Anjaana Shahar ...Ajnabee Log..'s Image

Anjaana Shahar ...Ajnabee Log..

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08 Feb 2010
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ब्लोगरो की महफ़िल - भाग २

आप सभी ने मेरी रचना 'ब्लोगरों की महफ़िल' भाग - १ को पढ़ कर मेरा बहुत होंसला बढ़ाया और प्रेरित किया के इस का भाग-२ भी लिखूं . मेरे बहुत से प्रिय और ख़ास ब्लागर साथियों के ब्लॉग के बारे में व उन की रचनायों की कुछ जानकारी देने का मेरा यह एक छोटा सा प्रयास है!
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गणतंत्र दिवस पर सभी को बधाई

31.राज्य, 1618 भाषाओं, 6,400 जातियों, 6 जातीय समूह, 29 त्यौहारों,1 देश, एक भारतीय होने पर गर्व है. ६० वे गणतंत्र दिवस पर सभी को बधाई 
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ब्लागरो की महफ़िल ..

यह रचना लिखने का बड़ा मज़ा आया! मैंने कोशिश की है अपने कुछ जाने पहचाने साथी ब्लागरो के ब्लाग व उनकी कुछ रचनाओं को अपनी इस ग़ज़ल में शामिल करने की! इस ग़ज़ल का मीटर सही रखना कुछ मुश्किल था फिर भी कोशिश की है. उम्मीद करता हूँ आप को पसंद आएगी!यारो शामिल हों
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मंजिल दूर तो है लेकिन

सभी ब्लागरों को नव वर्ष की हार्दिक शुभ कामनाएं !!इस अवसर पर पेश है एक नयी ग़ज़ल, उम्मीद करता हूँ आप सब को ज़रूर पसंद आएगी:  मंजिल दूर तो है  लेकिन, तुम हिम्मत कर के चलो ! राह मुश्किल हों तो हों, तुम प्यार के रंग भर के चलो !!  ज़िन्दगी तो
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ग़ज़ल - घर में रहते हुए भी

घर  में  रहते  हुए  भी मुझे बेघर सा क्यों लगता है!जाने से है चेहरे अनजाना शहर सा क्यों लगता है!!वोह जगह यहाँ तुम और हम खुश हों के रह सकें,हकीकत न हों इक ख्वाबी मंज़र सा क्यों लगता है!!रस्ते वही, पेड़ पौदे वही, यहाँ मिलते थे हम कभीफूल
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आओ हम सब बच्चे बन जाए...

आओ हम सब बच्चे बन जाए!मन से फिर से सच्चे बन जाए!!खेल कूद कर मन बहलाएमन में कोई विषाद न लायेअपने सब संघी साथी से खेलेंदुःख सुख सब के बाँट के ले लेंहम  न्यारे और अच्छे बन जाए!आओ हम सब बच्चे बन जाए!!हिंसा और घृणा से हम दूर रहे बापू का शांति पाठ हम पूर
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मंजिल दूर तो है तेरी लेकिन...

निदा फाजली साहिब की लिखी ग़ज़ल " सफ़र में धूप तो होगी" से प्रभाभित हों कर ग़ज़ल के कुछ शेयर लिखने की जुर्रत कर रहा हूँ. उन जैसी सोचने की मेरी कुव्वत या ख़यालात की गहराई तो नहीं है पर जो भी लिखा है आप की नज़र है. आप सभी ब्लागर को नव वर्ष की हार्दिक शुभ
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चाय वाली दीदी - भाग ३

पीछे मुड कर देखते ही मेरा समूचा बदन ठंडा पड़ गया। मिस्सी दीदी सामने खडी थी। वही से फ़िर वोह बोली, " कम इन" मैंने कहा, " मैं अंग्रेज़ी नही जानता" लेकिन मिस्सी दीदी मेरा हाथ पकड़ कर सीधे कमरे में ले गयी। स्वय एक कुर्सी पर बैठ गयी और मुझे अपने सामने वाली कु
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ज़िन्दगी की कड़ियों को...

ज़िन्दगी की कड़ियों को, समेटना जो चाहा तो, समेट नही पाया मैं। लोग मिलते रहे और बिछड़ते गए। सपने बनते रहे और सिमटते गए। रिश्ते बनते रहे और टूटते गए। घाव रिस कर नासूर बनते गए। फ़िर ख़ुद को ख़ुद से, जोड़ना जो चाहा तो, जोड़ नही पाया मैं। यादें आती रही और ज
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चाय वाली दीदी - भाग २

जिस दिन मिस्सी दीदी ट्रान्सफर हो कर आयी हमारे पड़ोसी अमर नाथ की पत्नी जिन्हें मैं मौसी कह कर बुलाता था, वो मेरे बीजी के पास आयी और बोली "अरी बहिन इब तो म्हारे मुहल्ले में यह क्रिस्तिअनी भी आ गयी है, लेकिन क्या बताऊं गाल तो उस के ऐसे गोरे हैं के पूछो
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चाय वाली दीदी - भाग १

