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19 May 2010
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वह रहने वाली महलों की

.....यह एक सीरियल का नाम है .......जो सहारा वन चैनेलपे चल रहा है ....इस सीरियल को देखने के बाद यह महसूस कियाएक परिवार को कैसे रहना चाहिए ....एक बेटी, एक बहु, किस तरहएक परिवार को बदल देती है ....... अगर आप ने नहीं देखा अभी तक .......भगवान् के लिए एक
 
भंगार
May 19 2010 02:58 PM
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नानू

....आज ,दो दिन से मेरे नानू को बहुत खांसी आ रही है ....अभी वह सिर्फपांच महीने का ही है ....उसकी यह तकलीफ देखी नहीं जाती .....डाक्टरगोखले की बहु को दिखाया .....उनकी दवा से बहुत फायदा हुआ ....आज सुबहमन थोड़ा रिलैक्स हुआ .... चैन से आफिस आया ........
 
भंगार
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नानू

नानू मेरा नवासा हैअभी वो तीन महीने सत्रह दिन कामुझे खूब पहचानता ...देखते ही मुस्कराने लगता ॥रंग रूप मेरी बेटी पे गया ...गुलज़ार साहब के साथ फोटो भी खिचवाया ॥उनकी गोदी में खेला ॥कवितायें जरुर लिखेगामेरा घर ....सूना हो जाएगा ...जब वो अपने घर जाएगा ...
 
भंगार
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खिलाड़ी

.......अधूरी जिन्दगी अभी तक जी रहा था मैं ....एक दिन ...माँ मुझे उठाने आयी ,सुबह के नौ बज रहे थे । गुस्से में माँ बोल रही थी , क्या होगा तेरा ?आंटी जी लडकाहै ना .....वीरू ....मालूम है ना ,तेरे साथ पढ़ता था ना .....? मैं कुछ बोला नहीं ....माँका ....रोजाना
 
भंगार
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दादाजी

मुझे आज तक दादा जी के नाम से ही जानते हैं ,बहुत नामचीन थे ,देश का वह ईनाम भी जीत चुके थे .......जिसे जीतने के लिए ,बहुत मेहनत करनी पड़ती है . उन्होंने बहुत सारी कहानियाँ ,गीत फिल्मों के ,कवितायें ....कहाँ नहीं छपे ...सरकार उन्हें पेंसन भी देती थी
 
भंगार
टैग: कहानी
Feb 18 2010 01:27 PM
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अमन की आस

रात को खाना खाते हुए ,मेरी पत्नी मेरी ही आखों में ही झांके जा रही थी । मुझसे सच जाना चाहती थी ।मेरा खाना कम ,डर जायदा मेरे अंदर जादा भरा हुआ था । मैंने खामोशी में सारा खाना खा लिया ,हाथ मुहंधो कर अपने बिस्तर पर जा लेटा ,आँखों में नीद नहीं थी ,सिर्फ आँखे
 
भंगार
टैग: अमन
Feb 16 2010 10:16 AM
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अमन की आस

Sunday, February 14, 2010अमन की आशबहुत कोशिश करता हूँ ...अपने जख्मों को भूल जाऊं ,पर वो नासूर बन कर बहता ही रहता है लाख मलहम लगता हूँ ........पर ठीक ही नहीं होने देते हैं लोग ,यह कोई और नहीं हैं ,मेरे अपने ही हैं । उसका नाम सलीम था ,उसकोअपने नाम से बड़ी
 
भंगार
Feb 15 2010 02:20 PM
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मेरी कहानियां

मुझे ,उस औरत की शक्ल ,बार बार याद आ रही थी . उसकी साड़ी का रंग मेरी आखों में कौंध जा रहा था ।उसका चेहरा मोम की मूरत जैसा था .....एक डर भी मुझसे चिपका हुआ था ...कहीं वह भूत तो नहीं था । मैं, मनको समझाता हुआ सफ़र कर रहा था ......बस वेल्वाई में रुकी सभी लोग
 
भंगार
Feb 11 2010 11:35 AM
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९१ कोज़ी होम

गुलज़ार साहब की कुछ आदतें बहुत अच्छी हैं सुबह पांच बजे उठ जाना ,और खेल के मैदान में जाना और सात बजे तक टेनिस खेलना ,घर लौट कर सुबह का अखबार देखना ,और साथ –साथ वगैर चीनी दूध की चाय पीना आठ बजे से नौ बजे तक नहाना धोना ,कुछ दवाईओं के साथ एक गिलास ठंडा दूध
 
भंगार
Feb 10 2010 12:23 PM
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९१ कोजी होम

