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सागरिका

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28 Mar 2010
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मरो शाकुंतलम्‌ : तुम मुझे स्पर्श करोगे सूर्यकिरण बनकर

काम, प्रेम और विवाह का त्रिकोणात्मक संबंध है. मानवेतर जगत्‌ में काम का संबंध केवल शरीर तक सीमित है परंतु मनुष्यों के बीच यह संबंध मन और आत्मा तक पहुँचता है. जैसे कि रामधारी सिंह ‘दिनकर ’ ने कहा है ’सेक्स (काम) की अनुभूति शारीरिक अनुभूति होती है. किंतु
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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मनोवैज्ञानिक पाठ का अनुवाद

साहित्येतर पाठ का अनुवाद करते समय अनुवादक को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ता है वे साहित्यिक पाठ के अनुवाद की समस्याओं से कई अर्थों में भिन्न होती हैं. हम जनते हैं कि साहित्यिक पाठ में अनेक प्रकार की समाज-सांस्कृतिक अर्थ छवियाँ और शैलीगत विशेषताएँ निहित
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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विशिष्ट तेलुगु साहित्याविधा अवधान के प्रवर्तक

तेलुगु भाषा और साहित्य में उपलब्ध ‘अवधान’ प्रक्रिया वस्तुतः परंपरा से प्राप्‍त एक विलक्षण प्रक्रिया है. इस प्रक्रिया के प्रवर्तक दिवाकर्ल तिरुपति शास्त्री और चेल्लपिल्ल वेंकट शास्त्री ‘तिरुपति वेंकट कवि द्वय’ के नाम से विख्यात हैं. अष्‍टावधान, शतावधान और
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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'कुरुक्षेत्र ’ काव्य के अंग्रेज़ी अनुवादक डॉ.पी.आदेश्वर राव से साक्षात्कार

‘कुरुक्षेत्र ’ को अनुवाद करने के लिए विशेष रूप से आपने अंग्रेज़ी भाषा को ही क्यों चुना ?‘कुरुक्षेत्र ’ काव्य का अंग्रेज़ी भाषा में रूपांतरित होना इसलिए वांछनीय है कि अंग्रेज़ी विश्व की समर्थ भाषा है और विश्व साहित्य की परिकल्पना उसी के द्वारा साकार हो
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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भारतीय साहित्य की पहचान की खोज

भारत में बोली जानेवाली भाषाओं एवं बोलियों की संख्या सैकड़ों में है, लेकिन भारतीय संविधान के आठवें अनुसूची में असमिया, उडि़या, उर्दू, कन्नड़, कश्‍मीरी, कोंकणी, गुजराती, डोगरी, तेलुगु, नेपाली, बांग्ला, बोरा, मणिपुरी, मराठी, मलयालम्‌, मैथिली, संताली,
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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तेलुगु के मानवतावादी कवि श्रीश्री : शताब्दी संदर्भ

" श्रम निष्फलमै, जनि निष्‍ठुरमै,नूतिनि गोतिनी वेदिकेवाल्ल्लु,अनेकुलिंका अभाग्युलंता,अनाथुलंता,अशांतुलंता,दीर्घ श्रुतिलो, तीव्र ध्‍वनि तोविप्लव शंखम्‌ विनिपिस्तारोई "(भाव : जब शोषित लाचार होगा और शोषकों के अत्याचार बढ़ेंगे तब सारे श्रमिक व शोषित वर्ग का
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
Mar 28 2010 05:55 PM
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सवर्ण और दलित सबकी धरती एक

23 फरवरी : पुण्यतिथि पर विशेष"श्रुतुलै शास्त्रमुलै, पुराण कथलै सुज्ञानसारम्बुलैयति लोकागम वीथुलै विविध मंत्रार्थम्बुलै नीतुलै.कृतुलै वेंकटशैल वल्लभ रति क्रीड़ा रहस्यम्बुलैनुतुलै तालुलपाक अन्नय वचो नूत्मक्रियलु चेन्नगुन्‌."(संकीर्तन लक्षणमु 12)(ताल्लपाक
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
Feb 23 2010 01:20 PM
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शिक्षा में भाषा और भाषा में शिक्षा

संप्रेषण की बहुमुखी व्यवस्था का नाम है - भाषा . वह सोचने - विचारने का माध्यम है और सामाजिक संस्था भी है. साहित्यिक साधन के साथ - साथ वह शिक्षा का भी साधन और साध्य दोनों है. उसमें जहाँ संपूर्ण देश को एक सूत्र में बाँधने की शक्ति है वहीं देश को टुकडों
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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Life in Economic Terms !

