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20 May 2010
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व्यंग्य कविता- गोत्र तो नहीं मिलता

एक अगोत्र प्रेमी का शपथ पत्र वीरेन्द्र जैनप्रिये, तुम कितनी सुन्दर हो, तुम्हारा रंग, जैसे कि चाँदनी को मिल जाये ऊषा का संगऔर हमारा गोत्र भी नहीं मिलता तुम्हारा रूप जैसे कि तराशा हो तुम्हें किसी कुशल कलाकार ने और हमारा गोत्र भी नहीं मिलताद्वापर में जिन
 
वीरेन्द्र जैन
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व्यंग्य- पाकिस्तान में अमर सिंह्

क्या पाकिस्तान में भी अमर सिंह होते हैं? वीरेन्द्र जैन खबर पाकिस्तान से आयी है और हिन्दुस्तान के कुछ खास लोगों को बहुत भायी है खबर सानिया मिर्ज़ा के बारे में है जिसने अपने हिन्दुस्तानी भाइयों को टाटा करके पाकिस्तान के शोयेब मलिक से शादी रचाईउसके वलीमे की
 
वीरेन्द्र जैन
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व्यंग्य कविता - स्टे

व्यंग्य कविता स्टे_____ वीरेन्द्र जैन् एक साधु ने अपने स्वार्थ हेतुएक सेठ को बरगलायाऔर उसे नारकीय पीड़ा कादिल दहला देने वालालगभग आंखों देखा हाल सुनाया।बोला, -रे अधम,जब यम के दूततुझ लेने आयेंगेतो तेरे ये सारे ठाट बाटधरे के धरे रह जायेंगेलेकिन सेठ बिल्कुल
 
वीरेन्द्र जैन
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गज़लनुमा रचना- पीठ पीछे आइना काला मिला

एक गज़लनुमा रचना पीठ पीछे आइना काला मिला [आदरणीय आलोचकों से क्षमायाचना सहित] वीरेन्द्र जैनसबको चिकनी शक्ल दिखलाता मिला पीठ पीछे आइना काला मिला रास्ते आवागमन के दूसरे सामने से द्वार पर ताला मिलावोट देकर आदमी बाहर हुआ फिर न कोई पूछने वाला मिला बैठकों में
 
वीरेन्द्र जैन
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कविता- आँखन देखी- कागद लेखी

आँखन देखी- कागद लेखी[क्रांति हमारी रही कागज़ों पर] वीरेन्द्र जैन उतरा है आकाश कागजों पर पतझर ओ’ मधुमास कागजों परकागज़ के नक्शे पर देश बना करते रहे विकास कागजों परनिकली सभी भड़ास कागजों परहोते रहे प्रयास कागजों परवे सबके सब आतंकी घोषित जो न करें विश्वास
 
वीरेन्द्र जैन
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पैरोडी- सिंहासन खाली करो उमाजी आती हैं

सिंहासन खाली करो उमाजी आती हैं [रामधारी सिंह दिनकर की स्मृति से क्षमायाचना सहित] वीरेन्द्र जैन ------------------------------------------------------ भोपाली ठंडी बुझी राख सुगबुगा उठी गेरुआ वस्त्र की आग दहकती जाती है दो राह काल के रथ को ये मामा
 
वीरेन्द्र जैन
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व्य्ंग्यजल-न कहीं है उमंग होली में

व्यंगजलहोली में------------यहाँ वहाँ न कहीं है उमंग होली मेंसभी लगाये हैं बाहर से रंग होली मेंउन्हीं के दिल में एक वायलिन सी बजती हैबजा रहे हैं जो बैठे मृदंग होली मेंमिले न मन, न मिली आत्मा, न इच्छाएंशारीर नाच रहे संग-संग होली मेंरहा जो ईद में, दीवाली
 
वीरेन्द्र जैन
Feb 25 2010 12:53 PM
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दो होली की कवितायें

दो होली की कवितायें1- उन पर रंग लगाऊं कैसेजिन मुख कालिख मली हुयी हैउन पर रंग लगाऊं कैसे?उजली खादी वाले निकलेचोर, उचक्के, पापी, बगुलेभगवा भेष किया है धारणउसमें छुपे हुये हैं रावणजनता बहुत सरल सीता सीनिर्वासित होकर वनवासीलव कुश भक्त ''माइकिल'' के
 
वीरेन्द्र जैन
Feb 21 2010 09:15 PM
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गीत - दीवारों पार बस कलेंडर बदला बदला है

