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मेरा देश मेरा गाँव

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18 Jun 2010
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निदा फाज़ली

उसके दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा वो भी मेरी ही तरह शहर में तनहा होगा इतना सच बोल कि होटों का तबस्सुम न बुझे रोशनी ख़त्म न कर आगे अंधेरा होगा प्यास जिस नहर से टकराई वो बंजर निकली जिसको पीछे कहीं छोड़ आए वो दरिया होगा एक महफ़िल में कई महफिलें होती है
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मुल्ला नसरुद्दीन

नसरुद्दीन अपने बेटे को घुमाने ले गया अब बेटा चीख रहा है चिल्ला रहा है रो रहा है,और नसरुद्दीन कह रहा है-नसरुद्दीन शांति रखो, धैर्य रखो एक महिला बहुत देर से सुन रही थी उसने कहा बड़ा प्यारा बेटा है ,और तुम भी बड़े धैर्यवान हो उसने बच्चे के सर पर हाथ रखा
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सफ़र में धुप तो होगी जो चल सको तो चलो

सफ़र में धुप तो होगी जो चल सको तो चलो सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता मुझे गिरा के अगर तुम संभल सको तो चलो हर इक सफ़र को है महफूज़ रास्तों की तलाश हिफाज़तों की रवायत बदल सको तो चलो यही है जिंदगी, कुछ ख्वाब,चन
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13aug की खबर का असर 24 aug को दिखा

१३ अगस्त को छपी पोस्ट का असर अब दिखने लगा है जिले में अब जगह जगह छापामारी अभियान चलने लगा है २३ तारीख को राजनांदगांव के मुंदडा दाल मिल में कई टिन तेल जब्त किया गया तथा आज २४ तारीख को उठने के साथ ही ये अच्छी खबर सुनने को मिली दुर्ग में १.५ करोड़ की दा
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दिल-ए नादां तुझे हुआ क्या है

ग़ालिब साहब की ये गजल राजेश गुप्ता जी ने दी थी उनको गजल गाने का और महफ़िल में पढने का बड़ा शौक है उनकी कई गजले अख़बार में छपती रहती है जब भी रात को ९ के बाद उनसे मिलता हूँ क्योंकी टाइम ही उसी समय मिलता है एक आध गजल वो जरुर सुनाते है ग़ालिब साहब की शायरी
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तन्हाई

आँखों से कैसे कह दू कि हर बात अधूरी सी लगती है दिल से जुबाँ तक आने में हर बात अधूरी सी लगती है रिश्तों में खट्टी मीठी सी तकरार भूली बातों सी लगती है माँ की बूढी बाते भी कई सालो का अनुभव लगती है हर पल जहाँ हम मस्ती करते वो बचपन की यादे लगती है दिल को
Dec 29 2009 11:52 AM
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चीनी के दाम भी बढ़ने लगे

देश में वैसे ही दाल को लेकर हाय तौबा मची थी अब शक्कर भी धीरे धीरे अपना सर उठाने लगी है ३२ रु किलो की दाल आज ९०- ९५ रु पहुच गयी है केवल ३ महीनो में,क्या है इस महंगाई का राज?इसको ले कर अटकले लगायी जा रही थी की इधर शक्कर ने भी अपनी मिठास कम करनी शुरू कर
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क्या करें साला सिलेंडर महंगा हो गया

अब तो ऐसा लगने लगा है कि हमारे देश में आने वाली पीढियों को सायकल और बैलगाडियों का मुंह देखना पड़ेगा क्योंकि इतने तेजी से हम अपने प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने में लगे हुए हैं कि आने वाले कुछ सालों में पेट्रोल, सिलेंडर, डीज़ल, का रेट इतना बढ़ जायेगा क
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इमान

चंद सिक्कों की खनक में बिक रहा इमान हर दफ्तर में मिल जायेंगे आपको बेईमान हर तरफ देखने को मिल जायेगा भरपूर भ्रष्टाचार ताक़ में रखे दिख जायेंगे सहिंता औ आचार सूप तो सुप अब तो चलनी भी बोलने लगी है इसलिए आज कल जूता फ़ेंक प्रतियोगिता होने लगी है
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यक्ष प्रश्न

