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काव्य मंजूषा

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17 Jun 2010
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सब मसालेदार है जी...

सुबह के नाश्ते में मसालेदार पराठा,   मसालेवाली चाय, हाथ में मसालेदार अख़बार में मसालेदार ख़बरों की चुस्की, मसालेदार लंच का डब्बा,    मसालेदार स्कूटर को, मसालेदार किक लगा कर,मसालेदार ट्राफिक में, मसालेदार झड़प में ख़ुद को झोंकता,
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सुनी थी रात उसकी हिचकियाँ ....

Banff  नॅशनल पार्क ..मोरेन लेक...लहू में कौंध रहीं हैं बिजलियाँसाँसों में चलने लगीं आँधियां यादों का आँचल अब उड़ने लगानज़रों में तैर गई परछाईयाँ थके थके से मेरे ख़्वाब जागते रहे सितारे लेते रहे अंगडाईयाँ जाने कौन गुज़रा दीवार के
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सब्ज़ीवाले की व्यथा कथा.....'अदा' की जुबानी....एक लोकगीत (शायद )

सोचा इस दुखियारे की बात आप तक पहुँचा दूँ.....
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कैसे मान लूँ बोलो, तो कोई पासबाँ नहीं मेरा...

ये तस्वीर कनाडा में Banff नेशनल पार्क की है... ये ज़मीं नहीं मेरी, वो आसमाँ नहीं मेराठहरी हूँ जहाँ मैं आज, वो जहाँ नहीं मेराहोगा क्या जुड़ कर भी, उस अनजाने हुज़ूम से  वो लोग नहीं अपने, वो कारवाँ नहीं मेरा बच कर लौट आती हूँ, गज़ब सागर की लहरों से
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पहुँचेंगे शिखर पर वो जिन्हें विश्वास होता है .....

जब मन उदास होता है ख़याल के पास होता है जो दिल में दर्द उठता हैलब पे उच्छ्वास होता है पहुँचेंगे शिखर पर वो जिन्हें विश्वास होता है सच्चा प्रेम मिल जाए फिर मधुमास होता है सुधि सा जो साथी होजीवन ख़ास होता है कलह प्रेमी मनुज का तोबस विनाश होता है कुटिलता का
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बिखरे हैं मसले हुए इंसानियत के फूल, जो पास ही तहज़ीब के बिस्तर पर पड़े हैं .......

मत पूछो हमें कौन हैंकिस ओर चले हैं,समझो कि मुसाफिर हैंऔर सराय में पड़े हैं,राह रोक लेते हैं   कुछ पहचाने से लोग,काम जिनके छोटे हैंपर नाम बड़े हैं,हर लम्हा हम मौत कीसरहद पर खड़े हैं,तूफ़ान से खेल लेतेकभी बवंडर से लड़े हैं,बिखरे हैं, मसले हुए इंसानियत के
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कर भी लो अब ज़रा मुझसे खुल कर बातें.....

यूँ हीं होतीं हैं कभी बेहुनर बातेंदिल करता हैकभी नगमाग़र बातेंपलकें झुक जातीं है  और बन जातीं है ज़बान फिर कर ही जातीं हैं  कभी अश्कतर बातेंतेरी ख़ामोशी अब  जानलेवा होती जाती है कुछ तो करो मुझसे भी  हमसफ़र बातेंदिल की बात कहींदिल
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ये जो चटका है झटका है तुम्हारा ....(पैरोडी...ये जो चिलमन है दुश्मन है हमारी )

ये जो चटका है झटका है तुम्हारा ऐसा तगड़ा नहीं फटका है तुम्हारादूसरा और कोई यहाँ क्यूँ रहे मेरी ही पोस्ट के दरमियां क्यूँ रहेहाँ यहाँ क्यूँ रहेये यहाँ क्यूँ रहेहां जी हां क्यूँ रहेये जो हाट लिस्ट है, बाप का है हमारानहीं दिख सकता, कभी पोस्ट तुम्हारानापसन्दी
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छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए ...'अदा' की आवाज़...

छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिएये मुनासिब नहीं आदमी के लिएप्यार से भी ज़रूरी कई काम हैंप्यार सब कुछ नहीं ज़िंदगी के लिएतन से तन का मिलन हो न पाया तो क्या -२मन से मन का मिलन कोई कम तो नहींखुशबू आती रहे दूर से ही सहीसामने हो चमन कोई कम तो नहींचाँद मिलता
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फिर भी बनाऊँगी मैं, एक नशेमन हवाओं में........

मेरे इश्क का जुनूँ,रक्स करता है फिजाओं में, तेरे फ़रेब मसलते हैं मुझेमेरे ही ग़म की छाँव में, हर साँस से उलझती हैहर लम्हा ज़िन्दगी की,  लिपटती जाती है देखोउम्र की ज़ंजीर पाँव में, ये पागलपन मेरा, बरामद करवाएगा मुझे,कब तक छुपूँगी कहो सदियों
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मैं लड़की होने की सजा पा रही हूँ .....

'इज्ज़त' 'आबरू'ये महज शब्द नहीं हैंनकेल हैं,जिनसे बंधा है मेरा वजूदये कील हैं, जिनसे टंगा है मेरा मनये रस्सी है जिससेबंधा है मेरा पेटऔर ये हथकड़ी हैं जिससे बंधे रहते हैंमेरे हाथ-पाँव.... ता-उम्रफिर भी मैं इन्हें बचा रही हूँ.... मैं लड़की होने की सजा पा
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आप की नज़रों ने समझा, प्यार के काबिल मुझे......आवाज़ 'अदा' की.....

धड़कन भी कुछ काबू में हो साँस भी अब ज़रा संभलेमेरी जाँ मेरी उम्र भी इस तूफाँ के मुक़ाबिल ठहरेजिस दम देखा था उसने पहली बार नज़र भर केवो लम्हा मेरी ज़ीस्त का इकलौता हासिल ठहरेज़ीस्त=जीवन आवाज़ 'अदा' की.....आप की नज़रों ने समझा, प्यार के काबिल मुझेदिल की ऐ
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इमेज.....सुहानी चांदनी रातें हमें सोने नहीं देती.....आवाज़ 'अदा' की है ...

हमेशा की तरह इस बार भी कछुवे और खरगोश की दौड़ प्रतियोगिता में, खरगोश हार गया...सबको बहुत हैरानी हुई, सबने सोचा कि अब तक तो खरगोश को सबक सीख ही लेना चाहिए था ...आख़िर क्या वजह है कि ये फिर हार गया ...!  लिहाजा सारे मिडिया वाले पहुँच गए खरगोश से उसकी
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जो हमने दास्ताँ अपनी सुनाई आप क्यों रोये.....

आवाज़ 'अदा' की....जो हमने दास्तां अपनी सुनाई, आप क्यों रोएतबाही तो हमारे दिल पे आई, आप क्यों रोएहमारा दर्द\-ए\-ग़म है ये, इसे क्यों आप सहते हैंये क्यों आँसू हमारे, आपकी आँखों से बहते हैंग़मों की आग हमने खुद लगाई, आप क्यों रोएबहुत रोए मगर अब आपकी खातिर न
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इस तरह के affairs ग़लत होते हुए भी जीवन में कितने रंग भर देते हैं...

आज कल पूर्णिमा में बहुत बदलाव देख रही हूँ...पूर्णिमा एक खूबसूरत सी लड़की जो मेरी कलीग है, आज तक उसे अपने काम से काम रखते हुए, चुपचाप काम करते हुए और सच पूछा जाए तो कुछ उदास सा ही देखा था....उसके पति  हैं और उसके दो बेटे हैं...हमारे ऑफिस में कई
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हम तो शेरों को कुछ नहीं समझते फिर गीदड़ों की क्या बिसात....

  ज्यादातर ब्लोग्गर्स का मानना है कि ब्लॉग जगत में गुटबाजी है...और हो भी क्यों नहीं यह मानवीय गुण है  एक तरह की पसंद रखने वाले लोग एक साथ रहना पसंद करते हैं...अपने शहर में ही देखिये..हिन्दुओं का मोहल्ला और मुसलमानों का मोहल्ला जैसी जगहें देखने
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हर दिल जो प्यार करेगा वो गाना गायेगा.....आवाज़ 'अदा' की....