अब सब कुछ एक जैसा हो गया मुझे चारो तरफ से घेर लिया गया है मैं अपने आप से लड़ता हुआ यहाँ तक पहुंचा ......जब वो मेरे पास रहते हैं ,मैं निश्चिन्त हो कर जीता हूँ . एक बार उन्होंने मुझे अपने पास बुला कर कहा था ,इश्वर के भक्त हो ...इसीलिए मुझे तुम्हारी चिंता
 
भंगार
Feb 10 2010 11:23 AM
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९१ कोजी होम

हम सभी सहायक ,गुलज़ार साहब की सिगरेट चुरा के पीते थे ।सभी सहायक गरीब ही थे ,और सब को सिगरेट पीने का शौक था ...डड़ू , राज सिप्पीको हम लोग बुलाते थे ....वही एक पैसे वाले थे ५५५ नाम की सिगरेट पीते थे ,बड़ीमुश्किल से एक सिगरेट देते थे ....महंगी जो होती थी ।
 
भंगार
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९१ कोजी होम

गुलज़ार साहब के बारे में कुछ लिखना ,कभी -कभी बड़ा मुश्किल हो जाता है ,उनके किस पहलु के बारे में लिखूं यही समझ में नहीं आ रहा है .....फिर भी ,अभी हाल में इक दिन कहने लगे .....तुम्हारे पिता जी ,मुझे सौंप के गये थे तुम्हे ,याद है की भूल गये ....... । मैंने
 
भंगार
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९१ कोजी होम

आज मैं गुलज़ार साहब के उन सहयोगिओं के बारे में बात करूँगा ,जो उनका जैसा बनना चाहते थे....पर बन नहीं सके ....कपड़ों की नक़ल तो जरुर की .....मैं गुलज़ार साहब की पहली फिल्म "मेरे अपने "से बात करूंगा .......गुलज़ार साहब ......के सहायक जो उनकी पहली फिल्म ...मेरे
 
भंगार
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९१ कोजी होम

गुलज़ार साहब , मुझे बूढ़े सन७३ में भी लगते थे । क्यों ? मुझे नहीं मालूमवक्त बीतता गया आज भी वैसे ही हैं ,वजह ....मुझे नहीं मालूम । जैसे बचपनेसे सीधे बुढ़ापे में आ गये , वैसे भी ,उन्हें बुढ़ापे से ज्यादा प्यार है ,आप को उनकीफिल्मों से ही पता चल जाएगा ,उनका
 
भंगार
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९१ कोजी होम

पीछे मुड के देखने की आदत नहीं है ,गुलज़ार साहब की । आज तक ,हजारो लोग मिले उनसे ,बहुत करीब से दोस्त भी हुए ....फिर किसी मोड़ पे ,छोड़ के चले गये .....जो उनके साथ चले ,वह बहुत कम लोग हैं ।उनके दोस्तों में ,एक राही साहब थे ,गुज़र गये कुछ साल पहले । शाम होते
 
भंगार
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भंगार

गुलज़ार साहब के बहुत सारे पहलु के बारेमें बात किया मैंने अभी तक , मेरी इच्छा थी ,....आप लोग उनके किसी पहलु से अवगत होनाचाहते हैं तो , मैं कोशिश करूंगा .बताने का । ... आज मैं ,उनके अकेलेपन के बारे में बात करूँगा । गुलज़ार साहब ,अकेले रहते -रहते ...अकेले पन
 
भंगार
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९१ कोजी होम

गुलज़ार साहब को गुस्सा क्यों आता है ? गुस्सा तो हर किसी को आता है ,पर गुलज़ार साहब झूठ बोलने पे गुस्साकरते हैं । झूठ बोल के भी कभी झूठ मत बोलना उनके सामने , वरना वह हो जाएगा जोकभी नहीं हुआ । आप घबरा गये होंगे ....सिर्फ आप से बात करना कम कर देंगे ... किताब
 
भंगार
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९१ कोजी होम

गुलज़ार साहब , जिद्द भी कमाल की करते हैं जैसा वह सोचते हैं वैसा ही होना चहिये ,गाने की लाइन अगर लिख दीउसको आप तोड़ मडोड़ नहीं सकते और कोशिश, भूल कर मत कीजयेगा ....काम छोड़ देगें पर लाईन नहीं बदलेंगे ,कई बार होता है ऐसा ,एकदो शायरी कीकिताबे लोग पढ़ के
 
भंगार
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९१ कोजी होम

गुलज़ार साहब की मेहमान -नवाजी ...... .......बहुत अच्छे ढंग से करते हैं ,हिन्दू धर्म में कहा गया है ....भगवान् कास्वारूप होते हैं , मेहमान । जो भी उनसे मिलने आता है ,उसके खाने -पीने का खुद ही ख्याल रखतेहैं । और अच्छी से अच्छी चीज खिलाने की कोशिश करते हैं ।
 
