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तपती रेत

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31 Dec 2009
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क्या होगा?

नए साल में नया क्या होगा... वोही रात वोही दिन.. वही तुम और वही मैं। झुटपुटे से निकलता चांद, साथ के छिट-पुट तारे, पर कौन हमारे... छिटकी सी धूप, अलसा के खोया रूप, कैसा प्रतिरूप... रात की आसमानी आंच, इर्द गिर्द लहराता सा बोझ, किसकी सोच.... दीमक सा दिखता
 
तरूश्री शर्मा
Dec 29 2009 11:54 AM
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आपको तो आती होगी आवाज...

इस नाशुक्रे से दौर में आखिर वे क्यों नहीं समझते कि क्या परोस रहे हैं... क्यों और आखिर कब तक... क्या जब तक हमारी आवाज हम तक पहुंचना बंद हो जाए???? मुझे अब कोई आवाज नहीं आती। भले ही, बमों के होते हैं धमाके, कई राउंड चलती है गोलियां, ग्रेनेड्स भी कभी कभ
 
तरूश्री शर्मा
Dec 29 2009 11:54 AM
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यही है ना वो भूख?

दिल्ली की ठंडी शाम थी और महज चार घंटे बाद ट्रेन। मैं, मेरी बहिन और उसकी फ्रेंड सहित हम चार लोग थे और करोल बाग के बाजार में शॉपिंग के बाद एक और दोस्त को साथ लेकर किसी रेस्टोरेंट में खाना खाना था। इसके बाद राजेन्द्र प्लेस की एक होटल से अपना सामान उठाकर
 
तरूश्री शर्मा
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मां की तनख्वाह!!!!!!!

वो अनाथालय मुझे हमेशा पूजा घर जैसा लगा। हालांकि मैं जब भी स्नेह छाया जाती मेरी आत्मिक संतुष्टि का स्वार्थ मेरे साथ जुड़ा होता। लेकिन बाहर आकर मैं खुद को बहुत बड़ी लगने लगती जैसे मैंने कईयों पर अहसान कर दिया कुछ किताबें, खाने की वस्तुएं और कपड़े देकर।
 
तरूश्री शर्मा
Dec 29 2009 11:54 AM
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सवालों के ढेर से....धुंए के छल्ले

रातें हर रोज खाली खाली सी रहने लगी थीं.... जैसे तारे आसमान से अब चिपकते ही ना हों और चांद की डोरी आकाश से लटकती ही नहीं थी। रात का सन्नाटा जैसे होता ही नहीं था और अंधेरे की कालिख पसरती ही नहीं थी। दिन जैसे दिन की तरह नहीं होते थे.... सूरज का रथ जैसे
 
तरूश्री शर्मा
Dec 29 2009 11:54 AM
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लटके हैं अरमां उल्टे

जुड़ने को था जो, अभी बिखर गया, बिना कहे... सफर बदल गया। ख्वाब था एक, जुड़ा सा दिखता था, पास आते ही, मकड़जाल पर जमी, बारिश की बूंदों सा.. कतरा कतरा ढुलक गया। ताउम्र सोचने की ख्वाहिश थी, उससे मिलने की एक गुजारिश थी, वक्त से वफाई ना हुई, घरौंदों सा बिगड
 
तरूश्री शर्मा
Dec 29 2009 11:54 AM
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ये मेरा...हां मेरा नाम है।

वो गुलाब के फूल थे, तेरी डायरी में लिखे, मेरे नाम से दिखते हर्फ़े, जो तेरी कसमसाहट बयां करते थे। हर शब्द पर कई कई बार फिरी कलम, और उसे गहरा बनाने की चाह में, एक दूसरे में गुंथे,लिपटे से अक्षर। इतनी कवायद से कागज पर- पहचान खो चुका नाम, तेरी भावनाओं की
 
तरूश्री शर्मा
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मां से जाकर कह दूंगी....

