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कोलाहल

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08 Mar 2010
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मंदी, महंगाई, सूखे से सीखा नहीं सबक

मंदी,सूखे और महंगाई की तिहरी मार के बाद पेश किए गए इस बजट में देखने वाली सबसे बड़ी बात यह थी कि संकट के इस दौर से हमारी सरकार ने क्या सबक सीखा। वित्त मंत्री का बजट भाषण सुनने के बाद स्पष्टï है कि हमारे नीति-नियंताओं ने आफत के इस दौर से कोई सबक नहीं लिया।
 
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मीडिया का ये 'जी-फैक्टर '

मीडिया का ये 'जी-फैक्टर ' 'ज्ञानोदय' के मीडिया विशेषांक में पत्रकारिता की दुनिया के 'बड़े लोगोंÓ अनुभवों और संस्मरणों के रास्ते कहीं न कहीं मीडिया के चाल-चरित्र में हाल के वर्षों में आए बदलाव की झलक देखने को मिली। विनोद दुआ ने अपने आलेख में पत्रकारिता की
 
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मीडिया का ये 'जी-फैक्टर '

'ज्ञानोदय' के मीडिया विशेषांक में पत्रकारिता की दुनिया के 'बड़े लोगोंÓ अनुभवों और संस्मरणों के रास्ते कहीं न कहीं मीडिया के चाल-चरित्र में हाल के वर्षों में आए बदलाव की झलक देखने को मिली। विनोद दुआ ने अपने आलेख में पत्रकारिता की चुनौतियों के एक
 
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महंगाई पर तमाशेबाजी!

महंगाई आज देश की जनता के लिए ङ्क्षचता का सबसे बड़ा का मुद्दा है। दूसरी ओर सरकार में बैठे लोगों लिए शायद यह महज बौद्धिक कलाकारी और बयानबाजी का विषय बनकर रह गया है। शायद यही वजह है कि सरकार की तमाम कोशिशों केबावजूद महंगाई जहां की तहां कायम है। उधर सरकार
 
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तो ऐसे होती है दिल्ली में क्रांति, कमाल है!

एक खास विज्ञापन की तलाश में पिछले दो-चार दिन के हिन्दुस्तान टाइम्स के पन्ने पलट रहा था। ध्यान एक पेज की लीड स्टोरी पर गया। चार-पांच काॅलम में छपी स्टोरी थी, रंगीन फोटो के साथ। फोटो में एक खूबसूरत सी लड़की अपनी छोटी सी कार पर चढ़ रही थी, बड़े अंदाज-ओ-अदा
 
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दरोगा जी में जाग उठी ’ देवी ’

माथे पर रोली का लंबा सा टीका लगाए आज उनके मुख की शोभा कुछ अलग सी है। रोजाना के रौब के साथ-साथ एक अनूठा तेज टपक रहा है चेहरे से। जिप्सी की अगली सीट पर बैठे एसओ साहब पूरे एक्शन में हैं। अरे, एक्शन मतलब वसूली नहीं यार ! आप लोग तो खामखां एक ही जगह अटक जाते
 
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Sep 25 2009 02:18 PM
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दाती गुरु का मंतर काम कर रहा है

मदारी की बाजीगरी दिल बहलाती है। लोग सिक्के फेकते हैं। मीडिया की बाजीगरी इससे कहीं गहरी है। व्यापकतर असर रखती है। चैनलों का चलाया दाती गरु का मंतर आजकल दिल्ली में खूब कमाल दिखा रहा है। दाती गुरु वही रजत शर्मा मार्का। इंडिया टीवी वाले। बाद में शायद अच्छा
 
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Sep 20 2009 01:59 PM
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दाती गुरु का मंतर काम कर रहा है

मदारी की बाजीगरी दिल बहलाती है। लोग सिक्के फेकते हैंै। मीडिया की बाजीगरी इससे कहीं गहरी है। व्यापकतर असर रखती है। चैनलों का चलाया दाती गरु का मंतर आजकल दिल्ली में खूब कमाल दिखा रहा है। दाती गुरु वही रजत शर्मा मार्का। इंडिया टीवी वाले। बाद में शायद अच्छा
 
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Sep 19 2009 02:17 PM
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कंडक्टरों की ये अजब-गजब भाषा

दिल्ली की बसों नगर बसों में सफर करना यूं तो अपने आप में एक यातना है, पर इस यातना में एक मजा भी कहीं छिपा हुआ है। यह मजा है कंडेक्टरों की बोली और चुहलबाजी का। कभी-कभी सोचता हूं कि जाने कब नजर पडे़गी ललित कला अकादमी वालों की, इन कलाकारों की कलाकारी पर। हर
 