आवाज़ 'अदा' की....हर दिल जो प्यार करेगा वो गाना गायेगादीवाना सैंकड़ों में पहचाना जायेगादीवाना ...आप हमारे दिल को चुरा के आँख चुराये जाते हैंये इक तरफ़ा रसम\-ए\-वफ़ा हम फिर भी निभाये जाते हैंचाहत का दस्तूर है लेकिन, आप को ही मालूम नहीं, ओ~ ओ~ ओ~जिस महफ़िल में
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मैं बहुत सेलेक्टिव हूँ....

मैं बहुत सेलेक्टिव हूँअपने पिता को अपनी माँसे ज्यादा प्यार करती हूँलेकिन मैं माँ पर भी मरती हूँमुझे सफ़ेद साड़ी ज्यादा पसंद हैक्योंकि वो मुझपर फब्ती हैफिर भी कोई-कोई काली साड़ीभी मुझ पर जंचती है मुझे मीठा पसंद हैमैं खट्टा नहीं खाती हूँ लेकिन आम का अचारचट
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भरी दुनिया में आख़िर दिल को समझाने कहाँ जाएं......आवाज़....'अदा' की...

आवाज़....'अदा' की...भरी दुनिया में आख़िर दिल को समझाने कहाँ जाएंमुहब्बत हो गई जिनको वो दीवाने कहाँ जाएंलगे हैं शम्मा पर पहरे ज़माने की निगाहों केजिन्हें जलने की हसरत है वो परवाने कहाँ जाएंसुनाना भी जिन्हें मुश्किल छुपाना भी जिन्हें मुश्किलज़रा तू ही बता ऐ
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ब्लॉग की ज़मीं आज करबला सी है .....

अब इस घर में अजब उदासी है ख़ुशी तो है पर बहुत ज़रा सी है जाने कितने राह भटक रहे हैं ये और कुछ नहीं बदहवासी है कहना है उनसे न करो तार-तारकल ही तो रिश्तों की क़बा सी है अहमकी के हक़ पर हो रहा यलग़ारब्लॉग की ज़मीं आज करबला सी है क़बा = ढीला
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सत्यम शिवम् सुन्दरम.... आवाज़....'अदा' की...

किड ब्लोग्गर असोसिएशन  के तरफ से आप सबको बहुत बहुत धन्यवाद....यह एक प्रिलिमिनरी राउंड था...भारी संख्या में आप लोगों ने हमारा उत्साह बढाया है....और हम नत मस्तक हैं ....आप सभी इसके सदस्य बना लिए गए हैं....हमारी सिर्फ एक ही शर्त है...प्रेम..प्रेम और
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किड ब्लोग्गर असोसिएशन....बन रहा है जी....आइये और मेम्बर बनिए...

आज कल संगठन बनाने की बड़ी होड़ लगी हुई है ...मुझे भी कुछ ब्लोग्गर्स की बड़ी फ़िक्र हुई है ...सोचा ऐसा ही रहा तो, ये बेचारे तो कहीं के नहीं रहेंगे...लिहाजा..एक नया संगठन बनाने की सोची है...आप सब जो भी ख़ुद को इस काबिल समझते हैं ज्वाइन कर सकते हैं....सबकुछ
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'राज' फिल्म से ये गीत है.....आवाज़ 'अदा' की....

'राज' फिल्म से ये गीत है...आपके प्यार में हम सँवरने लगे....आवाज़ 'अदा' की....
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जो बिना खर्चे बिना असले के जीत की गारंटी दिलाती है ......

 कहीं मंदिर में घंटी बाजेकहीं अजान सुनाती हैपाँच बजे पौ फटते ही वो पाने भरने जाती हैचारों चौहद्दी नलका के मजमा बड़ा लगाती हैबाल्टी और देगची की कतार बढ़ती ही जाती है मेरी बारी पहले आये हर रण-नीति अपनाती है ऐसी पोलिटिक्स चलती है कि पोलिटिक्स ख़ुद
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एक बार फिर मैं पराधीन हो गई .....पिया ऐसो जिया में समाय गयो रे.....