Life is the two Sector Economy !Problems are the Traditional SectorSolutions are the Organised SectorBirths are the ProductionDeaths are the ConsumptionSorrows are the DistributionViolence is the ExchangeCharacters are the EnterpreneursActivities are the
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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कभी ज़मीन कभी आसमान की बातें : आठ नई किताबें

सलाखों के पीछे, कविता संग्रह / डॉ.अनंत काबरा / क्लासिकल पब्लिशिंग कंपनी, 28,शापिंग कॉम्प्लेक्स, कर्मपुरा, नई दिल्ली - 110 015 / 2009/ रु.350/- / 154 पृष्‍ठ . अनंत काबरा ने इस कविता संग्रह में इस जीवन दर्शन को काव्यात्मक अभिव्यक्‍ति प्रदान की है कि अप
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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My Strange Thoughts

My blood tingled and my heart ached with a strange, exquiste pain.I was in constant expectation and fear of something, marvelling at everything,ready for anything.My imagination played and hoveredaround the same set of ideas all the time,Like swifts
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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Nov 15 2009 06:23 PM
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यही है महानगर !

अजीब है यह जिंदगी का सफर नहीं है हमें मंजिल की ख़बर चारों ओर हैं कंक्रीट का जंगल वाह रे भाई, क्या यही है महानगर ! लाखों-करोड़ों गगनचुंबी अट्टालिकाएँ मगर नहीं दीखता है घर इस तिकड़मी संसार में बिछे हैं काँटे हर कदम पर डगर डगर पर दुनिया की भीड़ में लाखों
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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आशियाना

मैंने कुछ कहा उसने कुछ सुना दोनों ने एक दूसरे को कुछ कहते सुना एक - दूसरे के साथ जीने मरने की कसमें खाई एक - दूसरे के बीच फासले मिटा दिए मैंने तो अपना सब कुछ उसके नाम कर दिया उसीको अपना कर्ता धर्ता मान लिया उसके लिए दुनिया को पीछे छोड़ दिया अपना घर -
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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प्रलय तांडव !

धरती कराह रही थी बूँद बूँद के लिए तरस रही थी उसकी छाती फट गई थी और वह बंजर बन गई थी सभी वैज्ञानिक मिल गए मेघमंथन करने के लिए पंडित पादरी जुट गए वरुण देव को प्रसन्न करने के लिए पता नहीं भयभीत वरुण देव किस कोने में जा बैठे बच्चे बूढे सभी पानी के लिए तर
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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माँ !

माँ ! नौ महीने कोख में अपने रक्त मांस से सींचकर मुझे जन्म दिया है और अपनी छाती को चीरकर दूध पिलाया है रात भर अपलक जागती रही हर पल हर लम्हा मेरे बारे में सोचती रही ख़ुद तो कष्ट झेलती रही कंटीली राह पर चलती रही पर मेरी खुशी के लिए भगवान से हर पल याचना
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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आज की हिंदी कविता में पर्यावरण

इक्कीसवीं शती की प्रमुख चिंताओं में से एक है पर्यावरण संरक्षण की चिंता. पर्यावरण अर्थात्‌ हमारे आस-पास का वातावरण. वात्‌ (हवा) का आवरण. यह सर्वविदित है कि हवा विभिन्न गैसों का मिश्रण है जिसमें ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बन-डाई-ऑक्साइड तथा सल्फर-डाई-ऑक्स
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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टैलेंट

यादों के रिजर्व बैंक से कागज़ पे जरा कंटेंट उतार लूँ यांत्रिक सभ्यता के पुर्जे हैं हम सही टैलेंट का नाम सुना है कम क्या सभागारों में माइक पकड़कर भाषण झाड़ना टैलेंट है ! या छोटे - बड़े परदों पर हाव भाव दिखाना टैलेंट है ! हिंसा को हीरोइज्म बनाकर टीनेज ल
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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एक ही तत्व

हम दोनों एक दूसरे से ऐसे अलग हुए जैसे पेड़ से पत्ते और मेघ से पानी जब हम मिले तो यह अहसास हुआ की हम अलग नहीं हैं हम एक ही तत्व हैं जैसे फूल और खुशबू जैसे सागर और लहरें जैसे सूरज और किरणें
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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मेरे साजन

तुम सच भी हो और सपना भी अजनबी भी हो और अपना भी तुम मेरे दिल के करीब भी हो और दूर भी तुम कायनात भी हो और खुदा की करामात भी हे मेरे साजन कहूँ तो क्या कहूँ ! करूँ तो क्या करूँ !
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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राजनीति

