
Rangnath Singh
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मुझे कदम-कदम पर

मुझे कदम-कदम पर चौराहे मिलते हैंबाँहे फैलाए !!एक पैर रखता हूँ कि सौ राहें फूटतींव मैं उन सब पर से गुजरना चाहता हूँबहुत अच्छे लगते हैं उनके तजुर्बे और अपने सपनेसब सच्चे लगते हैंअजीब सी अकुलाहट दिल में उभरती हैमैं कुछ गहरे मे उतरना चाहता हूँजाने क्या मिल
 
Rangnath Singh
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चाहिए मुझे मेरा असंग बबूलपन

मुझे नहीं मालूममेरी प्रतिक्रियाएँसही हैं या ग़लत हैं या और कुछसच, हूँ मात्र मैं निवेदन-सौन्दर्यसुबह से शाम तकमन में हीआड़ी-टेढ़ी लकीरों से करता हूँअपनी ही काटपीटग़लत के ख़िलाफ़ नित सही की तलाश में किइतना उलझ जाता हूँ किजहर नहींलिखने की स्याही में पीता
 
Rangnath Singh
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एक अंतर्कथा

अग्नि के काष्ठखोजती माँ,बीनती नित्य सूखे डंठलसूखी टहनी, रुखी डालेंघूमती सभ्यता के जंगलवह मेरी माँखोजती अग्नि के अधिष्ठानमुझमें दुविधा,पर, माँ की आज्ञा से समिधाएकत्र कर रहा हूँमैं हर टहनी में डंठल मेंएक-एक स्वप्न देखता हुआपहचान रहा प्रत्येकजतन से जमा
 
रंगनाथ सिंह
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पता नहीं...

पता नहीं कब, कौन, कहाँ किस ओर मिलेकिस साँझ मिले, किस सुबह मिले!!यह राह ज़िन्दगी कीजिससे जिस जगह मिलेहै ठीक वही, बस वही अहाते मेंहदी केजिनके भीतरहै कोई घरबाहर प्रसन्न पीली कनेरबरगद ऊँचा, ज़मीन गीलीमन जिन्हें देख कल्पना करेगा जाने क्या!!तब बैठ एकगम्भीर
 
रंगनाथ सिंह
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अँधेरे में - 1

जिन्दगी के ... कमरों में अँधेरे लगाता है चक्कर कोई एक लगातार ; आवाज़ पैरों की देती है सुनाई बार - बार ... बार - बार , वह नहीं दिखता ..... नहीं ही दिखता किन्तु , वह रहा घूम तिलिस्मी खोह में गिरफ्तार कोई एक ; भीत - पार आती पास से , गहन रहस्यमय अंधकार -
 
रंगनाथ सिंह
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अँधेरे में - 2

सूनापन सिहरा , अँधेरे में ध्वनियों के बुलबुले उभरे , शुन्य के मुख पर सलवटें स्वर की, मेरे ही उर पर ,धँसती हुई सिर, छटपटा रही हैं शब्दों की लहरें मीठी हैं दुःसह !! अरे, हाँ सांकल ही रह-रह बजती है द्वार पर कोई मेरी बात मुझे बताने के लिए ही बुलाता है ,
 
रंगनाथ सिंह
Dec 29 2009 11:52 AM
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अँधेरे में - 3

समझ न पाया कि चल रहा स्वप्न या जागृति शुरू है दिया जल रहा है, पीतालोक-प्रसार में काल गल रहा है, आस-पास फैली हुई जग-आकृतियाँ लगती हैं छपी हुई जड़-चित्र-कृतियों- सी अलग व दूर-दूर निर्जीव !! , यह सिविल लाइंस है. मैं अपने कमरे में यहाँ पड़ा हुआ हूँ. आँखे
 
रंगनाथ सिंह
Dec 29 2009 11:52 AM
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अँधेरे में - 4