दोस्तों राम राम और जो नियमित ब्लॉग लिखते है उनको कर बद्ध सलाम वो इसलिए कि पता नही इतना टाइम उनके पास कहाँ से आता है और चलो टाइम को जाने भी दो क्योकि "सब तो निकम्मे ही हैं "इतना दिमाग कहाँ से आता है यार कि रोज लिख लेते है कौन सा घी खाते है या कौन से घ
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मेरा देश मेरा गाँव

ऐसा क्यों हुआ कि मैं उब गया हर किसी से इनसे भी उनसे भी,अपनों से,गैरों से यहाँ तक कि आपने आप से भी अब लगता है डर हर सुबह निकलता हूँ रात लौट आता हूँ फ़िर भी खोज नही पाता हूँ मैं अपना घर बोलूं या चुप रहूँ निर्णय नही कर पाता हूँ टालता हूँ आज को कल पर इसी
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आजादी

आज़ाद हुए देश को इतने साल हो गए और हम आज भी आजाद नहीं हैं बंधे हुए हैं रुढीवादियों की जंजीरों से इस कदर बढ़ते हुए भ्रस्टाचारों से बढती हुई गरीबी से लाचार हैं हम बढती हुई महंगाई से मजबूर हैं हम कर रहें हैं फाकें इस देश में लोग हमको ही नोच रहें है इस दे
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निदा फाज़ली

बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यों नहीं जाता जो बीत गया है वो गुजर क्यों नहीं जाता सब कुछ तो है क्या ढूँढ्ती रहती हैं निगाहें क्या बात है मैं वक्त पे घर क्यों नही जाता वो एक ही चेहरा तो नही सारे जहाँ में जो दूर है वो दिल से उतर क्यो नही जाता मैं अपनी ही उलझी
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कमला

अब नही सहा जाता ,कमला के बापू ने पेट पकड़े हुए कहा, कई दिनों से ही बापू बीमार था पाँच साल की कमला अपनी नन्ही नन्ही आंखों से सब देख रही थी मगर उसके बस में कुछ नही था .नुक्कड़ का डॉक्टर भी देख गया था अस्पताल जाने के पैसे भी नही थे सब कुछ शराब की भेंट च
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निदा फाज़ली

कहीं-कहीं से हर चेहरा तुम जैसा लगता है तुम को भूल न पाएंगे हम,ऐसा लगता है ऐसा भी एक रंग है जो करता है बातें भी जो भी इसको पहन ले वो अपना सा लगता है तुम क्या बिछडे भूल गए रिश्तों की शराफत हम जो भी मिलता है कुछ दिन ही अच्छा लगता है अब भी यूँ मिलते है ह
Oct 14 2009 07:51 PM
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निदा फाज़ली

बदला न अपने आपको जो थे वही रहे मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे अपनी तरह सभी को किसी की तलाश थी हम जिसके भी करीब रहे दूर ही रहे दुनिया न जीत पाओ तो हारो न ख़ुद को तुम थोडी बहुत तो जेहन में नाराज़गी रहे गुजरो जो बाग़ से तो दुआ माँगते चलो जिसमे खिले है फ
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यक्ष प्रश्न

आज का प्रश्न है : गया वक्त गुजर कर क्यों नही आता
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यक्ष प्रश्न

आदरणीय लोगों को आज ये बताते हुए अत्यन्त हर्ष हो रहा है कि चंडूखाने में आज से ऐसे चंडू सवालों की शुरुआत हो रही है कि इसका जवाब तो शायद दुनिया बनाने वाले के पास भी न हो लेकिन हमारे ब्लोगर बंधू इन सवालो का जवाब आसानी से दे सके ?आज का प्रश्न-------भगवान् ने
Aug 28 2009 02:13 AM
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मेरी पोस्ट चोरी हो गयी

दोस्तों राम राम चंडूखाने से एक खबर आई है की २७-५-०९ को छपी "जिन्दा लाशों की बस्ती" नामक एक पोस्ट चोरी हो गयी है चंडूखाने के जासूस पूरी सरगर्मी से तलाश कर रहे हैं पुलिस भी कागजी खाना पूर्ति करके जगजाहिर जवाब दे चुकी है खोजने वाले को एक सिंगल समोसा और हाफ
टैग: समाज
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निदा फाज़ली

