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मोहन का मन

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11 Jun 2010
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आंगन में पंछी आए ख्वाब सजाने को

आंगन में पंछी आए ख्वाब सजाने कोआँखों में सपने लाये ,कुछ कर दिखाने कोकुछ सपने पीछे छूटे पलकों पे आंसू बनकेकुछ अपने पीछे छूटे पलकों पे आंसू बनकेकुछ ख्वाब झांकते हैं आँखों में मोती बनकेकुछ वादे अपनों के हैं ,कुछ वादे अपने सेकल दुनिया महकेगी फूल जो आज खिलने
 
मोहन वशिष्‍ठ 9991428447
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क्या लिखूँ

कुछ जीत लिखू या हार लिखूँ या दिल का सारा प्यार लिखूँकुछ अपनो के ज़ाज़बात लिखूं या सापनो की सौगात लिखूँ मै खिलता सुरज आज लिखू  या चेहरा चाँद गुलाब लिखूँ  वो डूबते सुरज को देखूँ या उगते फूल की साँस लिखूँवो पल मे बीते साल लिखू या सादियो लम्बी
 
मोहन वशिष्‍ठ 9991428447
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राम का लैटर सीता के लिए पंजाबी में...

प्यारी सीता,मैं इथे  राजी ख़ुशी से हाँ and hope ke tu v ठीक ठाक hovengi,लक्ष्मण रात नु तेनु बहुत याद करदा सी.मैं इस बन्दर दे हाथ तेनु चिट्ठी bhej reha हाँ,तू bilkul tension ना layi मैं बहुत jaldi tenu ravan कोलो छुड़ा लवांगे मैं AIRTEL दा
 
मोहन वशिष्‍ठ 9991428447
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आदत

रास्ते में ही छोड़कर उन्हे जाने कि आदत हैवो मेरे हर झूठ से खुश होती,जिसे हमेशा सच बोलने की आदत थी,वो एक आंसू भी गिरने पर खफा होती थी,जिसे तन्हाई में रोने की आदत थी,वो कहती थी की मुझे भूल जाओगे,जिसे मेरी हर बात याद रखने की आदत थी,हमेशा माफ़ी मांगने के
 
मोहन वशिष्‍ठ 9991428447
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मां तुझे सलाम

सर्वप्रथम आप सभी को मांतृत्‍व दिवस की हार्दिक बधाईं इस उपलक्ष्‍य पर मैं मां के लिए दो शब्‍द आपके सामने प्रस्‍तुत करना चाह रहा हूं आशा है आप सबको पसंद आएंगेमेरी मांबूढी है मगरअभी भी बच्‍चों के लिएरखती है हौंसलाअपने 40 साल के बेटे कोगोद में उठाने की औरउसे
 
मोहन वशिष्‍ठ 9991428447
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प्यार खुदा की ही बन्दगी है

एक चिडिया को एक सफ़ेद गुलाब से प्यार हो गया , उसने गुलाब को प्रपोस किया ,गुलाब ने जवाब दिया की जिस दिन मै लाल हो जाऊंगा उस दिन मै तुमसे प्यार करूँगा ,जवाब सुनके चिडिया गुलाब के आस पास काँटों में लोटने लगी और उसके खून से गुलाब लाल हो गया,ये देखके गुलाब ने
 
मोहन वशिष्‍ठ 9991428447
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बहुत दिन बाद वापसी दोस्त के लिए

आज मैं आप सभी को एक अपने साथी दोस्त से मिलवा रहा हूँ जिन्होंने मेरा काफी साथ दिया ये मेरा दोस्त मेरा हमसाया आकाश अपने ग्रुप के साथ तेरी दोस्ती है मेरे लिए भगवन का नायब तोहफा नजर न लगे किसी की इसे जो मिला है ये नायब तोहफा मिले हर जनम में भाई की तरह
 
मोहन वशिष्‍ठ 9991428447
Mar 16 2010 01:21 PM
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तुम जब याद आते हो

तुम जब याद आते हो तो रुलाते हो जब याद नहीं आतेतो सताते हो आखिर क्यूँक्या यही होती है चाहतक्या यही प्रेम कहलाता हैअगर है यही प्रेमतो है कडवा मगर बड़ा प्याराखुसनसीब हैं वों जो पीते हैं इस प्याले कोहो जाते हैं अमर कर जाते हैं अमर जो पीते हैं इस प्याले को
 
मोहन वशिष्‍ठ 9988097449
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कुछ लोग जमाने में...