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Sep 15 2009 02:08 PM
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समाचार वालों पीछे से निकल लो

दिल्ली की बसों नगर बसों में सफर करना यूं तो अपने आप में एक यातना है, पर इस यातना में एक मजा भी कहीं छिपा हुआ है। यह मजा है कंडेक्टरों की बोली और चुहलबाजी का। कभी-कभी सोचता हूं कि जाने कब नजर पडे़गी ललित कला अकादमी वालों की, इन कलाकारों की कलाकारी पर। हर
 
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मायने बदल गए

परिवर्तन ही ‘स्थायी’ है समझता है आदमी तभी तो बदल लेता है, खुद को समय के साथ अपना पूरा किरदार और बदल डालता है साथ में सोच, फितरत, स्वभाव सबकुछ। बदलावों के इस बवंडर में, फंस कर बदल जाते हैं लफ्जों के मायने भी शब्द वही रहते हैं शब्दकोश वही रहते हैं बदल
 
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तो इस लिए है सुअर घिनौना ।

स्वाइन फ्लू की खबर पढ़ते हुए मन ख्याल आया कि - - -तो इस लिए सुअर का मांस खाने को बुरा माना जाता है । पर अगले ही पल दूसरा सवाल उठा कि स्वाइन फ्लू की बीमारी तो हाल के वर्षों में ही सामने आई है, पर सुअर के मीट को लेकर कई देशों और संस्कृतियों में घृणा सदि
 
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दिमाग की खिड़कियां खोलो अविनाश !

मोहल्ला से फिर एक ब्लागर को निकाल दिया गया । सलीम खान नाम के इस शख्स पर आरोप था अपने धर्म, इस्लाम का प्रचार करने का । यानि मोहल्ले में धर्म या मजहब की बात करना कुफ्र है, गुनाह है । इस एकतरफा कार्रवाई के औचित्य पर चर्चा बाद में करेंगे । पहले यह कहना च
 
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इस ‘सिरफुटव्वल’ का भी अपना ही मजा है

कल की मेरी पोस्ट ‘मुझे ‘चोर’ कहने का शुक्रिया ’ पर एक टिप्पणी आई है । टिप्पणी उन्हीं मित्र ‘समय’ की थी जिनकी टिप्पणी का जिक्र मैंने नाम लिए बिना किया । भले मानुष हैं, सो पुनः टिप्पणी भेजकर उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि ठेस पहुंचाना उनका उद्देश्य नहीं था
 
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आओ प्यारे सिर टकराएं !

कल की मेरी पोस्ट ‘मुझे ‘चोर’ कहने का शुक्रिया ’ पर एक टिप्पणी आई है । टिप्पणी उन्हीं मित्र ‘समय’ की थी जिनकी टिप्पणी का जिक्र मैंने नाम लिए बिना किया । भले मानुष हैं, सो पुनः टिप्पणी भेजकर उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि ठेस पहुंचाना उनका उद्देश्य नहीं था
 
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मुझे ‘चोर’ कहने का शुक्रिया

दो-चार दिन पहले की ही बात है । अपने ब्लाग पर आयी टिप्पणियां देख रहा था । चिरकुटों के चंगुल में हिन्दी शीर्षक से लिखी गई लेखमाला की तीसरी और अंतिम कड़ी पर आई दो टिप्पणियां कुछ ‘अलग’ सी दिखीं । अलग सी इसलिए कह रहा हूं कि अच्छा-बुरा, सही-गलत कहना मेरे लि
 
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अविनाश का यह पाखंड !

परसों मोहल्ला से भेजा गया अविनाश का एक पोस्ट ब्लागवाणी पर देखा । ‘बेढंगे कपड़े पहनना, मुसीबत को बुलावा’ या ऐसे ही किसी शीर्षक से मोहल्ला पर पूर्व में प्रदर्शित एक पोस्ट के बारे में थी यह पोस्ट । अविनाश ने इस पोस्ट को फालतू करार देते हुए इसे मोहल्ला से
 
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Jun 16 2009 09:20 PM
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ठीक कहा था डार्विन तुमने

ठीक कहा था डार्विन तुमने, सदियों पहले, ठीक कहा था । विज्ञान की आड़ में छुप कर, समाज का गहरा-नंगा सच । दुरुस्त थीं सौ फीसदी, अनुकूलन-प्राकृतिक चयन की तुम्हारी दोनों ही अवधारणाएं और सटीक था एकदम योग्यतम की उत्तरजीविता का वह विश्वव्यापी सिद्धांत । फलसफा
 
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पूजा भी बनी प्रमोशनल इवेंट !