इस कहानी को लिखने का मेरा कोई खास मकसद नही था। पहले पहल सोचा करता था की दुनिया में मकसद ही सब कुछ होता है पर अब नही। अब तो यह महसूस करता हूँ की कुछ बातें बिना किसी मकसद के भी ज़िन्दगी के लिए बहुत ज़रूरी हो जाती है। खैर इस विवाद में न पड़ कर कहानी शुरू
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कुदरत के नजारे - Ghazal

मेरा यह नेचुर के ऊपर एक ग़ज़ल लिखने का पहला प्रयासः है। उम्मीद करता हूँ आप को पसंद आएगी... आज सुबह जब मेरा बाग़-ऐ-गुल से गुजर हुआ। कुदरत के करिश्मे का दिल पे अज़ब असर हुआ। हलकी फ़ैली थी धूप जैसे सफेद चादर का हो रूप, ठंडी हवा चल रही थी जिस से बदन शरर शरर
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संदेश बिरहन का..

ओ पंछी! यह संदेशवा दे दो जब तुम गुजरो पी की नगरिया। मोहे हर पल पी की याद सताए, मोरी छलक जाए है गगरिया। वोह कहते थे के आयेंगे अब के सावन में। एक अगन लगती जाए मोरे तन बदन में। लगन में उनकी मीठा सा दरद है मन में। धड़क जाए जियरा मोरा जब चमके वैरी बिजुरिय
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सागर किनारे...

शाम के झुट्पते में जब सूरज डूबता है सागर किनारे बैठा मैं, उस को निहारा करता हूँ जिस की सुनहरी किरणे रेत पर छिटक रही है तो लगता है मुझ को ऐसे जैसे एक मिलन हो रहा है जा हो रही हो जुदाई रात और दिन की रेत पर बैठा मैं कमज़ोर उँगलियों से तेरा नाम लिख देता ह
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क्या कहें?

मय जो हम ने मांगी साकी से पिलाई न गयी। सामने जाम था प्यास हम से बुझाई न गयी। क्या कहें अब जुबां ही चुप सी रहती है, क्या करें बात, बात हम से बनायी न गयी। जब भी गर्दन झुकाए तेरे आस्तां से गुज़रे हम, आँख उठायी तो सही, पर आँख मिलाई न गयी। माना के तुम भूल
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छोड़ा ऐसे तुम ने मुझ को...

छोड़ा ऐसे तुम ने मुझ को, मेरा खो गया हर सहारा। ना भुला पाया मैं तुझ को, तेरी याद ने मुझ को मारा। दिल तब से टूट चुका है, जब से जुदा हुए तुम, सब को मैं भूल चुका हूँ, मेरे खुदा हुए तुम, अब तो डूबी हमारी कश्ती, मुझे तूं ही दिखा किनारा। ना भुला पाया मैं त
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यादें

फ़िर तेरी याद ने इतना मुझे रुलाया है। दर्द उतना ही बढ़ा जितना इसे दबाया है। आंसू छलके ही रहे रोज़ मेरी आंखों से, ज़ख्म जलते ही रहे बीती हुई बातों से, आज यह दिन भी मुझे प्यार ने दिखाया है। दर्द उतना ही बढ़ा जितना इसे दबाया है। तन्हाई में मुझे फ़िर अतीत
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कभी यूँ ही..

मेरी तन्हाई की हमराज़ तेरी रंग भरी याद! करती है वीरान दिल को आबाद ! तरीक ज़िन्दगी के, उफक को तेरी यादों के जुगनू रोशन करते हैं। लेकिन फ़िर भी कभी यूँ ही जाग उठती है सहसा वोही रूहानी प्यास। तुम्हारे करीब बहुत ही करीब आने की आस। जी चाहता है उसी तरह फ़िर
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कल रात नही मैं रोया था...

कल रात नही मैं रोया था .. पहले जब दुनिया सोती थी , आँखें रहती मेरी रोती थी लेकिन कल तेरे दामन में , छुपा कर सर मैं सोया था कल रात नही मैं रोया था ... देखे थे रात मधुर सपने , जैसे सब सुख मिले अपने , दुःख के बादल से रहा दूर , दूर सपनों में मैं खोया था
Dec 29 2009 11:42 AM
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सफ़र में धुप तो होगी जो चल सको तो चलो

मैं निदा फाजली साहिब की ग़ज़लों का बहुत शौक़ीन हूँ और बहुत प्रभाभित हूँ उन के सोचने की गहराई से व् उन के अंदाज़-ऐ-बयाँ से व् उन के नजरियों से । उनकी लिखी यह ग़ज़ल मेरे दिल के बहुत अज़ीज़ है इस लिए मैं आप के साथ यह share करना चाहता हूँ । चित्रा सिंह जी आवाज
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सुबह हो रही है...