कुछ लोग जमाने में ऐसे भी तो होते हैंदफ्तर में जो हंसते हैं घर जाके वो रोते हैंबीवी की नजरों में अच्छे हैं वो शौहरबच्चों के कपड़ों को, जो शौक से धोते हैंरातभर बीवी की खिदमत में जुटते हैंजाते ही वो दफ्तर में आराम से सोते हैंकुर्सी पर लदे रहना, बस फितरत है
 
मोहन वशिष्‍ठ 9988097449
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आपका एक दोस्त

पूछे कौन हूँ मैं ,तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .एक दोस्त है कच्चा पक्का सा ,एक झूठ है आधा सच्चा सा .जज़्बात को ढके एक पर्दा बस ,एक बहाना है अच्छा अच्छा सा .जीवन का एक ऐसा साथी है ,जो दूर हो के पास नहीं .कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,तुम कह देना कोई ख़ास नहीं
 
मोहन वशिष्‍ठ 9988097449
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खुशखबरी खुशखबरी खुशखबरी खुशखबरी खुशखबरी खुशखबरी खुशखबरी

सभी भाइयों के लिए एक खुश खबरी है अब जो भी शादीशुदा नहीं हैं खाशकर उन्ही के लिए क्यूंकि राखी सावंत ने इलेश को छोड़ दिया है तो अब सभी राखी के चाहने वाले खुश होकर जल्द राखी के होने वाले स्वन्वर में शामिल होने के लिए कमर कास लें खुशखबरी  खुशखबरी 
 
मोहन वशिष्‍ठ 9988097449
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पेट की खातिर या ठंड की खातिर

किसी काम से दिल्‍ली जा रहा था। रास्‍ते में आधी रात को एक स्‍टेशन पर गाडी रूकी। आंख खुल गई। तो बाहर जो नजारा देखा उसे आपके सामने प्रस्‍तुत कर रहा हूं। सुबह सुबह की मीठी मीठी कुनकुनी सी ठंड तन पर नाम मात्र कपडे कंपकपाता जिस्‍म सिकुड रहा है अपने आप में
 
मोहन वशिष्‍ठ 9988097449
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मतलब की दुनिया

उफ ये दुनिया ये मतलब की दुनिया ये चेहरों पे चेहरे लगाती है दुनिया ये भोले ये मासूम सुंदर से चेहरे मगर दिल में इनके हैं काले अंधेरे मतलब के रिश्‍ते बनाती है दुनिया फिर तन्‍हा एक दिन छोड जाती है दुनिया कभी दोस्‍त बनके हंसाती है दुनिया कभी बनके दु‍श्‍मन
 
मोहन वशिष्‍ठ 9988097449
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दीपावली की शुभकामनाएं

दीपावली पर्व की आप सभी को समस्‍त परिवार सहित हार्दिक शुभकामनाएं  वैभव लक्ष्‍मी आप सभी पर कृपा बरसाएं। लक्ष्‍मी माता अपना आर्शिवाद बरसाएं। दूर कहीं गगन के तले  एक दीप की लौ नजर आई  जाकर पास देखा उसके  दीपक जल रहा था  बिना तेल
 
मोहन वशिष्‍ठ 9988097449
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जिंदगी कुछ वक्‍त दे मुझे

मेरा अपना घर जिससे हूं मैं दूर बहुत दूर गाहे बगाहे घर जाना और  जल्‍दी से घर से लौट वापस आना क्‍या यही है जिंदगी क्‍या यही है जिंदगी का दस्‍तूर घर पर है मेरी बीमार मां बीमार पिता और मैं अकेला दूर घर से बहुत दूर ना मां के दर्द को बांट पा रहा हूं न
 