लोग अक्सर कहते हैं राजनीति एक खेल है पर मेरे पापा कहते हैं यह एक कमर्शियल फिल्म है बहुमुखी प्रतिभा संपन्न इस फिल्म के हीरो है रोज एक नया किरदार निभाता है रोज एक नया नाम बदलता है और हीरोइन तो हुकूमत की कुर्सी है भैया ! वह तो है अपनी जगह न हिलती है न ड
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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राष्ट्रकवि सुब्रह्‌मण्य भारती पर दो पुस्तकें

तमिल साहित्य और संस्कृति की विशाल परंपरा में राष्ट्रकवि सुब्रह्‌मण्य भारती का विशिष्ट स्थान है. भारतीय राष्ट्रीय संग्राम एवं राष्ट्रमुक्ति आंदोलन में भारती का योगदान उल्लेखनीय है. जाति - पाँति एवं देशकाल की सीमाओं से अनाबद्ध, मानव मात्र के लिए आदर्श
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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‘सन्नाटे में रोशनी ’ बोती कविताएँ

हर मनुष्य को एक तरह का नशा होता है - अंधकार के गरजते महासागर की चुनौती को स्वीकार करने का, पर्वताकार लहरों से खाली हाथ जूझने का, अनमापी गहराइयों में उतरते जाने का और फिर अपने को सारे खतरों में डालकर आस्था के, प्रकाश के, सत्य के, मर्यादा के कुछ कणों क
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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उपन्यासों में जनवादी चेतना

सामाज वस्तुतः ऐसे वर्गों से बनता है जो किन्हीं निश्‍चित प्रयोजनों के लिए एक दूसरे के संपर्क में आते हैं. अर्थात्‌ समाज व्यक्तियों के पारस्परिक संबंधों की व्यवस्था है. आज समाज विभिन्न स्तरों अर्थात्‌ आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक के साथ साथ
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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‘हम दीवानों की क्या हस्ती, हैं आज यहाँ, कल वहाँ चले’

भगवतीचरण वर्मा की पुण्यतिथि 5 अक्‍तूबर पर विशेष ‘हम दीवानों की क्या हस्ती, हैं आज यहाँ, कल वहाँ चले’ भगवतीचरण वर्मा (30 अगस्त, 1903 - 05 अक्‍तूबर, 1981) ने प्रायः सभी विधाओं में सृजन किया. वे एक संपूर्ण साहित्यकार थे. लेकिन कविता वर्माजी की अंतरात्मा
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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गाँधी जयंती : ''हिंद स्वराज्य''

अक्‍तूबर का महीना आते ही सबसे पहले हम सत्य और अहिंसा के प्रतीक महात्मा गांधी (02 अक्‍तूबर,1869 - 30 जनवरी,1948) को याद करते हैं. इस उपलक्ष्य में ‘स्रवंति ’ की ओर से आपको ‘गांधी जयंती ’ की शुभकामनाएँ. इस अंक में हम महात्मा गांधी की कृति ‘हिंद स्वाराज्
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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'आज़ाद ही हो लेंगे, या सर ही कटा देंगे'

कस ली है कमर अब तो, कुछ करके दिखाएँगे, आज़ाद ही हो लेंगे, या सर ही कटा देंगे, हटने के नहीं पीछे, डर कर कभी जुल्मों से, तुम हाथ उठाओगे, हम पैर बढ़ा देंगे." - -अशफ़ाक उल्ला खाँ भारत की आज़ादी का इतिहास अविस्मरणीय घटनाओं से भरा पड़ा है. लाखों - करोड़ों
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
Oct 01 2009 12:44 AM
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हिंदी दिवस पर भाषा चिंतन

सितंबर का महीना हम हिंदी प्रचारकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इसी महीने में ‘हिंदी दिवस ’ मनाया जाता है. ‘स्रवंति ’ की ओर से आपको ‘हिंदी दिवस ’ की शुभकामनाएँ देते हुए हम यहाँ एक सद्यः प्रकाशित पुस्तक ‘हिंदी भाषा चिंतन ’ की ओर आपका ध्यान
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
Oct 01 2009 12:44 AM
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जो चले गए, उनको प्रणाम !

हिंदी के लोकप्रिय रंगकर्मी, निर्देशक, कवि और अभिनेता, ‘आगरा बाज़ार ’ और ‘चरनदास चोर ’ जैसे सुप्रसिद्ध नाटकों के लेखक हबीब तनवीर का निधन 08 जून, 2009 को 85 वर्ष की आयु में हुआ. हबीब तनवीर का जन्म 01 सितंबर, 1923 को रायपुर (छत्तीसगढ़) में हुआ था. उनका
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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कुँवरनारायण