सुबह का समय है, ठंडी बयार चल रही है। पंछी चहचहा रहे है, रसीले गीत गा रहे है। सूरज निकल रहा है, किरणे फैला रहा है। चारो तरफ़ जैसे, इक जादू सा छा रहा है। मन्दिर में कहीं पुजारी, घंटी बजा रहा है। मस्जिद में कहीं मुल्ला, खुदा को बुला रहा है गुरद्वारे में
Dec 20 2009 02:34 AM
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आँखें क्या कहती है?

पहली ही नज़र में प्यार हो जाने की बात तो अक्सर आप ने सुनी ही होगी क्योंकि यह एक मानी हुई सहज और स्वभाविक सी बात है। किसी की आँखों में प्यार देखना एक ऐसी मनोवैज्ञानिक , भावनात्मक और अध्याम्तिक घटना है जिस की पूरण व्याख्या कोई नहीं कर सका है। आँखे तो एक
Dec 20 2009 02:34 AM
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कितना मुश्किल लगता है..

बीती बातों को भूल के जीना कितना मुश्किल लगता है, भंवर के बीच रखना सफीना कितना मुश्किल लगता है॥ नादाँ दिल भूले भी तो कैसे अपनी बीती यादों को, दिल के पन्नों से नाम का मिटना कितना मुश्किल लगता है॥ ग़मज़दा हो दिल तो कैसे खुशीयों को महसूस करे, अपनी ही तनह
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सुन बेवफा..

सुन बेवफा यादों को मेरी तुम चाह कर भी भुला ना पाओगी । रोंती रहोगी ख्यालों में मेरे, मगर तुम हम को रुला ना पाओगी ॥ इश्क में मेरे तुम डूब मरोगी यादो के अंधेरों में खो जाओगी, बंद दर जो मैंने अपना कर दिया, तुम उसे खुलवा ना पाओगी॥ तरसोगी मेरे पास आने को,
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चाय वाली दीदी - अन्तिम भाग

इस कहानी को देरी से पूरी करने के लिए मैं अपने प्रिय पाठको से क्षमाप्रार्थी हूँ। इसे लिखने के लिए मुझे अपने अन्दर से बहुत कुछ खोजना पड़ा और बड़ी तकलीफ भी हुई इसे पूरा करने में । इसे लिखते वक़त मुझे कुछ ऐसे हालातों का सामना करना पड़ा जिन के बारे में सोचा
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बेदर्दी बालमा तुझ को.....

बेदर्दी बालमा तुझ को...मेरा मन याद करता है बरसता है जो आँखों से वो सावन याद करता है बेदर्दी बालमा तुझ को...मेरा मन याद करता है..... शाम का झुटपुटा सा था. मैं अपने कमरे में ऐसे ही अनमना सा लेता हुआ था अपने बिस्तर पर। तभी "आरज़ू" फिल्म के पुराने गाने ने
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बातें.....

यह तमन्ना रहती थी मेरी, कि करते तुम से दो बातें, जो सकून दे दिल को मेरे, करते तमाम हम वोह बातें कुछ हम भी कह ना पाते थे, कुछ यह दुनिया भी जलती थी, जाने क्यों रोकती थी मुझ को, न करने देती थी क्यों बातें यही आरज़ू रहती थी मेरी, कि मिल जाये तूं वीराने मे
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पानी के बुदबुदे सा...एक एहसास ...

हाँ तुम्हारे अन्दर शायद हमेशा एक एहसास तो रहा होगा जिसे मैं पागल उस वक़त जान नही पाया, समझ नहीं पाया। बिल्कुल पानी के बुदबुदे जैसा एहसास...इतना नाजुक सा ...टूटने का तुम्हे दर्द तो हुआ होगा । आज वक़त की लहर ने शायद उस का वजूद मिटा दिया है। हमारा भी क्
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मयकदे में...

कल जब मयकदे में जाम उठाया तो उछल गया तेरा नाम सुना तो आँख से एक अंशू निकल गया सुना मैंने, कहता था कोई, या खुदा वो सच न हो के तेरा दिल मेरे अपने ही रकीब पर फिसल गया या खुदा इस बात ने किया परेशान रात भर मुझे कैसे तुम मुझे भूल गयी क्यों तेरा दिल बदल गया
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पतझड़

भूल नहीं पाता हूँ पतझड़ मास को मैं जब तुम से जुदा होता हूँ ज्यों पत्ते शाख से टूटे मैं टूटता हूँ तुम से आशुकन लिए हुए, हवाओं के झोंको से उड़ता हुआ तेरा आँचल रह रह के सदा देता है बढते कदम यह मेरे एक बार जकड जाते हैं मैं रुक के देखता हूँ तेरा आंशु भरा
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Anjaana Shahar ...Ajnabee Log..