अकस्मात् चार का ग़जर कहीं खड़का मेरा दिल धड़का , उदास मटमैला मनरूपी वल्मीक चल - विचल हुआ सहसा। अनगिनत काली - काली हायफ़न - डैशों की लीकें बाहर निकल पड़ीं , अन्दर घुस पड़ीं भयभीत , सब ओर बिखराव। मैं अपने कमरे में यहाँ लेटा हुआ हूँ। काले - काले शहतीर छ
 
रंगनाथ सिंह
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अँधेरे में - 5

एकाएक मुझे भान  !! पीछे से किसी अजनबी ने कन्धे पर रक्खा हाथ। चौंकता मैं भयानक एकाएक थरथर रेंग गयी सिर तक , नहीं नहीं। ऊपर से गिरकर कन्धे पर बैठ गया बरगद - पात तक , क्या वह संकेत , क्या वह इशारा ? क्या वह चिट्ठी है किसी की ? कौन - सा इंगित ? भागत
 
रंगनाथ सिंह
Dec 29 2009 11:52 AM
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अँधेरे में - 6

सीन बदलता है सुनसान चौराहा साँवला फैला , बीच में वीरान गेरूआ घण्टाघर ,   ऊपर कत्थई बुज़र्ग गुम्बद ,   साँवली हवाओं में काल टहलता है। रात में पीले हैं चार घड़ी - चेहरे , मिनिट के काँटों की चार अलग गतियाँ , चार अलग कोण , कि चार अलग संकेत ( मन
 
रंगनाथ सिंह
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अँधेरे में - 7

चाँद उग गया है गलियों की आकाशी लम्बी - सी चीर में तिरछी है किरनों की मार उस नीम पर जिसके कि नीचे मिट्टी के गोल चबूतरे पर , नीली चाँदनी में कोई दिया सुनहला जलता है मानो कि स्वप्न ही साक्षात् अदृश्य साकार। मकानों के बड़े - बड़े खँडहर जिनके कि सूने मटिय
 
रंगनाथ सिंह
Dec 29 2009 11:52 AM
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अँधेरे में - 8

एकाएक हृदय धड़ककर रुक गया , क्या हुआ  !! नगर से भयानक धुआँ उठ रहा है , कहीं आग लग गयी , कहीं गोली चल गयी। सड़कों पर मरा हुआ फैला है सुनसान , हवाओं में अदृश्य ज्वाला की गरमी गरमी का आवेग। साथ - साथ घूमते हैं , साथ - साथ रहते हैं , साथ - साथ सोते
 
रंगनाथ सिंह
Dec 29 2009 11:52 AM
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चांद का मुँह टेढ़ा है

नगर के बीचों-बीच आधी रात--अंधेरे की काली स्याह शिलाओं से बनी हुई भीतों और अहातों के, काँच-टुकड़े जमे हुए ऊँचे-ऊँचे कन्धों पर चांदनी की फैली हुई सँवलायी झालरें। कारखाना--अहाते के उस पार धूम्र मुख चिमनियों के ऊँचे-ऊँचे उद्गार--चिह्नाकार--मीनार मीनारों
 
रंगनाथ सिंह
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लकड़ी का रावण

दीखता त्रिकोण इस पर्वत-शिखर से अनाम, अरूप और अनाकार असीम एक कुहरा, भस्मीला अन्धकार फैला है कटे-पिटे पहाड़ी प्रसारों पर; लटकती हैं मटमैली ऊँची-ऊँची लहरें मैदानों पर सभी ओर लेकिन उस कुहरे से बहुत दूर ऊपर उठ पर्वतीय ऊर्ध्वमुखी नोक एक मुक्त और समुत्तुंग
 
रंगनाथ सिंह
Dec 29 2009 11:52 AM
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एक भूतपूर्व विद्रोही का आत्म-कथन