पुनः प्रकाशित..... क्या हाल है गुप्ता जी, आज कल नज़र नहीं आते हैंकौनो प्रोजेक्ट कर रहे हैं,या फोरेन का ट्रिप लगाते हैंगुप्ता जी काफी गंभीर हुए, फिर थोडा मुस्कियाते हैंफिर संजीदगी से घोर व्यस्तता का कारण हमें बताते हैंअरे शर्मा जी राम कृपा से, ये शुभ दिन
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जाईये आप कहाँ जायेंगे...ये नज़र लौट के फिर आएगी...

आजकल गानों से ही काम चलाइये....इनदिनों इतनी ज्यादा व्यस्त हूँ कि ये भी नहीं बता सकूँगी कि कितनी व्यस्त हूँ ... कमेन्ट भी नहीं कर पा रही हूँ, आपलोग प्लीज बुरा मत मानियेगा...गाने रिकॉर्ड करने में ज्यादा समय नहीं लगता है इसलिए इसी से काम चला रही हूँ....बहुत
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बाबू जी धीरे चलना ....आवाज़ 'अदा' की है....

गाना: बाबूजी धीरे चलना चित्रपट : आर पार संगीतकार : ओ. पी. नय्यरगीतकार : मजरूह सुलतान पुरीआवाज़  : गीता दत्त लेकिन यहाँ आवाज़ 'अदा' की है....बाबूजी धीरे चलनाप्यार में ज़रा सम्भलनाहाँ बड़े धोखे हैंबड़े धोखे हैं इस राह में, बाबूजी ...क्यूँ हो
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दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये.....'अदा' की आवाज़.....

गाना : दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये चित्रपट : उमराँव जान  संगीतकार :  खय्याम  गीतकार :  शहरयार  गायक :  आशा भोसलेयहाँ 'अदा' की आवाज़.....  दिल चीज़ क्या है, आप मेरी जान लीजियेबस एक बार मेरा कहा, मान लीजियेइस अंजुमन
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लघुकथा...तन से सुन्दर ..मन से सुन्दर..(गीत : आगे भी जाने न तू, पीछे भी जाने न तू, जो भी है, बस यही एक पल है...)

लीला और शीला दो बहनें ..लेकिन दोनों  में ज़मीन आसमान का फर्क था...लीला रूपवती, चंचल और मुखर जबकि शीला बहुत सीधी-सादी और चुप रहने वाली....दोनों धीरे धीरे बड़ी हो गईं..माँ-बाप को उनकी शादी की बहुत फ़िक्र हुई... रिश्तों की तलाश की गयी..परन्तु जो भी आता
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दिखता नहीं है इक परिन्दा भी कहीं पर आस का ....

मेरा दिल है इक जज़ीरा इल्म और अहसास का रूह लिए बेरंग शक्ल तेरी आरज़ू की प्यास कादर्द का आसमान कितना ख़ाली ख़ाली लग रहा दिखता नहीं है इक परिन्दा भी कहीं पर आस कातुम हमारी ज़िन्दगी में अब आ ही जाओ मेहरबाँएक अरसा काट डाला हमने तो बनवास का ज़िन्दगी सँवरेगी इक
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ताजमहल बनाम तेजो महालय ..... एक नजरिया यह भी...........

(ईमेल से प्राप्त हुआ है यह आलेख..)बी.बी.सी. कहता है........... ताजमहल........... एक छुपा हुआ सत्य.......... कभी मत कहो कि......... यह एक मकबरा है.......... प्रो.पी. एन. ओक. को छोड़ कर किसी ने कभी भी इस कथन को चुनौती नही दी कि........ "ताजमहल शाहजहाँ ने
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मेरी प्रतीक्षा को अमर मत होने देना....!!! ........अभी न जाओ छोड़ कर के दिल अभी भरा नहीं.....

सबसे पहले एक गीत...आवाज़ 'अदा' की...अभी न जाओ छोड़ कर के दिल अभी भरा नहीं.....ज़रा सा एक्सपेरिमेंट किया है इसमें...सुनिए और बताइए कैसा है..??और अब एक छोटी सी कविता... सजल आँखों से तुम्हें देखूँ,तुम अंतहीन नभ हो ना ! खग सी मैं,अज्ञात स्पर्श का परिचयसाथ लेकर
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आओ हुज़ूर तुमको सितारों में ले चलूँ....आवाज़ 'अदा' की है.......

