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कुछ तो है.....जो कि ! *

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31 Dec 2009
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अनटाइटिल्ड !

आज यहाँ मतदान का दिन था । हुँह, मतदान .. हम करें दान, ताकि वह कर सकें जनकल्याण !         बेहन माया ने सुबह सुबह मतदान किया ! मीडिया ने पर्याप्त कवरेज़ भी दिया ! अभी स्पष्ट ही नहीं है, 16-17-18-19 मई ( मोटामोटी ब
 
डा. अमर कुमार
Dec 29 2009 11:53 AM
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कभी कभी मेरे दिल में..

यह ख़्याल आता है कि, ब्लागिंग में मुआ ब्लागर आख़िर करता क्या है ...  क्या केवल यही तो नहीं,   कि   " रमैया तोर दुल्हिन लूटै बजार " ? शायद ऎसा नहीं ही होगा.. काहे कि सदियन पाछै कबीरौ पलटि के ठोकिं गये रहें, " हम त
 
डा. अमर कुमार
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माफ़ करियेगा बीच मे कूद रहा हू.

आज कट-पेस्टीय तकनीक से एक लँबी पोस्ट लिखने का जुगाड़ लग गया ! हमारे क्लास टीचर श्री अनूप शुक्ल जी कहते हैं.. वह हमरा लिखा बूझ नहीं पाते !  गुरु, आप कभी ऎसे अनाड़ी तो न थे.. ही ही तो.. कट-पेस्टीय तकनीक से लँबी पोस्ट का जुगाड़.. क्या मैं छायावादी कहल
 
डा. अमर कुमार
Dec 29 2009 11:53 AM
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कँघा आरक्षण के लिये ग़ँज़ों की गणना

बड़ा बेहूदा शीर्षक है, न ? मुझे भी लग रहा है, पर समय के पैंतरेबाजी के आगे सभी नतमस्तक.. तो मैं भी नतमस्तक !  हालाँकि ऎसे समय लोकतंत्र के हज़्ज़ाम सबसे ज़्यादा नतमस्तक हैं ! जरा ध्यान से.. आचार संहिता जारी आहे .. गड़बड़ लिखोगे तो माफ़ीनामें पर दस्तख़त कर
 
डा. अमर कुमार
Dec 29 2009 11:53 AM
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मत मानो मेरा मत, पर यह मत कहना कि मत नहीं दिया था

विष्णु प्रभाकर जी नहीं रहे । कुछेक शीर्ष अख़बारों के लिये यह ब्रेकिंग न्यूज़ न रही होगी ! अनूप जी ने उचित सम्मान दिया !  विष्णु जी ने आवारा मसीहा के लिये सामग्री जुटाने के लिये जो कल्पनातीत श्रम किया है, मैं तो केवल इसी तथ्य से ही उनका भक्त बन गया
 
डा. अमर कुमार
Dec 29 2009 11:53 AM
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नतीज़ा रहा सिफ़र ?

आज की पालीमिक्स-चर्चा ने मुझे एक बार  फिर बाध्य किया है.. कि मैं भी टपक पड़ूँ ! परमस्नेहिल लावण्या दीदी आहत हुईं.. उनकी तात्कालिक प्रतिक्रिया अपना कितना प्रभाव छोड़ पायी होगी.. यह देखना बाकी है ! मैं भी अपने साथी चिट्ठाकारों के विषय-कल्लोल पर यथाश
 
डा. अमर कुमार
Dec 29 2009 11:53 AM
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जैसा देश वैसा भेष

आम तौर पर मैं पहेली-पचड़े में नहीं पड़ता । एक सर्प पहेली जिसका उत्तर मुझे भी नहीं मालूम ! कोई बताएगा ?     इस विचारोत्तेजक पहेली ने मुझे टिप्पणी बक्से में ज़बरन ढकेल ही दिया । उत्तर देने से पहले सतर्क होकर इधर उधर देखा,  सो माहौल के
 
डा. अमर कुमार
Dec 29 2009 11:53 AM
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बिन बुलायी, एक अपूर्ण कविता

आज व्याधिग्रस्त माया श्रीवास्तव धुर 5 बजे अवतरित हुईं, टालने का प्रश्न नहीं.. पर थोड़ी व्यग्रता थी क्योंकि यह आज के परामर्श समय की अंतिम बेला थी, हिस्ट्री लेने के दौरान मेरे मुँह से ' परिवेश ' शब्द का उल्लेख  हुआ । बस, उनके पतिदेव महोदय ने मुझसे
 
डा. अमर कुमार
Dec 29 2009 11:53 AM
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क्षमा करें डा. मान्धाता