दुख तुम्हें भी है, दुख मुझे भी। हम एक ढहे हुए मकान के नीचे दबे हैं। चीख़ निकालना भी मुश्किल है, असम्भव...... हिलना भी। भयानक है बड़े-बड़े ढेरों की पहाड़ियों-नीचे दबे रहना और महसूस करते जाना पसली की टूटी हुई हड्डी। भयँकर है! छाती पर वज़नी टीलों को रखे
 
रंगनाथ सिंह
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बहुत दिनों से

मैं बहुत दिनों से बहुत दिनों से बहुत-बहुत सी बातें तुमसे चाह रहा था कहना और कि साथ यों साथ-साथ फिर बहना बहना बहना मेघों की आवाज़ों से कुहरे की भाषाओं से रंगों के उद्भासों से ज्यों नभ का कोना-कोना है बोल रहा धरती से जी खोल रहा धरती से त्यों चाह रहा कह
 
रंगनाथ सिंह
Dec 29 2009 11:52 AM
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विचार आते हैं

विचार आते हैं लिखते समय नहीं बोझ ढोते वक़्त पीठ पर सिर पर उठाते समय भार परिश्रम करते समय चांद उगता है व पानी में झलमलाने लगता है हृदय के पानी में विचार आते हैं लिखते समय नहीं ...पत्थर ढोते वक़्त पीठ पर उठाते वक़्त बोझ साँप मारते समय पिछवाड़े बच्चों क
 
रंगनाथ सिंह
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भूल-ग़लती

भूल-ग़लती आज बैठी है ज़िरहबख्तर पहनकर तख्त पर दिल के, चमकते हैं खड़े हथियार उसके दूर तक, आँखें चिलकती हैं नुकीले तेज पत्थर सी, खड़ी हैं सिर झुकाए सब कतारें बेजुबाँ बेबस सलाम में, अनगिनत खम्भों व मेहराबों-थमे दरबारे आम में। सामने बेचैन घावों की अज़ब त
 
रंगनाथ सिंह
Dec 29 2009 11:52 AM
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मृत्यु और कवि

घनी रात, बादल रिमझिम हैं, दिशा मूक, निस्तब्ध वनंतर व्यापक अंधकार में सिकुड़ी सोयी नर की बस्ती भयकर है निस्तब्ध गगन, रोती-सी सरिता-धार चली गहराती, जीवन-लीला को समाप्त कर मरण-सेज पर है कोई नर बहुत संकुचित छोटा घर है, दीपालोकित फिर भी धुंधला, वधू मूर्छि
 
रंगनाथ सिंह
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अंधेरे में ( एक अंश)

अनखोजी निज-समृद्धि का वह परम उत्कर्ष,परम अभिव्यक्तिमैं उसका शिष्य हूँवह मेरी गुरू है,गुरू है !!वह मेरे पास कभी बैठा ही नहीं था,वह मेरे पास कभी आया ही नहीं था,तिलस्मी खोह में देखा था एक बार,आख़िरी बार ही।पर, वह जगत् की गलियों में घूमता है प्रतिपलवह फटेहाल
 
रंगनाथ सिंह
Dec 15 2009 02:35 PM
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रात, चलते हैं अकेले ही सितारे

रात, चलते हैं अकेले ही सितारे। एक निर्जन रिक्त नाले के पास मैंने एक स्थल को खोद मिट्टी के हरे ढेले निकाले दूर खोदा और खोदा और दोनों हाथ चलते जा रहे थे शक्ति से भरपूर। सुनाई दे रहे थे स्वर – बड़े अपस्वर घृणित रात्रिचरों के क्रूर। काले-से सुरों में बोल
 
रंगनाथ सिंह
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ऐ इन्सानों

आंधी के झूले पर झूलोआग बबूला बन कर फूलोकुरबानी करने को झूमोलाल सबेरे का मूँह चूमोऐ इन्सानों ओस न चाटोअपने हाथों पर्वत काटोपथ की नदियाँ खींच निकालोजीवन पीकर प्यास बुझालोरोटी तुमको राम न देगावेद तुम्हारा काम न देगाजो रोटी का युद्ध करेगावह रोटी को आप वरेगा ।
 