वो वहां की थी जहां साधन थे लेकिन स्वतंत्रता नहीं। व्याकुलता थी लेकिन राहत का कोई उपाय नहीं। उसके पास पंख थे लेकिन उड़ने के लिए आसमान नहीं। वो चुप नहीं बैठी.... और अपने आस पास के बंधन तोड़कर खुले आसमान की ओर हसरत से देखने लगी। मां से जाकर कह दूंगी, बा
 
तरूश्री शर्मा
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दुनिया जाए तेल लेने... ऐश तू कर।

मजा आता है जब लम्बे समय से चल रहे घिसे पिटे से रूटीन में कुछ बदलाव आता है। खासकर ऑफिस में हुए इस तरह के बदलावों के दौरान तो खूब मजा आता है.... आपको भी और लोगों को भी। बदलाव चाहे पॉजिटीव हो या नेगेटिव... बयानों और कानाफूसियों का वो दौर चलता है कि कुछ
 
तरूश्री शर्मा
Dec 29 2009 11:54 AM
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अंगुलियों का गणित

अंगुलियां- सारा हिसाब जानती हैं। गिनती हैं दिन, बुनती हैं संख्याएं, अंदाज तोलती हैं, जोड़ती हैं मुट्ठियां, सारे भेद घटाकर, और दुगुनी कर देती है, हिम्मत हमारी। अंगुलियां- सारा हिसाब जानती हैं। खींचती हैं रेखाएं, आढ़ी टेढ़ी मुसीबतों की तरह, तो कहीं परे
 
तरूश्री शर्मा
Dec 29 2009 11:54 AM
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मां मुझे लोहा बना दो!!!!!

बलात्कार की खबरें...भले ही अंदर तक हिला देती हों, लेकिन आज भी घरों में मां अपनी बेटी को सुबह सवेरे उठने से लेकर रात को सोने तक यही हिदायतें देती है कि बेटा तेरी खूबसूरती कैसे निखर सकती है या कैसे तू गोरी और सुंदर बनी रहेगी...और हां... ठीक से रहा कर..
 
तरूश्री शर्मा
Dec 29 2009 11:54 AM
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फीनिक्स,फीनिक्स...कहां गए थे?

परसों पड़ोस के दो छोटे छोटे बच्चे... उम्र छह और सात साल की होगी, शाम को अपने लॉन में खेलते कूदते बातें कर रहे थे। अंधेरा था और कमरे में गर्मी होने की वजह से मैं भी बाहर निकल आई थी, दोनों बच्चो को दीवार के इस पार मेरी उपस्थिति का एहसास नहीं था। खुले द
 
तरूश्री शर्मा
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रातों रात ऊंचा किया कद...

रात के समय कम कद वाली मूर्ति हटाई जा रही थी और सुबह होने तक शानदार और भव्य ऊंचे कद वाली मूर्ति वहां मौजूद थी। तो कैसा लगा आपको ये रातों रात कद बढ़ाने वाला फॉर्मूला? वास्तव में दृश्य कुछ वैसा ही था जैसा सद्दाम हुसैन की मूर्तियां गिराने के वक्त रहा था।
 
तरूश्री शर्मा
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पुराना हो गया है ये राग....

दिल भी ये ज़िद पर अड़ा है किसी बच्चे की तरह, या तो सब कुछ ही इसे चाहिए या कुछ भी नहीं। राजस्थान में गुर्जरों ने आरक्षण की ज़िद पकड़ ली और अपनी मांगें मनवाने के लिए आम जनता की परेशानी से मुंह मोड़ लिया। कई दिनों पहले पटरियां उखाड़ने की ना सिर्फ धमकी द
 
तरूश्री शर्मा
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गुलाबी शहर में सात धमाके

दिनांक : 13 मई, 2008 दिन : मंगलवार समय : शाम 7.30 बजे शहर : ये वो शहर है जहां श्रद्धा लोगों का आम जज़्बा है और जहां की गुलाबी फिज़ा उसकी कहानी कहती है, जी हां जयपुर। वक्त किसी का सगा नहीं हुआ, सो जयपुर कैसे इससे अलग रह सकता था। यहां भी वही हुआ, जो दे
 
तरूश्री शर्मा
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मेरा विश्वास

आस का बादल उड़ता उड़ता, मुझ तक ही तो आएगा। रात की पंछी धुंधला धुंधला, होकर के खो जाएगा। लम्बे डग हैं,छोटा मग है, अभी पार हो जाएगा। रहते रहते हवा का साया, अपने पंख फैलाएगा.... कुहरा यूं छंट जाएगा, रोशन एक ख्याल आएगा। तभी आस का छूटा बादल, उड़कर मेरे पा
 
तरूश्री शर्मा
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उसकी पहुंच...

सोचती हूं हर पल, दर्द के गहराते पैमाने, इतने गहरे कि, मेरी आवाजों की कोठरियां गूंजने लगे, और हंसी का- एक सिरा तक, उसे छू न सके। मैं सोचती हूं कि , फिर वो - कैसे पहुंचता है, वहां तक??
 
