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04 Jun 2010
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जब सारे मरीज़ ख़तम हो जाते है तब डाँक्टर जी जाते हैं ..

पूरा एक घंटा बीत गया था और नम्बर आ ही नहीं रहा था. अभी पाँच मरीज और बचे थे फिर मेरा नम्बर आने वाला था. मैं कुछ जगहों पर खुद को असहाय पाती हूँ : डाँक्टर के क्लीनिक में बैठकर अपनी बारी का इंतजार करना; प्लेटफार्म पर ट्रेन के आने का इंतजार और ..... तीसरा
 
Razia
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किसी भी स्थिति में धैर्य मत खोना . . बेटी को माँ का ख़त

अभिभूत हूँ मैं तुमने जो सन्देश मातृ दिवस पर मुझे दिया है. आज भी जब याद करती हूँ उन क्षणों को जब मैनें मातृत्व सुख अर्जित किया था तो रोमांचित हो जाती हूँ. और यह मातृत्व सुख तुमने ही तो प्रदान किया था - सर्वप्रथम. ऊँगली पकड़कर तुम्हें चलना सिखाने से लेकर अब
 
Razia
टैग: पत्र
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मजदूर

मजदूर दिवस पर मेरी कविता पढें यहाँ क्लिक करके
 
Razia
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इंसान ऐसे भी होते हैं

लोग चिल्ला रहे थे. वह भी चिल्ला रहा था. लोग गालियाँ सुना रहे थे. वह भी गालियाँ सुना रहा था. मैनें कहा : इंसान ऐसे होते हैं. लोग चिल्ला रहे थे. वह शांत था. लोग गालियाँ सुना रहे थे. वह मुस्करा रहा था.. मैनें कहा : इंसान ऐसे भी होते हैं वह चिल्ला रहा था.
 
Razia
टैग: समाज
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फिर जन्मने की ख्वाहिश

नीद से लड़ते हुए जब थकी-हारी फिर नीद आ जाती है सपना देखना मेरा तुम्हें जाहिर हो इसलिये बड़बड़ाती हूँ . रक्तपिपासु घूमते है निर्द्वन्द देखकर डर जाती हूँ फिर जन्मने की ख्वाहिश में अक्सर मैं मर जाती हूँ
 
Razia
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चलो धूप से बात करें ` ` `

कुछ कारणो से लम्बे समय से ब्लागजगत से दूर रही. आज एक रचना के साथ लौट रही हूँ. चलो धूप से बात करें अब तो शुभ प्रभात करें . रिश्ता-रिश्ता स्पर्श करें अब तो ना आघात करें . सुनियोजित करते ही हैं कुछ तो अकस्मात करें . तेरे-मेरे अपने है-सपने फिर किसका रक्तपात
 
Razia
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मंजिल दूर नहीं है

मंजिल की ओर महज़ एक कदम और यकीन मानिये मंजिल एक कदम और नजदीक हो गया दूसरे कदम ने और एक कदम नज़दीक कर दिया तीसरा -- चौथा -- -- और फिर अब तो मंजिल दूर नहीं है **********
 
Razia
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कुछ रिश्ते व्यापार के होते हैं

**कुछ रिश्ते उधार के होते हैंकुछ रिश्ते प्यार के होते हैंइतनी बेरूखी अच्छी नहीं हैकुछ रिश्ते इंतज़ार के होते हैंटूट जाते हैं पल में देखो तोकुछ रिश्ते तार के होते हैंनाज़ुक फूल, कब उफ किया!कुछ रिश्ते खा़र के होते हैंबिक गये पर इतनी हैरानी क्यूँकुछ रिश्ते
 
Razia
टैग: ग़ज़ल
Aug 04 2009 06:50 PM
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सपनों को खंगालता है मन

जाने कितने सपने पालता है मन फिर सपनों को खंगालता है मन नाज़ुक इतना कि टूटता रहता है खुद ही को फिर संभालता है मन खुद ही के खिलाफ बयान देकर अपना भडा़स निकालता है मन कभी बच्चों सा मचल जाता है कभी हर बात को टालता है मन आसमान छूने की आरज़ू इसकी गेंद सा खुद
 
Razia
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मजदूर ----

दिनभर काम किया अब है थककर चूर-चूर और नहीं है कोई यह है एक मजदूर इसको इसकी मेहनत का प्रतिफल क्या मिलता है? दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से इनको मिलता है बच्चे इनके बिलख बिलख कर खो देते हैं नूर और नहीं है कोई यह है एक मजदूर खुले आसमान के नीचे रहकर औरों क
 
Razia
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नाच रहे हैं देखो मोर --

मौसम ने अंगडाई ली बदल छाये हैं घनघोर रंग-बिरंगे पंखो वाले नाच रहे हैं देखो मोर . सावन की रिमझिम बूंदे क्यों बैठे हो आंखे मूंदे हरियाली छाई हर ओर नाच रहे हैं देखो मोर . बढ़ गयी फूलों की लाली झूम रहे हैं डाली-डाली चुप हो जा मत कर शोर नाच रहे हैं देखो मो
 
Razia
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झुग्गी-झोपड़ियों में झांकता है --

यह ऊंचा मकान जब अपनी ऊँचाई आंकता है बेशरम पड़ोस की झुग्गी-झोपड़ियों में झांकता है ------------ आईना पत्थरों के गाँव में, सूरज पेड़ की छॉव में मछली देखो डूबने के डर से बैठ गयी है नाव में
 
Razia
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कभी कभार ढहना सीखो ---------

सच्चाई को कहना सीखो सच्चाई को सहना सीखो बुलंदी के अभिलाषी हैं तो कभी कभार ढहना सीखो उजड़ गए हैं घर तो क्या चौराहों पर रहना सीखो पत्थर - पत्थर छूकर गुज़रो पानी - पानी बहना सीखो
 
Razia
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बचपन ऐसे भी पलता है --

मजदूर माँ के बच्चे का बचपन ऐसे ही पलता है ---- ! !
 
Razia
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आईनों पर कहर ..

उजाड़कर बस्ती शोक मनाते हैं कत्ल करके फिर आंसू बहाते हैं . गुमशुदा तलाश में पढ़कर नाम ख़ुद ही को लोग ढूढ़ने जाते हैं . ख़ुद के चेहरों पर लगा कर दाग आईनों पर देखिये कहर ढाते हैं . इस बस्ती से बेखौफ न गुज़रिये बात-बात पे लोग खंज़र उठाते हैं . मज़हबी शिक
 
Razia
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सृजन का बीज -- !

आओ! हम उस ज़मीन को सींचे जिसके अन्दर नन्हा बीज छटपटा रहा है अंकुरित होने को . आओ हम उस ज़मीन में खाद डाले जिसके अन्दर कोमल अंकुर लड़ रहा है कठोर परतों से अंकुरित होने को हमें विश्वास है हारना ही होगा उन परतों को; ज़र्ज़र होना ही है उन दीवारों को जिसक
 
Razia