माननीय,आदरणीय,सम्माननीय,पहलवानी श्री समीर भइया को ये निदा फाज़ली साहब की गजल समर्पित करता हूँ उनकी 20 अगस्त की पोस्ट टैक्सस की यात्रा पे हम हैं कुछ अपने लिए कुछ हैं ज़माने के लिए घर से बाहर की फ़ज़ा हँसने हँसाने के लिए यूँ लुटाते न फिरो मोतियों वाले मौसम
Aug 27 2009 12:22 AM
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मुल्ला नसरुद्दीन

मुल्ला नसरुद्दीन का एक युवती से नया नया प्रेम हुआ युवती ने एक दिन कहा कभी हमारे घर भी आयिए नसरुद्दीन बोले क्यों नहीं जरुर जरुर दुसरे दिन मुल्ला युवती का पता ले कर माकन की तलाश शुरू कर दी लेकिन मकान कुछ ऐसा की मिले ही न आखिर एक वृद्ध व्यक्ति को रोककर
Aug 26 2009 10:03 PM
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मुल्ला नसरुद्दीन

मुल्ला नसरुद्दीन के पडोसी ने पूछा तुम्हारा लान तो बड़ा प्यारा है,मैंने भी दूब के बीज लाकर बोए है अंकुर भी आने शुरू हो गए लेकिन कौन से अंकुर दूब के है और कौन से घास पात के है यह कैसे पहचाने मुल्ला ने कहा बड़ी सीधी तरकीब है दोनों को उखाड़ के फ़ेंक दो फिर जो
Aug 26 2009 10:02 PM
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मुल्ला नसरुद्दीन

मुल्ला नसरुद्दीन १०० साल के हो गए तो उनके मित्र ने पूछा यार मुल्ला तुन्हारे १०० साल तक जीने का क्या राज है मुल्ला ने कहा २-३ दिनों तक ठहरें मित्र ने फिर पूछा २-३ दिन में कैसे बता दोगे क्या खोज बीन में लगे हो मुल्ला ने कहा नहीं दो तीन कम्पनियों से बात चल
Aug 26 2009 10:00 PM
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मुल्ला नसरुद्दीन

मुल्ला नसरुद्दीन अपन बेटे को राजनीती की शिक्षा दे रहा था उसने अपने बेटे से कहा चढ़ जा सीढ़ी पर बेटा चढ़ गया ,जब वो पूरी सीढ़ी चढ़ गया तो मुल्ला बोला अब बेटा कूद जा मैं तुझे संभाल लूँगा बेटा थोड़ा डरा सीढ़ी ऊँची कही बाप चुक गया तो हाथ से छुट गया तो कहीं हाथ
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मेरा मन

बारिश में क्यों झूमता है मन, इस मौसम में क्यों तड़पता है मन पानी की बुँदे भी गोलियों सी लगती है,हर बूंदों से आहत होता है मन समुन्दर सा अशांत क्यों होता है मन,झील सा गहरा क्यों होता है मनलहरों के किनारे जब भी आता है,अकेले में बैठ के रोता है मन
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इमान

चंद सिक्कों की खनक में बिक रहा इमान हर दफ्तर में मिल जायेंगे आपको बेईमान हर तरफ देखने को मिल जायेगा भरपूर भ्रष्टाचार ताक़ में रखे दिख जायेंगे सहिंता औ आचार सूप तो सुप अब तो चलनी भी बोलने लगी है इसलिए आज कल जूता फ़ेंक प्रतियोगिता होने लगी है
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"जिन्दा लाशों की बस्ती"

यूँ घूमते घूमते इस शहर में आ गया हूँ जिन्दा लाशों की किसी सुनसान बस्ती में आ गया हूँ हर कोई बैठा अपने ही कफ़न की तैयारी कर रहा है आदमी ही आदमी को नोच-नोच कर खा रहा है सोचा किसी हरे पेड़ की छाया में सुस्ता लेता हूँ पर यहाँ तो हर दरख्त सूखा नज़र आया है य