तरूश्री शर्मा
Dec 29 2009 11:54 AM
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कहानी - जिंदगी की लिफ्ट

वो हर दिन इसी आस में सोती और जागती थी कि जल्द ही उसे अपने जरूरत का काम मिल जाएगा। समय निकल रहा था और हिम्मत भी चुकती जा रही थी। लेकिन आस का कोना अभी रोशन था। हर दिन भारी हो रहा था और वक्त की बेवफाई ने उसे कुंठा से संघर्ष करने के लिए भी कह दिया था। कई
 
तरूश्री शर्मा
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एक सफर

घर की इकलौती चिमनी... डगमगाती थी। रसोई के बचे तेल से, कितना जल पाती थी? बस्ती में बसा, कोने का वो मकान... रोशनी की परिभाषा, यही चिमनी जताती थी। और घर से बाहर, कहीं दूर... तेज़ धूप चिलिचलाती थी। घर के सारे उलझे काम, लौ के दम तोड़ने से पहले, करने हैं प
 
तरूश्री शर्मा
Dec 29 2009 11:54 AM
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चांद पाने की जिद है जिंदगी!!!

आज फिर दिल ने एक तमन्ना की,आज फिर दिल को हमने समझाया.हमेशा लगता है दिल तमन्नाओं का ढेर है जिसमें उम्मीदें बुदबुदे की तरह अंगड़ाई लेती हैं...और जब पकड़ने की कोशिश करो...हाथ ही नहीं आती। कौन है जो दावा करता हो,कि मैं इसे पकड़ने की कोशिश नहीं करता। क्यों
 
तरूश्री शर्मा
Jul 30 2009 11:50 AM
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यही गलतफहमी थी शायद....

वो आए तो हो गया यकीं हमको..एक इसी की आरजू थी शायद।दरख्तों के रोने का इल्म ना था,परिंदों के उड़ने की जिद थी शायद।फिक्र ना थी कि पाना है तुम्हे,फिक्र तो जुदाई की थी शायद।दामन-दामन जर्रा जर्रा बुत बना,उसीके होने से रौनक थी
 
तरूश्री शर्मा
Jul 29 2009 12:51 PM
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वक्त लगा पर किस्सा खत्म हुआ

उलझा उलझा सा है बहुत कुछ। कई बार दिमाग इतने गहरे और उथले स्तर पर किलोलें करता है कि भाव पकड़ना मुश्किल हो जाए। ऐसे ही किसी चंचल और व्यग्र वक्त को शब्दों में पकड़ने की कोशिश।)  कई कई दिनों की बेचैनी और आए दिन की कलह... बादल छंटने को हैं। र
 
तरूश्री शर्मा
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कटी-कटी एक पतंग/जंग जारी है?

एक अरसे तक खुद को कटी हुई पतंग पाया उसने। लेकिन इर्द गिर्द की दूसरी कटी पतंगों से कुछ अलग!! सबसे ज्यादा फटी पतंग थी लेकिन हौंसला इतना कि एक हाथ मिलते ही सबसे ऊपर उड़ ले। लेकिन वो हाथ....? हौसलों के बावजूद एक भाव था जिसे वो क्या कहे... अपनी अकमर्ण्यता
 
तरूश्री शर्मा
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बस एक बार....

कुछ ही वक्त गुजरा होगा, जब तुम मेरे सब कुछ थे.. जिसे मैं नहीं दे पाती थी कोई नाम। उस धुरी की तरह... जिसके इर्द-गिर्द, मेरी जिंदगी सा कुछ टंगा था... और मैं कोशिश करती थी, उसे खींच लाने की अपने पास... कई बार.... लेकिन हर बार नाकाम। शायद तुमने भांप लिया
 
तरूश्री शर्मा
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बस एक बार....

कुछ ही वक्त गुजरा होगा, जब तुम मेरे सब कुछ थे.. जिसे मैं नहीं दे पाती थी कोई नाम। उस धुरी की तरह... जिसके इर्द-गिर्द, मेरी जिंदगी सा कुछ टंगा था... और मैं कोशिश करती थी, उसे खींच लाने की अपने पास... कई बार.... लेकिन हर बार नाकाम। शायद तुमने भांप लिया
 
तरूश्री शर्मा
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शायद, लड़की गलत थी...

ये मंजर पहली बार सामने आया हो... ऐसा नहीं था। कई बार लड़की ने सवाल पूछा था और हर बार लड़के ने उसे बहला कर बात को फिर नदी की तरह बहा दिया था। दोनों पानी की तरह एक दूसरे पर प्रेम बहाते थे, और इस बहाव का माध्यम था, मोबाइल फोन। ना लड़का कभी लड़की से मिल
 
तरूश्री शर्मा