भंगार
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९१ कोजी होम

गुलज़ार साहब का दर्द ...................................... उनका दर्द , अपनी डायरी तक रहता है ......कभी किसी से कहते नहीं .....और जब निकला भी तो सब तक पहुंचा ........ हजार रहें , मुड़ के देखी कहीं से कोई सदा न आई बड़ी वफा से निभाई तुमने हमारी थोड़ी सी
 
भंगार
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९१ कोजी होम

गुलज़ार साहब का दर्द ..........किसी से नहीं बाँटते ....उनकी शायरी में बहता हुआ ,नज़र आयेगा ...उसी दर्द को एक खूबसूरत सी माला जरुर बना देते हैं .... जैसे .......हजार राहें ,मुड के देखीं कहीं से कोई सदा न आई बड़ी वफा से निभाई तुमने हमारी थोड़ी सी बेवफाई
 
भंगार
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९१ कोजी होम

गुलज़ार साहब को घूमने का बहुत शौक है और वह भी अकेले ,निकल जाते हैं किसी वोरआज तक यह आदत कायम है ....महीने में पांच दिन तो बाहर ही रहते हैं ...पर रहते हैं वहीं जहाँवो चाहते हैं ....एक बार की बात है .....गुलज़ार साहब को दिल्ली जाना था ...मिर्ज़ा ग़ालिब
 
भंगार
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९१ कोजी होम

वक्त के बहुत पाबंद हैं गुलज़ार साहब ,अगर आप उनसे मिलने जारहें हैं तो ,एक बात ख्यालरखना पड़ेगा ,जो वक्त कुटी साहब ने दिया है उससे पांच मिनट पहले पहुंचना पड़ेगा ...वरनाआप की मीटिंग कैंसिल हो जायेगी .......आज भी मैं वगैर वक्त लिए उनसे मिलने नहीं जाता आज भी
 
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९१ कोजी होम

हमारे शास्त्रों में कहा गया है , हर मनुष्य को सिर्फ एक वक्त का भोजन करना चाहिए ....गुलज़ार साहब एक ही वक्त भोजन करते हैं ......जब मैं उनके पास वतौर सहायक लगातो पता चला ....सुबह एक गिलास दूध पीतेहैं ........फिर शाम को खाना खाते हैं ,वह भीदो फुल्के थोड़ी सी
 
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९१ कोजी होम

भाई के बारे में जितना लिखो उतना ही कम लगता है .....हम सभी सहायक उनको भाई कहके बुलाते है । आज भी हम गुलज़ार साहब को भाई कहते है .....आप जब भी गुलज़ार साहब से मिलेंगेआप उन्हें हमेशा जागा हुआ पायेंगे ....आप को बहुत ध्यान से सुनेगें ......पर आप को यह पता
 
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९१ कोजी होम

सन ८० का दौर था । गुलज़ार साहब , के साथ जब भी बाहर जाता ....लोग उन्हें इस तरह देखतेजैसे कोई हीरो हो .....मुझे समझ नहीं आता ....इतने नामचीन कैसे हैं ? एक तो उनके सफेद कपड़ोंसे पहचान थी ...हमेशा सफेद कुर्ता और सफेद पैंट और उस पर सुनहले रंग की मोजडी । सच
 
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९१ कोजी होम

मैं सन ७३ से ले कर सन ९९ तक उनके साथ सहायक रहा ....जिस भी घटना का जिक्र करता हूँवह इसी दौर की हैं ....वैसे आज भी हमारा मिलना जुलना पहले जैसा ही है ....आज तक मुझे उनमेंकोई भी अवगुन नजर नहीं आया .....कोई भी उनके बारे में बुरा बोलता है तो ...उसकी अपनी
 
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९१ कोजी होम

बात सन ७७ की है , उस वक्त मेराज साहब गुलज़ार साहब के मुख्य सहायक थे । एक निर्माता गुलज़ार साहब को साईन करने आया ,अपनी अगली फिल्म के लिए वतौर लेखक और निर्देशक । निर्माता का नाम तो याद नहीं आ रहा है ....कुछ देर बाद मेराज साहब को गुलज़ार साहब ने अपने कमरे में
 
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९१ कोजी होम

गुलज़ार साहब , जो लोग खाने की थाली में अन्न छोड़ते हैं उन लोगों से बहुत खफा होते हैं ।बहुत साल पहले की बात है ...कभी -कधार हम सभी सहायक एक साथ गुलज़ार साहब केसाथ बैठ कर खाना खाते थे ....मेराज साहब की एक आदत थी, जल्दी -जल्दी खाना खा कर उठ जाते थेऔर प्लेट में
 