मोहन वशिष्‍ठ 9988097449
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भारत धरती मां है हमारी

भारत धरती मां है हमारीहम सब इसकी संतानइससे है पहचान हमारीहम इसकी पहचानभारत धरती मां है हमारी हम हैं भारत के बच्‍चेये हमको है अभिमानदुश्‍मन इस पर नजर जो डालेले लें उसकी जानभारत धरती मां है हमारी अगर पडी जो इसे जरूरतकभी हमारी जान कीइक पल की ना
 
मोहन वशिष्‍ठ 9988097449
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बन जा मेरी मात यशोदा

काफी दिन पहले मेरी धर्मपत्‍नी द्वारा लिखित एक भजन आज आपको पढा रहा हूं आशा है आप सभी को पसंद आएगी। यह भजन मेरी पत्‍नी ने जन्‍माष्‍टमी पर लिखा था लेकिन कुछ व्‍यस्‍तता के चलते आज इसे आप सभी को पढवा रहा हूंतू बन जा मेरी मात यशोदामैं कान्‍हा बन जाऊंजा यमुना
 
मोहन वशिष्‍ठ 9988097449
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साहिर लुधियानवी जी के शेर

आज की कडी में हम आपको पढा रहे हैं साहिर लुधियानवी के शेरों की एक सीरिज तो बस कुछ मत सुनो बस पढो और बताओ कि आज की पेशकश कैसी रही  तो आज पेश हैं साहिर लुधियनवी जी के शेर  मैं और तुम से तर्के-मोहब्‍बत की आरजू दीवाना कर दिया है गमें रोजगार ने अभी न
 
मोहन वशिष्‍ठ 9988097449
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हो रही है बारिश झम -झमाझम

हो रही है बारिश झम- झमाझम नाच रहे हैं पेड छम -छमाछम बह रही है पवन सन -सनासन हो रही है बारिश झम -झमाझम नहीं निकला सूरज तम- तमाकर छिप गया बादलों में दुम दबाकर भर गया पानी लब- लबालब हो रही है बारिश झम- झमाझम गा रहे हैं पक्षी चह -चहाकर मेंढक भी टर्राया टर-
 
मोहन वशिष्‍ठ 9988097449
Sep 01 2009 04:12 PM
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अधखिला फूल

आज फिर बारिश हुईसबके चेहरे खिलेफूल खिलेपेड खिलेखिला नवयौवन भीबस, नहीं खिला तोएक फूलजो अभी अधखिला थागिर गयाइस बारिश सेऔर फिर वो अधखिला फूलसमा गयापानी के आगोश मेंऔर बह गया दूरबहुत दूरपानी के आगोश में
 
मोहन वशिष्‍ठ 9988097449
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श्रीकृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी की हार्दिक बधाईयां

जय श्री कृष्‍णा जय जय श्री राधेआप सभी को श्री कृष्‍ण जी के जन्‍मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नहींसर कटा सकते हैं लेकिन सर झुका सकते नहीं वंदे मातरम्
 
मोहन वशिष्‍ठ 9988097449
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अंधा प्‍यार या अंधा इंसान

एक अंधा लडका सभी लोगों से बहुत घृणा करता था। वह किसी से बात करना भी मुनासिब नहीं समझता था। लेकिन वह लडका एक लडकी से बेइंत्‍हा प्‍यार करता था और उसके बिना रह भी नहीं सकता था। दोनों में बहुत सारी प्‍यार भरी बातें होती थीं। लडकी भी बेइंत्‍हां प्‍यार करती थी
 
मोहन वशिष्‍ठ 9988097449
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बादलों जैसा जोश

गर हो जाए बादलों जैसा जोश हर इन्‍सां मेंकभी तो सूरज को ले लेते हैं अपने आगोश मेंगर हो जाए पानी जैसा तेज हर इन्‍सांकभी तो पहाडों से रास्‍ता बना ही ले
 