रंगनाथ सिंह
टैग: कविता
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सरमस्तों की महफ़िल में गजानन मुक्तिबोध आया

ज़माने भर का कोई इस क़दर अपना न हो जाए कि अपनी ज़िंदगी ख़ुद आपको बेगाना हो जाए। सहर होगी ये शब बीतेगी और ऐसी सहर होगी कि बेहोशी हमारे होश का पैमाना हो जाए। किरन फूटी है ज़ख़्मों के लहू से : यह नया दिन है : दिलों की रोशनी के फूल हैं – नज़राना हो जाए।
 
रंगनाथ सिंह
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मुक्तिबोध को हार्दिक श्रद्धांजली

मुक्तिबोध की कविताएं,कहानियाँ,लेख,निबंध सभी ने हिन्दी को व्यापक स्तर पर प्रभावित किया है। कवि के रूप में उन्हें सर्वाधिक लोकप्रियता मिली। मुक्तिबोध हिन्दी कविता में एक अवधारणा बन चुके हैं। अपने समकालीन और परवर्ती पीढ़ियों को समान रूप से प्रभावित करने
 
रंगनाथ सिंह
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मैं तुम लोगों से दूर हूँ

मैं तूम लोगों से इतना दूर हूँ तुम्हारी प्रेरणाओं से मेरी प्रेरणा इतनी भिन्न है कि जो तुम्हारे लिए विष है, मेरे लिए अन्न है। मेरी असंग स्थिति में चलता-फिरता साथ है, अकेल में साहचर्य का हाथ है, उनका जो तुम्हारे द्वारा गर्हित हैं किंतु वे मेरी व्याकुल आ
 
रंगनाथ सिंह
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डबरे पर सूरज का बिम्ब

जब उससे मैं सड़क पर मिला, मुझे लगा कि वह ठीक बात करने के मूड में नहीं है। राह में मुझे देखकर वह खुश नहीं हुआ था। उसकी शर्ट की पीठ पसीने से तर-बतर थी, बाल अस्त-व्यस्त थे। और चेहरा ऐसा मलिन और क्लान्त था मानो सौ जूते खाकर सवारी आ रही हो। तत्काल निर्णय ल
 
रंगनाथ सिंह
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कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी: दो

बात चल रही थी आलोचना और काव्य पर। यशराज न जाने किस बात पर चीखकर टेबल पर घूँसे मारन लगा और बोला, ”हाँ, आलोचना में फ्राॅड होता है, किन्तु काव्य में भी होता है। एक तो फ्राॅड जान-बूझकर किया जाता है अर्थात् काव्य में लेखक जो दृष्टि अपनाता है वह उसकी अन्तर
 
रंगनाथ सिंह
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कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी - 1

मेरी डायरी पर बहुत कम बहस हुआ करती है। लेकिन कल हो ही गयी। वो जो यशराज हैं न। वही, वही ! उस गली में रहते हैं। नहीं, नहीं, उनकी वकालत नहीं चलती। हाँ यूँ ही हैं, यों आदमी काबिल हैं। बी. एस-सी., बी.टेक.,एल-एल.बी., लेकिन बिलकुल बेरोजगार हैं। उस शहर में उ
 
रंगनाथ सिंह
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मैं उनका ही होता जिनसे

मैं उनका ही होता जिनसे मैंने रूप भाव पाए हैं। वे मेरे ही हिये बंधे हैं जो मर्यादाएँ लाए हैं। मेरे शब्द, भाव उनके हैं मेरे पैर और पथ मेरा, मेरा अंत और अथ मेरा, ऐसे किंतु चाव उनके हैं। मैं ऊँचा होता चलता हूँ उनके ओछेपन से गिर-गिर, उनके छिछलेपन से खुद-ख
 
रंगनाथ सिंह