मैं निदा फाजली साहिब की ग़ज़लों का बहुत शौक़ीन हूँ और बहुत प्रभाभित हूँ उन के सोचने के नजरियों से । उनकी लिखी यह ग़ज़ल मेरे दिल के बहुत अज़ीज़ है और साथ में आप के साथ शेयर करना चाहता हूँ चित्रा सिंह जी आवाज़ में यह ग़ज़ल जो उन की बहुत ही बेहतरीन गाई हुई चुन
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सुबह हो रही है...

सुबह का समय है, ठंडी बयार चल रही है। पंछी चहचहा रहे है, रसीले गीत गा रहे है। सूरज निकल रहा है, किरणे फैला रहा है। चारो तरफ़ जैसे, इक जादू सा छा रहा है। मन्दिर में कहीं पुजारी, घंटी बजा रहा है। मस्जिद में कहीं मुल्ला, खुदा को बुला रहा है गुरद्वारे में
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आँखें क्या कहती है?

पहली ही नज़र में प्यार हो जाने की बात तो अक्सर आप ने सुनी ही होगी क्योंकि यह एक मानी हुई सहज और स्वभाविक सी बात है। किसी की आँखों में प्यार देखना एक ऐसी मनोवैज्ञानिक , भावनात्मक और अध्याम्तिक घटना है जिस की पूरण व्याख्या कोई नहीं कर सका है। आँखे तो एक
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कितना मुश्किल है..

बीती बातों को भूल के जीना कितना मुश्किल है, भंवर बीच सफीना रखना कितना मुश्किल है॥ नादाँ दिल भूले भी तो कैसे अपनी बीती यादों को, दिल के पन्नों से नाम का मिटना कितना मुश्किल है॥ ग़मज़दा हो दिल तो कैसे खुशीयों को महसूस करे, अपने ही तनहाइयों से उभरना कित
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सुन बेवफा..

कहते है हम यादों को मेरी तुम चाह कर भी भुला ना पाओगी । रोंती रहोगी ख्यालों में मेरे, मगर तुम हम को रुला ना पाओगी ॥ इश्क में मेरे तुम डूब मरोगी यादो के अंधेरों में खो जाओगी, बंद दर जो मैंने अपना कर दिया, तुम उस को खुला ना पाओगी॥ तरसोगी मेरे पास आने को
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चाय वाली दीदी - अन्तिम भाग

इस कहानी को देरी से पूरी करने के लिए मैं अपने प्रिय पाठको से क्षमाप्रार्थी हूँ। इसे लिखने के बहुत कुछ अपने अन्दर से खोजना पड़ा और मुझे बड़ी तकलीफ हुई इसे पूरा करने में भी । इसे लिखते वक़त मुझे कुछ ऐसे हालातों का सामना करना पड़ा जिन के बारे में सोचा नही
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चाय वाली दीदी - अंतिम भाग

जब भी मैं स्कूल से लोटता तो चाय मैं मिस्सी दीदी के यहाँ ही पीता था . वोह मुझे बिना दूध वाली चाय नहीं देती थी । जब मिस्सी दीदी बिना दूध वाली चाय पीती थी तो पता नहीं क्यों मेरा मन उदास हो जाता था । मैंने कई बार उन्हें मना भी किया पर उन से यह आदत छूटती
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बेदर्दी बालमा तुझ को.....

बेदर्दी बालमा तुझ को...मेरा मन याद करता है बरसता है जो आँखों से वो सावन याद करता है बेदर्दी बालमा तुझ को...मेरा मन याद करता है..... शाम का झुटपुटा सा था. मैं अपने कमरे में ऐसे ही अनमना सा लेता हुआ था अपने बिस्तर पर। तभी "आरज़ू" फिल्म के पुराने गाने ने
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बातें.....

यह तमन्ना रहती थी मेरी, कि करते तुम से दो बातें, जो सकून दे दिल को मेरे, करते तमाम हम वोह बातें कुछ हम भी कह ना पाते थे, कुछ यह दुनिया भी जलती थी, जाने क्यों रोकती थी मुझ को, न करने देती थी क्यों बातें यही आरज़ू रहती थी मेरी, कि मिल जाये तूं वीराने मे
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पानी के बुदबुदे सा...एक एहसास ...

हाँ तुम्हारे अन्दर शायद हमेशा एक एहसास तो रहा होगा जिसे मैं पागल उस वक़त जान नही पाया, समझ नहीं पाया। बिल्कुल पानी के बुदबुदे जैसा एहसास...इतना नाजुक सा ...टूटने का तुम्हे दर्द तो हुआ होगा । आज वक़त की लहर ने शायद उस का वजूद मिटा दिया है। हमारा भी क्