मोहन वशिष्‍ठ 9988097449
Aug 08 2009 04:33 PM
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फुरसत के लम्‍हे

नमस्‍कार साथियों माफ करना आजकल थोडी दिक्‍कतें आ रही हैं इसलिए ज्‍यादा समय नहीं बिता पा रहा हूं आप सभी के साथ। आज आप को थोडा मुस्‍कुराता देखने को दिल कर रहा है इसलिए आप सभी के साथ एक हास्‍य कविता सांझा कर रहा हूं जिसे लिखा है हमारे विजय जैन जी ने तो प
 
मोहन वशिष्‍ठ
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कविता खो गई

कविता खो गई मेरी अपनी जिसे लिखा था मैंने बहुत ही निराले अंदाज में खो गई कहीं कहां ढूंढूं कहां खोजूं किस किताब में दबी होगी किताब में होगी भी, या नहीं कहीं मेरे भीतर ही तो नहीं खो गई पता नहीं क्‍या सच में मुझसे खो गई या आंख मिचौली खेल रही है पता नहीं
 
मोहन वशिष्‍ठ
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बेटियां

बहुत दिनों बाद आज आना हो पाया है आप सभी के बीच। ये 20-25 दिन बहुत भारी बीते और आप सभी को तो बहुत ही याद किया। हर रोज ख्‍याल आता था कि आज कौन सी पोस्‍ट और कौन सी कविता आई होगी किसने किसकी पोस्‍ट उठा कर अपने ब्‍लाग पर पोस्‍ट की होगी किसी ने मेरा ब्‍लाग
 
मोहन वशिष्‍ठ
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प्‍यार हो तो ऐसा

एक लड़का और एक लड़की.. एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे | लड़के की मौत के बाद, उसने लड़की को याद करते हुए कहा.. "एक वादा था तेरा, हर वादे के पीछे.. तुम मिलोगी मुझे हर दरवाजे के पीछे..! पर तुम मुझसे दगा कर गई.. एक तुम ही न थी मेरे जनाजे के पीछे..!" पीछेसे
 
मोहन वशिष्‍ठ
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बेटियां

जब बेटी के होने पर खुशी मनती थी आजकल क् ‍ या हुआ इस दुनिया को कहां गई वो सुशील सुनैयना और वो घर की लक्ष् ‍ मी कहलाने वाली आखिर क् ‍ या कसूर है इनका जो इनको इस जहां में आने से पहले ही भेज दिया जाता है दूसरे जहां की ओर जो आज मां है कल वो भी किसी की बेट
 
मोहन वशिष्‍ठ
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बहुत ही जरूरी सूचना कृप्‍या सभी ध्‍यान दें खासकर आगरा मथुरा वासी

नमस्‍कार साथियों आज आप सभी से एक निवेदन कर रहा हूं कि जो भी आगरा , मथुरा या आसपास से हों तो मुझे यह पता करके ब ता दें कि आगरा यूनिवर्सिटी से एम ए प्रथम वर्ष के एक्‍जाम कब हो रहे हैं क्‍या कोई तारीख मुकरर हुई है। हालांकि ये एक्‍जाम पहले अप्रेल में होन
 
मोहन वशिष्‍ठ
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न कोई फूल दामन में मेरे

वक् ‍ त के कर्कश थपेडों ने खडा कर दिया आज मुझे उस मोड पर जहां से पीछे हटने का नहीं है हौसला मुझमें आगे बढने की ताकत नहीं मुझमें ये एक मोड जिंदगी का मेरे है खतरनाक चंद कांटे ही कांटे हैं न कोई फूल दामन में मेरे पराए तो पराए ही थे अब न रहे अपने भी मेरे
 
मोहन वशिष्‍ठ
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हे प्रिये जब तुम साथ मेरे होते हो

हे प्रिये जब तुम साथ मेरे होते हो कितने ही अफसाने कहते हो होता है मीठा सा अहसास उन तानों में भी जो तुम देते हो विरह वेदना से हो पीडित याद मुझे तुम करते हो जब भी ताने तुम देते थे अब भी ताने तुम देते हो हे प्रिये जब तुम साथ मेरे होते हो क् ‍ या तुम् ‍
 