चारों ओर लौह - मौन गुम्बद - सा अंधकार जिसकी दीवारों से टकराती आवाजें ये केवल सन्नाटे को और झनझनाती हैं. *** *** *** *** समय के केंचुल सरीखा रास्ता. मारकर खाया हुआ - सा पड़ा चारों ओर खाली नगर - पंजर ... लुंज दीवारें - सहारे डरी, सिकुड़ी पड़ी कुछ परछाइ
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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अज्ञेय के निबंध

प्रयोगवाद और नई कविता के विशिष्ट कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय ’ का स्वर अत्यंत वैविध्यपूर्ण है. एक कुशल कवि होने के साथ साथ वे एक सफल उपन्यासकार, कहानीकार, निबंधकार और संपादक भी हैं. अज्ञेय मध्यवर्ग की पीड़ा से भली भाँति परिचित हैं. मध्यवर्ग
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
Sep 24 2009 03:18 PM
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ऋता शुक्ल की कहानियों में सामाजिक जीवन

ऋता शुक्ल की रचनाओं में तिवारीपुर का परिवेश दीखता है. किसी भी रचनाकार के लिए परिवेश से कटकर रहना संभव नहीं होता . अतः ऋता शुक्ल ने भी अपनी रचनाओं के माध्यम से अपने परिवेश में निहित व्यष्टिगत एवं समष्टिगत समस्याओं को उकेरा है और जनमानस को सोचने के लिए
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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मुक्तिबोध के सौंदर्य सिद्धांत

हम जानते हैं कि नई कविता के प्रमुख हस्ताक्षर गजानन माधव मुक्तिबोध की रचनाएँ पाठकों और आलोचकों के लिए चुनौती हैं. उनकी प्रतीकात्मकता एवं बिंब विधान मौलिक तथा किंचित दुरूह भी है. उनकी रचनाओं में सामाजिक चेतना, लोक मंगल की भावना, सौंदर्यानुभूति तथा जीवन के
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
Sep 18 2009 11:51 PM
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बालशौरि रेड्डी और उनका साहित्य

दक्षिण भारत में हिंदी प्रचार-प्रसार में वरिष्ठ लेखक बालशौरि रेड्डी का योगदान सराहनीय है. उन्होंने उपन्यास, कहानी, नाटक, निबंध, समीक्षा, आलोचना आदि साहित्यिक विधाओं के माध्यम से दक्षिण भारत की संस्कृति को हिंदी पाठकों तक पहुँचाने का काम किया है. मौलिख
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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विचार

जीवन रंग मूल तत्व का अंश भाव तरंग
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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हक़ की लडाई

शक्ति बिन शिव अधूरा राधा बिन श्याम नारी बिन नर अधूरा सीता बिन राम । फिर भी ये औरत सोच ! सोच उन सुविधाओं के बारे में जो प्रकृति ने तुझे दी औ' समाज ने खसोट लीं... पैदा तो हुई तू पुरुष के साथिन के रूप में दैया रे दैया ! आज तो उसीकी गुलाम बन गई ! कभी किस
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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डिग्रियाँ

डिग्रियाँ भी तो बिन पेपरवेट सब बेकार
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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कालापानी : अंडमान की दंडी-बस्ती

बंगाल की खाड़ी में स्थित अंडमान द्वीप समूह, म्यान्मार व सुमात्रा के बीच, 219 मील की लंबाई में फैला हुआ है। यूनानियों का भ्रम था कि अंडमानवासी नरभक्षी थे और यूरोपीय अन्वेषकों ने तो अंडमान द्वीप समूह को 'नरभक्षियों की भूमि' का नाम दिया था। ऐसी अफवाहें
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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यादें

प्रेत सी छाया बन यादें पीछा करती बार -बार। भूलभुलैया - सा लगता है मेरा यह जीवन संसार॥
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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उड़ती परियां

रंग बिरंगे पंखोंवाली ओ मनभावन तितली! किन कलियों की गलियों में तू अपना रूप लुटाने निकली? ओ बसंत की रानी तितली ! रंग बोलती तेरी भाषा ; तेरे साथ थिरकती रहती सबके मन की मंजुल आशा। रंग मखमली, अंग पवन सा, कली - कली की सगी सहेली; ओ तितली! तू लगती सुंदर परिय
 
गुर्रमकोंडा नीरजा
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श्रम संस्कृति के किसान कथाकार विवेकी राय

भोजपुरी के प्रथम ललित निबंधकार एवं आलोचक विवेकी राय ग्राम जीवन और लोक संस्कृति के प्रति समर्पित एक ऐसे कथाकार हैं जिनका कृतित्व वैविध्यपूर्ण एवं बहुआयामी है। वे स्वयं अपने आपको ‘किसान साहित्यकार’ कहते हैं। वे अपनी ज़मीन से इस तरह जुड़े हुए हैं कि उनक
 
गुर्रमकोंडा नीरजा