नया नया क्या है शाम वही थी सुबह वही है नया नया क्या हैदीवारों पर बस कलैंडर बदला बदला हैउजड़ी गली, उबलती नाली, कच्चे कच्चे घरकितना हुआ विकास लिखा है सिर्फ पोस्टर परपोखर नायक के चरित्र सा गंदला गंदला हैदीवारों पर बस कलैंडर बदला बदला हैदुनिया वही, वही
 
वीरेन्द्र जैन
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दुष्यंत की ग़ज़ल की पैरोडी -2

दुष्यंत की ग़ज़ल की पैरोडी -२ ( मूल मक्ता -ये जुबां हमसे सीं नहीं जाती जिन्दगी है कि जी नहीं जाती) नौकरी हमसे की नहीं जाती क्योंकि चमचागिरी नहीं आती अफसरों के विशाल बंगलों पर नाक हमसे घिसी नहीं जाती राजाशाही चली गयी होगी देश से अफसरी नहीं जाती उनके क
 
वीरेन्द्र जैन
Dec 29 2009 11:53 AM
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सेठों के अखबार में

सेठाें के अखबार में प्राइम मिनिस्टर पहुंचे झांसी हैल्थ मिनिस्टर आयी खांसी गड़बड़ कुछ हो गयी रेल के मंत्रीं ज़ी की कार में ऐसे समाचार आते हैं सेठों के अखबार में अफसर रिशवतखोर बहुत है रेल महकमा चोर बहुत है एमएलए फ़ंस गये मास्टरनी दीदी के प्यार में ऐसे समाच
 
वीरेन्द्र जैन
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दो व्यंग्य कविताएं

दो व्यंग्य कवितायें वीरेन्द्र जैन 1. जी हाँ मैं भोपाल से ही बोल रहा हूँ जी हाँ मैं पूरे होशो हवाश में कह रहा हूं कि नहीं रिसी कोई गैस इन दिनों पर पता नहीं ये सारे लोग एक ही दिशा में क्यों भाग रहे हैं हो सकता है कि वहाँ साहित्य संस्कृति के पुरस्कारों
 
वीरेन्द्र जैन
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व्यंग्य गीत -

लेकिन तेरा नाम नहीं है वीरेन्द्र जैन् तख्त वही है ताज वही है गीत वही है साज़ वही है अब तक सूरज चाँद वही है लेकिन तेरा नाम नहीं है अब तक लूटमार वैसी की वैसी होती है लेकिन जनता और किसी के नाम को रोती है देश वही है राज वही है शोषण भरा समाज वही है अब तक स
 
वीरेन्द्र जैन
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व्यंग्यजल बिल्लियों ने रास्ते काटे बहुत्

व्यंग्यजल वीरेन्द्र जैन बिल्लियों ने रास्ते काटे बहुत हुये होंगे उन्हीं के घाटे बहुत गाल पर बच्चे के जब बोसा लिया खाये अपने गाल पर चांटे बहुत वो मिलन की रात आंखों में कटी यार को आये थे खर्राटे बहुत जब से उनके हुश्न को कांटा कहा मेरी राहों में बिछे का
 
वीरेन्द्र जैन
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व्यंग्यजल --अब तो बाहर है अपने बूते से

अब तो बाहर है अपने बूते से बात होने लगी है जूते से घूमते फिर रहे हैं आवारा साँड़ जो बँध रहे थे खूँटे से एकता की दुहाई के दाता खुद नजर आ रहे हैं टूटे से ये मदारी भी खूब हैं यारो पूछते कुछ नहीं जमूरे से कितने बारह बरस हुये प्यारे घूरे अब भी लगे हैं घूरे
 
वीरेन्द्र जैन
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व्यंग्यजल भूत प्रेतों को भज रही दुनिया

व्यंग्जल भूत प्रेतों को भज रही दुनिया भूत प्रेतों को भज रही दुनिया आदमी से उलझ रही दुनिया हम भी गृह लक्ष्मी को ढोते हैं हम को उल्लू समझ रही दुनिया ऐसे आभुषणों के फैशन हैं बम मिसाइल से सज़ रही दुनिया उसकी ज़ुल्फों से होड लेती है जाने कब से सुलझ रही दुनि
 
वीरेन्द्र जैन
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व्यंग्यजल -दशहरा है तो क्या कर दूँ ,दिवाली है तो क्या कर दूँ?