मोहन वशिष्‍ठ
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मैं कवि बनता नहीं

खाली कागज पर नीली स्‍याही वाले पैन से चंद आडी तिरक्षि‍ लकीरें खींचने से कोई कविता नहीं बनती न ही कोई कवि बन जाता ऐसे ही कवि बनने के लिए अपना दिल बाहर निकाल खून से उस पर लिखना आंसुओं से उसको सींचना और फिर मन के किसी कोने से दिमाग के किसी हिस्‍से से डा
 
मोहन वशिष्‍ठ
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घर तो घर था

घर तो घर था घर हुआ करता था भाई बहन मां बाप सब के रहने से घर बना हुआ था घर धीरे धीरे बनता गया मकान मकान में कुछ लोगों के रहने से मकान मकान ही रहा न बन सका घर
 
मोहन वशिष्‍ठ
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बीत गए बरसों

आज कल परसों बीत गए बरसों उनसे मिले हुए जो अक्‍सर कहते थे चलेंगे साथ उम्रभर यूं ही डालकर इक दूजे के हाथों में हाथ
 
मोहन वशिष्‍ठ
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मेरे अपने बारे में

जब भी मैं सोचता हूं अपने बारे में कि मैं क्‍या हूं अंदर झांकता हूं तो पाता हूं कुछ भी नहीं मैं कभी सोचता हूं कि किसी कवि की लिखी किसी कविता के शब्‍द में लगी मात्रा की आवाज का सौंवा भाग भी नहीं हूं कभी सोचता हूं कि धरा पर लगे वृक्षों के पत्‍ते पर पडी
 
मोहन वशिष्‍ठ
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बिसरी यादें मूर्ख दिवस की

बात आज से ठीक पांच साल पहले की है। मेरी शादी के ठीक 20 दिन बाद मूर्ख दिवस यानी आज का दिन आ जाता है। हांलांकि कभी इस दिवस को गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन उस बार जो मूर्ख बनाया कि आज तक इस बात को याद कर मेरी श्रीमती जी अभी भी हंसते हंसते लोट पोट हो जाती
 
मोहन वशिष्‍ठ
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मैं बेरोजगार हूं मुझे नौकरी दे दो

डूबते हुए आदमी ने पुल पर चलते हुए आदमी को आवाज लगाई बचाओ बचाओ पुल पर चलते आदमी ने नीचे रस्‍सी फेंकी और कहा आओ नदी में डूबता हुआ आदमी रस्‍सी नहीं पकड पा रहा था रह रह कर चिल्‍ला रहा था मैं मरना नहीं चाहता जिंदगी बहुत महंगी है कल ही मेरी एमएनसी में नौकर
 
मोहन वशिष्‍ठ
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मंजिल की विसात ही क्‍या

मंजिल ही न रही अब कोई रास् ‍ ता भी मैं भटक गया सोचा था साथ दे देंगे मेरे कदम चलेंगे मेरे साथ दूर तलक मिल जाएगी मंजिल होगी आसान डगर कदम ही मेरा साथ छोड गए तो मंजिल की विसात ही क् ‍ या अब अपनों ने मुंह फेर लिया दुनिया का भरोसा क् ‍ या करना जब दोस् ‍ त
 
मोहन वशिष्‍ठ
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कदम ही मेरा साथ छोड गए तो मंजिल की क्‍या विसात

मंजिल ही न रही अब कोई रास्‍ता भी मैं भटक गया सोचा था साथ देंगे मेरे कदम चलेंगे मेरे साथ दूर तलक मिल जाएगी मंजिल होगी आसान डगर कदम ही मेरा साथ छोड गए तो मंजिल की क्‍या विसात अब अपनों ने मुंह फेर लिया दुनिया का भरोसा क्‍या करना जब दोस्‍त ही दुश्‍मन बन
 
मोहन वशिष्‍ठ