अखबार में छपी कुछ तस्वीरों ने बरबस ही आकर्षित किया । तस्वीरें थीं हालीवुड की सुपर माॅडल क्लाउडिया की । अरे गलत मत सोचिए भाई ! बिकिनी-स्वीमिंग कास्ट्यूम में देह उधाड़ू फोटो सेशन की नहीं थीं यह तस्वीरें । इस सबके उलट क्लाउडिया साड़ी में ढकी-मुंदी सी नजर
 
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ठीक कहा था डार्विन

ठीक कहा था डार्विन तुमने, सदियों पहले, ठीक कहा था । विज्ञान की आड़ में छुप कर, समाज का गहरा-नंगा सच । दुरुस्त थीं सौ फीसदी, अनुकूलन-प्राकृतिक चयन की तुम्हारी दोनों ही अवधारणाएं और सटीक था एकदम योग्यतम की उत्तरजीविता का वह विश्वव्यापी सिद्धांत । फलसफा
 
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बहस को गलत दिशा में मत मोड़िये हुजूर

भई मसिजीवी जी ! बातों को गलत आलोक में न लें । न तो महिलाओं के लिए विधायिका में आरक्षण का मैं विरोध कर रहा हूं न ही यह कह रहा हूं कि विनय कटियार जो कह रहे हैं वही शब्दशः सही है और वही होना चाहिए । मैंने महज यह सवाल उठाया है कि इसका असल लाभ महिलाओं के
 
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महिला बिल पर बेवजह नहीं है तकरार

महिला आरक्षण बिल पर रार और तकरार दोनों ही बढ़ती जा रही हैं । महिलाओं को समाज में, सियासत में, सत्ता में आगे लाने की बात हर दृष्टि, हर लिहाज से सही है । इसका विरोध न किया जाना चाहिए न हो रहा है । पर बिल के स्वरूप और उसके प्रभाव-कुप्रभाव को लेकर गर्मागर
 
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यह चीन की बदमाशी तो नहीं !

सुबह अखबार के पहले पन्ने पर खबर पढ़ी कि ‘वायुसेना के दो विमान अरुणाचल के जंगलों में गायब’ । वायुसेना के अधिकारियों के हवाले से समाचार में किसी तकनीकी खामी के चलते विमान के दुर्घटनाग्रस्त होकर जंगल में गिर जाने की आशंका जताई गई है । साथ ही अधिकारियों क
 
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चैराहे नहीं रहे अब वैसे

चैराहे नहीं रहे अब वैसे पहले से अल्हड, ठहरे-ठहरे से हर ओर मची है भागमभाग आदमी भाग रहा है, सडकें भाग रही हैं पीछे-पीछे भाग रहा है चैराहा । नेता जी को जरूरत नहीं पड़ती, आने की अब चैराहे पर कि जनता से जुड़ने की जरूरत ही नहीं रही सियासत के रंग-ढंग दोनों ही
 
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कहीं यह चीन तो नहीं !

सुबह अखबार के पहले पन्ने पर खबर पढ़ी कि ‘वायुसेना के दो विमान अरुणाचल के जंगलों में गायब’ । वायुसेना के अधिकारियों के हवाले से समाचार में किसी तकनीकी खामी के चलते विमान के दुर्घटनाग्रस्त होकर जंगल में गिर जाने की आशंका जताई गई है । साथ ही अधिकारियों क
 
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क़ाफिले दोस्तों के

क़ाफिले दोस्तों के क्या देंगे, घाव पर घाव इक नया देंगे । इस भरोसे पे चोट खाए चलो, ज़ख्म अपने ही हौसला देंगे । क़ाफिले दोस्तों के क्या देंगे- - - वो मसाहत का दम जो भरते हैं जान हम पल लुटाए फिरते हैं खुद ही तोड़ेंगे क़यामत इक दिन हंस के सूली हमे चढ़ा देंगे ।
 
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चिरकुटों के चंगुल में हिन्दी - 3 ‘अंतिम ’

पत्र-पत्रिकाओं, संपादकों, लेखकों की करनी-धरनी के बाद बात करते हैं पुरस्कारों की । इस मामले में तो हिन्दी में चिरकुटई चरम पर नजर आती है । पुरस्कारों के लिए दिल्ली में कैसी-कैसी जोड़-तोड़, खींचतान, दांव-पेच और लाबींग की जाती है वह साहित्य की गलियों में भ
 
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चिरकुटों के चंगुल में हिन्दी - 3

पत्र-पत्रिकाओं, संपादकों, लेखकों की करनी-धरनी के बाद बात करते हैं पुरस्कारों की । इस मामले में तो हिन्दी में चिरकुटई चरम पर नजर आती है । पुरस्कारों के लिए दिल्ली में कैसी-कैसी जोड़-तोड़, खींचतान, दांव-पेच और लाबींग की जाती है वह साहित्य की गलियों में भ
 
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लोचा किधर है भाई !