ब्लाग में आख़िर क्या लिखा जाना चाहिये..   पढ़ कर मेरी प्रतिक्रिया रोके ना रूक सकी । बड़ा अनुकूल विषय है,सो टिप्पणी के रूप में यह पोस्ट यहीं चेंप देता हूँ । डा. मान्धाता जी, आपने मेरा मनोनुकूल विषय उठाया है, अतएव.. सहमत हूँ, कि हिन्दी ब्लागिंग स्तरह
 
डा. अमर कुमार
Dec 29 2009 11:53 AM
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ऎसी आज़ादी और कहाँ, आज़ाद ख़्याल विवेचन

विवेक भाई आग लगा कर अगले हफ़्ते के लिये बाई कर गये । गोया, चर्चाकार न हुये ज़मालो हो गये । यह तीसरी बार है, जब मैं इन चिट्ठाचर्चा वालों के उकसावे में पोस्ट लिखने को मज़बूर हो रहा हूँ । भुस्स मे आग लगा कर बी ज़मालो दूर खड़ी । मेरी पिछली कई पोस्ट से तो अंदा
 
डा. अमर कुमार
Dec 29 2009 11:53 AM
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तुम पार नेट परमेश्वर तुम ही नेट पिता

ॐ जय गूगल हरे, स्वामी जय गूगल हरे फ़्रस्ट (एटेड ) जनों के संकट, त्रस्त जनों के संकट एक क्लिक में दूर करे ॐ जय गूगल हरे… जो ध्यावै सो पावै दूर होवै शंका, स्वामी दूर होवै शंका सब इन्फ़ो घर आवै, सब इन्फ़ो घर आवै कष्ट मिटै मन का ॐ जय गूगल हरे… नेट पिता तुम
 
डा. अमर कुमार
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चला बाघ मंत्री बनने !

सुबह सुबह पंडिताइन ने झकझोर मारा, " एई उट्ठो.. एई उठो न, देखो बाघ लखनऊ तक आगया  ! अरे, मैं तो अपना ही किस्सा लेकर बैठ गया, एक आवश्यक औपचारिकता तो पहले पूरी कर लूँ  ! आपसब ब्लागर भाई व भौजाईयों को  समस्त उत्तरायण पर्वों की हार्दिक शुभका
 
डा. अमर कुमार
Dec 29 2009 11:53 AM
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ग़ैरज़रूरी बहसों में अटके हुये

ऐसे क्या कारण हैं कि हिन्दी कि फॅमिली बेकग्राउंड होते हुआ भी हिन्दी विषय मे कोई डिग्री नहीं हैं बहुतो से ब्लॉगर के पास ??  क्यूँ ?? क्षमा चाहूँगा, रचना… मेरा  जैसे  आपसे मतभेद योग चल रहा है । आपका यह प्रश्न ब्लागर के सँदर्भ में तो क्या
 
डा. अमर कुमार
Oct 04 2009 09:10 PM
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क़न्फ़्यूज़ियाई पोस्ट - हमका न देहौ, तऽ थरिया उल्टाइन देब -" ᵺ ᴥ א ѫ ϡ ʢ ¿ ZZ

मसल है... खाय न देब तऽ थरिया उल्टाइन देब अर्थात, हे पाठकों यदि मुझे अपनी मर्ज़ी अनुसार पसँद नहीं मिलेगी, तो मैं परसी हुई पूरी थाली उल्टा तो सकता ही हूँ ! खेद तो यह है कि, यह सब देखते देखते हो गया, जब  मैं  ब्लागवाणी  खोल  कर टिप्पण
 
डा. अमर कुमार
Sep 28 2009 12:21 PM
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नो.. नो.. नो.. दर्पण दर्शन क्यों ?

आज सुबह सोकर उठा..वह तो देर सबेर सभी उठते ही हैं, ख़ास बात क्या है ? लेकिन आज मेरा मन कुछ भारी था, अनमना सा बाहर पड़ी कुर्सी पर बैठा शरीफ़े में आते हुये फूलों की कलियाँ गिन रहा था । वह बगल में खड़ी हो जैसे आर्डर ले रही हों, “ ब्लैक टी या नींबू पानी ? ” कुछ
 
डा. अमर कुमार
Sep 10 2009 04:47 AM
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ज़ाकिर भाई.. ओ ज़ाकिर भाई !

ज़ाकिर भाई, आपकी पोस्ट देर से देख पाया । सटीक प्रश्न उठाया है, आपने । और मैं आपकी बेबाक दृष्टि का कायल भी हूँ ।  पहले तो मैं स्पष्ट कर दूँ कि, मैं आस्थावान सनातनी हिन्दू हूँ । बहुत सारे वितँडता और प्रत्यक्ष , अप्रत्यक्ष अनुभवों के बाद मैंने पूजा करना
 
डा. अमर कुमार
Aug 16 2009 04:26 AM
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पता नहीं क्यों ?