व्यंग्यजल वीरेन्द्र जैन दशहरा है तो क्या कर दूँ, दिवाली है तो क्या कर दूँ हमारी जेब जब खाली की खाली है तो क्या कर दूँ तुम्हारे पास नेता के लिए अलफाज अच्छे हैं हमारे पास बस अश्लील गाली है तो क्या कर दूँ इसे समझाउँ तो वो लोग हत्थे से उखड़ते हैं मुहल्ले
 
वीरेन्द्र जैन
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व्यंग्यजल - पास आई दिवाली

पास आयी दिवाली वीरेन्द्र जैन घर में उगी है घास पास आई दिवाली सब हो रहे उदास पास आई दिवाली लक्ष्मी की ओर इस प्रकार घूरतीं मिलीं जैसे खड़ी हो सास पास आई दिवाली बत्ती बना के दीये में डालेंगे डिग्रियाँ एम.ए ओ, बीए पास, पास आई दिवाली अपना भी अगर होता तो सी
 
वीरेन्द्र जैन
Oct 14 2009 07:51 PM
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व्यंग्जल - तिरी बिगडी बना देगी

मुहब्बत का मसाला डाल कर कुछ भी बना देगीतुम्हें रबड़ी लगेगी वो अगर खिचड़ी बना देगीभजन में गीत है संगीत है, आनन्द ले लेनासमझना मत कि वो देवी तिरी बिगड़ी बना देगीसियासत आदमी की जात को बचने नहीं देगीकभी अगड़ी बना देगी, कभी पिछड़ी बना देगीइधर मँहगाई ने मारा उधर
 
वीरेन्द्र जैन
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व्यंग्य - जब तक खुदा सलामत चाचा

व्यंग्य ग़ज़ल जब तक खुदा सलामत चाचा इंसानों की आफत चाचा मुल्ला मरे पादरी मरता मरता ग्रंथी पंडित चाचा पाँचों वक्त नमाजें पूजन फ़िर भी नहीं हिफाज़त चाचावे भी ज़र ज़मीन मालिक जो रब से रखें अदावत चाचा जो रहता ख़ुद डरा छुपा सा भेजो उसको लानत चाचा सहते सहते उमर
 
वीरेन्द्र जैन
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व्यंग्यजल - इतना पैसा कहाँ से आया नेताजी

हमें नहीं क्यों ये बतलाया नेताजीइतना पैसा कहाँ से आया नेताजीनोट छापने की मशीन लगवायी हैया घर में चकला चलवाया नेताजीहमने तो तुमको संसद में भेजा थामगर वहाँ तू नजर न आया नेताजीजनता ने अपनी आवाज तुझे सोंपीतू ने जब तब हाथ उठाया नेताजीकहता रहता था कि भूख नहीं
 
वीरेन्द्र जैन
Sep 02 2009 10:54 PM
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व्यंग्य बिल क्लिंटन के साथ लौटने का सहस

व्यंग्यक्लिंटन के साथ लौटने का साहसवीरेन्द्र जैन''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''अमेरिकी महिला पत्रकारलौरा लिंगऔर यूना लीतुमने साहस की एक नई मिसाल बना लीतुम्हारी उम्र की युवतियां तोदिलों में घुसने की कोशिशें करती हैंऔर करंट
 
वीरेन्द्र जैन
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व्यंग्यजल -हमारा बहुमत है

हमारा बहुमत हैहम जो चाहे करें, हमारा बहुमत हैदेश समूचा चरें, हमारा बहुमत हैवोट बटारें नैतिकता पर, फिर उसकीमिल कर चटनी करें, हमारा बहुमत हैआलू प्याज सरीखे मत भी बिकते हैंदेकर ऊंची दरें, हमारा बहुमत हैमँहगाई से, दंगों से, हुड़दंगों सेलोग जियें या मरें,
 
वीरेन्द्र जैन
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दुष्यंत की ग़ज़ल की पैरोडी

मूल गजल का मतला था- मेरे गीत तुम्हारे पास सहारा पाने आयेंगे मेंरे बाद तुम्हें ये मेरी याद दिलाने आयेंगे मिला निमंत्रण सम्मेलन का गीत, सुनाने आयेंगे गीतों से ज्यादा अपना पेमेंट पकाने आयेंगे बड़ बड़े कवि ले आयेंगे प्यारी प्यारी शिष्याएं निज बीबी से दूर र
 
वीरेन्द्र जैन
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व्यंगाज़ल नैनो में मां बाप समां न पायेंगे