भाई ब्लागवाणी में हमारा फोटो दिखाई नहीं दे रहा है क्या करें कोई रास्ता बताओ ! वैसे तो चेहरा चमकाने का बहुत शौक नहीं हमें । पर्दे के पीछे रह कर ही सुकून में रहते हैं पर जानना यह है कि आखिर इसके पीछे तकनीकी खामी क्या रह गई है - - - और फिर जब औरों के थो
 
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टायलेट के कुछ नये प्रयोग

रवीश ने टायलेट में पेपर फ्रेम के जरिए प्रचार के एक नए नुस्खे की बात उठाई थी । कुछ इसी तरह की, कुछ दिन पुरानी एक और बात याद आ गई । कुछ महीनों पहले एक कंपनी ने जेंट्स यूरीनल के लिए ऐसा कमोड बनाया जिसकी आकृति महिला के खुले हुए मुंह की तरह थी । किसी सिने
 
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झूठे थे लेमार्क तुम

और तुम्हारी ही तरह झूठा था ‘ अंगोें की उपियोगिता ’ का वह सिद्धांत कि विलुप्त हो जाते हैं अनुपयोगी अंग और उपियोगियों का होता है भरपूर विकास ऐसा होता हकीकत में अगर क्यों विलुप्त हो जाती सदियों पहले, आदमी के शरीर से दुम दुम जिसकी पड़ती है जरूरत जिंदगी मे
 
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कहीं तो बख्श दो यार

ठीक बात कही आपने रवीश भाई ! वैसे गहराई में जाकर देखें तो ऐसी सारी बेतुकी कवायदों की जड़ में आदमी का लालच ही नजर आता है । वह कहीं कोई मौका छोड़ना ही नहीं चाहता । अपना हित साधने का । ‘ थिंक पाजिटिव ’ वाहे हमारे कुछ बिरादर हमें छिद्रान्वेशी करार देते हुए
 
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कहीं तो बख्श दो यार ।

ठीक बात कही आपने रवीश भाई ! वैसे गहराई में जाकर देखें तो ऐसी सारी बेतुकी कवायदों की जड़ में आदमी का लालच ही नजर आता है । वह कहीं कोई मौका छोड़ना ही नहीं चाहता । अपना हित साधने का । ‘ थिंक पाजिटिव ’ वाहे हमारे कुछ बिरादर हमें छिद्रान्वेशी करार देते हुए
 
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लेमार्क तुम गलत थे

लेमार्क तुम गलत थे और तुम्हारी ही तरह झूठा था ‘ अंगों की उपियोगिता ’ का वह सिद्धांत कि विलुप्त हो जाते हैं अनुपयोगी अंग और उपियोगियों का होता है भरपूर विकास ऐसा होता हकीकत में अगर क्यों विलुप्त हो जाती सदियों पहले, आदमी के शरीर से दुम दुम जिसकी पड़ती
 
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चिरकुटों के चंगुल में हिन्दी- 2

पहली कड़ी में हमने हिन्दी अखबारों और पत्रिकाओं में होने वाली चिरकुटई की बात की थी । आज चर्चा करते हैं इलेक्ट्रानिक मीडिया और लेखकों की दुनिया की । इलेक्ट्रानिक मीडिया में अखबारों की तरह बेगारी की समस्या तो अमूमन नहीं होती, पर यहां की अपनी अलग पेचीदगिय
 
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चिरकुटों के चंगुल में हिन्दी- 1

आज हिन्दी दिवस नहीं है! जानता हूं भई। फिर क्यों रो रहा हूं हिन्दी के नाम पर । अरे भाई मैं कोई बुद्धिजीवी, विद्वान या साहित्यकार नहीं जो मौका देख कर आंसू बहाउूं, वह भी महज मंच पर । आम आदमी हूं । वो तो ससुरा रोज ही रोता है कभी खुद पर, कभी घर-परिवार पर
 
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कोलाहल

मीरा को पचा गए ओबामा-गान करने वाले घर की मुर्गी दाल बराबर की कहावत एक बार पिफर हमारे देश की मीडिया पर सटीक बैठती दिखाई दे रही है/ ओबामा के अमेरिका का राष्ट्रपति बनने पर जो चैनल एक के बाद एक विशेष कार्यक्रम पेश कर रहे थे, उनमें मीरा कुमार के लोकसभा अध
 
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