लगता है, आजकल मैं निष्क्रीय हूँ... पूरी तौर पर तो नहीं,  कम ब कम ब्लागर पर निष्क्रीय तो हूँ ही.. पता नहीं क्यों ? इस पता नहीं क्यों का ज़वाब तलब करियेगा, तो टके भाव वह भी यही होगा कि, " पता नहीं क्यों ? " यह पता नहीं क्यों हमेशा एक नामा
 
डा. अमर कुमार
Jul 22 2009 03:29 AM
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जिन्दगी की रेल कोई पास कोई फेल

आज अभी चँद मिनटों पहले एक पोस्ट पढ़ी.. निठल्ले , सठेल्ले और ............ठल्ले :) एक गाना सुना करता था.. " जिन्दगी की रेल कोई पास फेल.. अनाड़ी है कोई खिलाड़ी है कोई " बस इसी को पकड़ लिया, " रेल जब हुईहै, तौनि डब्बवा भी हुईबे करि... डब्बवा म
 
डा. अमर कुमार
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हाँ, बात डाक्टर्स डे की हो रही है

यह है जुलाई का महीना, और  इस महीने की पहली तारीख़ हम डाक्टरों के लिये एक ख़ास मायने  रखती है । इन  पँक्तियों के लेखक को  विश्वास है कि, आप में से  अधिकाँश  कुछ कुछ  ठीक पकड़ रहे हैं । यदि ऎसा है तो, आप इन्टेलिज़ेन्ट कहे
 
डा. अमर कुमार
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विस्मृत बिस्मिल और ब्लागर च तनवीर

पहले तो यह बता दूँ कि, यह पोस्ट भँग की तरँग में नहीं लिखी जा रही है । मानता हूँ कि शीर्षक बड़ा अटपटा बन पड़ा है, बल्कि यदि मुझे स्वयँ ही टिप्पणी देनी होती, तो उसे फ़कत एक लाईन में समॆट देता, " तेली के सिर पर कोल्हू ! " पर इस शीर्षक के पीछे एक
 
डा. अमर कुमार
Jun 14 2009 03:41 AM
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एक एक्कनम एक, दो दूनी चार, तीन तियाँ नौ.. ..

ई लेयो, दुनिया चैन से रहने भी न दे.. और पूछे ’ बेचैन क्यों रहते हो ? " हम पहले ही ब्लागर से मोहोबत करके सनम.. रोते भी रहे.. हँसते भी रहे गुनगुनाय रहे थे, कि आजु एकु मोहतरमा हमसे पूछि बैठीं, " क्षमा करें डाक्साब, आप काहे के डाक्टर हैं ? &quo
 
डा. अमर कुमार
May 27 2009 05:55 AM
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नँगे सच में नहायी बहना

देख भाया, मेरी गलती नहीं हैं । आजकल हाल है कि, ’ जाते थे जापान .. पहुँच गये चीन समझ लेना ’ तो पढ़ा ही होगा । अपनी प्रतिष्ठा के प्रतिकूल एक मिन्नी सी,  सौम्य.. लजायी हुई पोस्ट देकर अपने जीवित होने की गवाही देनी पड़ी । बताइये भला.. मेरी एक चिरसँचित
 
डा. अमर कुमार
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जीवनदास को कड़ी से कड़ी सजा दी जाये

बड़े दिनों से यह “ चलता रहे.. चलता रहे.. “ देख व सुन रहा हूँ । यूँ तो मैं ’ निट्ठल्ला इफ़ेक्ट ’ से इतना पका हुआ हूँ कि, टेलीविज़न बहुत ही कम देखता हूँ । एक म्यान में दो तलवारें वैसे भी कहाँ रह पाती हैं ? अरे, निगोड़ी ब्लागिंग को शामिल न भी करें, तो भी आप
 
डा. अमर कुमार
May 27 2009 05:55 AM
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अक्षरश:

कई दिनों से ब्लागर पर सक्रिय नहीं हूं। इधर-उधर एक इक्का-दुक्का टिप्पणी ठोकी व " धन्यवाद  देने की आवश्यकता नहीं है " की औपचारिकता निभाते हुए नन्हा मन का टेम्पलेट तैयार कर दिया ।  अब क्या  करें ?   नये-नये इन्सटाल किय
 
डा. अमर कुमार
May 27 2009 05:55 AM
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अप्रासँगिक स्वगत कथन

सुबह सुबह अख़बार पढ़ दिन ख़राब करने से बेहतर लत है, चिट्ठाचर्चा ! आदत के मुताबिक आज भी पलटाया तो ..   " उपस्थित श्रीमान /  मैडम  साथ एक बेहतरीन लिंक लेकर अनूप जी को पाता हूँ, ” जो कि स्वयँ में चर्चाकार का ही टैगलाइन है, और बहुत अच्छा
 
डा. अमर कुमार