व्यंग्यजल इसमें केवल बीबी बच्चे आयेंगे 'नैनो' में माँ-बाप समा ना पायेंगे दादाजी का रिश्ता, कोई रिश्ता है वे पापा के पापाजी कहलायेंगे माल विदेशी बिके स्वदेशी झख मारे अंधे जब पीसेंगे कुत्ते खायेंगे इतना बोझ न डालो कंधे झुक जायें अपनी डोली फिर किससे उठव
 
वीरेन्द्र जैन
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एक ग़ज़लनुमा रचना

पुराने वक्त में ये हादसा कई बार होता था अंधेरी रात में भी चाँद का दीदार होता था तुम्हारे दूर जाने ने बदल कर 'बॉर' कर डाला तुम्हारे साथ रहते जो कभी 'घर-बार' होता था उसी के वास्ते सब हो रहा अब इस जमाने में हमारे वास्ते जो देश का बाजार होता था कहीं खबरे
 
वीरेन्द्र जैन
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नई पीढी के नाम संदेश

नई पीढी के नाम ----------- मुझको तो अगली पीढी को केवल यही सिखाना है तुमको अपने माँ बापों की बातों में नहिं आना है हम तुमको कुछ नीति सिखायें ऐसी तो सामर्थ्य नहीं हम तुमको उपदेश पिलायें तो उसका कुछ अर्थ नहीं हम जीवन भर रहे नपुंसक हमने अत्याचार सहे बेईम
 
वीरेन्द्र जैन
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नाम लिखा दाने दाने पर

नाम लिखा दाने दाने पर जिसने खाने वालों का उसने ही क्यों लिखा न उस पर नाम उगाने वालों का बर्फी चमचम केक फलूदा डोसे चिकिन मसालों तक नहीं लिखा पर नाम हमारा उसने रोटी दालों तक ऐसा लगता है लिख डाला नाम भतीजों सालों का नाम लिखा दाने दाने पर जिसने खाने वालो
 
वीरेन्द्र जैन
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स्वर्ग का स्टे

एक साधु ने अपने स्वार्थ हेतु एक सेठ को बरगलाया और उसे नारकीय पीड़ा का दिल दहला देने वाला लगभग आंखों देखा हाल सुनाया। बोला, -रे अधम, जब यम के दूत तुझ लेने आयेंगे तो तेरे ये सारे ठाट बाट धरे के धरे रह जायेंगे लेकिन सेठ बिल्कुल भी नहीं घबराया क्योंकि वह
 
वीरेन्द्र जैन
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नोट सौ सौ के टूट जाते हैं

ज़िन्दगी इस कदर उदास हुयी अब वो नाराज़ तक नहीं होती नोट सौ सौ के टूट जाते हैं और आवाज़ तक नहीं होती
 
वीरेन्द्र जैन
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कुछ व्यंग्य कवितायें

ं जब एक हट्टे कट्टे भिखारी ने मांगा आटा तो अपनी कड़की छुपाने के बहाने मैंने उसे बुरी तरह डांटा पहले तो उसने सहा फिर उत्तर में कहा आपकी इस दशा पै हँसूं या रोऊं आप तो ऐसे डंाट रहे हैं जैसे में आटा नहीं वोट मांग रहा होऊं ं घोड़े और घास का कैसा अद्भुत सामं
 
वीरेन्द्र जैन
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मेरा साठवां जन्म दिन

मेरा ६० वां जन्म दिन १२ जून को मेरा ६० वां जन्म दिन था जिसे मेरे मित्रों ने धूमधाम से मनाया . व्यंग्य लेखक एवं वरिष्ठ आई ऐ एस अधिकारी ज़ब्बार ढाकवाला सुप्रसिद्ध कथा लेखिका उर्मिला शिरीष और प्रगति लेखक संघ के कार्यकारी महासचिव शैलेन्द्र कुमार शैली ने
 
वीरेन्द्र जैन
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सठियाने का दिन

आज में प्रमाणपत्र के साथ सठिया गया हूँ , सुबह से सहानिभूति के फोन आ रहे हैं और में उन्हें जल्दी ही सेम टु यू की शुभकामनाएं लौटा रहा हूँ
 
वीरेन्द्र जैन
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हम चुनाव में हार गए

ज्योतिषियों के सब भविष्यफल बिल्कुल ही बेकार गये बाबा तेरी आशीषें ले हम चुनाव में हार गये मंत्र पढे थे पूजा की थी अनुष्ठान करवाये थे जाने कितने ओझाओं के झाड़ू भी तो खाये थे कई पुरोहित हवन यज्ञ के पैसे ले हरिद्वार गये बाबा तेरी आशीषें ले हम चुनाव में हा
 
वीरेन्द्र जैन