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९१ कोजी होम

नया साल आये तीन दिन बीत चुके हैं .......कुछ नहीं लिखा ....तीन दिन यह सोचते बीत गया.........मैंने क्या किया इस साल ......लगा कुछ नहीं किया ...कुछ भी ऐसा नहीं जिसे याद किया जा सके ...यादों को जो लिख रहा हूँ .....जो मैंने देखा -सुना ,इसमें कुछ भी लाट-लपेट
 
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९१ कोजी होम

एक शाम ,मैं किसी काम से गुलज़ार साहब से मिलने उनके बंगले में मिलने गया था .....मेरे पास मोटर साईकिल थी ,जो बड़े बेटे की थी ....मैं अब नहीं चलाता था ...फिर भी उसी से गया था .....वजह थी नई ....अभी कुछ महीने पहले उसने खरीदा था .....होंडा की करिज्मा थी
 
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९१ कोजी होम

फिल्म लाईन में .....अगर आप समाचार में नहीं हैं ,तो समझिये आप पीछे रह गये हैं ....आप को अपने आप को बेचने के लिए .....हमेशा ख़बरों में रहना पड़ेगा .....यह आप पे निर्भर है ....किस रूप में रहना है आपको ...हम सभी एक प्रोडक्ट की तरह हैं .....जिसे बेचने के ल
 
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९१ कोजी होम

सहारा चैनेल .....में काम कर रहा था ...तभी मेरे पुराने निर्माता जय सिंह मिले वह एक सीरियल डी डी के लिए बनाना चाहते हैं .....मुझे कहा एक कहानी दो ...जिसमें कम से कम दो सौ एपिसोड बनाया जा सके ........महीना भर लग गया कहानी खोजते -खोजते .....एक कहानी मिली
 
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९१ कोजी होम

आज तक यही देखा ....अपने सोचे कुछ नहीं होता ...जिस तरह नेचर चलता है ...वैसे ही हमें अपना जीवन चलने देना चाहिये .........जिस तरह से हम भूख लगने पे कुछ खाने को आतुर हो जाते हैं ....पर नहीं ......यही गलती हम अपने जीवन में करते हैं .........बस यही गलती हम
 
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९१ कोजी होम

दोपहर का वक्त था ,मैं घर जा रहा था । जुहू के रास्ते मुझे अपने घर जाना पड़ता है ...जुहू बीच से, जैसे आगे बढ़ा था की... अपने दोस्त शलीम आरिफ साहब को देख कर रुक गया .......हम लोग ,काम -धंदे की बात करने लगे ,मैंने अपनी बीती सुनाई ...कैसे जापान वाली फिल्म
 
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९१ कोजी होम

टोकियो से हमारा हवाई जहाज करीब एक बजे उड़ा ,घर जाने का अलग मजा था । आखों में एक ताजगी थी अपनों से मिलने की ....इस फिल्म का ४० प्रतिशत ...शूट बाकी था , जो इंडिया में करना था ...हम सभी लोग करीब आठ बजे शाम को मुम्बई पहुँच गये ....सभी लोग अपना समान ले कर
 
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९१ कोजी होम

मेरे पास दो सूटकेस हो गया था ....एक और सूटकेस इस लिए लेना पड़ा की समान ज्यादा हो गया था ....आज हम लोगो का आख़री नास्ता था ....होटल का नेपाली नौकर बहुत उदास था ...उसे भी अपना देश याद आ रहा था ...तीन साल में एक बार ,उसे अपने देश जाने को मिलता है उसके बच
 
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९१ कोजी होम

अपने देश जाने का सुख बड़ा कमाल का होता है रात कब बीत गयी पता ही नही चला ,सुबह जल्दी ही उठ गया ,अपनी अटैची में समान रखा । सी का दिया हुआ .....पैकेट एक बार जी किया ...देख लूँ .....पर सी का दिया हुआ वादायाद आया की हिदुस्तान जा कर ही खोलना ....वैसे ही रख
 
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९१ कोजी होम

सुबह देर तक सोता रहा ,हल्ला सुन कर आँख खुल गयी । फाईट मास्टर अकरम की आवाज आ रही थी , नीचे जा कर देखा ......हमारे निर्माता चंचल जी से झगड़ रहा था ....अपने पैसे मांग रहा था ...जो उसके साथ आए थे फाईटर ,उन्होंने डुप्लीकेट का काम किया था ,उनके भी पैसे अभी
 
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भंगार

अपने शहर जाने को सिर्फ़ दो दिन ही बाकी थे , मैं सोच रहा था ...कुछ वह देख कर जाऊं यहाँ से ,जो अपने लिए बिल्कुल नया हो ........ ......सुबह उठ कर शूटिंग के लिए चल दिए .......रास्ते में फाईट मास्टर मुझ से मिला और कहने लगा ....हम लोगों को अभी तक ,हमारे का
 
भंगार