0
व्यंग्य कविता- गोत्र तो नहीं मिलता
एक अगोत्र प्रेमी का शपथ पत्र वीरेन्द्र जैनप्रिये, तुम कितनी सुन्दर हो, तुम्हारा रंग, जैसे कि चाँदनी को मिल जाये ऊषा का संगऔर हमारा गोत्र भी नहीं मिलता तुम्हारा रूप जैसे कि तराशा हो तुम्हें किसी कुशल कलाकार ने और हमारा गोत्र भी नहीं मिलताद्वापर में जिन
- 12 00 टिप्पणियां [2]
May 20 2010 07:24 PM


Shuffle