आवाज़ 'अदा' की है.......आओ हुज़ूर तुमको सितारों में ले चलूँदिल झूम जाए ऐसी बहारों में ले चलूँआओ हुज़ूर आओ(हमराज़ हमखयाल तो हो हमनजर बनोतय होगा ज़िन्दगी का सफर हमसफ़र बनो) (२)चाहत के उजले उजले नजारों में ले चलूँदिल झूम जाए ऐसी बहारों में ले चलूँआओ हुज़ूर
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मन डोले मेरा तन डोले ...

मन डोले मेरा तन डोले...फिल्म: नागिन संगीतकार : हेमंत कुमार (कहते हैं असल में संगीत दिया था हेमन कुमार के सहायक रवि और कल्याणजी ने)गीतकार : राजेंद्र कृष्ण गईका : लता फिलहाल 'अदा' (मन डोले मेरा तन डोले मेरे दिल का गया करार रे ये कौन बजाये
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पर बैठा रहा सिरहाने पर .....

अब प्यार मुझे तन्हाई कर बढ़ के शाने पर रख दे सर तू साथ है तो सब है गौहरवर्ना है सब कंकर पत्थरअब कौन ग़मों का हिसाब करे बस खुशियों पर ही रक्खो नज़र तेरा प्यार सुलगता है दिल में और आँखों में खुशनुमा मंजरइक सच्ची बात कही थी कलसो आज चढ़ूँगी सूली परबोला ही
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भगजोगनी .....

जुल्फें सियाह खोल दूँ तो, मौसम हो बिजलियों के देखूं तेरी तकदीर में हैं, कितने साए रकीबों के मेरा देर से आना, तेरे रुख़ की वो उलझी शिकनखुलेगा फिर दफ़्तर वही, हज़ार शिकायतों केतुम्हें जाँ बना लिया मगर, अभी सोचना होगा मुझे जाने मेरी तक़दीर में
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जिक्र हो फूलों का बहारों की कोई बात हो....

जिक्र हो फूलों का बहारों की कोई बात हो रात का मंजर हो सितारों की कोई बात होरेत पर चलते रहे जो पाँव कुछ हलके से थेग़ुम निशानी हो अगर इशारों की कोई बात हो नाख़ुदा ग़र भूल जाए जो कभी मंजिल कोईमोड़ लो कश्ती वहीं किनारों की कोई बात होआ ही जाते हैं कभी
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वाह !! मर्दानगी...जिंदाबाद....

जानते हो !!वह घोषित चरित्रहीन है, क्योंकि : वो किसी को अपने पास फटकने नहीं देती, ईट का जवाब पत्थर से देती, तुम्हें आईना दिखा देती है,हर बार तुम हार जाते हो,अपनी ही नज़र में गिर जाते हो,फिर ऊपर उठने की जुगत लगाते हो,उसके नाम पर चढ़कर तुम; ऊपर पहुँच
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और हर फ़िकरे कश की एक औक़ात होती है.....

मसक जातीं हैं,  अस्मतें,किसी के फ़िकरों की चुभन से,बसते हैं मुझमें भीहया में सिमटेआदम और हौवा,जो झुकी नज़रों सेदेखते हैं, खुल्द के फल का असर,दिखाती हैंसही फ़ितरत, इन्सानों की,उनकी तहज़ीब-ओ-बोलियाँ, वर्ना पैरहन के नीचे  सबका सच एक
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मैं बंद गली का हूँ वो आखिरी मकाँ ....

मेरे दिल में अब वो हाजत नहीं रहीतुम्हें बाँधने की अब आदत नहीं रही जिस्म तो खड़ा हुआ है बस यहीं कहींरूह से मगर कोई निस्बत नहीं रही मैं बंद गली का हूँ वो आखिरी मकाँ  रास्तों को जिसकी जरूरत नहीं रहीनिस्बत=रिश्तागीत तो आप सुन चुके हैं लेकिन फिर सुन